अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य के पूर्व आचार्य। अंग्रेजी कविता संग्रह ‘इंसेस्ट एंड अदर पोएम्स’। हिंदी की कविताऐं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

शहर का वयस्क होना

मेरा शहर आखिर
वयस्क हो गया!

सीधा-सा बच्चा था
धूप में चुक्कू-मुक्कू बैठा
हरा कनटोप पहने
नाक सुड़कता
पिल्लों, चूजों से खेलता
अचानक एक दिन
गलियों में उगते
कांच की इमारतों की जैकेट
और रिसोर्टों की हिप्स्टर पहन
वह छौवा से किशोर हो गया

फिर, नाले पर छनते बर्रे
खेसारी की कचरी, और
तीखी चटनी के दोने को
पिज्जा कॉर्नर की कचरे की बाल्टी में झटक
कनकव्वे काटती
हुर्र-हुर्र करती
मोटरसाइकिलों पर
झंडे लहराता
नारे चिंघाड़ता
वह बालिग हो गया

छौना-सा बबुआ था
गुलथुल, गदबद
छोटी पहाड़ी की गोद में
मेहंदी की क्यारी-सा
अब सयाना हो गया-
मुहल्लों के तालाबों को समेटता
जंगल के छोरों को उधेड़ता
नदी पर पुलों की करवटें लेता
हाथ-पांव पसारता
पागल सांड-सा
मुस्टंड हो गया

मेरा शहर भी आखिर
बड़ा हो गया!

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