वरिष्ठ कवि, चित्रकार, वास्तुकार। हिंदीअंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन। हिंदी में 13 काव्यसंग्रह और एक यात्रावृत्त।

 

पानी

बुद्ध! तुमने अछूत कन्या के हाथ से
पानी पीया था
क्या तुम नहीं जानते थे
पानी की भी जातियां होती हैं
जानते थे बुद्ध!
तुम्हारी प्यास केवल बहाना थी
तुम पानी को शस्त्र बना
शुरू करना चाहते थे एक युद्ध
तुम्हारा वह युद्ध
तुम सदियों बाद भी जीत नहीं पाए
रणांगण में वह अभी चल ही रहा है
हां, अछूत कन्या की बस्ती में
युगों से पसरा अंधकार
थोड़ा-थोड़ा फटने लगा है
भोर की मंद हवा में वहां बज रहा है संतूर-
बुद्धं शरणम् गच्छाऽऽऽमि
धम्मं शरणम् गच्छाऽऽऽमि
संघं शरणम् गच्छाऽऽऽमि

स्लेटों के, ब्लैकबोर्ड के टुकड़े
कुछ टूटी कुर्सियां, कुछ फूटी मटकियां
दह चुकी दीवारों की ईंटें
कुछ अब तक खड़ी ईंटों की दीवारें
टीन की चद्दरों और कवेलुओं की छतें
कुछ संकरी गलियां
कुछ बड़े रास्ते
दुकानों के काउंटर
घिसे हुए टायर, गाड़ियों के कलपुर्जे
साइकिलों के अस्थिपंजर
कुछ कब्रें, कब्रों से झांकते नर-कंकाल
हजारों साल बाद मरी हुई एक नदी का
पोस्ट्मॉर्टम करेंगे पुरातत्वविद
और बताएंगे नदी के उदर में क्या-क्या मिला
खंगालेंगे जंग लगा कबाड़
लिखेंगे रिपोर्ट में
भरापूरा कस्बा रहा होगा कभी यहां
चलते-चलते कार्बन डेटिंग की राह पर
अतीत की धुंधमय दुनिया में चले जाएंगे
भग्नावशेषों की गहराई में डूब कर लिखेंगे
किसी नदी ने अकस्मात्
उदरस्थ कर लिया था कस्बे को
घटना इक्कीसवीं सदी के किसी दिन घटी थी
यहां हरसूद नामक कोई कस्बा था

शब्द जुबानों पर जम गए
कप ठहर गए हवा में
चाय भाप बन उड़ती रही
अचानक छा गया सन्नाटा
विश्व भर में लोग परदे पर
देख रहे थे उनका बह जाना
वह हृदय विदारक लाइव टेलिकास्ट था
जल का सम्मोहन, सेल्फी का आकर्षण
दोनों भयानक होते हैं
निर्जीव-सी थी नदी

कांकड़-पत्थरों के बीच लड़खड़ाती रेंगती
दूर नदी बीच आर्द्र हवा में
अलसा रही चट्टानों में
ऐसा कुछ आकर्षण या सब खिंचे चले गए
पिता, बच्चे को छाती से चिपटाए मां
हँसते-खिलखिलाते तीन बच्चे
फिर कुटुंब पूरी धरती पर
दर्द की सनसनाहट बन शिराओं में उतर गया

फटी-फटी आंखें देखती रहीं स्तब्ध
निर्जीव नदी का अकस्मात जी उठना
और चट्टानों पर टिकी असहाय जिंदगियों का
एक-एक कर कुपित हिलोरों के
आगोश में समा जाना
बच्चे को छाती से चिपटाए मां
अंत तक खड़ी रही चट्टान पर नदी से लड़ती
फिर वह भी बह गई

इन दिनों शर्म से पानी-पानी होने वाली कहावत
पानी-पानी होकर
जाने किस दिशा में वह गई होगी
किसी कब्रिस्तान में अपनी मौत का मसिर्र्या पढ़ने

बेशर्मी की नदियां अब निकालती जाती हैं
एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौथी
जैसे वृक्ष की डालियों से डालियां
डालियों से फिर-फिर डालियों
काली नदियों का जाल बिछा है
गुप्त सुरंगों से नहीं
बेशर्मी की नदियां सिंहद्वार से घुसती हैं अब
संसद में, विधानसभा में, दफ्तर में
मस्तिष्क और मन में
सूखे हमामों को पानी से भरतीं
जहां सभी नेगे हैं
सड़कों पर नग्न शरीर
आकाश तक सर उठा कर चलते हैं
कोई कुछ नहीं कर सकता
सुना है, नंगे से खुदा भी डरता है

कैसा काल है बंधु!
चुल्लू भर क्या
समुद्र भर पानी में डूब कर भी
जिंदा रहते हैं लोग

आकाश से धरती पर अंगारों की वर्षा
हवा में तपन का तांडव
क्षितिज तक सनसनाती आग में ऊंटों की कतारें
हर दिशा भटक कर लौट आती नजरें
कहीं पानी की बूंद नहीं
भ्रम का पीछा करते-करते
थक कर लड़खड़ा गए हरिण
पर ऊंटों के नथुने फड़फड़ा रहे हैं
उन्होंने भांप ली
कहीं दूर टीलों के उस तरफ से
हवा में आ रही पानी की गंध
मुट्ठी भर हरियाली में ओझल
ओक भर अमृत मिला पपड़ाए अधरों को
मरु के आक्षितिज महासमुद्र में
सुकून-से नखलिस्तान के द्वीप
जैसे अंधेरे खंडहर के किसी सुनसान कोने में
जल रही मोमबत्ती की थरथराती लौ

पानी
छोटी-सी बावड़ी के अंधेरे गर्भ में सो रहा था
हरी काई की भारी चादर लपेटे
अंगारों की बारिश से अपने को बचाता
और पूरा गांव दौड़ रहा था
नदी, पोखर झील की तरफ
हर कहीं पपड़ाई जमीन
भयानक सन्नाटा
कमर और सर पर बैठी
धूप में तंदूर-सी जल रही गगरियां
ठांव-ठांव भटकतीं
अंततः बावड़ी तक पहुंचीं
वहां छिप कर सो रहा था थोड़ा-सा गंदला जल
स्त्रियां दो सदी पुरानी दीवार में फंसी
दो हाथ चौड़ी फिसलन भरी सीढ़ियों से
बावड़ी तल में उत्तरीं एक के पीछे एक
वह मटकी भर पानी के लिए
जीवन का मृत्यु की घाटी में उतरना था
तनिक विचलन कि सांसों का खत्म स्पंदन
बहुत निर्मम होता है पानी कभी-कभी!

स्त्री रो सकती है, रो लेती है
मां बहा देती है अंतर में पछाड़ मारता
वेदना का समुद्र आंखों से
पिता रोते नहीं
नदियां पिता की आंखों में भी होती तो होंगी
पिता की नदियों में बाढ़ भी आती होगी
उनके लिए तट की मर्यादा भंग करना निषिद्ध
वे आंखों की कोर तक आकर ठहर जाती हैं
पिता दुखों की मरुभूमि में चलते हैं नंगे पांव
पूरा कुटुंब पीठ पर, कधों पर उठाए
पिता अंतर में छिपा कर रखते हैं
रुदन का हाहाकार

पानी बहुरूपिया
आस्था पर आरूढ़
हिमालय की दुर्गम कंदरा में
शिवलिंग हो जाता है कभी
कभी गगनचारी हरकारा बन
संतप्त यक्ष की विरह वेदना
रामगिरि से सहस्त्र कोस दूर
अलकापुरी में राह देखती
उदास यक्षिणी तक पहुंचाता है
कभी पानी, पानी बन कर उतरता है धरती पर
गगन की ऊंचाइयों से
उतारता कोकिल-कंठ में रागिनी
डालता अमराइयों में झूले
प्रणयबिद्ध हृदयों में मधुर पीड़ा
कटी-फटी धरा की देह पर मलता है
मुलायम हरा मरहम
कभी रुद्र-सा कुपित
अकस्मात कर उठता है
कड़कड़ाती बिजलियों के ताल पर तांडव
फिर थक कर निकल जाता है
धीरे-धीरे कहीं दूर
पानी जरूरत है, पानी अमृत है, पानी विष भी है

अट्ठारहवें दिन
मुंबई पर जमे हुए हैं मेघ
यक्ष का संदेश पहुंचा चुके
अब कहीं जाने की जल्दी नहीं
भायखला छोड़ते रुक गई लोकल
आगे पानी, पीछे पानी
ऊपर पानी, नीचे पानी, पानी ही पानी
बहुत सारी मुंबई लौट रही है घरों को दफ्तरों से
कलाई पर छोटी सुई रेंगती ग्यारह तक चली गई
अनिश्चय और हताशा की धुंध
पटरियों पर उमड़ता पानी गुलाटियां मार रहा
लोकल मात्र इंतजार कर सकती है
कर रही है
श्रांत-क्लांत स्त्री-पुरुष
कंधों पर निढाल सिरों का पराया बोझ
आंखों में अधजगी नींद का खुमार
गीली रात पसर रही है हवा में
कहीं दूर दादर, परेल, अंधेरी
माटुंगा की बस्तियों में
प्रतीक्षा की मोमबत्तियां
जलते-जलते गल कर बुझने लगी हैं
रात्रि के कौन-से प्रहर
कारावास से मुक्तिमिलेगी
बादल ही जानता है
पर मुंबई डूब रही है जलप्रलय में
और वह आकाश में बैठा
नीरो की शैली में बांसुरी बजा रहा है।

संपर्क : डी के 2 – 166/18, दानिशकुंज, कोलार रोड, भोपाल462042 मो.8989569036