यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत।पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिंदी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक।तीन उपन्यास और चार कहानी संग्रह प्रकाशित।

टोरंटो के नॉर्थ यॉर्क इलाके की व्यस्ततम रियल इस्टेट एजेंट लोरेन का आज पैंतालीसवां जन्मदिन है।मुड़कर देखती है तो स्वयं को उस जगह पाती है जहां होने के सपने कई युवा देखते हैं।लग्ज़री गाड़ी, बड़ा बंगला और दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़ती आमदनी।वह इसलिए भी खुश थी कि आज कोई मीटिंग नहीं है, और न ही किसी क्लाइंट को घर दिखाने जाना है।आराम से कॉफी की चुस्कियां भरते हुए अखबार पढ़ रही थी और फुरसत के क्षणों में आसपास बिखरी प्राकृतिक छटा को निहार रही थी।पतझड़ से पहले अलग-अलग रंगों में पत्ते अपना सौंदर्य लुटा रहे थे; मानो हर पत्ते में प्रतिस्पर्धा हो रही हो कि कौन अपनी भरपूर छटा बिखेर कर श्रेष्ठता की दौड़ में सबसे आगे है।पीला, केसरिया, लाल, कत्थई, मरून, इन रंगों के हल्के-गहरे इतने अलग-अलग स्वरूप थे कि आंखें तय ही नहीं कर पातीं कि इसे कौन से रंग का नाम दिया जाए।

इस खुशनुमा सुबह का आनंद उठाते कुछ ही मिनट बीते होंगे कि लोरेन का फोन घनघना उठा।आवाज किसी महिला की थी।उसने अपना नाम मार्था बताया और कहा कि वह अपना घर बेचना चाहती है।आज किसी से भी मिलने का मन नहीं था लोरेन का।आज वह खुद के साथ ही रहना चाहती थी।परंतु आवाज से लग रहा था कि शायद कोई वृद्ध महिला है।और कोई होता तो जरूर मना कर देती लेकिन सीनियर सिटिजन को प्राथमिकता देना उसकी आदत है।सबकुछ भुलाकर लोरेन ने उससे उसके घर का पता लेकर नोट किया व शाम को मिलने की योजना बनाई।लिखे पते पर पहुंचने से पहले अपना होम वर्क किया कि किस तरह की प्रॉपर्टी है और लगभग कितनी कीमत होगी।जब लोकेशन पर पहुंची तो उसे बाहर ही कुर्सी पर बैठे एक महिला दिखी।

वही थी घर की मालकिन, मार्था।न चश्मा पहना था, न ही आसपास कोई व्हील चेयर या लाठी थी जिसके सहारे वह चलती हो।पूरी तरह स्वस्थ।लोरेन ने जब उसे ध्यान से देखा तो लगा वह अस्सी के ऊपर तो होगी।कपड़ों की सलवटें अधिक थी या चेहरे की, यह बता पाना मुश्किल था।हां, उसके चेहरे की सौम्य मुस्कान में एक मिठास थी; जीवन की संतृप्ति की, या फिर लोरेन को देखकर घर बेचने की आश्वस्ति की।

अपने चेहरे को ध्यान से पढ़ते देख मार्था ने लोरेन से कहा- ‘मैं यहाँ बहत्तर साल से रह रही हूँ।’

‘बहत्तर साल! यानी आप?’

‘हाँ, आपका अंदाज सही है कि मैं कितनी बड़ी हूँ, मेरी उम्र छियानवे वर्ष है।मैं यहां चार वर्ष और रहकर शतक पूरा करना चाहती थी, लेकिन अब लग रहा है कि शायद देर हो जाएगी।’ यह कहते हुए मार्था की आंखों में आया उत्साह धीरे-धीरे लुप्त हो गया।

लोरेन का मुंह खुला का खुला रह गया! तकरीबन बीस साल से वह इस पेशे में है, लेकिन इतने सीनियर क्लाइंट से कभी नहीं मिली।स्तब्ध-सी सामने बैठी मार्था को देख रही थी।आंखों ने मार्था के चेहरे से हटने से मना कर दिया।इस रोमांच को महसूसते होंठों की मुस्कान जैसे फूट पड़ रही थी।औपचारिकता को पूरा करते बोली- ‘आपसे मिलकर अच्छा लगा मार्था।’

कुछ ही पलों में मार्था की उम्र का यह रोमांच, आशंकाओं के घेरे में तबदील हो गया।घर की बाहरी हालत को देखकर अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि यह प्रॉपर्टी बहुत बुरी हालत में होगी।सामने स्वीट होम की तख्ती टंगी थी जो जंग खा-खा कर काली पड़ गई थी।उस पर उकेरे गए शब्दों का अनुमान भर लगाया जा सकता था, क्योंकि स्वीट शब्द काली-कत्थई परतों में दबा हुआ दम तोड़ चुका था।उखड़ा-बिगड़ा होम शब्द दिख रहा था बस।स्वीट होम अंदर से कितना कड़वा होता है, इसका अनुभव लोरेन को पहले भी कई बार हुआ था।

यह तो सिर्फ बाहर टंगी एक तख्ती थी, अंदर का नजारा इसके जरिए रील की तरह घूम रहा था।घर में बदबू होगी।घर का हर ऊर्जा-पुर्जा ढीला होगा।यह घर बहत्तर सालों से संचित वस्तुओं का कबाड़खाना होगा।हाल ही में एक सत्तर वर्षीय महिला का घर बेचने से पहले पूरी तरह से उसका जीर्णोद्धार करवाना पड़ा था।मात्र पैंतालीस वर्षीय लोरेन के स्वयं के घर में ही इतनी अनावश्यक वस्तुएं थीं तो यहां न जाने क्या होगा।एकाध ट्रक भर जाएगा, कूड़ा-कचरा फेंकने में।

‘क्या मैं आपका घर देख सकती हूँ?’

‘अभी नहीं।जब आप पक्का कर लें कि आप मेरा घर बेचने के लिए तैयार हैं, तब आप घर देख सकती हैं।’

‘मतलब?’

‘मतलब यह कि पहले हम कांट्रेक्ट पर साइन करें, उसी के बाद मैं आपको घर दिखाऊंगी।’

सारी शंकाएं सच हो रही थीं।यानी घर की हालत बहुत खराब है इसीलिए मार्था खतरा उठाना नहीं चाहती।जाहिर सी बात है कि अगर एजेंट घर देख ले और मना कर दे, तो सारे लोगों में यह बात फैल जाएगी, फिर कोई नहीं आएगा उसकी मदद करने।सड़े हुए खाने की बदबू, पुराने कपड़ों की सीलन और जालों से अटे-पटे घर की पूरी तस्वीर लोरेन की आंखों में घूमने लगी।बाहर रखी कुर्सियां और बरामदा इतनी खराब हालत में थे तो अंदर की हालत कैसी होगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था।

फिर भी एक बात पूछी लोरेन ने- ‘आखिरी बार घर की मरम्मत कब हुई थी?’

उसने कहा- ‘छब्बीस साल पहले किचन की मरम्मत हुई थी।’

यह एक और हैरत भरी बात थी।लोरेन को अपने नए घर में भी हर साल कभी प्लंबर तो कभी इलेक्ट्रीशियन की जरूरत पड़ जाती है।यहां इतने वर्षों में अब लाइटें काम नहीं कर रही होंगी।नल टपटप कर रहे होंगे।बाथरूम में जमी काई की याद आने लगी, पैर रखा नहीं कि फिसल जाएगी।घर की दीवारें भी झर-झर गिरने वाली होंगी।बदहाल दीवारों में जानवरों, चींटियों और कॉक्रोच के झुंडों ने अड्डे बना रखे होंगे और फर्श पर गंदगी की परतें इस कदर चढ़ गई होंगी कि…

बाहर बरामदे में इस समय लोरेन जहां बैठी थी, वहां से जगह-जगह ऐसे धूल-धूसरित सुराख दिख रहे थे।इस क्लाइंट को हाँ करने से पहले एक बार सोचने को दिल कर रहा था।ऐसी प्रॉपर्टी बेचने में बहुत परेशानी होती है।महीनों और कभी-कभी तो साल भी हो जाता है, प्रॉपर्टी बिक नहीं पाती।दूसरी ओर क्लाइंट की उम्र देखते हुए मानसिक तनाव अलग रहेगा।अपने पेशे से इतर सोचे तो लोरेन की नैतिकता की कसौटी पर ये मानक नहीं थे।उम्र का लिहाज करके उसे मार्था की मदद करनी होगी।चाहे जो हो।मानवीयता के नाते भी इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा।इस प्रॉपर्टी का सौदा तो वह जरूर करेगी।चाहे उसे खुद खरीदना पड़े, चाहे उसकी गंदगी को साफ करने में अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़े।

लोरेन को पशोपेश में देखकर मार्था बोली- ‘अगर आपको मेरा मकान बेचने में कठिनाई लग रही हो तो बता दीजिए।कोई दबाव नहीं है।’

अपने विचारों से तुरंत बाहर आ गई लोरेन- ‘अरे नहीं, बिलकुल नहीं मार्था।मैं कल इसी वक्त पेपर्स के साथ आऊंगी।अपने कारीगरों को भी साथ लाऊंगी ताकि वे मुझे एस्टीमेट दे सकें कि घर को प्रेजेंटेबल बनाने के लिए कितना खर्च होगा।हाँ, एक निजी सवाल है, क्या मैं आपके परिवार के बारे में जान सकती हूँ?’

‘आपको मुझसे ही बात करनी है।कोई परिवार वाला बीच में नहीं होगा।मैं हूँ, आप हैं और घर है।’

‘जी ठीक।’

मार्था का यह सपाट जवाब लोरेन को संदेश दे गया।सीधा-सा अभिप्राय यह था कि परिवार के बारे में मत पूछो।शायद वह डरती होगी कि एजेंट कहीं पीछे न हट जाए।वह नहीं चाहती थी कि जब तक कोई पक्की तरह से बेचने के लिए तैयार न हो जाए, तब तक अंदर आए।सीधी-सपाट बातों के आदी लोग लोरेन को हमेशा अच्छे लगे हैं।फिर भी उसे यह समझने में मुश्किल हो रही थी कि यह सपाट बयानी घर की अंदरूनी हालत को सामने क्यों नहीं ला रही।इस गुत्थी में उलझने के बजाय उसे इंतजार करना ही बेहतर लगा।

आशंकाओं के बीच एजेंट लोरेन ने उसी दिन रात में इलाके का चक्कर लगाया।सड़क किनारे अपनी गाड़ी पार्क करके टहलते हुए कुछ पड़ोसियों से बात करनी चाही।वे सभी ऋतुओं की तरह बदलते रहे थे।इसीलिए किसी को भी मार्था के बारे में कोई खास जानकारी नहीं थी।हाय-हलो के अलावा किसी की भी मार्था से कोई और बात नहीं हुई थी।सबने उसे इसी कुर्सी पर बैठे देखा था।उसके घर के अंदर की झलक कभी नहीं देखी थी।

बहरहाल, घर की बदहाली से रूबरू होने के लिए लोरेन तैयार थी।वैसे भी रियल इस्टेट वाले कचरा घर को भी इस तरह प्रस्तुत करके बेचने के लिए तैयार करते हैं कि घर की काया पलट हो जाती है।उसने घर जाकर तुरंत अपने प्लंबर, पेंटर, इलेक्ट्रिशियन, सबको अलर्ट संदेश भेजा कि एक घर को तैयार करना है।एक सप्ताह के अंदर उस घर की शकल बदल देनी है।साथ ही मकान मालिक की उम्र का वास्ता देकर कहा- हम जितनी जल्दी हो सके क्लाइंट को अपना घर बेचने की खुशी देना चाहते हैं, जो हमारे ही एरिया में शायद सबसे सीनियर सिटीज़न हैं।

लोरेन जानती थी कि यह काम इतना आसान नहीं है।इसके पहले भी कई बुजुर्गों के घर बेचने में दम निकल गया था।उन सभी के घर बहुत बुरी हालत में पाए गए थे।वे सब अस्सी वर्ष की आयु के अंदर थे।मार्था इसी घर में उम्र की सर्वाधिक सीढ़ियां चढ़ चुकी हैं।अंदर की हालत किसी कूड़े-कचरे के ढेर से कम न होगी, यह तय था।बाहर का हाल वह करीब से देख चुकी थी।हर कोने से बेचारगी नजर आ रही थी।बरामदे में घुसने वाला कारपेट बरसों से बदला नहीं गया था।उसके नीचे छुपे धूल के कण पैरों की आहट मिलते ही बाहर आकर हवा में उड़ने लगते।उस पर पड़ी हुई तीन कुर्सियां और एक मेज अपनी कहानी खुद कह रही थीं।जगह-जगह से पोपड़े निकल-निकल कर गिर गए थे।कहीं मटमैला, कहीं गहरा, तो कहीं रंग विहीन हिस्सा था।कुर्सी के हत्थे, कुर्सी की टांगें और उसकी पीठ अलग-अलग रंगों की दास्तान सुनाते अपने बरसों पुराने जन्म की दास्तान बयां कर रहे थे।

लोरेन के पेशे में ऐसे अनुभव बहुत मायने रखते हैं।इस तरह के सौदों में सिर्फ फायदा-नुकसान नहीं देख सकती वह।मार्था के चेहरे की हर झुर्री में लोरेन अपने लिए एक संदेश पढ़ रही थी कि उसके घर को बेच दे ताकि वह अपनी आखिरी जिम्मेदारी पूरी कर सके।मरम्मत करवाते समय भी मार्था यहीं रहेगी, इसलिए एक-एक कमरा ठीक करवाया जाए।उसे किसी प्रकार की तकलीफ पहुंचाए बगैर मकान बेचना एक मुश्किल काम था।

मार्था की निजी भावनाएं अनायास ही लोरेन के जेहन में थीं; बहत्तर साल की अवधि एक घर में बिताना! जाहिर है कि उसे अपने घर की ईंट-ईंट से प्यार होगा।लंबे अरसे से उसके साथ कोई था तो ये घर की दीवारें थीं, उसके सुख में, उसके दुख में।

आखिरकार, वह समय आया जब लोरेन को घर देखना था।प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, और घर की पुताई के लिए पेंटर, ये सभी लोग आने वाले थे।वे सभी अपने-अपने कार्यों का अनुमानित खर्च बताएंगे ताकि लोरेन प्रॉपर्टी की कीमत तय करे।लोरेन और मार्था दोनों वहीं बरामदे में बैठे।तीनों कारीगर सड़क पर खड़े लोरेन के इशारे की प्रतीक्षा कर रहे थे।पहले मार्था और बाद में लोरेन ने पहले कांट्रेक्ट पर हस्ताक्षर किए।लोरेन ने अपना कमीशन बहुत कम कर दिया था।सामान्यत: वह पांच प्रतिशत लेती थी, इस सौदे के लिए चार प्रतिशत तय करके अपनी सौहार्दता का परिचय दिया।

हस्ताक्षर करने के बाद मार्था ने लोरेन से कहा- ‘अब आप घर देख सकती हैं।’

‘क्या मैं अपने स्टाफ को भी साथ ले लूं?’

‘जरूर।’

 

लोरेन और टीम के तीनों सदस्य अंदर घुसे।मुख्य दरवाजे के बाद एक भारी पर्दा था।पर्दा हटाकर लोरेन ने ऐसे प्रवेश किया मानो बहुत प्रतीक्षा के बाद किसी अभेद्य किले में प्रवेश मिला हो।उसके मुंह से एक चीख निकली, ‘ओह माय गॉड!’ पीछे वालों तक संदेश पहुंचा- गंदगी का पहाड़ देखने के लिए तैयार हो जाओ।सारे एक-एक करके पर्दा हटा कर अंदर गए।एक के बाद एक हवा में आवाजें थीं- ‘ओह माय गॉड!’

सबके हाथ अपने चेहरे पर थे, अपना मुंह और नाक ढंके हुए।विस्फारित आंखें चारों ओर देख रही थीं।यह क्या था! ऐसा लगा जैसे वे परियों के महल में प्रवेश कर रहे हों।खूबसूरत परदों के रंग से मैच होती दीवारों पर वैसे ही हल्की-हल्की प्रिंट वाले वॉल पेपर थे।हर शो-पीस में, पेंटिंग में हाथ की कलाकारी के नमूने साफ देखे जा सकते थे।थोड़ी-थोड़ी देर में हवा में हिलते झीने परदे एक तरह की खुशबू-सी फैलाते, जब जगमगाती रोशनी में उनका रंग बदल जाता।

लिविंग रूम से बेड रूम की ओर बढ़े तो देखा, पिंक रंगों की छटा थी वहां।सब कुछ हल्के गुलाबी रंगों में! यहां तक कि वहां सजे फूल भी गुलाबी थे।ऐसा नर्म और कोमल गुलाबी रंग जो आंखों से होता दिल के पोर-पोर में समा जाए।नाजुक और मुलायम अहसास के साथ अगले बेड रूम में प्रवेश किया।यहां नील गगन के तले-सी नीली छत थी।नीले रंग की बहार कमरे की हर सजावट में झलक रही थी।मानो नीले आकाश के नीचे किसी ने अपना शयनकक्ष सजाया हो।तस्वीरों से झांकते नीले फूलों की करिश्माई चित्रकला का अद्भुत नमूना देखते ही बनता था।

किचन में हर चीज अपनी जगह थी।राइस कूकर में चावल पक रहे थे।निश्चित ही पुराना बासमती चावल है, तभी तो उससे निकलती भाप के साथ हौले-हौले चावल की हल्की-सी खुशबू फैल रही थी।इस बात का सबूत देते हुए कि किचन में रोज खाना बनता है।इतनी सफाई लोरेन के घर में भी नहीं थी।प्लंबर ने सारे नल चेक किए।इलेक्ट्रिशियन ने भी लाइटें चेक की।पेंटर को बेहतरीन रंगी-पुती दीवारों के साथ वॉल पेपर से सजाए कमरों में करने लायक कुछ नहीं दिखा।मात्र स्वीट होम की तख्ती को साफ करने और बाहर बरामदे के कारपेट को फेंकने के अलावा कोई काम नहीं था।

साथ आए तीनों लोगों ने अपनी ड्यूटी बजाई।इलेक्ट्रिशियन ने जगमगाती नई तख्ती लगाने, पेंटर ने बरामदे के रंग-रोगन के लिए पुराना कारपेट उठाकर अपने ट्रक में डाला।प्लंबर के लिए कोई काम ही नहीं था वहां।वह मुस्कराता हुआ चला गया।

लोरेन को बचपन की परियों की कहानियों की याद आ गई जब उनके रंग-बिरंगे महलों को देखकर आह और वाह निकलती थी।आज एक जीवंत परी से मुलाकात हुई थी।परियों के महल में रहती वह परी मार्था।शतकीय पारी खेलती उसकी जादुई मुस्कान उसके व्यक्तित्व को अपने घर की तरह सजा रही थी।

‘कैसे मार्था, कैसे!’ कौतूहल से लोरेन ने पूछा।

‘ऐसे ही, खाली समय था, घर की दीवारें थीं, यूं मेरा समय सजता रहा।’

जाने की इजाजत लेते हुए लोरेन ने मार्था को बहुत प्यार से देखा- ‘क्या मैं आपको झप्पी दे सकती हूँ।’

मार्था ने अपने हाथ फैला दिए।दुबली-पतली-नाटी मार्था को श्रद्धा की झप्पी देकर लोरेन ने उठा लिया।जितने हाथ ऊपर कर सकती थी उतना ऊपर।मार्था बहुत ऊपर थी, आसमान की ऊंचाइयों को छूती; लोरेन उस आसमान में उड़ती रेत का एक कण मात्र।

लोरेन मुस्कराते बोली- ‘मार्था, एक बात बताओ, बरामदा इतना गंदा क्यों रखा?’

‘ताकि लोगों को लगे कि अंदर कुछ नहीं है।कोई चोर-लुटेरा भी बुढ़िया को तंग न करे।’ मार्था हँस पड़ी थी, खुलकर।पके हुए पुराने चावल की महक अब पूरी तरह वातावरण में घुल-मिल गई थी।

संपर्क : 1512-17 अंडले डीआर, नॉर्थ यॉर्क, टोरेंटो, ओएनएम2 एन2 डब्ल्यू 7, कनाडा, 001+647 213 1817 ईमेल hansadeep8@gmail.com