
प्रतिष्ठित कवि–आलोचक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर। कविता संग्रह ‘हर कोशिश है एक बगावत’ तथा ‘लोहा–लक्कड़’। आलोचना पुस्तकें ‘यथार्थ और कथार्थ’ तथा ‘आलोचना–आसपास’।
माँ सरस्वती से
भाषा में- कब से खोज रहा हूँ
मैं तुम्हें!
तुम्हारे चित्र मेरे पास हैं
राजा रवि वर्मा के हाथों बने से लेकर
मकबूल फिदा हुसैन के हाथों तक के बने
इन चित्रों से मिलान करते हुए भी
तुम्हें पहचानने की कोशिश की-
पर नाकाम
भाषा के जंगल में घना अंधेरा है
और तुम कहीं होगी
तो प्रकाश की तरह ही होगी
इससे कम की
न मैं कल्पना कर सकता हूँ
न कामना
जंगल खामोश है
बस, अपने ही पांवों के नीचे
सूखे पत्तों की चरमराहट
महसूस करता हूँ जब कभी
लगता है मैं चल रहा हूँ
वरना सब कुछ रुका है यहाँ
ठहरा-ठहरा-सा
जंगल के हर मोड़ पर
घात लगाए दिख जाते हैं
अदृश्य आखेटक
खामोशी में जब तब झांकते
शब्द-शब्द पर निशाना साधते!
चित्र में-जो मेरे हाथ में है-
तुम्हारे हाथ में कमल है
पर उसमें न कोई गंध है जो हवा को
सुवासित कर सके
न वह सूखता है कभी न मुरझाता
वीणा भी है चित्र में
तुम्हारी उंगलियां जिसके तारों पर हैं
पर न कोई गति
न झंकृति…
मुझे नहीं चाहिए-तुम
निरी मूर्तिवत-नितांत अपार्थिव
नितांत अलौकिक
वसंत में
प्रकृति के शृंगार को खिले जो फूल
वे भी तोड़ लिए जाएं
तुम्हारे गतिहीन चरणों पर चढ़ाए जाने को
मुझे काम्य नहीं है यह
मैं तुम्हें सजीव देखना चाहता हूँ
पूरी की पूरी पार्थिव-
अपनी मटमैली भाषा में!
मैं फूल नहीं
अपनी श्वासों से सुरभित
कुछ शब्द तुम्हें अर्पित करना चाहता हूँ
शब्द-जो बड़े जतन से
जंगल की वीरानी में
घात लगाए आखेटकों से बचाकर
किसी तरह तुम्हारे लिए सहेजे हॅूं मैं!
मैं तुम्हें सजीव देखना चाहता हूँ
पूरी की पूरी मानवी
बस, तुम इतनी पात्रता मुझे दे दो
कि मैं तुम्हारी वीणा के तारों को छू दूँ
झंकृति-सी तुम खुद ही
बज उठोगी मुझमें
मां, बस इतनी पात्रता दे दो मुझे!
सबकुछ- और ज्यादा और ज्यादा
थे तो हम सब एक साथ
पर, हर एक में
सबसे अलग दिखने का उत्साह
इतना अधिक था
कि और अधिक
अकेले होते जाते रहे हम सब
और ज्यादा प्रगतिशील
और ज्यादा जनवादी
साबित होने की होड़
सबमें व्यापी इतनी एक-सी
कि कम होते गए
अपने आप में
एक होते हुए भी हम सब
बेशक
चलते हैं सब मिले मिले ही
पर और ज्यादा और ज्यादा होने के चक्कर में
याद ही नहीं रह जाता
कि मिलना है कहां?
वही बात प्रतिपक्ष में
वही बात जब वह बोल रहा था
मुझे लग गया था, वह भाषण दे रहा है
वही बात जब मैं बोल रहा था
मैं खुद अपने को खामोश खड़ा पा रहा था
कटघरे में भाषा के
वह मंच पर था सार्वजनिक
भीतर से डरा
बाहर से निर्भय
मैं अपने भीतर था
रेत पर तड़पती
मछली-सी निर्भयता के साथ-
बाहर आने से डरता हुआ
वही बात उसके
कमल मुख से निकलते ही
नारे-सी लोके जाने को
होंठ ही होंठ पा गई थी
वही बात मेरे अंदर ही अंदर घुट रही थी
मेरी ही सांसों की टोका-टाकी से
वही बात
किस तरह मैं लाऊं
कविता से बाहर
अपनी कविता से?
वे जीते- हारा लोकतंत्र
अब क्या था?
मतदान-केंद्र पर लाइन में में खड़ा हुआ था।
पता चला
मतदान-सूची में तो मेरा नाम नहीं है।
समझ गया मैं, बिन पूछे ही-
यह तो उनका काम नहीं है
जांचें-परखें
कि क्यों नहीं हूँ मैं सूची में
अलबत्ता आगाह किया सब मुलाजिमों ने
‘जाओ
घर जाओ सही-सलामत
लोकतंत्र में मिला सुदामा के तंदुल-सा
जो कुछ
उसमें अपनी खैर मनाओ
भारतमाता की जै बोलो
और रहो आश्वस्त
कि हारे हुए लोकतंत्र के
तुम प्रहरी हो!’
संपर्क : 12बी/1, बंद रोड, एलनगंज, इलाहाबाद (प्रयागराज)-211002, मो.9336493924


पढ़कर सकून मिला कि अब भी कोई है जिसने भारत के “मरे हुए लोकतंत्र”पर लिखने की जुर्रत की,वरना भारत का तथाकथित “लूट तन्त्र”/लोकतंत्र दिन पर दिन मजबूत होता जा रहा है। —–अनुभव सिंह 9451017217