वरिष्ठ लेखक और कथाकार। गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्वअध्यक्ष।ग्यारह उपन्यास, छह कहानी संग्रह, आठ आलोचना ग्रंथ।

मौसी आज पहले की तुलना में ज्यादा मिठाई, फल, बिस्कुट लेकर आई। हर बार उनके चेहरे पर कुसुम के प्रति करुण भाव रहता था, उसकी जगह पर सम्मानपूर्ण सहयोग का भाव था। कुसुम उनकी बांहों के घेरे से छूटकर मौसी की आंखों में सीधी ताकती हुई बोली, ‘मौसी, आज कुछ खास बात हो गई क्या?’ मौसी ने अचानक कुसुम को चूम लिया। बोली, ‘आज तुम्हारे मौसा तुम्हारे लिए एक ऐसा प्रस्ताव लेकर होटल से लौटे हैं कि अगर तुम मान लो तो तुम्हारा सब दुख-दलिद्दर भाग जाएगा।’

‘ऐसी कौन सी बात है मौसी, जो हमारा सब कुछ ठीक कर दे? और अगर ऐसा कुछ है तो मुझे उसे मानने में क्या एतराज़ हो सकता है?’

‘एतराज हो सकता है, अगर अकल से काम न लो। आज तुम्हारे मौसा के होटल में ऑस्ट्रेलिया के अंग्रेज आए हैं, साथ में उनकी मैडम भी हैं। उन लोगों को नौ महीने के लिए एक ऐसी युवती की कोख किराए पर चाहिए जो मां बनने के लायक हो और विवाहिता हो। उन लोगों ने तुम्हारे मौसा से ऐसी युवती तलाश करने को कहा। तुम्हारे मौसा ने मुझसे कहा कि कुसुम अगर यह बात मान ले तो उसका भला हो जाएगा।’

‘लेकिन मुझे करना क्या होगा? कोख किराए पर किस तरह दी जाती है?’

मौसी ने कहा, ‘उनका भ्रूण तुम्हारे गर्भ में डाल दिया जाएगा। यह काम डॉक्टर करेंगे। वह आदमी तुमको देख भी नहीं पाएगा। दस लाख रुपए तुम्हें उनसे मिलेंगे। पांच लाख अभी और पांच लाख बच्चा हो जाने के बाद। बच्चा होने में तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। डॉक्टर आपरेशन करके बच्चे को निकाल कर उसके मां-बाप को दे देंगे। तुम्हें पांच लाख रुपए मिल जाएंगे। इन नौ महीनों में तुम्हारा सारा खर्च वे लोग उठाएंगे। तुम्हें या बच्चे को रोग-दोख होगा, उसका खर्च भी वे ही करेंगे। बच्चा हो जाने के बाद आठ-दस दिन में तुम घर जा सकोगी। दस लाख रुपयों से दरसन कोई रोजगार कर लेंगे। उनका नौकरी के लिए दर-दर भटकना छूट जाएगा। तुम आज रात अपने पति से बात कर लो। मैं कल दोपहर में आऊंगी। नहीं तैयार होगी तो किसी और को खोज लेंगे।’

कहकर मौसी लौट गई। मौसी की एक-एक बात को कुसुम उलट-पलट कर देखने, समझने, गुनने, मथने लगी। कभी गुदगुदी होती तो कभी लाज लगती। आन मरद के बेटा की महतारी! सुनते कैसा तो घिनौना लग रहा है। लेकिन फायदा कितना है। दस रुपया नहीं कमाने वाले को दस लाख मिल जाएंगे। उस रुपए से मिलने वाले सुख के सपनों के सतरंगी पंखों पर उड़ती रही कुसुम। पता ही नहीं चला, दिन कब बीत गया, कब सांझ हो गई और कब दरसन आकर उसके सामने भूखे प्यासे खड़े हो गए॥

उनके चेहरे पर उगा था कि आज का इंटरव्यू भी व्यर्थ हुआ। कुसुम दौड़कर मिठाई पानी ले आई। दरसन ने हाथ-मुंह धोकर मिठाई खाकर पानी पिया। तब तक चाय बिस्कुट नमकीन लेकर कुसुम हाजिर हो गई। चाय पीते हुए दरसन कुसुम को निहारते रहे। पूछा, ‘मौसी आई थीं क्या? बहुत मालमत्ता ले आई थीं, लगता है।’ कुछ कहते-कहते दरसन की निगाह कुसुम की आंखों में थिर हो गई।

कुसुम का चेहरा लाल हो गया। नीचे की ओर ताकने लगी। अचानक पति को बांहों में भरकर उनसे चिपक गई। दरसन को सुख मिला पर अचरज का धक्का उससे बड़ा था। उन्होंने गले से लिपटी पत्नी को अलग करके दोनों हाथों से उसका मुख अपने सामने किया। अचरज का और बड़ा धक्का लगा- कुसुम की आंखों से आंसू की धार बह रही थी।

कुछ देर उनकी पीठ सहलाते रहे, आंखें बार-बार पोंछते रहे और कई तरह से घुमा-फिरा कर बार-बार पूछते रहे कि आखिर बात क्या है? देर तक अपने को तैयार करने के बाद कुसुम ने आंखें नीची किए हुए मौसी के साथ हुई बातचीत का पूरा ब्यौरा खोल कर बता दिया।

सुनकर दरसन काठ हो गए। निस्तेज आंखें शून्य में अटक कर रह गईं। कुसुम ने पति को इस रूप में देखा तो आतंक से सिहर उठी। बोली, ‘आप यह कैसे मान ले रहे हैं कि मौसी की बात मानने जा रही हूँ। हमलोग जैसे हैं, सुखी हैं। आपका पढ़ना-लिखना बेकार नहीं जाएगा। किसी न किसी दिन तो काम मिलेगा। तब तक अपने घर में रहने और हवा-सूखा खाकर दिन काटने में क्या हर्ज है? आप ही के साथ पढ़ने वाले कितने ऐसे हैं जो कुली-कबाड़ी का काम कर पेट भर रहे हैं। बंबई, पंजाब में खट रहे हैं। आप उनसे कितने अलग हैं। आपको न दुखी होने की जरूरत है न निराश-हताश होने की। मैं खाना बनाकर ला रही हूँ। कुसुम अंदर चली गई। दरसन उठकर कमरे में टहलने लगे- चक्कर पर चक्कर, जैसे कोल्हू का बैल घूमता है। उसकी आंखों पर काली पट्टी लगी होती है शायद इसलिए कि एक ही ओर घूमते रहने से चक्कर न आ जाए और वह चलता रहे। दरसन चलते जा रहे थे चक्कर पर चक्कर- दिमाग सुन्न। न अच्छा लग रहा था, न बुरा। कोई विचार जीवित था ही नहीं। बस पैर चलते जा रहे थे।

कुसुम रोटी चोखा और चटनी बनाकर ले आई। उसे देखकर दरसन के पांव ठहरे और दिमाग का काठपन टूटा। बोले, ‘अपनी थाली भी ले आओ। साथ-साथ खाएंगे।’ कुसुम को याद आया, जब बहुत छोह उमड़ता है, तब दरसन साथ खाने की बात सोचते हैं। अपनी थाली भी ले आई। साथ-साथ खाने और एक-दूसरे को खाते हुए देखने से चेतना खुलने लगी। बातचीत न होने पर भी जड़ता लगातार टूटती रही। कुसुम उठती हुई बोली, ‘कल मौसी से साफ-साफ कह दूंगी कि हमलोग इस लफड़े में फंसने के लिए तैयार नहीं हैं।’

दरसन ने जैसे सुना ही नहीं। दोनों साथसाथ सोते और अपने अपने कुंद होते विचारों से जूझते हुए जागते रहे। रात के पिछले पहरों में आंख लगी। कुछ देर से उठे। कुसुम चाय बना लाई। उसने कहा, ‘उठने में देर हो गई। आप जल्दी नहा लीजिए, कुछ बना लेती हूँ।दरसन ने कहा,  ‘कोई जल्दी नहीं। आज मुझे कहीं जाना नहीं है। आराम से नहाएंगे, खाएंगे। थोड़ा आराम करेंगे।कुसुम को संतोष हुआ कि रात वाली बेचैनी से दरसन उबर आए हैं।

मौसी तीसरे पहर आईं। दरवाजा खटखटाते ही कुसुम समझ गई कि मौसी आई हैं। दरवाजा खोलने के लिए उधर बढ़ी तो दरसन ने कहा,  ‘मौसी को मना मत करना। मैं भी उनसे बात करके सबकुछ जानना चाहता हूँ।’ कुसुम ने दरवाजा खोला। मौसी ने उसकी आंखों में पढ़ना चाहा कि क्या निर्णय हुआ किंतु कुसुम उनके लिए चायपानी के इंतजाम में व्यस्त हो गई। चाय आई। मौसी पीने लगीं तो दरसन ने मुस्कुराकर कहा, ‘मौसी जी, जरा मैं भी सुनना चाहता हूँ कि यह कोख किराए पर देने का मामला क्या है और कौन लोग हैं जो इतना पैसा लुटा रहे हैं।’ मौसी ने एक-एक बात छितरा-छितरा कर बता दिया। यह भी कह दिया कि तमाम लड़कियां तैयार हो जाएंगी। तुम्हारे मौसा तुम दोनों के भले के लिए ऐसा सोच रहे हैं। कुसुम हमारे घर में रहेगी। तुम पांच लाख से अपना कोई रोजगार शुरू कर सकते हो। नौ महीने बाद डॉक्टर बच्चे को निकाल कर अंग्रेज मां-बाप को सौंप देंगे। तुम्हें पाँच लाख और मिलेंगे। आठ-दस दिन बाद कुसुम तुम्हारे साथ अपने कस्बे में लौटकर आराम से रहेगी। यहां किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। सब यही जानेंगे कि कुसुम बंबई में अपनी मौसी के पास रहकर कोई पढ़ाई कर रही है। सबसे बड़ी बात यह होगी कि दस लाख से कस्बे में अपना कारोबार करने लगोगे तो सब लोग तुम्हारा गुण गाते पीछे घूमेंगे।

मौसी चलने को हुईं तो दरसन ने धीरे से कहा, ‘मैं कुसुम को इस काम के लिए समझाऊंगा। आखिर आप हमारे भले के लिए ही तो सबकुछ कर रही हैं।’ मौसी ने कहा, ‘भगवान कुसुम को सुबुद्धि दें मैं तो यही कामना करूंगी।’

 

सबकुछ वैसे ही हुआ, जैसा होना चाहिए था। समय पर ऑपरेशन हुआ। ऑस्ट्रेलिया वाले अंग्रेज और उनकी मैडम अपने बेटे को लेकर हवाई जहाज से अपने देश पहुंच गए। आठ-दस दिन बाद कुसुम का घाव सूख जाएगा। वह अपने पति के कारोबार में सहयोग करने लगेगी। लेकिन एक नई विपत्ति आ पड़ी। कुसुम की छाती में दूध उतरने लगा। अगले दिन छातियां दूध से भर उठीं। कुसुम ने मौसी से कहा। मौसी ने डॉक्टर से बात की। डाक्टर ने कहा, ‘अभी वह हाथ से दूध निकाल दे या आस-पास कोई बच्चा हो तो उसे पिला दे। बाद में ऐसी दवा दे दी जाएगी जिससे दूध न बने।’

शाम को डॉक्टर की गाड़ी मौसी को बुलाने के लिए आ पहुंची। मौसी गईं तो डॉक्टर के पास ऑस्ट्रेलिया वाले साहब मैडम के साथ बैठे मिले। बच्चा मैडम की गोद में रोए जा रहा था। इतना कमजोर हो गया था कि रोने की ताकत भी नहीं बची थी। मौसी के हाथ में दो लाख रुपए की गड्डी रखकर डॉक्टर ने कहा, ‘इस बच्चे को 6 महीने तक कुसुम के दूध पर ही रखना पड़ेगा। ये लोग होटल में रहेंगे और आपके घर जाकर बच्चा दूध पी लिया करेगा।’

मौसी सबको उसी गाड़ी में बिठाकर घर लौटीं। कुसुम की छाती मुंह में लेकर बच्चा दूध पीने लगा। कुसुम की छाती में दूध उमड़ रहा था और उसकी आंखों से आंसू की धारा उमड़ रही थी। मौसी की आंखें भर आईं, मैडम भी सुबकने लगीं। बच्चा पेट भर जाने के बाद हाथ-पांव हिलाकर खुशी जाहिर करने लगा। उसको मैडम ने गोद में उठाया तो छनछना कर रोने लगा, जैसे गरम चीज से छू गया हो। मौसी ने उसे लेकर फिर कुसुम की गोद में दिया। वह स्पर्श बच्चे को इतना सुखद लगा कि तुरंत सो गया। कुसुम के पास ही बच्चा रहेगा उसके मां-बाप उसे देखते रहेंगे। यही उनका सुख होगा। कुसुम ने मौसी से कहा कि साहेब के सामने वह बच्चे को दूध नहीं पिला पाएगी। तय हुआ कि वह मौसी के बैठक वाले कमरे में रहेंगे। वहीं अपने लैपटॉप पर कुछ काम करते रहेंगे। बच्चा दूध पी लेगा तब कुसुम के कमरे में जा सकेंगे! मौसी ने पूछा, ‘यह मशीन क्या है?’ साहब ने बताया कि वह गोद में रखकर काम करने वाला छोटा कंप्यूटर है। इसे लैपटाप कहते हैं, मौसी ने पूछा, ‘कुसुम को सिखाया जा सकता है क्या?’ साहब खुश होकर बोले, ‘सिखा दूंगा। कुसुम को कंप्यूटर सिखाना मेरा काम।’

अगले दिन वैसा ही लैपटॉप लाकर साहब ने कुसुम के पास रख दिया और उसे खोलने के तरीके बताने लगे। कुसुम लजाती हुई झिझक रही है, यह देखकर मैडम ने सिखाना शुरू कर दिया। डॉक्टर ने कुसुम और बच्चे को बुलवाकर दोनों का वजन लिया। कुसुम के नाश्ते, खाने का पूरा चार्ट बनाया और आदेश कर दिया कि जब तक बच्चा दूध पीता रहेगा, तब तक कुसुम का खाना-पीना इसी चार्ट के हिसाब से चलेगा। शाम तक अंग्रेज और उनकी मैडम मौसी के घर पहुंच गए। उनके साथ दो आदमी खाने-पीने के बहुत सारे सामान के साथ आए। उन सामानों में ऐसे भी थे जिन्हें पकाने और तैयार करने में मौसी समर्थ नहीं है, यह जानकर साहब-सहबाइन वहीं ठहरकर मदद करने लगे। मौसी ने उन लोगों से कहा कि आज रात वे भी यहीं खाना खाएं। वे तैयार हो गए। मौसा, मौसी, कुसुम, साहेब-सहबाइन साथ-साथ खाने बैठे। बेटा भरपेट दूध पीकर आराम से सोता रहा। कुसुम को सूप बेस्वाद लगा, मगर पीना पड़ा। मौसी ने अपनी तरकारी में से एक चम्मच साहब और एक चम्मच मैडम की थाली में डाल दिया। मैडम ने ब्रेड के साथ मुंह में डाला। स्वाद का मजा ले पाती उससे पहले ही चेहरा लाल हो गया। बेसिन में मुंह का कौर उगल कर कुल्ला करने लगी। तब भी मुंह की जलन कम नहीं हो रही थी। मौसी ने मिठाई दी। उसे धीरे-धीरे चूसने लगी। साहब ने तरकारी की ओर ताका भी नहीं। ब्रेड, मक्खन, उबले आलू, सूप और दूध से उनका पेट भर गया।

सोने के लिए होटल लौटते समय मैडम बच्चे को साथ ले जाना चाहती थी। ज्यों ही उसे उठातीं, चौंक कर रोने लगता। कुसुम की देह से सटकर चुप हो जाता। वे लोग बच्चे को वहीं छोड़कर होटल लौट गए।

दरसन ने पांच लाख रुपए से कस्बे के अपने मकान में आगे चार दुकानें बनवाने का काम शुरू कर दिया था। पीछे रहने के लिए आधुनिक सुविधाओं वाला छोटा घर भी साथ-साथ बनने लगा था। रात दिन काम में जुटे रहते। एक दिन मिस्त्री मजूरों ने छुट्टी कर ली तो दरसन मौसी के घर गए। उस समय कुसुम बच्चे को दूध पिला रही थी और उसके लाल भभूक चेहरे के बीच मूलमुलाती नीली आंखों की अजगुत खूबसूरती देख-देख कर हैरान हो रही थी। दरसन का आना सुनकर बच्चे को छाती से लगाए ही बैठक में आ गई। बच्चे के साथ उसे देखकर दरसन के चेहरे पर तनाव उभरा। कुसुम उल्टे पांव लौटकर उसे मौसी की गोद में देकर दरसन के पास आई। दरसन का सूखा चेहरा देखकर ममता और दुख से भर गई। उसके मुंह से निकला, ‘वहां कुछ खाते-पीते नहीं हो क्या? इस हाल में रहकर मकान-दुकान बनवा कर क्या होगा?’

दरसन ने सूखी हँसी हँसकर कहा, ‘बिना खाए पिए कैसे रहूंगा। यह जरूर है कि तुम्हारे हाथ का खाना अब कैसे मिलेगा!’ कुसुम छलकती आंखों से किचेन में घुस गई। मक्खन, ब्रेड, मिठाई, नमकीन लाकर दरसन के पास बैठी। बोली, ‘कुछ खाइए। चाय बनाकर ला रही हूँ।’ बिना दरसन की आंखों की ओर देखे किचेन में लौटकर चाय बनाने लगी। चाय लेकर आई। दरसन ने कहा, ‘अपनी भी ले आओ।’ कुसुम उठी। अपने लिए दूध में हॉर्लिक्स बनाकर ले आई। देखकर दरसन ने पूछा, ‘चाय नहीं पीती?’ फीकी हँसी के साथ कुसुम का जवाब आया, ‘अपनी मर्जी से कुछ भी खाना-पीना नहीं होता। सबेरे से रात तक के खाने-पीने का चार्ट बना है। उसी हिसाब से खाना-पीना है।’

बच्चे का रोना सुनकर भीतर गई। उसे थपककर सुलाया। सो गया तो उसके लिए कैसी तो ममता उमड़ी। मन हुआ उठाकर दरसन को दिखाऊं कि मेरी कोख से कैसी अजनबी सूरत शक्ल का बच्चा जनमा है। वहीं से बोली, ‘बच्चे को ले आऊं! देखिए तो कैसा है?’

अनमने स्वर में दरसन ने उठते हुए जवाब दिया, ‘मैं क्या करूंगा उसे देखकर! और हां, मुझे लौटने में देर होगी। अब निकलता हूँ।’ कुसुम चाहती थी कि कुछ फल-मिठाई, सूखे मेवे पति को दे, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई। दरसन चुपचाप लौट गए। कुसुम ग्लानि से भर गई।

मैडम ने मौसी से कहा कि आज शाम का डिनर सब लोग हमारे होटल में लेंगे। मौसी तैयार हो गई। मौसा को खबर हो गई। होटल की बड़ी गाड़ी सबको लेने के लिए आ गई। होटल पहुंचकर सबलोग पहले साहब वाले कमरे में गए। पहले बड़ा बैठका। उसके बाद बेडरूम बैठक में कई तरह के सूप और नरम-गरम पीने वाली चीजें आ गईं। साहब और मैडम ने अपनी-अपनी पसंद के गिलास उठा लिए। मौसा ने सूप लिया। मौसी और कुसुम कुछ भी लेने को तैयार नहीं हुईं।

आधे घंटे बाद डाइनिंग हॉल में जाने पर कुसुम कुछ समझ नहीं पाई। वहीं अंधेरा था। मेजों पर लालटेन के शीशों की तरह शीशों के बीच मोमबत्तियां जल रही थीं। उनसे बहुत कम रोशनी निकल रही थी। कहीं से बहुत मद्धिम संगीत धीरे-धीरे माहौल को रहस्यमय बना रहा था। सबलोग अंदाज से धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए एक मेज के पास पहुंचकर कुर्सियों पर बैठे। सबके बैठते ही चमचमाती वर्दी में तीन बेरे आ धमके। मेज पर छोटी बड़ी प्लेटें, कांटें, चम्मच रखे जाने लगे। इतने धीरे और करीने से चीजें रखी जा रही थीं कि उनसे उपजी कोई आवाज अदृश्य कोनों से बहती आ रही सुकोमल संगीत लहरियों को बैठे हुए लोगों की चेतना को रसमग्न करने में कोई बाधा नहीं पहुंचा रही थी। बैठे लोग खुद भी किसी तरह की आवाज का कारण बनने से अपने को बचा रहे थे।

कुसुम ने ऐसा माहौल कभी देखा-सुना नहीं था। वह भी दम साधे सबकुछ देख, सुन और समझ रही थी। गोद में बच्चा कसमसाया। उसे दूध पिलाने की बात कहकर कुसुम ने मौसी से कमरे में पहुंचाने की बात की। मौसी तुरंत खड़ी हो गई। मौसा भी उठे। अंग्रेज साहब ने मौसा को इशारे से बरजते हुए कहा, ‘मैं इन दोनों को कमरे में पहुंचा आता हूँ।’ वे आगे उस अंधेरे हॉल में रास्ता टटोलते बढ़े, उनके पीछे मौसी, मौसी के पीछे गोद में बच्चा सम्हालती कुसुम। कई बार लगता कि वह मेज-कुर्सियों से टकरा जाएगी। बचती, सम्हलती हॉल से बाहर आई। वहां तो रोशनी की बाढ़ ही थी। कमरे में पहुंचकर कुसुम ने मौसी से कहा, ‘इन्हें वापस भेजो तो बच्चे को दूध पिलाऊं।’

मौसी ने अदब के साथ साहब को समझाया, ‘आप तो जानते ही हैं, किसी मर्द के सामने बच्चे को अपना दूध पिलाने में हिंदुस्तानी औरतें लजाती हैं।’ साहब तमक करबोले, ‘ऑफिस में काम करने वाली औरतें खुले आम छाती खोल कर बच्चे के मुंह में लगाती हैं। उनकी फोटो अखबारों में छपती है। भारत सरकार चाहती है कि हर औरत ऐसा करे।’

कुसुम ने दृढ़ता के साथ एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘वे सब लाखों रुपए लेकर उस तरह के विज्ञापन तैयार करती हैं। और चाहे जो भी हो, आपको मेरी देह की ओर ताकने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए।’

बच्चा तेजी से बढ़ने लगा। छठवें महीने तक आते-आते उसकी मुस्कान, उसकी किलकारियां सबको मुग्ध करने लगीं। मेम साहब एक गोल-गोल घूमने वाली गाड़ी खरीद लाई। गाड़ी क्या थी, एक गोल स्टूल जैसी प्लास्टिक की बनी, नीचे छोटे-छोटे पहिए लगे। बीच में कपड़े की पहियां लगी हुईं। बच्चे को बीच में खड़ा कर के किनारे उसके दोनों हाथों में पकड़ा दिए जाते। बच्चा एक-दो कदम चलने की कोशिश करता, गाड़ी घूमने लगती। बच्चा बैठ जाता उन्हीं पहियों पर। दो-चार मिनट बाद उसे पहले की तरह खड़ा कर दिया जाता। डगमगाते कदम आगे पीछे पड़ते। बच्चा साधने की कोशिश करता। कोई उसे सहारा दे देता। वह फिर कोशिश करता। सबलोग गाड़ी के चारों ओर झुककर बच्चे का हौसला बढ़ाते। कुसुम को लगता, साहब उस खेल में झुकते समय जानबूझ कर उसकी देह से सटने या हल्के से उसके सिर से अपना सिर छुआने की कोशिश कर रहे हैं। वह बिना कुछ बोले अपने को समेट लेती। अपने को समझा लेती कि यह उसका भ्रम हो सकता है। अपने आप ऐसा हो गया होगा।

बच्चा कई कदम गाड़ी में गोल-गोल घूम गया। सब ताली बजा कर उसे और चलने को ललकारने लगे। वह हँसता हुआ बच्चा बैठने ही वाला था कि कुसुम उसे थामने के लिए लपकी, मेम कुछ कदम अलग खड़ी थी। मौसी से उन्होंने कुछ कहा, तब तक बच्चे के ऊपर झुकी कुसुम साहब को झुकते देख पीछे हटी। ऐसा करते ही उसके पैर लड़खड़ा गए। वह पीछे की ओर गिरने ही वाली थी कि साहब ने उसे पकड़ लिया। उसे सीधा खड़ा करने के प्रयास में जाने-अनजाने साहब के हाथों ने कुसुम को हल्का-सा अपनी ओर खींच लिया। कुसुम मुस्कुराई। सीधी खड़ी हुई। मौसी और मैडम अपनी बात में मगन थीं।

मुस्कुराती कुसुम ने मैडम से कहा, ‘साहब आपको प्यार करते हैं?’ मैडम भौचक। ‘क्यों पूछती हो?’ कुसुम ने अपनी ओर हैरानी से ताकती मैडम से कहा, ‘अपने साहब से पूछ लीजिए।’ मैडम ने सवालिया निगाह साहब की ओर फेंकी। साहब कुछ नहीं समझने की मुद्रा में उनकी ओर देखने लगे। कुसुम ने मैडम से कहा, ‘आप लोगों ने, मेरी कोख खरीदी। आपका काम पूरा हुआ। मेरी देह मेरे पति की है।’

यह कहकर वह दरवाजे की तरफ बढ़ गई।