
पत्रकारिता से शुरुआत करने के बाद उत्तर प्रदेश राज्य के बिक्रीकर विभाग में कार्यरत। कला और संगीत में विशेष रुचि।

हिम्मत शाह (22 जुलाई 1933 – 2 मार्च 2025)
गुजरात के लोथल में एक जैन परिवार में जन्म। सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से स्नातक की उपाधि हासिल कर एमएस यूनिवर्सिटी, बड़ौदा में अपने गुरु और प्रख्यात कलाकार एन एस बेंद्रे से कला की बारीकियां सीखीं।वास्तु शिल्प, भित्ति चित्र, टेराकोटा और कांस्य में अमूर्तन का आधुनिक इतिहास रचा। शाह की कृतियों में कांस्य और टेराकोटा माध्यम का अद्भुत सम्मिश्रण देखने को मिलता है।
हिम्मत शाह
दीवानगी में गुजरात छोड़ा
तो गुजरात ने फिर कभी पुकारा नहीं
दिल्ली में गुजारे बीसियों साल
पर दिल्ली किसी की हुई नहीं
आहत होकर पहुंचे राजस्थान
उसने कभी अपनाया नहीं
कल सुबह पहुंचे
ईश्वर के घर
जहां मां पहले से मौजूद है
अरसे के बाद
आज खाई मां के हाथ की बनी
पानी के हाथ वाली
बाजरे की रोटी।
सृजन
1987 की एक शाम
गढ़ी के स्टूडियो में
कला के गुर सीखने
गई थी शंपा शाह
सामने ही एक पेड़
तेज हवाओं से
लगभग हिलता देखते रहे
हिम्मत शाह
देखो, देखो शंपा
तेज हवाओं से
हिलते पेड़ को देखना
भी सृजन है
जमीन में गहरी जड़ों
और पत्तों से लबालब
मजबूत हट्टे-कट्टे पेड़ को भी
हिला रही है हवा
कर रही है पेड़ के गरूर पर
तड़ातड़ वार
बस, इसी तरह देखती रहना
देखना ही कला है
और देखे को महसूसना सृजन
बिना किसी नोट्स के
कला के गुरों से हो समृद्ध
लौट आई थी शंपा शाह।
बहुत तपा कर
तपाना शायद उपयुक्त शब्द नहीं है
कहना चाहिए
बहुत गलाकर
बनी थी यह कलाकृति
ठीक वैसे ही
जैसे जिंदगी की भट्ठी में
तपे थे, गले थे, बने थे हिम्मत शाह
हिम्मत शाह होने के लिए
गलना पड़ता है
तपना पड़ता है।
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