प्रकाशित कृतियां अभी वे जानवर नहीं बने’, ‘कोई तकलीफ़ नहीं’, ‘प्रतिनिधि कहानियां’, ‘सपनों का गणित’ (कहानीसंग्रह)सुबह के इन्तज़ार  में’ (नाटकसंग्रह)काग़ज़ की ज़मीन पर’ (संपादित पुस्तक)सृजन की वीथिका’, ‘सृजन का उत्सव’ (आलोचना)

हम आठ थे।

तब तक ग्रुप पर हमारा झगड़ा शुरू नहीं हुआ था।

अजय ने मैसेज डाला था व्हाट्सएप पर – ‘डोंट वरी! मैं भी शाम की पार्टी में शामिल हो रहा हूँ।मैं ऑफिस से घर आ चुका हूँ।’

अजय के मैसेज के नीचे एक ‘स्माइली’ भी दांत निपोर रहा था।

पार्टी का प्रस्ताव सिल्विया का था।उस मरघिल्ली को अपने काम की पहली तनख्वाह मिली थी।हम सभी दोस्तों को उसने सूचना दी थी।हम कुल मिलाकर आठ थे और सभी व्हाट्सएप पर जुड़े थे।सभी समाज को बदलने का दावा करते फिरते थे और अपने आपको इनकलाबी साबित करने का कोई मौका छोड़ते नहीं थे।कम से कम समाज को सुधारने और देश व दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हमारी धुआंधार बहसों का कोई अंत नहीं था।मैक्सिम गोर्की की मां किताब के पात्रों की तरह हम निरंतर बैठकें करते थे।बस हमारी बैठकों का स्थान आठों में से किसी का भी घर, कोई चायखाना, कोई बगीचा या बस-स्टैंड भी हो सकता था या फिर आज की तरह स्टार कैटेगरी का रेस्तरां भी।ग्रुप का नाम भी बड़ा जोशीला था – ‘एट रिवोल्यूशनरीज़।’ हालांकि आयशा कहती थी कि रिवोल्यूशनरी नहीं होता, रिवोल्यूशनिस्ट होता है, पर कोई तब्दीली किए बिना मैंने नीचे सिर्फ हिंदी अनुवाद डाल दिया था – ‘आठ क्रांतिकारी।’

अजय बैंक में था और उसकी बहन संजना किसी मल्टीप्लेक्स के सेल्स डिपार्डमेंट में थी।

अजय का मैसेज देखकर मैं कुढ़ गया।

जब भी कोई काम हो या कोई कार्यक्रम हो, तो अजय बैंक के काम और व्यस्तता का रोना रोने लगता था।अभी पिछले रविवार को भी किसानों के समर्थन में चित्रों की एक प्रदर्शनी में जाने का कार्यक्रम बना था।वहां हमें सुबह से शाम तक किसानों के साथ बैठना भी था।तब उसी दिन, ऐन समय पर अजय ने बताया कि मार्च में कोई छुट्टी नहीं।रविवार भी ऑफिस।उस बेवकूफ के कारण सबका कार्यक्रम खराब हुआ, लेकिन आज जब सिल्विया ने पार्टी का प्रस्ताव दिया, तो वह न केवल पांच बजे घर पहुंच चुका था, बल्कि मोबाइल पर भी उपलब्ध था और ग्रुप में चुटकुले डाल रहा था।

मेरी गलती इतनी ही थी कि मैंने चिढ़कर अजय से पूछ लिया था कि – ‘अबे, तुझे मार्च में कहां से समय मिल गया? बैंक कैसे मेहरबान हो गया तुझ पर? रात दस बजे से पहले तो घर नहीं आ सकता तू, फिर आज पांच बजे तेरे चरण-कमल घर में कैसे?’

मैंने आगे लिखा था- ‘किसानों के समर्थन में जाना हो, तो तू बिज़ी रहता है और पार्टी में जाने के लिए समय ही समय!’

अजय जवाब देने से पहले जरूर गर्व से हँसा होगा।मैं गारंटी दे सकता हूँ।खूब जानता हूँ मैं उसे।उसका रिप्लाई मैसेज था-

‘मैंने ऑफिस में कह दिया कि मेरी बहन को लड़के वाले देखने आ रहे हैं।फिर कोई क्या रोकता।इसके बाद तो इधर चार बजे नहीं कि बॉस खुद पूछने लगा कि रुके क्यों हो अब तक? बस, मैंने बाइक निकाल ली।’

बस इतनी-सी बात थी।पर झगड़े की शुरुआत का ठीकरा मेरे सिर पर फोड़ा गया।

संजना ने चिढ़कर लिखा था – ‘तूने ऑफिस में मेरा नाम क्यों लिया? क्यों लिया मेरा नाम? मुझे यह सब बिलकुल पसंद नहीं! मैं कोई कमोडिटी नहीं हूं कि कोई लड़का मुझे देखने आए।’

‘तू है कहां?’

‘तुझे इससे क्या? कंपनी के स्टोर पर हूँ।तू समझता क्या है अपने को?’

तब तक आयशा ने संजना के समर्थन में एक ऊर्ध्वमुखी अंगूठा भेज दिया था – ‘थम्स अप।’

‘ज्यादा हल्ला मत कर’ – अजय का भी गर्मी वाला मैसेज था, ‘मैंने कोई तेरा नाम नहीं लिया ऑफिस में।कोई तेरी फोटो नहीं दिखा दी ऑफिस में।बड़ी आई! बस इतना कहा कि लड़के वाले मेरी सिस्टर को देखने आ रहे हैं…।’

‘तो अपने लिए कह देता… अपने लिए बोल देता कि बैंकर अजय कुमार को देखने लड़की वाले आ रहे हैं… ऐसी बातों के लिए लड़कियां ही दिखाई देती हैं तुझे…?’

‘चुप रह, बकवास मत कर!’

‘तू चुप रह।’

संवाद जोर पकड़ रहा था।

मुझे पता है कि गुस्से में संजना की नाक लाल हो जाती है।हम इसका संदर्भ लेकर कई बार उसे कहते भी थे कि असली कम्युनिस्ट तो तू ही है।

‘यह हमारा ही देश है कि कोई कुछ भी बोल देता है लड़कियों के बारे में।कई देशों में तो सजा हो जाए इस पर’ – संजना का मैसेज उभरा।

खीझा हुआ अजय – ‘क्यों हो जाए… बहन को लड़के वाले देखने आ रहे हैं, ये कहना कोई अपराध हो गया?’

अड़ी हुई संजना – ‘हां हो गया अपराध… ये अपराध ही है…।’

आक्रमक अजय – ‘दिन को रात कहेगी, तो मान लेंगे क्या सब… अपने फैक्ट्स चेक कर जाकर।बड़ी फेमिनिस्ट बनी फिरती है।’

खिसियाई हुई संजना – ‘पहले फेमिनिस्ट का मतलब मालूम कर ले डिक्शनरी में।’

अजय आक्रोश में – ‘तू फेमिनिस्ट नहीं है फेमिनाजी है।’

संजना अब शायद आगबबूला हो गई होगी – ‘देख रही हूं पूजा और सिल्विया, मैं देख रही हूँ कि तुम दोनों ऑनलाइन हो, लेकिन गलत बात पर भी कोई मेरे सपोर्ट में खड़ी मत होना।’

तब तक बिजोय महापात्रा ने भी अंग्रेजी में लिख दिया था – ‘काइन्डली टेल मी दि नेम ऑफ दि होटल एंड सेंड मी लोकेशन।आई विल प्रेफर तंदूरी चिकेन…।’

इस संदेश ने आग में घी का काम किया।चिढ़ीकुढ़ी संजना का मैसेज था तुझे तो बस तंदूरी चिकेन मिल जाए, बाकी दुनिया को आग लगे, तेरी बला से।कयामत भी आ जाएगी न किसी दिन, तो तू हिमगिरि के शिखर पर कहीं शीतल छांह में निर्विकार बैठा हुआ, प्रलयप्रवाह देखते हुए चिकन खाता पाया जाएगा।

‘और उसकी आंखें भी भीगी नहीं होंगी…’ मैंने जोड़ा।

‘सॉरी यार, बैटरी ऑफ माई मोबाइल इज़ लो, सो आई जस्ट आस्क्ड… आई विल कम डायरेक्टली फ्रॉम माई क्लासेस’।

‘कोई बैटरी-वैटरी लो नहीं है, खाने की बात सुनकर तू बौरा जाता है…।’

बिजोय महापात्रा मणिपुर से पढ़ने आया था और सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था।उसका रंग गेहुंआ था और कद मध्यम।कद के अनुपात में उसका वजन कोई दस किलो अधिक था।बाल घने थे और सुनहलापन लिए भूरे।वह हमेशा चुस्त जीन्स पैंट पर गाढ़े रंग की टी-शर्ट पहनता था।दुनिया की तकरीबन हर बात की उसे जानकारी थी।हम उसे सर्च-इंजन कहते थे।जब हम बीएमडब्लू कार की बात करते थे, तो वह उसके मालिक और उसके ब्रैंड एम्बैस्डर्स की बात करता था।आर्कटिक और ऐंटार्कटिक एरिया को वह भालुओं के होने और न होने से जोड़ देता था, ऑर्गैनिक और इनॉर्गैनिक केमिस्ट्री का फर्क वही हमें समझाता था।हमारा साथी दीपक दावा करता था कि बिजोय उप-राज्यपाल के अधिकार, अंडमान निकोबार क्षेत्र में गन्ने की खेती के लिए लगने वाले उर्वरक के नाम और शहर के मावा एसोसिएशन के अध्यक्ष द्वारा जारी मिठाइयों के आज के निर्धारित भाव भी बता सकता है।बिजोय के कपड़ों को लेकर दीपक उसको जरूर टोकता था – ‘तू ध्यान क्यों नहीं देता खरीदते समय? पैंट नीचे से कसी है, लेकिन ऊपर से ढीली है।टी-शर्ट चटक पीले रंग की लेने की क्या तुक है? अगली बार टी-शर्ट लेने मेरे साथ चलना।’ बिजोय इन सलाहों पर अमल तो नहीं ही करता था, ऊपर से दीपक की जैकेट यदि खोलकर रखी हो, तो पहन लेता था।इस बात की परवाह किए बिना कि जैकेट जरूरत से ज्यादा लंबी है और वह उसमें विचित्र लग रहा है।खुद दीपक के कपड़ों से सुरुचि-संपन्नता झलकती थी।कई मौकों पर तो वो सूट या ब्लेजर भी पहन लेता था।कोट-पैंट, जैकेट से लेकर कुर्ते तक सभी में वह जंचता था।उसकी लंबाई अच्छी थी और वह फिल्मों के हीरो की तरह आकर्षक था।

होस्टल के खाने से आजिज बिजोय हम लोगों के घर या होटल में खाने-पीने का कोई भी मौका छोड़ता नहीं था।सिल्विया कहती थी कि तू खाने के लिए लालायित नहीं, बल्कि उससे भी एक कदम आगे लालायमान रहता है… लालायमान।बिजोय महापात्रा शर्माता था और झेंपता था।उसे खरी-खोटी सुनाने और उसका मजाक उड़ाने के बावजूद मुलाकात की सूरत में सभी उसके लिए कुछ न कुछ खाने के लिए लाने की कोशिश अवश्य करते थे।

सिल्विया का जवाबी मैसेज कुछ देर में आया – ‘तू इतनी पर्सनल क्यों हो रही है संजना?’

‘क्यों, तुझे बुरा नहीं लग रहा क्या? तुझे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता।औरत को कोई कुछ भी कहे… तू खुश रह खुद में ही।’

‘ए चुप रह… मैं कोई उसका सपोर्ट नहीं कर रही।’ मरघिल्ली।

‘तू चुप है, इसका मतलब है कि तू उसके साथ है।’ लाल नाक।

अजय ने पटाक्षेप करते हुए लिखा- ‘मैं अब कुछ बात नहीं करूंगा, मुझे तो अभी से भूख लग रही है।डिनर पर मिल रहे हैं न आठ बजे, तब बात करूंगा।तब जवाब दूंगा सबको।अभी तो मोबाइल बंद कर रहा हूँ मैं।तब तक जिसको अपनी भैंस चराने का शौक हो, चराता रहे।’

वस्तुतः जंग समाप्त नहीं हुई थी।यह तो केवल युद्ध-विराम था।

रात आठ बजे तक हम कुछ लोग होटल पहुंच गए थे।इस होटल में हम पहले भी आ चुके थे।

टेरेस पर रौनक थी।भीड़ अधिक नहीं थी और एक कॉर्नर का टेबल हमें दिया गया था।हमारे लिए आठ-दस कुर्सियां लगाई गई थीं।मौसम खुशनुमा था।रोशनी कम थी और बिजली के रंगीन कुमकुमों से वातावरण सुखद हो गया था।

होटल एक्सेलेन्ट।खाना भी यहां का बड़ा लजीज और एंबिएंस भी।मस्त! – बिजोय अपने अंगूठे और तर्जनी को जोड़कर गोलाकार करते हुए बोला।स्वर उसका सामान्य था, लेकिन वह उत्साहित था और उसकी आवाज में खुशी पकड़ी जा सकती थी।

बिजोय महापात्रा ने टेबल पर मौजूद अचार को चाटना, चटनी को चखना और प्याज को कुतरना शुरू भी कर दिया था।वह बाकियों का लिहाज कर रहा था, अन्यथा उसकी नजर मेज पर रखे मूंगफली और सलाद पर भी थी।

संजना घर न जाकर सीधे कंपनी से वहां पहुंची थी।हैलो, हाय छोड़कर आते ही उसने पर्स को बेमुरव्वती से पटका और अपना दुपट्टा ठीक करते हुए भुनभुनाना शुरू कर दिया – ‘ऐसे तो बड़ा क्रांतिकारी विचार दिखाता है।किसानों के पक्ष में खड़ा होता है, औरतों के समर्थन में बात करता है।बस, घर में कोई प्रगति की बात नहीं! दुनिया में सब बदलाव हो, औरत खूब स्वतंत्र हो, लेकिन घर की नहीं… घर के बाहर सारे सुधार हों।’

‘पागल मत बन’, अजय उलटकर जवाब दे रहा था – ‘तू जानती है कि मैं फालतू के आडंबर नहीं करता।लेकिन दिखावे का फेमिनिज्म मुझे पसंद नहीं।मैं खुद सिगरेट नहीं पीता, इसलिए कोई लड़की कहे कि मैं फेमिनिस्ट हूँ इसलिए मैं भी पुरुष की तरह सिगरेट पियूंगी, तो यह मुझे स्वीकार नहीं।इसका समर्थन मैं नहीं कर सकता।सिगरेट लड़के के लिए भी बुरा है और इतना ही बुरा लड़की के लिए भी।’

‘बात को बदल मत।सिगरेट कहां से आ गई बीच में…।’

‘सिगरेट का एक्जाम्पल दिया है, इतना भी नहीं समझती।’

‘पहले गलत बात करता है फिर बातें बनाता है…।’

‘तू विश्लेषण करती रह।मैं सूप पीने के बाद ही कोई बात करूंगा…’ – अजय ने निर्णायक स्वर में कहा।

‘मैं पहले जूस लूंगी’ – आयशा बोली।

‘आई विल गो विद पेप्सी’ – संजना ने अपनी लाल नाक को मसलते हुए कहा।

‘ठंडा नहीं पीना मुझे… मुझे भूख लगी है।पहले सूप और स्टार्टर्स तो मंगा।होस्ट क्यों चुप बैठी है’ – मैं सिल्विया से संबोधित हुआ, ‘खाना खिलाने बुलाया है या ‘भूख के तीन दिन’ का वाचन करने…।’

सिल्विया के बाल घुंघराले थे।उसका कद पांच फुट तक भी नहीं पहुंचता था।बहुत दुबली थी इसलिए मैं उसे मरघिल्ली कहता था।लेकिन वह बला की खूबसूरत थी।उसकी आवाज में खनखनाहट थी।वह शहर के अंग्रेजी अखबार में एडिटिंग डिपार्टमेंट में थी और खुद को असिस्टैंट एडिटर कहलवाना पसंद करती थी।वह कहती थी कि मैं प्रूफ रीडिंग करूं या टाइपिंग करूं, काम तो मेरा संपादक वाला ही है।

‘पूजा और दीपक आए नहीं अभी तक…’ -सिल्विया बोली, उसकी आवाज में चर्च की घंटियों की-सी मिठास थी – ‘दीपक तो खैर फोन उठाता ही नहीं आजकल और पूजा का भी फोन स्विच ऑफ आ रहा है…।’

मैं कुढ़ गया।

‘वे दोनों तो वीआईपी हैं।दोनों देर करेंगे तो हम सब भूखे बैठे रहें? अरे, वह बाद में ज्वाइन नहीं कर सकते हमें…?’

आयशा प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है, इसलिए नसीहत देने के अंदाज में बात करती है- ‘हल्ला मत कर’ – वह बोली, ‘हल्ला मत कर… आर्डर दे दिया है और तू यहां आने के बाद सलाद और चार पापड़ खा चुका है।दिखाई सब देता है मुझे।काटने को मत दौड़ हर बात में…।’

सिल्विया ने कहा- ‘सब के लिए स्टार्टर्स बोला है।तेरे आने से पहले ही बोला है।अब लगा देगा कुछ देर में… तेरे और बिजोय के लिए कॉर्न सूप मंगाया है।’

यह लड़कियों वाला सूप मैं नहीं लूंगा’, बिजोय ने मुंह बिचकाया, मेरे लिए चिकन तंदूरी और मनचाओ सूपपहले ही बताया था

लड़कियों वाला?’ संजना ने भृकुटी तानीअब लड़कालड़की का अलग कुछ नहीं है।बाथटॉयलेट भी यूनिसेक्स होता है

ओहआई एम सॉरीमैं तो इसलिए बोला कि लड़की लोग कॉर्नसूप पसंद करता है जेनेरेलीबिजोय शर्मिंदा हुआ।

जेनेरेलीसंजना ने नकल उतारी।

तब तक वेटरों ने कुछ परोसना शुरू कर दिया।

‘तू एक तख्ती लटका ले गले में ‘फेमिनिस्ट’ और पुरुषों से बात करना भी बंद कर दे… क्योंकि सारे के सारे बदमाश ही होते हैं।’ मैं चिढ़कर बोला।

‘तू चुप रह… तेरे पापा लॉयर हैं, तो तुझे लगता है कि सारी कायनात तूने खरीद ली है।ये जो गुलछर्रे उड़ा रहा है न तू और होन्डा सिटी में घूम रहा है न… वो तेरी अपनी कमाई से नहीं हैं।’

‘ए सिरफिरी…’ मैं भड़ककर बोला… ‘तेरा झगड़ा अजय से है।तेरी नाराजगी पूजा से है।और गुस्सा उतार रही है मुझ पर।फादर वकील हैं तो क्या? मैं भी एलएलएम कर चुका हूँ और जब चाहूं काला कोट ओढ़ सकता हूँ, जब चाहूं प्रैक्टिस शुरू कर सकता हूँ।’

‘झगड़ा शुरू ही तेरे कारण हुआ आज।अजय जल्दी आए चाहे देर से… तुझे क्या जरूरत थी अजय से पूछने की…।’

‘वाह रे वाह…’ मैंने कहा- ‘बैंक में बहाना बनाए अजय।झगड़ा करो तुम लोग और बिल फाड़ो मेरे नाम पर।ठीकरा फोड़ो मेरे सिर पर।’

सिल्विया बोली – ‘अरे तुम लोग मेरे सेलिब्रेशन में आए हो या दंगल करने? तू समझाता क्यों नहीं इनको बिजोय…।’

‘गुड… गुड…’ बिजोय बोला, तंदूरी चिकन इज़ गुड…’ कान में इयरफोन लगाए वह अपनी दुनिया में था।सबको अपनी तरफ देखते पाकर वह हड़बड़ा गया।

सभी एक झटके से हँसे।उसकी घबराहट देखकर हम अपनी हँसी नहीं रोक पाए।

‘इन दोनों को इतनी भी कर्टसी नहीं कि देर हो रही है, तो एक मैसेज कर दें हमें।’ कुछ देर बाद संजना बोली।बस तभी पूजा रेस्टोरेंट के दरवाजे पर दिखाई दी।

‘पूजा आ गई है…’ फिर मैंने कहा।संजना ने मुंह बनाया।पूजा से चिढ़ी हुई है वह।पूजा की विपरीत दिशा में देखते हुए वह ठंडा पीने लगी।

‘संजना…’ अजय ने कुछ कड़े स्वर में कहा- ‘यह ठीक नहीं।व्हाट्सएप पर पूजा ने सपोर्ट नहीं किया… छोटी सी बात है।यह सब चीजें लड़ने की नहीं होती।थोड़ी समझदार बन।बड़ी हो गई है।बच्चों की तरह लड़ना ठीक नहीं है।’

‘अब तू सिखाने मत बैठ मुझे… वह मेरी सहेली है, मुझे पता है कि उससे कब लड़ना है और कब मिल्ली करनी है।तू हमेशा रोब मत दिखा।यह मत भूल कि बड़ा नहीं है तू मुझसे।ट्विन्स हैं हम।’

‘हां… लेकिन तुमसे पंद्रह मिनट पहले पैदा हुआ हूँ।उस लिहाज से बड़ा ही हूँ तुमसे।पंद्रह मिनट बड़ा।इस अंतर को तू क्या, अब भगवान भी नहीं बदल सकता।’

‘‘बड़े भाईसाहब’ पढ़ कर आया है और वैसे ही व्यवहार किया कर…’, मुंह बिसूरकर बोली संजना – ‘पंद्रह मिनट के बल पर जिंदगी भर मुझ पर रोब गांठता फिर।’

तब तक पूजा पास आ गई थी।सलीके से पहनी गई शिफॉन की मूंगे के रंग की साड़ी में वह भली प्रतीत हो रही थी।उसे छरहरी भी नहीं कह सकते और मोटी तो हरगिज़ नहीं! उसकी सुगठित काया, साफ रंग, गोल चेहरा और पोनी टेल उसे बेहद आकर्षक बना रहे थे।

‘लेट-लतीफ… देर से आने का तो तूने ठेका लिया हुआ है।नौ से ऊपर हो गया।’ मैंने कहा।

सिल्विया बोली – ‘ये हम लोगों की तरह सीधे काम से यहां नहीं पहुंच सकती न।नर्स के यूनिफॉर्म में कित्ता अजीब लगेगी।’

पूजा ने नर्सिंग का कोर्स किया था और अब एक स्थानीय अस्पताल में सेवाएं दे रही थी।हम सभी हँसे, लेकिन पूजा चुप रही।

‘हम खाना खाने के लिए थोड़े ही इकट्ठा होते हैं।हम तो बहस करने, गप्पा-गोष्ठी और हल्ले-गुल्ले के लिए मिलते हैं।इसलिए जल्दी आया कर…’ मैंने कहा। ‘चल कोई नहीं, दीपक कहां है?’

पूजा के कुछ बोलने से पहले ही संजना भड़क कर बोली – ‘ये सब बातें होती रहेंगी… पहले यह बता पूजा कि तुझे कुछ गलत नहीं लगा अजय की बातों में।इसने अपने ऑफिस में कह दिया कि मेरी बहन को लड़के वाले देखने आ रहे हैं।हम क्या कोई देखने वाली चीज हैं।अब अगर कोई लड़की आएगी इसको देखने… हैं? तब इसको बर्दाश्त होगा?’

‘अजय के विचार हमें पता है।वह ऐसा नहीं है।सहज ही ऑफिस में कह दिया उसने।ये तो बात का बतंगड़ बनाने वाली बात हो गई…’ संजना के बगल में बैठते हुए पूजा धीमे स्वर में बोली।

‘तू है ही ऐसी… तू कभी खुलकर विरोध करती नहीं।सही बात के पक्ष में खड़ी होती ही नहीं।मौका और स्थिति देखकर ही समर्थन करती है।कहीं इसे बुरा न लग जाए… कहीं वह रूठ न जाए।मुंह मत खुलवा मेरा… दीपक भी इतना गलत जा रहा है आजकल… पर तू तो अपना हाथ आधा खड़ा रखना और तय करना उसी समय पर कि कब किसके पक्ष में हाथ उठाना है।अरे दिनकर जी ने तेरे जैसे फेन्स पर बैठे लोगों के लिए ही लिखा है  -जो तटस्थ हैं वक्त कल उनसे भी मांगेगा हिसाब… और ऐसा ही कुछ लिखा है कि समय लिखेगा उनका भी अपराध…।’

‘पहले पढ़ तो ले कविवर दिनकर की कविता ठीक से’ – आयशा बोली।

‘एक इधर का पक्ष होता है, एक उधर का।साथ ही, एक तटस्थ रहने वालों का और एक बिजोय की तरह खाने में मस्त रहने वालों का।’ मैंने कहा।

सब हँसे।बिजोय भी मुंह चलाते हुए संकोच से हँसा।पूजा शांत थी।एक शब्द नहीं कहा उसने।अमूमन ऐसा होता नहीं, पर वह आज बिलकुल चुप थी।

‘उसे सांस तो लेने दे।हम सिल्विया की पहली तनख्वाह का जश्न मनाने आए हैं…’ मैंने हल्के से डांटा संजना को।

फिर पूजा धीरे से बोली – ‘इतनी कोई बात नहीं हुई संजना।मैं फिर कहती हूँ कि अजय ने सहज भाव में कही है यह बात।यहां इतना स्त्रीवादी बनने की जरूरत नहीं है।कम से कम इस बात में तू अति कर रही है…।’

‘देख, मैं कहता था न? तुम सब एक तरफ, मैं और पूजा एक तरफ।मतलब पूजा जानती है कि क्रांति और प्रगति के नाम पर बेवकूफियों के लिए कोई जगह नहीं है।’ समर्थन मिलने से उत्साहित स्वर में अजय ने कहा।

‘पूजा तो दब्बू ही है और दब्बू ही रहेगी।दीपक के साथ भी गुडी गुडी में लगी रहती है।’ संजना मुंह बनाकर बोली।

‘अरे चुप क्यों है तू… आज तूफान इतना शांत क्यों है?’ सिल्विया ने कहा भी और पूछा भी।

‘दीपक किधर है?’ मैंने पूछा, ‘इतनी देर हो गई यार! तुम लोगों की तरह रात दो बजे तक सोने की आदत नहीं है मेरी।मुझे ऑफिस जल्दी जाना पड़ता है।’

‘अरे, क्या हुआ? बोल न, चुप क्यों है? मेरी कोई बात बुरी लगी क्या?’ संजना बोली।

‘सब खत्म आज!’ धीमे स्वर में कहा पूजा ने।

‘क्या? क्या कहा? सुनाई नहीं दिया…’ मैंने सशंक स्वर में कहा।

‘दीपक से ब्रेक-अप कर लिया है यार… उसे छोड़ दिया है, छोड़ दिया है।उसकी आवाज तेज हो गई, ‘हां… हां… छोड़ दिया है और वह भी हमेशा के लिए…’ उसने आगे कहा।

हम सभी सन्न रह गए।संजना चम्मच हाथ में घुमा रही थी, जो उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया।

हम सभी के हाथ थम गए।

छह जोड़ी आंखें अपार विस्मय से पूजा को देख रही थीं।

‘फालतू की बकवास मत कर’ – मैंने कहा।

आई एम सीरियसपूजा ने कहा, ‘बकवास भी नहीं कर रही हूँ और मजाक भी नहीं कर रही हूँ मैंकिसी निर्जन गुफा के भीतर से आ रही थी उसकी आवाज।उसका स्वर इतना सर्द था कि हम काठ हो गए।

अरे बेवकूफ’, सिल्विया फिर बोली बीस दिन बाद तेरी शादी है।क्या पागलपन है? क्या बेवकूफी भरी बातें कर रही है तू?’

विश्वास किसी को भी नहीं हो रहा था, लेकिन पूजा का चेहरा ज़र्द था।हम सभी भौचक्के रह गए थे।

‘झूठ मत बोल… कार्ड छप गए हैं तेरे।मां-बाबू आने वाले हैं तेरे अगले सप्ताह… भुवनेश्वर से।रिश्तेदार भी पहुंचने वाले हैं कुछ दिन बाद।’

‘तू कार्ड छपने की बात कर रही है, अरे शादी हो चुकी होती न, तो भी छोड़ देती उसे।’ पूजा ने बात काटकर कहा।

संजना ने घबराकर उसके दोनों हाथ पकड़ लिए- ‘क्या हुआ? तू मुझे बता क्या हुआ? झगड़ा किया… झगड़ा किया न उसने? तू चिंता क्यों करती है।बत्ती देंगे ना उसको।दीपक लड़ा है न तेरे साथ।अकल ठिकाने लाएंगे उसकी।ऐसे नासमझी में बात नहीं करते पूजा…।’

‘सब समझकर कह रही हूँ संजना।’ विचित्र आवाज में पूजा बोल रही थी।

‘क्या हुआ?’ आयशा बोली, ‘कोई दूसरी लड़की का चक्कर है?’

पूजा ने इनकार में सिर हिलाया।

‘हुआ क्या है? तू सिरफ हमें बताने का… रास्ता निकालेंगे न हम कुछ’ – बिजोय आत्मीयता से बोला।

‘कोई रास्ता नहीं बिजोय।मैं ‘प्वाइंट आफ नो रिटर्न’ पर खड़ी हूँ…।’

‘अरे, अब मुंह से बोलेगी भी कुछ…’ मैं उत्तेजित स्वर में बोला, ‘पहेलियां मत बुझा।आखिर बात क्या हुई?’

‘क्या बताऊं और क्या-क्या बताऊं तुम सबको…।दीपक वैसा नहीं है यार, जैसा तुम लोग समझते हो।वैसा नहीं है जैसा मैं उसे समझती थी।वह जो अपने चैनल के लिए तैयार कर रहा था न रिपोर्ट… जिले की लड़की अतिया के रेप की रिपोर्ट…।’

सभी चौंके।

‘हां, उसमें क्या नया है…’ मैंने कहा – ‘ओपन एंड शट केस है।किसे नहीं पता एमएलए ने बलात्कार किया और जब अतिया रिपोर्ट लिखाने जा रही थी तो उसे जिंदा जला दिया गया।सबको मालूम है…।’

‘खाक मालूम है!’ भड़क गई अचानक पूजा।पता नहीं, मन में कितना कुछ दबाकर रखा था।वह थरथरा रही थी- ‘एमएलए की तरफ से लोग आए थे।कई दिनों से उसके संपर्क में हैं वे लोग।और दीपक ने रिपोर्ट बनाई है कि बलात्कार तो हुआ ही नहीं और… और अतिया की मौत तो बस एक हादसा थी।’

‘यह क्या बोल रही है…?’

‘क्या कह रही है…??’

‘बे-सिर-पैर की बात क्यों कर रही है…???’

हम सभी अपने आपसे बात कर रहे थे।

‘हां, उसकी रिपोर्ट सभी चैनलों पर भी है आज।मैं तो सीधे उसके स्टुडियो पहुंच गई थी।बात की मैंने उससे… तो कहता है कि चैनल का मालिक यही चाहता है।फिर बोला, लड़की के साथ जो होना है, वह तो हो चुका… अब मैं रिपोर्ट क्या बनाता हूँ उससे क्या फर्क पड़ जाएगा… लड़की तो वापस जिंदा नहीं हो जाएगी।फिर कहता है कि ‘कलरफुल फ्यूचर’ के लिए थोड़े-बहुत समझौते करने पड़ते हैं…।’

‘तुझे कुछ गलतफहमी हुई है यार’ – मैंने विस्फारित नेत्रों से उसे एकटक देखते हुए कहा।

‘इतनी कमअक्ल नहीं हूँ…’ पूजा अचानक बोली – ‘समझती सब हूँ मैं।नावां खूब मिल रहा है उसे।खूब खर्च करता है आजकल।जबकि तनख्वाह क्या है उसकी, पच्चीस-तीस हजार महीना।पिछले हफ्ते कह रहा था कि शादी के तुरंत बाद फ्लैट लेगा सैटेलाइट एरिया में।चालीस लाख का फ्लैट और वह भी बिना लोन लिए।’

हम सभी अवाक थे।

‘हम सभी के साथ बातें तो बड़े सिद्धांतों वाली करता था।तू भी तो उसे बड़ा आदर्श पत्रकार समझती थी…’ आयशा ने किंचित विस्मय से कहा।

‘शायद तुम लोगों ने ध्यान से उसे पिछले कुछ समय से सुना नहीं है।टीवी पर उसकी रिपोर्टें देखी नहीं हैं।लेकिन मैं देख रही हूँ।संवेदनहीन पत्रकार के रूप में देख रही हूँ।मलाई खाने का शौक उसे अभी कुछ समय से लगा है।धर्म के नाम पर वैमनस्य बढ़ाता है।चिल्ला-चिल्लाकर सच को झूठ और झूठ को सच करता है।सच जानते हुए भी पूरी संवेदनहीनता से स्थानीय सरकार के पक्ष में अपनी बात कहता है… और… और मेरे समझाने पर उसने साफ कह दिया है कि किसी भी कीमत पर… किसी भी कीमत पर वह यह सब छोड़ नहीं सकता…।’

शून्य में देखते हुए पूजा कहे जा रही थी – ‘सारी नैतिकता भुलाकर गलत लोगों के शान में कसीदे पढ़ता है।मैं महीने भर से उसे देख रही हूँ और एंगेजमेंट के बाद तो पूरे ध्यान से नजर रखने का मौका मिला है।सच जानते हुए भी तानाशाही के पक्ष में क्रूरता से चिल्लाता है, केवल कुछ पैसों के लिए? सोचो!!’

‘हां… वह तो मुझे भी लगा था… कई बार वह गलत लगा है, लेकिन इस स्तर तक पहुंच गया है, इसका अंदाजा नहीं था मुझे।’ अजय ने कहा।

‘और आज तो अति ही हो गई न! सब जानते हुए भी दीपक एक बलात्कारी को भगवान बना रहा है और लोग तो वही मानेंगे जो देखेंगे।’ पूजा बोली – ‘अब बताओ कोई रास्ता है मेरे पास?’

‘सब ठीक है यार…’ संजना बोली, ‘लेकिन तेरी एक पूरी सुखी और संपन्न जिंदगी का सवाल है।इतनी कम उम्र में दीपक ने अपने प्रेजेंटेशन स्किल से अपनी पहचान बनाई है।अद्भुत वाक-कौशल है उसका।सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।आगे कितनी तरक्की करेगा।ऐसा करेगी तू तो सब छूट जाएगा न एक झटके से…।’

पूजा ने जलती आंखों से संजना को देखा – ‘तो क्या ख्वाबों की कीमत पर इतना बड़ा समझौता कर लूं? रहूंगी कैसे उसके साथ…।’

माहौल एकदम बदल गया था।टेबल पर रोशनी कुछ तेज हो गई थी।आसपास की मेजों पर कुछ लोग आना शुरू हो गए थे, पर हमारी टीम पर किसी का विशेष ध्यान नहीं था।सब अपने में मस्त थे।

आयशा ने कहा, ‘चिंता मत कर।हम सब तेरे साथ हैं।तेरे अम्मा-बाबू को भी समझाएंगे और तुझे क्या चिंता है।तू तो पढ़ी-लिखी है, अपने पैरों पर खड़ी है।तेरे लिए अच्छे लड़कों की कोई कमी है क्या?’

सिल्विया हिचक कर बोली- ‘देख, बात को समझ, माने तू तो समझदार है ही… है न? लेकिन शादी तय हो ही गई थी तो… समझ रही है न… दरअसल तू तो पिछले कुछ समय से उसके साथ… अम्म… मेरा मतलब है दीपक के साथ थोड़ा… मतलब इंटिमेसी वाली बात… तो मैं वही पूछ रही हूँ कि कुछ किया तो नहीं है ना? मतलब फिज़िकल रिलेशन… और बच्चे-बच्चे का कोई मामला तो नहीं न अभी? सीधी बात कहूं तो प्रेग्नेंट तो नहीं हुई है न…?’ इतना पूछने भर में हांफने लगी थी सिल्विया।

‘प्रेग्नेन्ट होती न… तो भी पीछे नहीं हटती।’ पूजा दृढ़ता से बोली।

‘हम तो दीपक के साथ तुझे भी गलत समझते थे कई बार।तू तो सचमुच क्रांतिकारी निकली।हम सिद्धांतों की इतनी दुहाई देते हैं, लेकिन तू तो अमल में ला रही है… हम सब से कितना ऊंचा उठ गई है तू।’ अजय ने कहा।

मैंने भर्राए गले से कहा – ‘तू चिंता मत करना।मैं जिंदगी भर तेरे साथ हूँ।तुझे कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा।’

‘ज्यादा सिंपैथी मत दिखा, पूजा इतनी देर बाद अब अपने रंग में लौटी – ‘ज्यादा सिंपैथी मत दिखा, मैं कोई तेरे से शादी नहीं करने वाली हूँ।’

मुझे छोड़कर सब हँसे।संजना ने तो ताली भी बजाई।

‘समय पर सही फैसला कितना सुकून देता है।अरे, मैं तो खुश हूँ आज…’ पूजा दृढ़ता से बोली – ‘सिल्विया, तेरी पहली तनख्वाह की बात है वरना पार्टी तो आज मेरी तरफ से होती।’

सिल्विया अचानक बोली – ‘लो भई, खाना भी आ गया।’

‘अब दबाकर खा’ – संजना अब बिजोय से मुखातिब थी।

‘ठहर जाओ सब एक मिनट’ – मैंने कहा।

सबने मेरी तरफ देखा।कुछ आश्चर्य से।

मैं मोबाइल के बटनों से खेलने लगा।

‘ग्रुप का नाम पहले बदल देता हूँ’, मैंने कहा – ‘सात क्रांतिकारी! सेवेन रिवोल्यूशनरीज़!!’

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