जीने और मरने का यह अंदाज देखिए
जिनको देख कर हम सीखते हैं कि एक सच्चे कम्युनिस्ट बौद्धिक का जीवन कैसा होना चाहिए, उन बहुत थोड़े से लोगों में एक राजेंद्र कुमार हैं।
शिक्षक, आलोचक और कवि के रूप में उनका योगदान अपनी जगह है, उनका कम्युनिस्ट होना एक कॉमरेड, साथी, दोस्त, संगठक और पारिवारिक व्यक्ति के रूप में सबसे अधिक नज़र आता है। उनका दोस्ताना उन सबके लिए बराबर है जिनकी आंखों में बराबरी के समाज का सपना कहीं न कहीं जिंदा है।
उनका मार्क्सवाद वैसा कभी नहीं था, जिसे मुक्तिबोध संदूक में बंद जड़ विचारधारा कहते थे। वह एक जीवित मार्क्सवाद है जो बदलती हुई दुनिया को समझता और उससे सीखता हुआ खुद को भी विकसित करता चलता है।
हमारे निजी जीवन में हमारी जीवन दृष्टि की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है जब मृत्यु से मुठभेड़ होती है।
जिस सहज मुस्कान, स्वच्छ दृष्टि और दृढ़ संकल्प के साथ राजेंद्र जी ने व्याधि का मुकाबला किया, जिस ख़ुलूस के साथ उन्होंने प्रतीक्षारत मृत्यु के लिए ख़ुद को तैयार किया, वह हमारे समय के एक महान उपन्यास जैसा है!
पिछली मुलाकात में उन्होंने ख़ुद के कहे ऐसे कई शेर सुनाए :
क्या जाने मौत ए मुंतज़िर भी कम हसीं न हो
तैयार हो ले तू भी, जरा बन संवर ले यार।
महबूब की तरह मृत्यु प्रतीक्षा में बैठी है। वह आपके तैयार हो जाने, बन-संवर लेने का इंतजार कर रही है। उसे देर तक इंतज़ार में रखना बेअदबी होगी, उतनी ही जितनी कि बिना तैयारी के लस्टम पस्टम मिल लेना!
जीने और मरने का यह अंदाज़ देखिए-
लगता है मुझसे मौत को भी हो गया है इश्क
क्या क्या बहाने ढूंढ़ती है मिलने के मुझसे।
मुझ जैसे शिकस्ता की खुशरुखी को देखकर
मुरझाए गुल भी पूछे हैं गुर खिलने के मुझ से!
यह मृत्यु का रूमानीकरण नहीं है। मृत्यु में निहित क्षति और निरवधि काल में उसके सौंदर्य का द्वंदात्मक साक्षात्कार है। कविता के इसे टुकड़े में इसे महसूस कीजिए-
तारा टूटा तो किसी ने मुझसे कहा :
इतने अनगिन तारों में से एक के टूटने से
आसमान पर क्या फ़र्क पड़ता है?
फ़ौरन एक तारे की कराह सुनाई दी- मुझसे पूछो, क्या फ़र्क़ पड़ता है क्योंकि मैं उस तारे के सबसे पास था जो अब मुझसे अलग होकर कहीं खो गया है! (‘उदासी का ध्रुपद’ संग्रह से)
अलविदा राजेंद्र जी! यादों में आपसे मिलते रहेंगे।
आशुतोष कुमार
