रजनीकांत एस. शाह

गुजरात विश्वविद्यालय से अध्यापन के बाद अनुवादक के रूप में सक्रिय। शोधप्रबंध सहित 28 पुस्तकों का प्रकाशन।

वर्षा अड़ालजा

साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त गुजराती लेखिका। 22 उपन्यास तथा 45 कहानी संग्रह प्रकाशित। उपन्यास अणसारपर फिल्म भी बनी और दो धारावाहिकों के लिए इन्होंने स्क्रीनप्ले भी लिखे।

 

अलस्सुबह नीला की आंख खुल गई, हमेशा की तरह। कुछ देर तक सोयी रही। उसके योगगुरु कहते थे, जब कभी बिछौने से उठो तब दाहिनी ओर मुड़कर आराम से उठो। अचानक झटके के साथ उठने में हार्टअटैक की संभावना रहती है।

वह धीरे से उठी, तब दाहिने पैर के घुटने में थोड़ा दर्द हो आया। ऐसा कुछ महीनों से चल रहा था, पर घर में थोड़ा टहलने से दर्द शांत हो जाता था। अभी निशांत को बताया नहीं था, अन्यथा तुरंत कहता कि चलो मां, ओर्थोपेडिक डॉक्टर को दिखा आते हैं।

तकलीफ़ ज्यादा नहीं थी, इसलिए ज्यादा दरकार नहीं। चाय चढ़ाई, बालकनी के गमलों में से पुदीने के चुने हुए कुछ ताजा पत्ते, थोड़ा-सा अदरक और मसालेदार चाय से भरा बड़ा मग लेकर चह उस छोटी सी बालकनी में बैठ गई।

बरसों से यह क्रम था। अभिजीत जीवित थे तब और उनके नहीं रहने के बाद भी। सूरज उसकी सुनहरी किरणों की टोकरी लेकर यहां से घर में, उनके जीवन में प्रवेश करता था। कुछ समय के लिए घर चमक उठता था। बाद में वह ऊंचे-ऊंचे वृक्षों को फांदकर चला जाता था। कई अखबार आते हैं। दोनों को सवेरे अखबार पढ़ते हुए उनमें प्रकाशित खबरों पर बात करने की आदत थी।

आज अकेलेपन में भी वह आदत अकबंद है। तब अभिजीत को ऑफिस, निशांत और रीचा को स्कूल, नाश्ता, छोटे-मोटे घरेलू काम, दोपहर में उसका महिला आश्रम जाना… जीवन अनवरत दो किनारों में बह रही नदी जैसा अतिवेग से दौड़ता रहता। अनेक आवाज़ें घर में चकराती थीं। बाद में एक के बाद एक करते हुए सब विदा होते चले गए। निशांत बैंगलोर की एक कंपनी में काम करता था। उसने अपने साथ काम कर रही प्रियम के साथ लिव-इन में रहकर कोर्ट मैरेज कर ली थी। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वे नियमित फोन करते रहते थे। चार-छह महीने में मिलने के लिए आ भी जाते थे। प्रियम ने उसे आईफ़ोन उपहार के रूप में दिया था, ‘मम्मा यू हेव टु वोट्सएप मी, ओ.के’।

वैसे सबकुछ ओके ही था न! फ़िर भी मन में एक खटका अवश्य था। ॠचा ने अपनी पसंद के युवक के साथ शादी रचाई। चलो, इस बात को लेकर कोई एतराज़ नहीं था, पर वह दागदार चरित्रवाले राजनीतिज्ञ का परिवार था। परिवार से कोई न कोई तो जेलयात्रा करके आया हुआ था। वह विजय के साथ, यहां के सारे संबंधों को तोड़कर कनाडा चली गई थी। वह भूल से कभी कभार हाय-हेलो कर लेता। बस बात उससे आगे बढ़ती नहीं थी।

डोरबेल बजा। वह धीरे से उठी। आज रविवार। पांच-छह अखबारों की गड्डी आ गई। उसने फिर से चाय चढ़ाई और सोफे पर पैर फैलाकर बैठ गई। देश-दुनिया की खबरें आराम से पढ़ती गई। उम्र हुई, हमारा क्या लेना-देना! जवानी में, जब वह अति-व्यस्त रहती थी, तब भी पति कहते रहते थे- ‘हम जीवन में भले व्यस्त रहते हों… दुनिया से भी जुड़े रहना चाहिए। इससे हमारी क्षितिजें विस्तृत होती हैं’।

वह दुपहरी में कुछ समय के लिए महिलाश्रम में जाती थी। वहां अलग-अलग प्रवृत्ति के पाठ्यक्रम चलते थे। एक कक्षा उसकी भी रहती थी। देश के अलग-अलग प्रदेशों में घटती रहनेवाली घटनाओं के बारे में वह रसप्रद बातें कहती थी और कभी-कभी अंग्रेज़ी भी सिखाती थी। वह कइयों की जिंदगी का हिस्सा बनी हुई थी! घर के समीप म्युनिसिपल गार्डन था। वहां कुछ समय से योग करनेवाले लोगों से जुड़ी हुई थी। लेकिन कक्षा के खत्म होते ही वह तुरंत घर लौट आती थी। रिटायर्ड पुरुषों की मंडली गप-शप करती रहती थी। शाम को कभी वह सैर पर निकलती तो बहनें बातों में व्यस्त दिखाई देती थीं। पर उनसे बच-बचाकर वह निकल जाती थी।

आज रविवार है। योग की कक्षाएं नहीं हैं। वक्त ही वक्त है। दो-एक अखबार पलंग पर रखे। दोपहर में पढ़ने के लिए। निशांत और प्रियम से बातचीत की। नहाकर तैयार होकर बाजार से सांभर की सामग्री लाई। मोबाइल पर गुलजार के गीत सुनते हुए उसने इडली-सांभर बनाया। अंजु काम करने के लिए आई तो उसे भी खाने के लिए बैठा दिया। नई फिल्म आई थी, उसके बारे में वह कहती रही। उसे टिकट के पैसे दिए, जाओ बहन तुम भी मजे कर लो। वह तो प्रसन्नता से उछल ही पड़ी। फटाफट काम निबटाकर चली गई।

फिर से घर किसी ध्यानस्थ मुनि की भांति शांत और निश्चल। अखबार के पन्नों के उड़ने की आवाज शांति में दखल देती रही। इजिप्ट में नए ममी का पता चला… करोड़ों का भ्रष्टाचार… ईरान की महिलाओं का आंदोलन…

उसने कुछ खबरों को रेखांकित कर लिया। अंग्रेजी कहानियों के अनुवाद की एक किताब का एक बढ़िया रिव्यू पढ़कर, एमेजोन पर ऑर्डर किया। कुछ झपकी-सी लगने से अखबारों को परे रखते हुए एक आलेख के शीर्षक की ओर नज़र गई… डेथ क्लीनिंग।

डेथ क्लीनिंगमतलब?

एक नया ही शब्द!

उसने आलेख पढ़ना शुरू किया, वाह! बहुत रसप्रद आलेख और नितांत नया विचार! बयासी वर्षीय एक महिला, विशाखा सुब्रमण्यम की मुलाक़ात लेकर अख़बार की एक रिपोर्टर ने आलेख लिखा था।

नीला उत्साहित होकर पढ़ने लगी।

आरंभ में लिखा हुआ था- यह आलेख सिनियर सिटीजन के लिए खास है, पर शीर्षक पढ़कर आलेख के विचार को निराशावादी या पलायनवादी न समझें। डिप्रेशन के साथ इस विचार को कोई निसबत नहीं है। पर डेथ क्लीनिंग इज सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ।

मृत्यु जीवन का उत्सव है!

नीला बैठ गई और एकाग्रता के साथ उस आलेख को पढ़ा।

2017 में स्वीडिश महिला मार्गारेट ने ‘जेंटल आर्ट ऑफ स्वीडिश डेथ क्लीनिंग’ विचार का प्रवर्तन किया, अपने जीवन के सूर्यास्त के दिनों में उसने इस विचार को अमली जामा पहना दिया। जीवन लौहचुंबक है। अनेक वस्तुओं को वह अपनी ओर खींचता रहता है। जीवन के दौरान असंख्य छोटी बड़ी वस्तुओं से घर भर जाता है। आपके मरने के बाद उन वस्तुओं का क्या होता है! गुजरीबाजार से लाई हुई आपकी मनपसंद पुरानी घड़ी, दादी के जमाने की तिपाई, बच्चे जब छोटे थे तब उनके लिए खरीदी हुई गुड़िया, बड़े जतन के साथ रखे लट्टू-कंचे स्मृति के रूप में, फोटो के अल्बम, बरतन, कपड़े…। आपकी विदाई के बाद यह सब खाली करते हुए आपके स्वजनों की नाक में दम हो जाएगा, कदाचित वे रुष्ट भी हों। उसके बजाय आप अपनी चीज़-वस्तुओं को जिसे जरूरत है या पसंद है उनको देते रहिए। इसे डिकल्टरिंग कहते हैं। डिकल्टरिंग योर हाउस एंड लाइफ टु! आपको गृहस्थाश्रम के बाद संन्यास में प्रवेश नहीं करना है, न वन में प्रवेश करना है। सादा जीवन ही जीने का उद्देश्य हो तो अपने आप मोह छूटता जाएगा। चीजें कम होंगी। इसलिए पॉज़िटिव एनर्जी की लहर से आपका जीवन पुलकित होगा….

आलेख लंबा था। नीला ने अख़बार परे रखा। यह सब पढ़ने की जरूरत नहीं थी। डेथ क्लीनिंग शब्द ने ही मन पर कब्जा जमा दिया था। उसने घर में चारों ओर नज़र घुमाई, घर में वस्तुओं की भीड़-भरमार लगी हुई थी। जो लोग यहां रहते थे, उन्होंने जाते-जाते अपने कदमों के निशान के साथ काफी कुछ यहां छोड़कर गए थे! ड्रॉइंगरूम की सीलिंग में लगा हुआ यह झाड़-फानूस! ॠचा जब कॉलेज में थी तब किसी सहेली के घर में देखा था और अभिजीत से जिद पर आकर यह खरीदा था।

घर में कई बार अभिजीत और उसके मित्र मिलते थे, ऊंधियापार्टी (मिक्स्ड वेजिटेबल) और रसपूड़ी की जियाफ़त। ॠचा-निशांत के जन्मदिवस की पार्टी होती, तब वह झाड़-फानूस घर को प्रकाश से भर देता। घर में रौनक आ जाती।

वह सोचती रही, कई बरसों से इसका स्विच चालू नहीं किया! किसके लिए करे? किस अवसर पर? निशांत और प्रियम से एकबार कहा था, यह झाड़फानूस बहुत महंगा है। ले जाइए न! पर उन्होंने तुरंत इनकार किया था : न मम्मी। हमें कंसील्ड लाइटिंग पसंद है।

उसने झाड़-फ़ानूस के नीचे खड़ी रहकर उसे बड़े ध्यान से देखा। उसमें बहुत सारे क्रिस्टल जड़े हुए थे और वे सब धूल-मिट्टी से सने थे। जिस चीज का उपयोग लंबे समय से किया नहीं गया था और अब किया जानेवाला नहीं था, क्या जिसे पसंद हो और उसका उपयोग करनेवाला हो, उसे नहीं दे देना चाहिए?

उसे पहले यह विचार क्यों नहीं आया! मनपसंद चीज को बेचना नहीं है, तो? मन में विचार धीमे-धीमे मथता रहा।

सबेरे बगीचे में योग के क्लास में गई। गुरुजी ने ध्यान के साथ व्यायाम करवाया। क्लास खत्म होने के बाद उसने गुरुजी से पूछा, ‘आप रामकृष्ण आश्रम, चिदानंद गुरुकुल, हरिद्वार के आश्रम में भी कक्षाएं लेने के लिए जाते हैं। वहां तीज-त्योहार पर सम्मेलन होते हैं। यदि वहां एक बहुत सुंदर झाड़-फ़ानूस का उपयोग हो सकता हो तो उसे भेज देने की व्यवस्था और उस पर होनेवाली लागत मैं वहन करूंगी।’

गुरुजी ने खुशी के साथ तुरंत स्वीकृति दे दी। ‘हरिद्वार में गंगाघाट पर ही विशाल भवन है, वहां कई उत्सव मनाए जाते हैं। बहन, यदि आप व्यवस्था कर सकती हैं तो उत्तम होगा।’

उसने उसी दिन पेकर्स एंड मूवर्स कंपनी को फोन जोड़ा। झाड़-फ़ानूस उतारा गया, साफ किया गया और ‘फ्रेजाइल’ के स्टिकर के साथ एक बड़ा कार्टून हरिद्वार के आश्रम में पहुंच गया।

घर में बहुत सारा फर्नीचर था! अब इन सबकी जरूरत नहीं थी। अतिरिक्त कुर्सियां, सोफ़ा, तिपाई। ये ट्रक में यात्रा करके महिलाश्रम पहुंच गए। अतिरिक्त गद्दे, तकिये और चादरें एनिमल शेल्टर में।

अब रसोई, पहली बार देख रही होऊं ऐसे वह चौंक उठी। अरे इतनी सारी बरणियाँ, डिब्बाडूब्बी, बर्तनों ने यहां अड्डा जमा हुआ है और उसे खबर भी नहीं हुई! स्टूल पर चढ़कर ऊपरवाली अलमारी खोली। एकदम नया मेलेमाइन का इंपोर्टेड डिनरसेट! याद आया, वह और अभिजीत मित्रों के संग बैंकाक गए थे, तब यह पतिदेव को बहुत पसंद आ गया था और पांच किलो अतिरिक्त सामान के चेकिंग काउंटर पर पैसे जमा कराकर ले आए थे। उन्होंने अपने हाथों से उसे सजाते हुए कहा था, अगली ऊंधियापार्टी इस डिनर सेट में!

वह समय आया ही नहीं। बैंकाक से लौट आने के महीने भर में ही एक रात फिल्म देखकर वे देरी से आए। बातें करते-करते सो गए और अभिजीत ने सबेरे आंखें खोलीं ही नहीं। नींद में ही अंतहीन सफर के लिए चल दिए।

उसे स्मृतियों ने ऐसे घेर लिया था कि उसका दम घुटने लगा। घर में, यहां जी गई जिंदगी में वह जैसे कैद हो गई हो। तुरंत बगीचे में सैर करने के लिए निकल पड़ी। हल्का सा अंधेरा छाने लगा था। बत्तियां जगमगा उठी थीं। पुरुष मंडली खानेपीने का मजा ले रही थी।

माताएं बच्चों को लेकर चली गई थीं, झूले अभी खाली झूल रहे थे। बच्चों की किलकारियां अभी भी हवा में गूंज रही थीं। वह चलने लगी।

अभिजीत से पहले कब मिली थी! कॉलेज-कैंटीन में! समुद्रतट पर एक नारियल में दो स्ट्रो। नारियलवाला हँस दिया था। तब मोबाइल नहीं थे, पर इस स्मृति-अल्बम में कितनी सुंदर छवियां थीं! उनमें वक्त थम गया था। अभिजीत द्वारा उड़ाई गई छलक उसे भिगोती रही। उसका पहला चुंबन सुंदर रंगबिरंगी तितली की भांति उड़ती हुई आकर कोमलता के साथ उसके होठों पर बैठ गया। उसकी आंखें बंद हो गईं। शरीर एक मीठी सिहरन का अनुभव करने लगा।

अंधेरा गहराया हुआ था। बगीचा अब तकरीबन निर्जन था। वह खड़ी हुई। नहीं, वह स्मृति-विषाद का अनुभव नहीं करेगी, उदास नहीं होगी। डेथ कलीनिंग की पहली शर्त यह थी ‘डेथ इज़ आ सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’। खाली बेंच पर कुछ रखकर जा रही हो, ऐसे वह तुरंत बगीचे से चली गई। रेस्तरां में खाना खाकर वह घर लौटी।

सबेरे बाल्कनी में चाय पीते हुए वह सोचती रही, यह डिनर सेट मैं किसे दूं? किसी से यदि पूछा और वह इनकार भी कर दिया तो? आजकल मेलेमाइन क्रॉकरी में कोई खास नवीनता भी नहीं है।

डोरबेल बजा। आज अखबार देरी से आए थे, पर दरवाजा खोला तो पड़ोस की मालती बहन थी।

‘कल मेरा जन्मदिवस था, तो लड़के ने केक मंगवाया। अब इस उम्र में क्या जन्मदिवस!’

‘नीला बहन! साठ हो गए तो बच्चे कहते हैं पार्टी। मेरी बहन भी आणंद से आई है। आपको भी बुलाया था, पर आप बाहर गई हुई थीं। यह केक खाइएगा अवश्य।’

‘बाहर से ही चली जाएंगी? अंदर आइए न!’

‘लेकिन मुझे खाना…?’

‘ज्यादा नहीं, पांच मिनट।’

मालती बहन अंदर आईं, केक डाइनिंग टेबल पर रखते हुए बोलीं, ‘आपके ऊंधिया का स्वाद अभी भी मेरे मुंह में है, नीला बहन!’

नीला तुरंत स्टूल पर चढ़ गई और अलमारी को खोला।

‘यह डिनर सेट है, आप ले जाएंगी? आपके घर यह काम में आएगा।’

मालती बहन को ताज्जुब हुआ, ‘इतना बढ़िया डिनरसेट!’

नीला ने एक प्लेट उनके हाथ में रखा। हल्के से हरे रंग में पत्तों की डिज़ाइन मालती बहन बार-बार देखती रही।

‘बहुत महंगा होगा… मेरे लिए इतना खर्च कर पाना मुश्किल है बहन।’

‘पैसे का सवाल ही नहीं है मालती बहन। आपके लिए विशेष रूप से इसे खरीदा नहीं है तो जन्मदिवस का उपहार मैं कैसे कहूं! यदि आप उसका उपयोग करेंगी तो मुझे बड़ी खुशी होगी, आपका बड़ा परिवार है। यह अवश्य काम आएगा।’

मालती बहन लजा गई।

‘पर…ऐसे ही …कैसे ले जा सकती हूँ?’

‘क्यों नहीं! मैं आपको प्यार से दे रही हूँ। अभिजीत भी जहां होंगे वहां खुश होंगे।’

मालती बहन जल्दी-जल्दी चलने लगी, ‘आपका बहुत धन्यवाद बहन। अभी विनय दौड़ते हुए आकर ले जाएगा।’

सच्ची विनय दौड़ते हुए ही आया। बड़ी उमंग के साथ ऊपर चढ़ गया, ‘लव यू आंटी।’ कहते हुए बड़ा थैला लेकर चलने लगा।

अब बर्तन। घर के समीपस्थ सब्जीमार्केट में फुटपाथ पर कई लोग साग-सब्जी बेचते थे और वहां झोंपड़ी में ही रहते थे, बड़ी बिशी चलाकर साथ में खाना खाते थे। उसने एल्युमिनियम के बेढंगे बर्तन, सस्ते प्लास्टिक प्लेट आदि वहां देखे थे। जिनमें दूधपाक, ऊंधियू वह पकाती थी वे बड़े-बड़े पतीले थे। चौकीदार को बुलाकर बड़ा थैला भरा। रिक्शा पर बाजार गई, तब सब लोग परिवार के साथ खाना खाने की तैयारी में लगे थे। नीला ने बड़ा थैला उनके पास रख दिया- ‘लो इनका उपयोग करना, बेचना नहीं!’ स्त्रियों ने इन्हें विस्मय से संभाल लिया, ‘आप कहो उसकी कसम बहन। यह हमारे लिए सोनारुपा है। क्या इन्हें बेचा जा सकता है! बर्तन को लेकर तो हमें बड़ी तकलीफ़ थी।’

उनके पांव छूने के प्रयास देखकर वह वहां से जल्दी निकल गई। रात को प्रियम को फोन लगाया, ‘तुम सबको बहुत याद कर रही हूँ। आओगी? न, मैं बीमार नहीं हूँ, बस आप सबसे मिलना है।’

निशांत और प्रियम दो ही दिन में आ गए- ‘क्या बात है मां!’

नीला ने बंद पड़ा बेडरूम खोला।

‘यह है तुम्हारा रूम। तुम्हारी ढेर सारी चीजें यहां पड़ी हुई हैं। यह ड्रॉइंगरूम का शोकेस, तुम्हें जो ठीक लगे प्रियम, ले लो बेटे।’

‘मां! क्यों ऐसा?’

‘अब मुझे इन सबका क्या काम है? यहां आओ।’

नीला प्रियम को अपने रूम में ले गई।

‘देखो इस पूरी गड्डी में जरी और कांजीवरम की साड़ियां हैं। मैं अब पहननेवाली नहीं हूँ। तुम अपने मित्रों के तथा अपने पारिवारिक अवसरों पर पहन सकती हो।’

प्रियम ने सारी गड्डी ले ली।

‘माय गॉड! सो ब्युटीफूल। मैं इनमें से ड्रेस बनवाऊं तो आपको कोई एतराज़ तो नहीं है न!’

‘एक ही शर्त है, मुझे फ़ोटो भेजना होगा।’

प्रियम ने नीला को उठा लिया।

‘आई लव यू, लव यू।’

निशांत ने कुछ पुस्तकें और दो-चार छोटी बड़ी वस्तुएं लीं और निकम्मी वस्तुओं का ढेर लगा दिया। दो दिन बड़ी खुशी-खुशी साथ रहकर वे लोग विदा हुए।

धीरेधीरे घर खाली होने लगा। अभिजीत की विदाई के बाद उसके कपड़े, और छोटी बड़ी वस्तुएं उसने तभी अनाथाश्रम में दे दी थीं। फ़िर भी एक दराज में से जुराबें, शूज़ और चप्पल का ख़जाना मिला।

घर अब खुलेपन का एहसास कर रहा था। थैंक्स विशाखा सुब्रह्मण्यम, मेरे जीवन के नए अध्याय के लिए! अंजु को बुलाया, घर की अच्छे से साफसफाई करवाई। अंजु भी बचीखुची वस्तुएं ले गई।

काफी कुछ समेट लिया गया। उसने जिए हुए बयासी वर्ष के जीवन को अच्छे से तह करके रख दिया।

अब एक आखिरी तंतु तोड़ना बाकी था।

ॠचा के जेवर यहीं थे। वह कुछ लिए बगैर चली गई थी। एक छोटा-सा प्रेम से सना पत्र ॠचा के नाम लिखकर जेवरों की पोटली में रखा। मेरे जाने के बाद वह आए और यह उस तक पहुंच जाए, ऐसी मन ही मन उसने प्रार्थना की। कुछ और कीमती जेवर थे। अभिजीत हर दीपावली पर चांदी-सोने की कोई न कोई वस्तु उपहार के रूप में देता था। वह बरसों से सोने की सादा एक चेन, छोटी बुट्टी और एक-एक चूड़ी के सिवाय कुछ नहीं पहनती थी। उसके मन में इन जेवरों को बेचकर उस राशि से महिलाश्रम के लिए कंप्यूटर खरीद लेने का विचार आया।

तिजोरी खाली हो गई। आखिर में एक छोटी-सी रेशमी थैली थी। उसे अंक से लगाए वह बहुत देर तक बैठी रही। अभिजीत ने और उसने एक-दूसरे को लिखे ख़त, सिनेमा के टिकट, चुपचाप शादी से पहले दोनों एक रात जिस रिज़ॉर्ट में रहे थे और मधु रजनी मनाई थी उस रिज़ॉर्ट का बिल, सब रेशमी पोटली में बांध दिया था। स्मृतिकोश में संचित कर लिया था उन्होंने साथ जिया गया जीवन, रुठौवल, मनुहार, हास्य और थोड़े आंसू भी!

वस्तुओं का डेथ क्लीनिंग किया जा सकता है, लेकिन उन यादों का क्या!

ये तो नितांत निजी है। उसकी त्वंशा जैसी। किसी को नहीं दी जा सकती। दिल की गहराई में संजोयी हुई। दिल किसने देखा है? फ़िर भी उसकी प्रतिपल प्रतीति है।

घर की ओर दृष्टिपात किया और राहत का अनुभव किया। मुक्ति की एक गहरी सांस भरी। असंख्य वस्तुओं का ढेर जीवन पर हावी हो गया था। विशाखा सुब्रह्मण्यम ने लिखा था, रिमूव द एक्सेस बेगेज फ्रॉम योर लाइफ एंड फील फ्री।’ मानो वह एक कारावास से मुक्त हो गई। माया के आवरण के हट जाने से परम आनंद का चेहरा प्रकट हुआ।

उसने बैग पैक किया, संभालकर रेशमी पोटली उसमें रखी। मालती बहन को चाभी दी। आपके बेटे की शादी है, मैं दो महीने तक यहां नहीं हूँ, आप मेरे घर का उपयोग खुशी-खुशी कर सकती हैं। मालती नीला को गले से लगाकर भावनाओं में बह गईं।

जब वह ट्रेन में बैठी तब उसे विचार आया, एक नए सफ़र का आगाज। उम्र के किसी भी पड़ाव पर एक नई शुरुआत की ही जा सकती है न!

ऋषिकेश के एक गेस्टहाउस के छोटे से कॉटेज में उसने बैग रखा, तब उसका मन प्रसन्नता से भर गया। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली। थोड़ी दूर से शुरू हो रहा वन्यप्रदेश। गंगातट ज्यादा दूर नहीं था। बेडरूम में बड़ी फ्रेंच विंडोज़। मानो बगीचा उसके कमरे में था और महकते फूल उसका शीतल लेपन कर रहे थे।

थोड़ी दूरी पर स्थित दूसरे कॉटेज में बच्चों के साथ एक परिवार आया हुआ था। भोजनखंड में रोज मिलना होता था और बहुत सारी बातें होती थीं। बहुत गपशप हुई। साथ-साथ घूमे, म्युजियम देखा, अलग-अलग मंदिरों का आर्किटेक्चर देखना बहुत अच्छा लगा।

बाद में वह दिन आया।

एक ढलती शाम को वह लक्ष्मण झूला गई। गंगा आरती का अभी-अभी समापन हुआ था और उसकी महाआरती के स्पंदन हवा की लहरों में बह रहे थे और नीचे जाह्नवी। धीरे-धीरे अंधेरा उतर रहा था और गंगा की धारा में असंख्य फूल दीपक जगमगाते हुए बह रहे थे। ये दीये जल प्रवाह में तैरते-झूलते हुए दूर जाकर जलसमाधि ले लेते थे। उसके पीछे तुरंत एक और दीप बहता आ रहा था। यह शृंखला खंडित नहीं हो रही है, सबकुछ प्रवहमान था।

वह नीचे उतरकर गंगा की सीढ़ी पर आई। अब वहां आरती की भीड़ नहीं थी। मंदिरों का घंटारव हवा को तरंगित कर रहा था। एक लड़का दौड़कर आया।

‘मैया, बस एक ही बचा हुआ है। ले लीजिए, बीस रुपये में दे दूंगा। प्लीज…’

उसने फूल से भरे हुए दीये का एक दोना सामने रखकर पल्लू पकड़ लिया, ‘ले लो, मैया, पंद्रह ही देना, बस।’

नीला ने दोना ले लिया और फूलों के नीचे रेशमी पोटली को रख दिया। दीया जलाया। नीचे झुककर तैरने के लिए जलप्रवाह में रख दिया।

‘मैया ऐसा नहीं करते। गंगाजल माथे पर चढ़ाओ।’

वह मुस्करा दी।

‘तुम तो बड़े सयाने हो। बड़े होकर पंडित बनोगे क्या!’

‘हां जी। इधर ही पाट लगाकर बैठ जाऊंगा। बाबा की पाठशाला में पढ़ता हूँ न।’

नीला ने सौ रुपये का नोट उसके हाथ में रखा। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। चिल्लाते हुए वह नीला से सट गया। उसने प्यार से एक हल्की सी चपत लगाई।

‘चल छोड़, हम खाने के लिए कहीं जाते हैं। बोल कहां जाएंगे?’

दोनों हँस दिए। नीला का दीया थोड़ी दूर जाकर जलसमाधिस्थ हो गया। नीला ने वंदन किया। मां तुम्हारे चरणों में सर्वस्व समर्पित।

‘चलो मैया, संभलकर हां।’

लड़के ने उसका हाथ पकड़ा। वह सीढ़ियां चढ़ने लगी।

संपर्क :
वर्षा अड़ालजा, ए-2, गुलबहार, मेट्रो के पीछे, बेरेक रोड, मुंबई-400020. मो.9833076673.
रजनीकांत एस. शाह, 2,‘शीलप्रिय’, विमल नगर सोसायटी, नवाबजार, करजण. जिला-वडोदरा, गुजरात-391240 मो.9924567512