वर्षा अडालजा
गुजराती की स्त्रीवादी वरिष्ठ कथाकार और नाटककार। 200 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। विशेष रूप से चर्चित उपन्यास ‘अंसार’, ‘बंदीवान’, ‘मृत्युदंड’ आदि। सात खंडों में कहानी संग्रह प्रकाशित। ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’, ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित। ‘सुधा’ और ‘फेमिना’ (गुजराती) पत्रिकाओं का संपादन किया। भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘कर्तृत्व समग्र सम्मान-2025’ से सम्मानित।
रजनीकांत एस. शाह
गुजरात विश्वविद्यालय से अध्यापन के बाद अनुवादक के रूप में सक्रिय। शोधप्रबंध सहित 28 पुस्तकों का प्रकाशन।

 

 

‘लो जी, बनारस आ गया मम्मीजी।’

‘काशी कहिए काशी!’

ट्रेन धीमी हुई। दोनों महिलाओं ने अपना सामान समेटना शुरू किया। उनके पास ज्यादा सामान था। अनंतराय बड़े चैन से उन दो महिलाओं को देखते रहे। प्रौढ़ महिला बड़े दमाम के साथ बैठी हुई थी और सफर के दौरान साथ चल रही युवती को लाजू कहते हुए हुक्म पर हुक्म छोड़े जा रही थी। अचानक ही अनंतराय की ओर मुड़कर उसने कहा- ‘आपका सामान?’

‘यह एक बैग और यह थैला।’

उसकी आंखें विस्फारित हो गईं, ‘यह तो कमाल हो गया। एक बैग लेकर क्या कोई मरने के लिए काशी आता है? न जाने ऊपर जाने में कितना वक्त लगेगा!’

अनंतराय चौंक गए। युवती के चेहरे पर नाराजगी थी। तो यह महिला भी काशी में मोक्ष पाने के लिए आई थी! उनकी ही भांति! सीट पर से उठकर उसने अपने रेशमी वस्त्र और गले की शोभा बढ़ा रहे सोने के हार को ठीक किया। कुछ गर्वित मुस्कान फैलाई, ‘हमने तो होटल में बुकिंग करवाया है, मैं तो ऐसे भवन-ववन में नहीं रह सकती।’

उन्होंने इंटरनेट पर बहुत खोज की थी लेकिन बाद में ऐसे ही निकल पड़े थे। ट्रेन रुकी। दोनों ही महिलाएं अपने सामान की झंझट में पड़ गईं। अनंतराय कंधे पर थैला लटकाए, हाथ में बैग लिए उतर गए। स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। सामान के साथ यात्री उतरते जा रहे थे। अनंतराय बैग लिए बाहर जाते ही पैदल रिक्शावालों के शोर में घिर गए। पुराने रिक्शे और ऐसे ही दारिद्र्य का चेहरा लिए उम्मीद लगाए खड़े थे रिक्शाचालक।

वे अभी यहां-वहां देख ही रहे थे, कि एक ने आकर बैग ले लिया और चलने लगा।

‘आइए सा’ब जी!’

उसे पालकी में बैठा रहा हो, ऐसे लहजे में बोलते हुए उसने बैग रिक्शे पर रखा। उन्होंने किराया पूछा नहीं। पवित्र धाम में पैर धरते ही सौदेबाजी के साथ दिवस की शुरुआत करनी नहीं थी। यह भी मालूम नहीं था, कि कहां जाना है!

‘सा’ब जी, कहां जाओगे?’

उसने अनंतराय को बड़े ध्यान से देखा। स्वच्छ वस्त्र, सुनहरे फ्रेमवाले चश्मे, गर्म जेकेट और एकदम नया सुंदर थैला और बैग।

‘कौन-सा होटल है?’

‘तुम जहां ले चलो।’

‘ओके, ओके, लेकिन इतना तो बता दीजिए, कि गंगास्नान के लिए आए हो, काशी विश्वनाथ के दर्शन करना है… मतलब घूमना है या मरने तक ठहरना है?’

‘कैसी …कैसी बात करते हो तुम?’

उसने हँसते हुए कहा, ‘अच्छा तो गुजराती हो आप। यहां सारी दुनिया के लोग आते हैं और विदेशी लोग भी। हम जानते हैं लोगों को। आप किसलिए आए हो, बताओ आप, फिर चलते हैं।’

बिना बोले ही अनंतराय की सांस फूल गई। छाती में बेचैनी हो गई। मात्र इतना ही बोल सके, ‘इच्छा तो यहां से ही चल बसने की है, चलो कहां ले चलते हो?’

बिना कोई उत्तर दिए पानीदार घोड़े पर सवार हो रहा हो, ऐसे ही रिक्शा की फटी हुई सीट पर वह बैठ गया और पैडल चलाने लगा। धुंद के घेरे से सूरज धीरे-धीरे आजाद हो रहा था। ठंडा पवन तीर की भांति चुभ रहा था। उन्होंने थैले से शाल निकालकर लपेट लिया। रिक्शेवाले के स्वेटर से धागे निकल आए थे। और फिर ठंड तो किस-किस के लिए शर्म भरेगा!

बनारस किसी भी शहर की भांति सुबह से ही गति में था। पूजा के सामान के ठेले, चाय और समोसों की टपरियां, भभूत रमाए हुए साधु, देसी रंगीन वस्त्रों में घूम रहे विदेशी… शहर अपनी बाहें फैलाए खुलता जा रहा था। दूर शहर पर झूल रहे धुएं की एक विशिष्ट गंध लेकर बह रही हवा की ठंडी लहर में मंदिर में घंटारव और हर-हर महादेव। हर-हर गंगे की आवाजें मिलकर एक अजीब से वातावरण की रचना कर देते थे। उन्होंने अन्य तीर्थों की भी यात्रा की थी। विदेश की भूमि पर भी। विश्व की सबसे प्राचीन नगरी की आध्यात्मिकता और आधुनिकता के परिवेश को वे विस्मय के साथ देखते रहे।

रिक्शा का धक्का लगा, वह रुक गई। वे उतरने ही वाले थे कि रिक्शेवाले ने कहा, ‘सा’ब जी! रुकिए यहां। देख लेता हूँ, कमरा खाली है या नहीं?’ ‘ठीक है।’ वह अंदर गया। अनंतराय नीचे उतरे। भवन बहुत पुराना लग रहा था। बीते हुए वक्त ने भवन की दीवारों को खुरच लिया था। ‘मोक्ष भवन’ लिखे हुए बोर्ड के अक्षर भी धुंधले पड़ गए थे।

रिक्शावाला दौड़कर आया। बैग ले लिया। ‘मिल गया कमरा नंबर-पांच। वैसे तो आधा भवन खाली पड़ा है। बात है कि घाट के आसपास गेस्टहाउस, लॉज, होटल बन गए हैं। यह बिलकुल फ्री है, टोटल सा’ब जी।’

अनंतराय चुपचाप उसके पीछे चले। ऐसी जगहों में वे कभी रहे नहीं थे। उसमें भी धर्मादा या धर्मशालाओं में तो पता नहीं कब पैर धरा हो! इंटरनेट पर होटल के लिए तलाश किया था। फिर तो होगा वही जो ऊपरवाले ने चाहा होगा तो ऐसा ही सही। देखा जाएगा।

लोहे के गेटवाले बड़े चौक में होकर भवन में रिक्शवाले के पीछे दाखिल हुए। पहले ही कमरे में वह दाखिल हुआ।

‘नमस्ते शुक्ला जी, पाय लागू।’

वह कमरा आवास और ऑफिस जैसा था। दीवारों पर श्रीकृष्ण और गणेश जी गेंदा फूलों की माला पहने मुस्कुरा रहे थे। फोटो फ्रेम पर पीले देव-देवियों की नामावलीवाले वस्त्र शोभायमान थे। अलमारी, छोटा पलंग, फाइल, पुस्तकें और छोटी-बड़ी वस्तुओं से सजाई दो-तीन परछत्तियां, पीछेवाले भाग में अधखुला किवाड़।

अनंतराय की नजर घूमती हुई कुर्सी पर बैठे शुक्ला जी पर स्थिर हुई। कसी हुई ऊंची देह, पुष्ट चेहरे पर छोटे श्वेत केश में गांठ से बंधी हुई शिखा।

‘बैठिए।’

अनंतराय सामने रखी कुर्सी पर बैठे। शुक्ला जी ने बड़ी बही को खोला, उनकी ओर घुमाया।

‘आपका एड्रेस, मोबाइल नंबर सब लिख दीजिए। कमरा पंद्रह दिन के लिए ही है, समझे!’

अनंतराय ने देखा कि सुवाच्य, टेढ़ेमेढ़े, गड़बड़िया अक्षरों से बही भरी हुई थी। तनिक रुके, जिस घर और शहर को छोड़कर चुपचाप निकल लिए थे, उस पते को लिखना है! शुक्ला जी समझ गए, ‘लिख दीजिए… क्या नाम बताया आपने? हां, अनंतराय। बढ़िया नाम है। हम उधर कागज-चिट्ठी नहीं लिखते।’

अनंतराय ने मुंबई का पता लिखा। शुक्ला जी ने बही को अपनी ओर खींचा। नाम-पता पढ़ा। ‘अच्छा तो आप बंबई से हैं। कहते हैं कि भागदौड़वाला शहर है, लेकिन बढ़िया शहर है। पढ़े-लिखे बीजनेसमैन लगते हो।’

‘जी।’

‘क्या है कि इस कुर्सी पर पैंतालीस साल से बैठा हुआ हूँ। बनारस के बाहर कदम नहीं रखा लेकिन इस कमरे से ही जैसे मैंने सारी दुनिया और उसका हालचाल सब जान लिया है।’

अनंतराय ने कुतूहलवश पूछा ‘लेकिन टोटल फ्री कैसे शुक्ला जी? यहां भी तो प्रॉपर्टी के दाम तो होंगे ही।’

‘बिजनेसमैन हो न!’

‘यदि पीछे मुड़कर देखा जाए तो नाईनटीन फिफ्टीएइट में राजस्थान के एक श्रेष्ठी दालमियाजी ने इस भवन का निर्माण किया था। तब तो यहां ज्यादातर मोक्षार्थी ही मरने की आशा लिए आते थे। उसको शांतिपूर्ण मौत मिले इसलिए इसे बनाया गया था।’

रिक्शावाले ने उत्साहपूर्वक कहा, ‘यह तो बताइए शुक्ला जी आपने कितने लोगों का अंतिम संस्कार किया है? लास्ट राइट्स। कहिए… कहिए…’

‘ये मेरा भोलू भोला ही है, कम से कम बारह हजार लोगों की अंतिम क्रिया का इंतजाम किया होगा।’

अनंतराय सिहर उठे। तकते रहे चुपचाप शुक्ला जी को।

‘सा’ब जी, यह तो जीवन का अंतिम स्थान है। जीवन के बाद मृत्यु ही है न! फिर भी बहुत प्यारा है मुझे। दिल्ली से आया था बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए। थोड़ी बहुत पढ़ाई हुई कि फैमिली की देखभाल की जिम्मेदारी आ गई। तब से इस कुर्सी पर बैठ गया, बस बैठ ही गया। बस तब से जीवन–मृत्यु के इस अजीब खेल को देखता रहा हूँ।’

भोलू ने झिझकते हुए कहा, ‘शुक्ला जी! सा’ब को कमरे में छोड़ दूं? मेरी दूसरी सवारियां छूटी जा रही हैं।’

अनंतराय तुरंत खड़े हो गए।

‘थैंक्स शुक्ला जी। चलो भोलु।’

‘आराम कीजिए। कमरे में सूचनाओं का बोर्ड है। पढ़ लेना। भोलू सा’ब के लिए टिफिन…’

‘सब हो जाएगा। कम कम सा’ब जी।’

दो बंद कमरों के बाद भोलू ने पांच नंबर खोला। बैग रखा।

‘आराम कीजिए सा’ब। टिफिन लेकर लौटूं तब सवारी के पैसे दीजिएगा।’ कोने में से मटका थोड़ी देर बाद वह भर लाया।

‘शाम को बाजार ले जाऊंगा, चाहिए तो वहां से पानी का बोतल खरीद लेना।’

भोलू गया। कमरा बड़ा हवादार था और स्वच्छ था। छोटी-सी अलमारी, दो कुर्सियां और एक पलंग। उसके पीछे ही खिड़की। वह पूर्व दिशा में होगी। वहां से दूर-दूर तक पसरा हुआ शहर और मकानों की अटारी पर सूरज जगमगा रहा था। धुंध पिघलती जा रही थी। उन्होंने पलंग की चादर को निकाला, अपने साथ लाई हुई चादर को बिछाया और पलंग पर लेट गए। ट्रेन की यात्रा की आदत लगभग छूट गई थी। थक गए थे।

किवाड़ जोर से खड़क रहा था। वे चौंक गए। ‘सा’ब जी…’ भोलू की आवाज से नींद उड़ गई। किवाड़ के खुलते ही भोलु टिफिन लेकर आया। पलंग के नीचे से तिपाई निकाली और टिफिन रख दिया। मटके से पानी भरकर ग्लास बगल में रखा।

‘आपके लिए स्पेशल लंच लाया हूँ, रबड़ी और फेमस समोसा।’

टिफिन खोलते हुए अनंतराय ने कहा, ‘अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हो।’

‘गोरे लोग, फोरेनर्स बहुत आते हैं। वे लोग हिंदी सीखते हैं, थोड़ी बहुत अंग्रेजी मेरी जुबान पर आ जाती है। बैठा हूँ शुक्ला जी के पास। आप खाइए।’

अनंतराय ने खिड़की के बाहर हाथ धोए। टिफिन खोला। व्यंजनों की महक और जायका दोनों अच्छे थे। भोलू ने टिफिन बंद किया।

‘थोड़ा आराम कर लो, शाम को आ जाऊं?’

‘हां और तब मैं एकसाथ पैसे दे दूं तो…’

भोलु खुश हो गया। टिफिन लिया।

‘हां जी, बिलकुल।’

किवाड़ बंद करके वह गया। अनंतराय पलंग पर लेट गए। मन जिद करके यहां ले आया था। अब यहां ही रहना था। इस अपरिचित नगरी में। अकेले ही। इस भरी नगरी में वह किसी टापू पर हो। अब तक जिया गया जीवन, बिताए हुए वर्ष आदि उन सबकी गठरी बांधकर उसकी अस्थि गंगाजी में बहाकर जीते जी नया अवतार धारण करना है।

थक गए थे, करवट बदली। कुछ वर्ष पहले एयरपोर्ट पर बैठे थे। फ्लाइट देरी से चलने के कारण बुकशॉप में घूमते हुए हाथ में ‘बनारस, दी सिटी ऑफ लाइट’ पुस्तक ऐसे ही खरीद ली थी। हावर्ड यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर द्वारा लिखी गई थी। पढ़ने में बड़ा मजा आया। उसके बाद तो बनारस के बारे में पढ़ा। इंटरनेट पर बहुत तस्वीरें देखी, तब से बनारस ने उनके मन को अपने वश में कर लिया था। रोहिणी के साथ आकर बड़े चैन के साथ होटल में रहना है। रोहिणी बहुत प्रसन्न हो गई थी। चेताया भी था- बिजनेस, दुनियादारी घर पर छोड़ ही देना। हर रोज गंगा आरती और काशी विश्वनाथ के दर्शन करेंगे।

नींद भी आते-आते उचट गई। मन तो साथ में ही यात्रा पर निकला हुआ था, वह कहां आराम करनेवाला था!

थोड़ा-सा पानी पिया।

पर रोहिणी तो स्वयं काशी विश्वनाथ के चरण में वंदन करने के लिए चली गई। जीवनपर्यंत संसार की तेज गति के साथ दौड़ते-हांफते हुए एक दिन रुककर पलटकर देखा तो पत्नी नहीं थी। बेटी और दामाद ने सबकुछ अपनी मुट्ठी में कैद करके उनको हाशिए पर धकेल दिया था। धीरे-धीरे बनारस मोहिनीस्वरूप धारण करके उनको आकर्षित करने लगा। कब तक इन लोगों के साथ जुड़े रहना! और किसलिए? इस जंजाल के जाल को ही काट डालूं तो!

न कोई प्रचार, न कोई समाधान की संभावना, चुपचाप सारी तैयारियां कर ली। बैंक के साथ अनुकूल व्यवस्था कर ली और एक दिन इस अपरिचित शहर की अपरिचित पगडंडी पर चलते हुए पहुंच गए। नो मैन्स लैंड, जीवन और मृत्यु के बीच की भूमि पर। फिर जीवन की अंतिम सरहद की कंटीली बाड़ के पास अनेक मुमुक्षुओं के साथ प्रतीक्षा की पंक्ति में, अचानक पंख फूटेंगे और सरहद के उस पार की अगोचर भूमि में उड़ जाएगा।

खिड़की से हवा आ रही थी या फिर क्यों कांप उठे। पुन: सो गए। पंद्रह दिन बाद इस भवन को छोड़ना है तब तक… या फिर बरसों तक…

किवाड़ की अंकड़ी खड़क रही थी। वे चौंककर बैठे। कहां थे वे! कैसे आ गए थे वे यहां! चश्मे के कांच पर से धुंधली परत हट जाए ऐसे दृश्य स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। उन्होंने किवाड़ खोला, भोलू खड़ा था, ‘फरेश हो गए सा’ब जी! चलिए। मैं रिक्शे पर बैठा हूँ।’

कुछ देर बाद बाहर निकलता शुक्ला जी के ऑफिस से गुजरते हुए उन्होंने अभिवादन करते हुए हाथ ऊपर उठाया। रिक्शे पर सवार हुए। भोलू ने अपने पुराने रिक्शे को प्यार से थपथपाया और पैडल लगाते हुए बाजार की ओर रिक्शे को लिया। प्रभात की अपेक्षा बनारस का रूप अभी अलग ही था।

‘सा’ब जी! दशाश्वमेध घाट ले लूं? क्या है कि मणिकर्णिका घाट तो फेमस है जी। पर पहली बार देखोगे तो रात में सो नहीं पाओगे। अब कितनी चिताएं जल रही होंगी, दिन-रात का स्मशान जो है।’

‘हूं…ट्रु।’

‘यहां काशी विश्वनाथ के दर्शन कर लीजिए, गंगा आरती दखिए और घाट पर बैठिए फिर वापस चलते हैं।’

भोलू जोर से पैडल मारने लगा। रास्ते पर भीड़ उमड़ रही थी। बत्तियां जगमगा उठी थीं। रास्ते पर ट्रैफिक की आवाजों पर से ‘हर-हर महादेव… हर-हर गंगे…’ का जयघोष यज्ञ के धुएं की भांति ऊंचे ही ऊंचे जाते हुए देवाधिदेव के चरणों में प्रणिपात करता था। भीड़ में रिक्शा थम गया, बगल में सटकर खड़े रिक्शा की ओर उनकी निगाह गई। रिक्शा चालक आराम से दांत कुरेद रहा था, अंदर बैठे हुए दो लोग बतिया रहे थे। रिक्शे के ऊपर सफेद वस्त्र में लिपटा हुआ शव  बंधा हुआ था। उन्होंने तुरंत अपनी नजर हटा दी, तो देखा कि दूसरी ओर एक दुकान के पास दो स्त्रियां खड़ी थीं।

ये तो ट्रेन के सहयात्री! वयस्क स्त्री ने सुंदर साड़ी पहन रखी थी और जिसे लाजु कहकर आदेशात्मक बातें करती थी, उसके हाथ में दो थैलियां थीं। दुकानदार शाल दिखा रहा था। अनंतराय स्तब्ध बैठे हुए थे। ओशो द्वारा कही गई भर्तृहरि की बात ताजा हो आई, संसार के अलग-अलग दृश्य देखते हुए कहते हैं ‘न जाने संसार: किंमृतमय: किं विषमय:।’

घाट से थोड़ी दूर रिक्शा रुक गया। उन्होंने जेब में हाथ डाला। सौ का नोट हाथ में आया। भोलू चकित होकर देखता रहा, ‘भोलू, ले लो!’ 

‘पर सा’ब जी…!’

‘ले लो भाई, तुम्हारे लिए कुछ गर्म कपड़े भी ले लेना। कम पड़ जाए तो मुझे बता देना।’

भोलू ने हाथ जोड़े। उसकी आंखें डबडबा आईं। उन्होंने उसके हाथ में नोट रख दिया। ‘चलकर जाऊंगा’ कहते हुए घाट की सिढ़ियों पर बैठ गए।

घाट पर भीड़ कुछ कम हुई। कुछ समय पूर्व हुई आरती का झिलमिलाता सुनहरा प्रकाश गंगा के प्रवाह में बहते हुए दूरस्थ प्रदेश को आलोकित करने के लिए जा रहा था। छोटे–छोटे फुलदीप कुछ दूर तक तरंगनृत्य करते हुए जल निमग्न हो जाते थे। कुछ लोग ठंडे पानी में थरथराते हुए स्नान कर रहे थे। गंगा जाति, धर्म, रंग या उम्र के भेदभाव के बिना सबकी आस्था, सपने, प्रार्थना अपने कल–कल निनाद करते हुए प्रवाह में ले जा रही थी। दो श्वेत विदेशी युवतियां भारतीय कुर्ता, तिलक में मोबाइल से फोटो ले रही थी। उन्होंने अब तक मोबाइल को छुआ नहीं था। सीमकार्ड बदल दिया था। फोटो लेने की आदत को अब भूलना था। अब क्या करना था उसका!

फोटोग्राफ्स और पेंटिंग से भरी घर की दीवारों की याद आई। रोहिणी और नन्ही-सी जाह्नवी के साथ कितनी-कितनी तस्वीरें! फिर जाह्नवी और प्रदीप्त की शादी की तस्वीरें, नन्ही-सी परी की तो अढलक तस्वीरें… चाय की केतली लेकर एक लड़का घूम रहा था। मिट्टी के कुल्हड़ से चाय का घूंट भरते हुए ये सारे दृश्य मन में समाते हुए वे खड़े रहे। फूलदीपक लिया और पत्नी की स्मृति में जल प्रवाह में उसकी यात्रा शुरू कराने के लिए रख दिया। जलविचियों पर सुनहरा उजास फैलते हुए और नाचते हुए वह फुलदीप जल निमग्न हो गया। मन भावुक हो गया। तुम क्यों चली गई? तुम्हारी इच्छा के अनुसार तो बिटिया और दामाद को सबकुछ सौंपकर और निश्चिंत होकर हमने साथ-साथ समय बिताया! पर तुम क्या जानो? हमारी प्यारी बिटिया ने प्रदीप्त के बहकावे में आकर प्रदीप्त के फैमिली मेंबर्स को…

पानी से भीगी हुई सीढ़ी पर बैठ गए। जिस गठरी को नदी की धारा में बहा देना था, उसे तो अभी गले लगाए हुए था!

‘नए हो वाराणसी में?’

अचानक जरा जोर से प्रश्न पूछा गया। वे चौंक उठे, बगल में एक स्त्री बैठी हुई थी। उसका शरीर कुम्हलाया हुआ और सूखा था। चमकती हुई आंखें उसे देख रही थीं।

‘अ….हां जी!’

‘मैं असीघाट में मोक्षधाम में रहती हूँ। कितने साल से? पूछिए तो!’

‘उन्होंने बड़ी मुश्किल से पूछा, ‘बीस साल से। कितने? बीस साल। जैसे ही वे चल बसे, तीनों बेटों से कहा, कि वाराणसी में रहना है मुझे, आपकी पत्नियां और बच्चों का बोझ मैं क्यों उठाऊं? आप भी खुशी से रहना और संभलकर। मोबाइल से बच्चों पर भी नजर रखो और यहां भी सावधान।’

‘शिव! शिव! बोलते हुए वह सीढ़ियां चढ़ गई। वे हतप्रभ हो गए। वृंदावन में दक्षिणा पाने के लिए पंडों ने माफिया की भांति उसे और रोहिणी को घेर लिया था। इस बात की याद हो आई। पर यहां गंगा तट पर! मोक्षार्थी होकर! अंधेरा घिर रहा था। वे उठे। बाजार की भीड़ से होते हुए भवन पहुंचे। शुक्ला जी के कमरे के पास से गुजरते हुए उन्होंने अभिवादन के रूप में हाथ ऊपर उठाया। अनंतराय को भी अभी खुद के साथ अकेले रहते हुए भय लगा रहता। वे शुक्ला जी के सामने कुर्सी पर बैठे।

‘सा’ब जी! लगता है कि पहले ही दिन आप कुछ उदास हो गए?’

‘है तो कुछ ऐसा ही शुक्ला जी।’

‘क्योंकि तुम कभी अपने साथ रहे नहीं होगे न! खुद के साथ रहने की भी आदत डालनी पड़ती है। मैं यहां से दो दफा दिल्ली वापस घर भाग गया था। मतलब मैं अपने आप से भाग रहा था।’

‘और अब?’

‘मैं अपने संग खुश हूँ।’

‘और ये काम?’

‘वह भी अच्छा है, जैसे श्रीकृष्ण के छोटे-से मुख में माता ने बड़ा ब्रह्मांड देख लिया। इस कमरे में मैंने सारा संसार देख लिया। गीता का उपदेश यहां चरितार्थ हो गया मेरे लिए।’ अनंतराय ने सोचा, देखने में कर्मकांडी सामान्य-सा लगनेवाला आदमी फिलोसॉफी की बड़ी-बड़ी पोथियां पढ़े बिना जीवन को निर्भ्रांत दृष्टि से देख सकता था!

‘वह कैसे?’

‘सीधी-सी बात है, कुछ भी अपेक्षा किए बिना कर्म करते रहिए।’

उसने बही खोली। कुछ पन्ने पलटे, ‘बीते वर्ष एक पत्रकार आया था। मुझसे मुलाकात की थी। यह रजिस्टर भी देखा। देखो यह एंट्री। पुत्र आया था पिता को साथ लेकर। पिता के मोक्ष के लिए। पिता की इच्छा पूर्ण करने के लिए। लेकिन क्या हुआ? अचानक हार्टअटैक से पुत्र की मृत्यु और पिता ने अग्निसंस्कार किया। है न जीवन मृत्यु का अजीब खेल!’

अनंतराय अवाक होकर सुनते रहे।

‘इसीलिए सबसे कहता हूँ, उदास नहीं होना है। ज्यादा सोचो मत। होनी होय सो होय।’

शुक्ला जी मंद मुस्कुराए और बही को बंद किया।

‘बहुत समय हुआ कोई बात करनेवाला मिला नहीं तो अपने भेजे का दही बना दिया। हां, कल मणिकर्णिका घाट जाइएगा। उस घाट को भगवान शिव ने अनंत शांति का वरदान दिया है। अविरत चिता जलती रहती है। उसकी बहुत सारी कथाएं हैं। मोबाइल पर मिल जाएंगी। लेकिन जीवन की अमृतसुधा तो चिता की राख से ही मिलेगी।’

अनंतराय नमस्कार करके खड़े हुए कि भोलू दिखाई दिया।

‘आपका टिफिन सा’ब जी! आप तो बोलना भूल गए, चलिए!’

अनंतराय भोलू के कंधे पर हाथ रखकर अपने कमरे में गए। तिपाई पर टिफिन खोल दिया। ‘चलो भोलू, साथ-साथ खाते हैं।’

भोलू तो स्तब्ध रह गया। ‘क्या बात करते हो! पूरे पचास का टिफिन है… और आप खानदानी और मेरी जात…’

‘चुप और बैठ जा।’

अनंतराय ने अपने लिए थोड़ा-सा प्लेट में लिया और टिफिन भोलू को दिया। उसे सामने बैठाकर जबरन खिलाया। भोलू ने टिफिन बंद किया, प्लेट को धोया और अनंतराय का चरण स्पर्श किया। ‘रहने दो भोलू, कल मणिकर्णिका जाएंगे न!’

‘हां सा’ब! वह तो सबसे पवित्र घाट है।’

‘तो कैसे?’

‘वहां तो स्मशान है न? माता सती के शरीर का अग्निसंस्कार उसी घाट पर हुआ था। महादेव ने ही वह अग्नि संस्कार किया था। तो हुआ न पवित्र!’

‘ठीक है। सुबह आ जाना, हम बाजार में नाश्ता करेंगे, तेरा फेमस समोसा और चाय।”

दोनों हँस पड़े। भोलू चला गया।

पहली बार मणिकर्णिका घाट देखा और सुन्न रह गए। लकड़ियों से भरे नाव पर से लोग लगातार लकड़ी की गठरियां किनारे पर लाद रहे थे और वे लकड़ियां तुरंत चिता पर चढ़ जाती थीं। धू-धू कर आग प्रज्वलित हो रही थी। धुएं से आकाश धुंधियारा लगता था। एक के बाद एक शव आ रह थे और गंगा में स्नान करके चिता के हवाले हो जाते थे। ठठरियों का तांता लगा हुआ था। कोई गेंदा फूलों से सजी हुई तो कोई सफेद वस्त्र में लिपटी हुई। एक तरफ कोई न कोई मुंडन करा रहा था। थोड़ी दूर एक टोला बैठा हुआ था और सामने ठठरी पड़ी हुई थी, वे लोग मृतदेह लेकर आ रहे थे। रोजाना तीन सौ…, चार सौ…, पांच सौ चिताएं…

पैर जमीन में जैसे जड़ें बनकर धंस गए हों ऐसे अनंतराय स्तब्ध खड़े थे। लाल वस्त्रों में कुमकुम और फूलों से सजाई हुई ठठरी में बंधा हुआ मृतदेह अंतिम विदाई की प्रतीक्षा में था। एक युवक ने मुख पर से कपड़ा हटाया और सेल्फी ली।

जन्म और मृत्यु दोनों साथ-साथ। कैसा साक्षात्कार! सबेरे ही भोलू ने कहा था, ‘सा’ब जी, इन मुर्दों के बीच साल में एक बार नृत्य महोत्सव होता है। क्या आपको मालूम है?’

वे तक रहे थे भोलू को। ‘नृत्य महोत्सव? स्मशान घाट पर?’

‘हां जी। चैत नवरात्र की सप्तमी को और नाचती कौन है? गणिका… धंधा करती है वह। समझे। बनारस गाइड में उसको नगरवधू लिखा है। मौत के मातम के बीच नाचती है। हे मां! अगला जनम ऐसा मत देना। आगे से चलती है परंपरा यह नाथ उत्सव की।’

घाट की सीढ़ियां चढ़कर अनंतराय रास्ते पर आ गए। थकान लगने के कारण थोड़ी देर के लिए एक चौकी पर बैठकर सुस्ताने लगे। उनकी भी यहां मौत होगी! कब? कैसे? इस प्रकार इस नगरी में कितना समय रहेंगे? रोजबरोज का यह जीवन मृत्यु का खेल। क्या ये सद्गत आत्माएं सच में मोक्ष प्राप्त करेंगी? वह भी यहां मरेगा तो लावारिस लाश की भांति उसकी चिता सजेगी या फिर कोई गंगा में बहा देगा!

वे अन्यमनस्क होकर चलने लगे। बाजार से होते हुए उन्होंने एक बुकशॉप देखा, अखबार खरीदा। बगल में ही थी बनारसी साड़ी की एक दुकान। एक युवा दंपती साड़ी खरीद रहा था। नवविवाहिता-सी लगती थी। युवती का दुल्हन जैसा शृंगार था। पति भी बड़े उत्साह के साथ साड़ी खरीद रहा था। कितने आनंदित थे ये दोनों! मौत की छाया में जीवन कितना पल्लवित था!

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। अग्नि की ज्वालाएं दिखाई दे रही थीं। क्या सचमुच ये सब मोक्षार्थी थे या जीवन के संग्राम से बचने के लिए यहां भागकर चले आए थे! उनकी भांति!

वे काले धुएं को बादल की भांति आकाश को घनघोर हुआ देखते रहे। राम श्रीराम… महादेव शंभो… हर-हर गंगे… स्वरघोष घंटाराव में एकाकार हो जाता था।

रात के समय भोलू टिफिन लेकर आया। उन्होंने कहा, ‘दो-तीन दिन बनारस में घुमा दे, शाम को नाव पर सैर करेंगे… फिर…’

‘फिर क्या सा’ब जी! पंद्रह दिन तो यहां खत्म हो जाएंगे, होटल में बुकिंग करें?’

उन्होंने हँसकर कहा, ‘नहीं रे भोलू, फिर स्टेशन लेकर चल। बनारस सुंदर शहर है, देख लिया। अब वापसी का टिकट कटाएंगे न!’

भोलू के हाथ का कौर अधर में ही अटक गया।

संपर्क : वर्षा अडालजा : ए-2, गुलबहार, मेट्रो के पीछे, बेरेक रोड, मुंबई-400020. मो. 9833076673
राजनीकांत एस. शाह: 2,‘शीलप्रिय’, विमल नगर सोसायटी, नवाबजार, करजण. जिला. वडोदरा. गुजरात-391240. मो. 9924567512