किनफाम सिंह नोंगकिनरिह

(1964) खासी कवि, लेखक और अनुवादक।नेहू, शिलांग में प्रोफेसर।कई पुस्तकें।कई पुरस्कार।

अनुवाद :  रेशमी सेन शर्मा

कला और साहित्य से जुड़ी अनुवादिका। कोलकाता में शिक्षणरत।

अंधेरी रात की रौशनी

मत पूछो मुझसे कि
मेरी कविता की जुबान कहां से आती है
मत पूछो कि मेरे जज्बात कहां से आते हैं
क्या कभी पूछा है सुबह के परिंदों से
आखिर वे क्यों चहचहाते हैं?
क्या कभी पूछा है फूलों और कलियों से
आखिर क्यों बहारों के आने पर मुस्कुराते हैं?
मेरी कविता की कोई वजह नहीं होती
नहीं जानता मैं
कब और कैसे आई कविता!
फिर भी अगर तुम जानना चाहो
तो मुझे अपनी यादों की पुरानी गलियों से
एक बार फिर से गुजरने दो-
कविता मेरी रूह में यों ही नहीं समाई
न वह पतझड़ के गुनगुनाते भंवरों के
नाजुक पंखों पर सवार होकर आई
न मासूम झरनों की किलकारियों से
मेरी आंखें भर आती हैं
जाड़ों की ठिठुरती शामों में
अलाव की सुलगन भी मन को थाम नहीं पाती
पहाड़ों की रूप बदलती घाटियां और
परदेसी पंछियों की भूख
मुझे बेचैन तो करती है
पर दिल की प्यास नहीं बुझा पाती
हां, दिलोजान कुर्बान है
मेरी माटी की इस सोंधी खुशबू पर
पर बेकरार नहीं कर पाती मुझे
चेरापूंजी के बादलों की नज़ाकत
ठंडी हवाओं के संग बरसात की पावन बूंदें
और कोहरों की परछाइयां
छू नहीं पाती हैं मन की गहराइयां
शहर के नापाक लोगों ने
मेरे भीतर के कवि को जगाया
क्योंकि मुझ नाचीज गंवार बंदे के लिए
फूलों की सेज नहीं थी जिंदगी
दिन में छात्र बना
रात में मजदूरी का दामन थामा
पर जिंदगी की इन रुसवाइयों ने
मुझे कभी भी कवि नहीं बनाया
शहर के रईस-नवाबजादियां
मेरी बेबसी का मजाक उड़ाते रहे
पर मजबूर हालातों ने
मुझे कमजोर न होने दिया
गिरता रहा-संभलता रहा
और दुनिया की रंगीनियों को देख
तड़पता रहा जीने को
फिर भी कविता
मेरे जिगर में आकर बस न पाई
क्योंकि बेवफा जिंदगी से भी मुझे हौसला मिला
उसने मुझे लड़ना सिखाया
और बंद आंखों से खुशियों को देखना सिखाया
यों तो कविता मेरे लिए
खुशियों और गमों का सिलसिला नहीं है
पर जैसे धरती समा लेती है सबको अपनी बाहों में
वैसे ही धीरे-धीरे मेरी कविता
भर लेती है सबकुछ अपने दामन में
और झरनों के रूप में बहती रहती है निरंतर
नहीं बना हूँ कवि मैं
सियासत के झूठे वायदों से खफा होकर
चाहे राजनीति के रंगे सियारों की
जहरीली फितरत हो या
जंग की तबाही और अनवरत बहती खून की नदिया हों
मेरे अंदर के कवि को
इनमें से कोई जगा न पाया
छात्रों का हंगामा नहीं
नौजवानों की कुर्बानियां नहीं
न सच, न धोखा
न खौफ, न दहशत
न प्यार, न नफरत
न जिंदगी, न मौत
न भला, न बुरा
न खूबसूरती, न बदसूरती
न दुआ, न बद्दुआ
आखिर क्या है मेरी कविता की जमीन
शायद इन सबसे बहुत आगे
कुछ अनोखी सी, कुछ न्यारी सी!
मेरी कविता ने अचानक
एक लाइलाज बीमारी की तरह आकर
मुझे घायल कर दिया
एक परित्यक्ता युवती अपनी अकेली, असहाय
इकलौती बच्ची को सीने से ऐसे लगाई हुई थी
जैसे सूनसान अंधेरी गलियों में
दूर कहीं मशाल की लौ दिख जाए!
कुछ ऐसी ही हालत में
मेरी कविता का जन्म हुआ था
कुछ तो थी
जो झकझोरने लगी थी मेरे सीने को
वीराने में मानो दिल मचल उठा था
एक अजीब सी बेचैनी, बेकरारी
एक दर्दनाक तमन्ना से मन कराहने लगा था!
मानो उसे छूना चाहता था मैं
और तब अचानक ही चुपके-चुपके
मेरी कविता की पहली पंक्तियां लिख डाली थीं मैंने
और गुस्ताखी से खिसका दिया था उन्हें
उसके दरवाज़े के नीचे से
वही थी मेरी कविता-
प्यार में खोई-खोई सी, पागल सी थी
और मानो एक अनंत साधना थी
पर उसपर भी दाग था कि
वह गुमनाम थी
और मेरी मुहब्बत व्यर्थ ही चाहने लगी
एक मासूम की तरह जिसे कुछ न पता हो
वह राह देखती रही अपने पुरुष की
जिसने उसे
मेरी पहली कविता को
अंधेरी रात की रोशनी कहकर पुकारा था
और जैसा कि तुम देख सकते हो
जवानी के दिनों में मैंने अपनी कविता
एक तलाकशुदा स्त्री पर कुर्बान कर दी थी
एक ऐसी स्त्री
जिसकी उम्र मेरी मां/चाची के बराबर की थी
यही थी मेरी कविता की शुरुआत!
और आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर
क्या मैं अपनी कविता किसी
नाबालिका कुंवारी को सौंप सकता हूँ?
शायद मेरी छात्रा की उम्र की हो
कुछ तुम्हारी तरह ही
सिगार फूंकने वाली
शराब पीने वाली
अरे! तुम्हारे खातिर तो मैं
अपने मन के गहरे कोयलेखानों में
झांककर आया हूँ
दबी चिंगारियों को फिर से जलाने चला हूँ
पर क्या मैंने कभी बताया तुम्हें
कि तुमने मुझे कितना अबोध और
अपूर्ण महसूस कराया है?

-किनफाम सिंह नोंगकिनरिह: रीडर, अंग्रेजी विभाग, नॉर्थ ईस्ट हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग
-रेशमी सेन शर्मा : 136 मेट्रोपोलिटन कोआपरेटिव सेक्टर-ए, कोलकता-700105 मो.8902711026