वरिष्ठ कवि। मराठी में अनूदित कविताओं का संग्रह ‘धरेचे सुख’ प्रकाशित। सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर।

जब तक देह है

भाषा नहीं थी
तब भी मैं लिखता था
कुरेदता पत्थरों से शिलाओं पर
कुछ आड़ा-तिरछा

वाद्ययंत्र नहीं थे
तब भी मैं उत्पन्न करता था ध्वनियां
नदी में उंगलियों से जल तरंग बजाता
मेरी हँसी मेरा विलाप
आदिम घाटियों में गूंजता था

जब गहन होता था सन्नाटा
तो मैं पीले सूखे पत्तों पर दौड़कर
उनमें पैदा कर देता खड़खड़ाहट
जो जंगल के एकांत में
सुनाई देती थी खूब दूर

पत्थरों को रगड़ कर
पैदा कर देता था आग
रच देता एक आदिम दुनिया
गढ़ देता था कुछ अनगढ़ शिल्प

कुछ नहीं था मेरे पास
तो मेरे पास मेरी देह थी
मैं ही हूँ
करोड़ों वर्ष से यह देह धारण किए
जब तक यह देह है
सबकुछ संभव है!

इसी देह में

इसी देह में हम मरेंगे बार-बार
इसी देह में जिएंगे फिर-फिर
इसी देह में ढूढेंगे थोड़े से सुख
भुगतेंगे
जन्म-जन्मांतरों के दुख भी इसी देह में

इसी देह में सागर हिलोरें लेगा
इसी देह में होगा हिमपात
यही देह कांपेगी भूकंप में
इसी देह में बसता है पुत्र
इसी देह में बसती है प्रिया
प्राण भी तो बसते हैं इसी देह में

इसी देह में भोगेंगे हम चौरासी लाख योनियां
मेरे लिए यही देह है सबकुछ
न कोई आत्मा, न परमात्मा
न कोई पृथ्वी, न कोई आकाश
न कोई स्वर्ग, न कोई नरक, न कोई ब्रह्मांड
यह देह नहीं तो कुछ भी नहीं।

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