हर रोज की भांति रिटायर्ड पर्सन सुबह पार्क में इकट्ठा होते, हलका-फुलका व्यायाम करते, हा!… हा! कर ठहाका लगाते, फिर थोड़ा आराम करके अपने-अपने घर को चल देते।

‘श्याम बाबू, क्या बात है, चेहरा क्यों उतरा हुआ है? भाभी ने डांट दिया क्या?’ हरदयाल ने पूछा।

‘हरदयाल भाई, क्या बताऊं…! रवि आया है, दस दिन के लिए। चुलबुली पोती सियोन ने हम बूढ़ों में फिर से जवानी-सा जोश भर दिया है। वह सारा दिन खेलती-कूदती, ये गिरा वो गिरा, ये तोड़ वो तोड़, वो आगे-आगे, हम पीछे-पीछे। उसे खेलता देखकर लगता है जैसे पूरा घर ही खेल में मगन है।’

‘तो समस्या क्या है?’

‘समस्या यह है कि रवि की मां ने बहू से दूसरे बच्चे के बारे में बात की। पता है, बहू ने क्या कहा? कहती है, मम्मी जी, हम एक ही बच्चा पालेंगे। घरवाली ने समझाया- बेटा, दूसरा बच्चा होगा तो सियोन को साथ मिलेगा। बहू बोली, हमें तो इसे ही पालने में दिक्कतें आ रही हैं।’

पास बैठा मंगलराम बोल पड़ा- ‘आजकल के बच्चों की बात ही न करो जी। हमें यह पसंद नहीं, हमें वह पसंद नहीं। मां-बाप की इच्छाएं भाड़ में जाएं।’

‘मंगलराम, बात तो सही है आपकी’, हरदयाल ने कहा।

‘सही नहीं, बिलकुल सही। वह हमारा साहबजादा और उसकी साहबजादी किसी की सुनते ही नहीं। मल्टीनेशनल कंपनी में खूब पैसा कमा रहे हैं।’

‘यह तो अच्छी बात है।’

‘अच्छी है, पर… क्या बताऊं…वे कहते हैं, हमें  बच्चा ही नहीं चाहिए। विदेशी नस्ल का कुत्ता पाल रखा है।’ कहते हुए उसका गला भर्रा गया। श्याम बाबू अपनी फोल्डिंग स्टिक उठाकर चल दिए।