
‘भोर की किरण’ नवगीत संग्रह, ‘गूंजती रहती है प्रतिध्वनि’ और ‘एक पुल जो बना था’ कविता संग्रह के साथ बाल साहित्य की 8 पुस्तकें।
कांच-घरों की चकाचौंध
मन के भीतर
एक नदी हर
रोज सिसकती है
रोखड़ में
तब्दील हो गए
सारे ही तो खेत
आंखों में चुभ रही
बेतरह
बिखरी-पसरी रेत
अगिन एक
खालीपन की तो
खूब दहकती है
खड़ा दुआरे
नीम समय की
चालें देख रहा
हर कोई बस
झूठ-कपट के
पासे फेंक रहा
गाछों पर
अब चिड़िया कोई
नहीं चहकती है
सगरे मनखी
एक-एक कर
नाता तोड़ गए
घर-आंगन
दालान सभी में
चुप्पी छोड़ गए
कांच-घरों की
चकाचौंध अब
मन में बसती है।
द्वारा : विद्यापुर वार्ड, निकट जी.आई.सी. द्वाराहाट, अल्मोड़ा, उत्तराखंड-263653 मो.9639373737


बहुत यथार्थ “कांच घरों की चकाचौंध अब मन में बसती हैं।”