
वरिष्ठ कवि। सेवानिवृत्त चीफ़ इंजीनियर। मराठी में अनूदित कविताओं का संग्रह ‘धरेचे सुख’ प्रकाशित।
पिता की काया में
पिता की सूखी देह में
कोई नदी जरूर बहती होगी
जिससे वह सींचा करते होंगे
मां के सपनों की फुलवारी
पिता की पथराई आंखों में
कुछ कोमल दृश्य छुपे होंगे
जिनमें शायद हम हों
पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक
किलकारियां भरते
पिता के घिसे नाखूनों में
कुछ पैनापन जरूर बचा होगा
जिनसे वह कुरेद लेते
कभी-कभी अपने घाव
और वक़्त आने पर
हो जाते थे हमलावर
अपने नीड़ पर आए संकटों पर
पिता जिन दिनों लड़खड़ाने लगे थे
तब भी
उनकी हथेली की जकड़न मजबूत थी
हमें आश्वस्त करती थी
पिता की लगातार क्षीण होती काया में
कुछ तो रहा होगा
हमारे लिए ऐसा आकर्षण
जिसके सम्मोहन में
हरदम बंधे रहे हम
यही तो पिता का पिता होना था।
संपर्क : 203, विजया नगर एक्सटेंशन, चेतकपुरी के पास, ग्वालियर–474009 (म.प्र.) मो.9826314451


बहुत सुंदर …
पठनीय। हृदयस्पर्शी