युवा कवयित्री। कोलकाता में शिक्षिका।

स्त्रियां बचा लेती हैं

स्त्रियां अकसर बचा लेती हैं एक मुट्ठी अनाज
कहती हैं इससे बरकत रहती है
सहेज रखती हैं नए-पुराने कपड़े
जाने कब कौन से अवसर पर काम आ जाएं
गाहे-बगाहे बचाती हैं
ज्यादा या थोड़ा तेल
जरा सी शक्कर और कुछ छंटाक मसाले
कुछ ऐसे कि न तो भोजन से स्वाद कम हो
और न ही जीवन से मिठास कम हो
बचा रखती हैं एक टूटे-तड़के फ्रेम में
एक पुरानी तस्वीर
‘ये तब की बात है जब बबुआ इत्ता सा था’
पुराने बरतन
कमजोर कुर्सियां
और यहां तक कि माचिस की एक तीली
इनके छोटे-से भंडार घर में
हर भूली-बिसरी चीज के लिए जगह है
और तो और बचा लेती हैं
आईने पर चिपकी बिंदी
नींद की एक झपकी
आंख की कोर में अटका एक आंसू
जब नहीं बचा पातीं
अपने लिए प्यार और इज्जत के साथ-साथ
दो घड़ी का सुकून।

एक मुकम्मल कविता

मैं अपनी खिड़की से
एक बूढ़े आदमी को छत पर
पूरे परिवार के कपड़े सुखाते हुए
रोज देखती हूँ
सोचती हूँ
यह कोई मजबूरी है
या परिवार के प्रति प्रेम
या फिर मात्र समय काटने का एक तरीक़ा
मैं उसकी आंखों में झांकने की कोशिश करती हूँ
जो बिना इधर-उधर देखे
एकाग्र भाव से रस्सी और कपड़ों पर टिकी हुई हैं
लेकिन कहीं कुछ नहीं मिलता
उम्र के साथ भावनाओं का अतिक्रमण
अकसर लोगों को भावशून्य कर देता है
जहां जीवन न जी पाने की तड़प
और मृत्यु का भय
अनुभव की आंच में तपकर एकमेव हो जाता है
जीवन की तमाम अस्थिरताओं को समेटे हुए ही
एक व्यक्ति
शायद सबसे सहज सबसे स्थिर हो सकता है
इतना सहज कि
सुख और दुख की समस्त विडंबनाओं से परे
हर कारण कारणहीन हो सके
बुढ़ापा एक नामुकम्मल जिंदगी की
सबसे मुकम्मल कविता है।

संपर्क : गुरुकुल ग्रांड, फ्लैट नं. 4, फेज-1, ब्लॉक-1, 4था तल, ठाकदारी, न्यूटाउन, ग्लैक्सी हेल्थ केयर सेंटर के पास, पोकाशिमपुर, कोलकाता-700102 मो.9330655983