भारत यायावर

निबंधकार और कवि। रेणु विशेषज्ञ के रूप में परिचित। फणीश्वरनाथ रेणु और महावीर प्रसाद द्विवेदी की रचनावली का संपादन।

 

रचना ही रहना है

गढ़ना ही बचना है

अपने होने को दिखाना

मौन को प्रकट करना

भाव को शब्द देना

विचार को चलना सिखाना

एक अरूप को रूप में बदलना

उदासी के क्षणों में भी हँसना

 

प्रेम के अमूर्त वैभव को भाषा का आवरण देना

घृणा की लपट को प्रकट करना

चलते हुए चलाते हुए

बढ़ते हुए बढ़ते हुए

अपने भीतर की गर्मी को बचाते हुए

सोचते हुए विचारते हुए

खोजते हुए खोजाते हुए

गुजरते समय के साथ गुजरते हुए

रचना का मर्म रचाते हुए

रचना ही रचना है

रचना ही बसना है

रचना ही बचना है

सुंदर को और सुंदर करना

अभाव को भरना निरंतर

नफ़रत की दुनिया में सद्भाव रचना

लोगों के बीच अलगाव मिटा देना

गिरे-पड़े लोगों का सहारा बनना

रोते हुओं को हँसा देना

धुआँ-धुआँ है माहौल

एक हल्की हवा का झोंका बन उड़ा देना

वातावरण में सुगंध भरना

किसी के हाथों को थामे रखना

अपने भोलेपन को बचाए रखना

भाव-आकुल अंतस को जगाए रखना

 

रचना है निरंतर

अपने-आपको गढ़ते रहना

किसी चेहरे को

अपने मन में समाए रखना

कि मेरे दिल में देखो

ये देखने की चीज है

कि देखो

और हर शख्स को पढ़ो

कि देखो

और कुछ न कुछ कहो

कि कहना ही रचना है

कि रचना ही संवरना है

 

प्रकृति और जीवन

अंत और अनंत का प्रदर्शन

साकार और निराकार

चेतना का उर्ध्वगमन

रचना है निरंतर

शब्द की अनुगूंज

निरंतर महसूस करना

भावावेग में व्याकुल रहना

एक सधी चाल में सीधे चलना

अपने सपनों में

उठना-बैठना

एक मदहोशी सा बना रहना

हर एक आवाज को सुनते रहना

पास रहकर भी कहीं

दूर चले जाना

दूर खड़े पेड़ों से बतिया आना

 

रचना है निरंतर

अपने भीतर और बाहर को सुनना

हर कही बात को गुनते रहना

एक जुनून सा चढ़ा रहना

प्रेम की पीर को पीते रहना

कभी उड़कर कभी गिरकर

कभी सो कर कभी खो कर

एक एहसास में तपते रहना

एक ऊहापोह में फंसकर बाहर आना

एक बनी बात का बिगड़ जाना

एक बिगड़ी बात का संवर जाना

जो भी हो जैसा भी हो

रचना है निरंतर

कि रचना ही बचना है।