
चर्चित कवि। संप्रति बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर में प्राध्यापक। ‘अभी-अभी जनमा है कवि’, ‘चांद में अटकी पतंग’ और ‘दिव्य कैदखाने में’ (कविता संग्रह)। ‘मल्लू मठफोड़वा’ (उपन्यास), ‘रचना और रचनाकार’ (आलोचना)। ‘कसौटी’ (अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका) के विशेष संपादन-सहयोगी।

बच्ची
नन्हीं-सी बच्ची
तोता को कहती है टोटा
कौआ को टौआ
टिट्टी! टिट्टी!
चहकती है
तितली को देखकर
चीखती है-टुट्टाऽ!
भागती है
कुत्ते से दूर
आदमी के पास
आदमी से बचकर
कहां जाएगी बच्ची?
मेरे लाल को हरा पसंद है
मेरे लाल को हरा पसंद है
उसे हरी कमीज चाहिए
हरी पतलून
टोपी हरी मोजे हरे रूमाल हरा
बहुत सारी चीजों में से
वह उसे चुनेगा
जिसमें हरा सबसे ज्यादा हो
उसे संख्या सिखाओ और कहो ‘वन’
तो समझेगा जंगल
कहो पहाड़ा
तो सुनेगा पहाड़
कितने रंग कितने सपने उगाता हूँ मैं
कविता के वृंत पर
कितनी इच्छाएं कितने प्रण
क्या मैं एक पत्ता उगा सकता हूँ
उसके लिए
कविता के बाहर
एक सचमुच का पत्ता?
जैसे लाल के ललाट पर लगाता हूँ
काला टीका
वैसा ही टीका लगा सकता हूँ
हरे के ललाट पर?
जैसे उसे देता हूँ हरी गेंद
दे सकता हूँ केले का भीगा हुआ वन
दूर तक फैला
नदी के साथ-साथ?
गेहूं को पोसता महीना पूस का?
शिशिर के दुआरे से देह झाड़कर निकला वसंत
पतरिंगों की चपल फड़फड़ाहट में
सांस लेता हुआ?
ओ सतरंगी पूंछवाली हरी पतंग
तुम उड़ो वसंत के गुलाबी डैनों पर सवार
मैं लगाता हूँ
अपनी जर्जर उंगलियों से ठुनके
उम्मीद के
ओ दूब, तुम फैलो
धरती की रेत होती देह पर!
मैं स्टेशनरी जाता हूँ
और कहता हूँ वह ग्लोब देना
जिसमें हरा ज्यादा गहरा हो
जिल्दसाज से कहता हूँ
धरती एक किताब है रंगों के बारे में
जरा फट-चिट गई है
इस पर लगा दो फिर से
वही हरी जिल्द
मेरे लाल को हरा पसंद है
इसे मैं दुहराता हूँ उम्मीद की तरह
इस काले होते वक्त में
रहम करो, लोगो
मत सुनो इसे मजहब की तरह
मत देखो इसे
सियासत की तरह
ओ पेड़ो-ओ हरे फव्वारो
तुम उठो नीले आकाश की तरफ
ओ सुग्गो
मेरे स्याह आंगन में उतरो!
यहीं ठीक है
वहां भीड़ थी बाबू
लोग तो अनेक थे रसूखदार
बाहर से आए विख्यात मेहमान
पर ढोंग बहुत ज्यादा
और चमक
बहुत तेज
सुंदरता, शराब, शोहरत
सबकुछ था बाबू
इत्र और लफ्जों की खुशबू
तश्तरियां, कृतज्ञ-भाव
मुस्कानें, जुगत
कितनी चीजें हैं लोगों के पास
पर दया कितनी कम!
ऐसी जगह
मैं भूल जाता मिट्टी की गंध
इंसानियत के खून-पसीने
और आंसुओं का नमक
मैं छोटे-से कस्बे का आदमी
मेरा जी हकलाता है
दिल्ली और बंबे की भाषा के बीच
मुझे बोलने में दिक्कत है
मेरे प्राणों में गूंजती हैं ढेरों आवाजें
मेरी भाषा को रौंदती हैं
दुस्सह स्मृतियां-
छपाक्!
जैसे रस्सी से छूटकर गिरता है डोल
गहरे कुएं में
गिरता है बच्चा
छत की मुंडेर से लहूलुहान
कुचल जाते शब्द
दहल जाती भाषा
मां के चीत्कार से
कितने रूपों में गिरता है जीवन
उठती है हिंसा
उठते हैं अहं-अट्टहास
घृणा के बवंडर
गिरती है प्रेम की पताका
मुझे बोलने में दिक्कत है
जुबान पर शब्दों के आने से पहले
आंखों में नाचती हैं लाशें
कानों में गूंजते विलाप
स्मृतियों में ध्वंस के नजारे
मैं कहां जाऊं
नीबू के झाड़ पर फुदकती
फुलचुकियों का आशिक मैं
कच्ची पगडंडी पर भीगे कनेर का मुरीद
रस्ते में पड़ा हुआ जूता भी
बचाता कुचलने से
तितली-सा हिया लिए
हमलों से भरी हुई दुनिया में कहां जाऊं
मैं चला आया बाबू
यहीं ठीक है मिट्टी के पास
घास के पास
और आकास के पास
यहीं ठीक है
नदी के तीरे जो बहती धीरे-धीरे
मन का कुछ मैल धुले जो बैठूं इस ठौर
एक हरा पत्ता छू लूं
एक पंछी निहार लूं
तो जीऊंगा कुछ दिन और!
संपर्क : आर.एन. कॉलेज से पूरब, साकेतपुरी, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार)मो. 8002577406
