काव्य संग्रह ‘पुकार’। झारखंड सरकार में कार्यरत।

मानव होना पड़ता है

रोटियां तवे पर फूलती रहती हैं
बिना जाति और धर्म देखे
वे नहीं पूछतीं-
किसने बेली हैं और
कौन सेक रहा है उन्हें

दवाइयां भी
बिना जाति-धर्म पूछे
हलक से नीचे उतरती रहती हैं

नदियां नहीं पूछती हैं
तैरने वालों से
जाति और धर्म

पेड़ नहीं पूछता है उनसे
जाति और धर्म
लू के थपेड़ों से बचने के लिए
खड़े हो जाते हैं सभी उसकी छांव में

दुधारू पशु भी नहीं पूछते हैं उनसे
जाति और धर्म
जो निकाल रहे होते हैं
उनके थन से दूध

जाति-धर्म पूछने के लिए
आदमी होना पड़ता है!

संपर्क : सहायक सांख्यिकी पदाधिकारी, जिला सांख्यिकी कार्यालय, गिरिडीह, झारखंड-815301 मो नं 9113150917