
कवि, आलोचक तथा टिप्पणीकार। दो किताबें प्रकाशित ‘ठाकुर जगमोहन सिंह समग्र’ और ‘जल भीतर इक वृच्छा उपजै’।
इधर लिखी जा रही कविता को लेकर अनेक पाठकों और आलोचकों की लंबे समय से शिकायत रही है कि इसमें विकल जीवनानुभवों की न कोई प्रतिच्छाया है और न ही कवि का अंतर्द्वंद्व कहीं प्रतिबिंबित होता हुआ दिखाई देता है। यह भी कहा जा रहा है कि इन कविताओं में कवि की अपनी मौलिकता भी दिखाई नहीं देती है, कविता जीवन के वास्तविक संघर्ष से दूर, कृत्रिम और यांत्रिक होती जा रही है। एक गंभीर आरोप यह भी लगाया जाता है कि इन कविताओं में अपने समय के भयावह यथार्थ को लेकर न कोई प्रश्नाकुलता है और न संशय या आत्मसंघर्ष।
यह सुखद है कि पहली बार कई युवा कवयित्रियों के काव्य संग्रह एक साथ प्रकाशित हुए हैं। मुझे जरूरी लग रह है कि इसी बहाने कविता में स्त्री के स्वर को पहचानने की कोशिश की जाए कि ये किस अर्थ में पुरुषों द्वारा लिखी जा रही कविताओं से ही नहीं अपनी पूर्ववर्ती कवयित्रियों की रचनाओं से भी भिन्न हैं।
21वीं शताब्दी के इस धूसर समय में जब जीवन चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है, स्त्रियां भी दलितों और आदिवासियों की भांति समाज के हाशिए पर हैं। उनकी कविताओं में जीवन, प्रेम और प्रश्नों की उपस्थिति किस रूप में है इसे उनकी कविताओं से गुजरकर ही जान पाना संभव है। फिर ये कविताएं अंतर्वस्तु और शिल्प के स्तर पर भी क्या कुछ भिन्न हैं?
हाल में प्रकाशित चार काव्य संग्रह हैं- ‘कमाल की औरतें’ (शैलजा पाठक), ‘अब मेरी बारी है’ (अंकिता आनंद), ‘फिर उगना’ (पार्वती तिर्की) तथा ‘पोखर भर दुख’ (मृदुला सिंह)। इन कवयित्रियों के संसार में उनके टूटते-बिखरते सपनों को, उनके आत्म और बाह्य संघर्ष को, उनके जीवनानुभवों को रूपायित होते हुए देख पाना सचमुच एक दुर्लभ अनुभव था।
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‘कमाल की औरतें’ कवयित्री शैलजा पाठक का तीसरा काव्य संग्रह है। इसकी कविताएं आज की स्त्री के संघर्ष और प्रतिरोध को एक अलग तरह से प्रतिबिंबित करती हैं। इन कविताओं में स्त्री की छवि पूर्ववर्ती कवयित्रियों की कविताओं से भिन्न है।
शैलजा की कविताएं स्त्री के भीतर की तहों को खोलती हैं। स्त्री के अभ्यंतर संसार में हमें झांकने का अवसर देती हुई उसके भीतर के टूटते-बिखरते संसार को देखने का अवसर प्रदान करती हैं। ये भीतर की स्याह परतों को हटाकर स्मृतियों के अधढहे खंडहरों की ओर भी इंगित करती हैं। इस तरह ये स्त्रियों के अबूझ संसार में हमें धीरे-धीरे प्रविष्ट होने का अवसर देती हैं।
शैलजा पाठक जिन स्त्रियों को अपनी कविताओं में रचती हैं, ऐसी स्त्रियां हैं जो स्त्री-विरोधी दौर में अपने होने को, अपनी स्वतंत्रता को लेकर काफी सचेत हैं। पुरुषों की चालाकियों और षडयंत्रों को लेकर उनके भीतर किसी तरह का कोई भ्रम नहीं है। वे जानती हैं कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
आज की स्त्री के प्रतिरोध के स्वर को यहां साफ-साफ सुना जा सकता है : ‘एक दिन मैं तुम्हारे हर गलत को गलत कहने का साहस पा लूंगी / एक दिन मैं हां में हां नहीं मिलाऊंगी / एक दिन चली ही जाऊंगी अपनी पसंद की जगह पर/ एक दिन मन से उतार दूंगी सारा बोझ / एक दिन चावल से कंकर चुनते हुए सोचूंगी जरूर कि मेरा जीवन मुझे किसलिए मिला था।’
शैलजा पाठक के यहां प्रतिरोध का स्वर व्यापक है। वह अपने प्रतिरोध को बिंब के किसी मुलायम आवरण में छिपाना नहीं चाहती हैं, बल्कि खुलकर पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देना चाहती हैं, जिसमें स्त्रियों के स्वप्न और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं है।
शैलजा पाठक अपनी एक कविता ‘डरो इन औरतों से’ में सीधे पुरुष वर्चस्व को ललकारती हुई सभी स्त्रियों की ओर से कहना जरूरी समझती हैं : ‘तुम जिन्हें डरा रहे हो/डरो उनसे/ये लगातार तुम्हारी ओर बढ़ी चली जा रही हैं/इन्होंने नदियों को आंख में साधा है/इन्होंने पहाड़ को पीठ से बांधा है / इनके जख्म पर नमक सी आग है / ये तीन हिस्सा पानी वाला भाग हैं।’
‘बहनें 7’ में बिना सवाल किए ढेर सारे सवाल हैं, ‘तुम्हें लगता है ये तुम्हारी जमीन हथिया लेंगी/तुम डरते हो कहीं बैग टांगे ये मायके में ही न जम जाएं/बहनों के सच की कहानी बड़ी बदसूरत है/ये जिंदा हैं कि बस इन्हें जान से नहीं मारा गया।’
शैलजा पाठक की कविताओं में स्त्रियों की एक अलग दुनिया है। उनकी स्त्रियां इस पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ डटकर खड़ी हुई सचेत स्त्रियां हैं जो अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती हैं।

जिज्ञासा : आपकी कविताएं ऊपर से सहज प्रतीत होती हैं पर बुनावट में काफी गझिन हैं, क्या इसे आप कविता की एक ताकत के रूप में देखती हैं?
शैलजा पाठक : कविता लिखते समय अलग से सहज होने की कोई कोशिश नहीं करती। वह अपने प्रवाह में वैसी ही लिखी जाती है। कविता को पानी की तरह बहते जाने का स्वभाव रखना चाहिए और पाठक तक पहुंचते ही उसे ठहर जाना चाहिए, जैसे कोई बर्फ। पाठक को पढ़ने के बाद उस प्रभाव से निकलने में थोड़ी देर लगे।
जिज्ञासा : आपकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि हम एक स्त्री के अंतर्लोक में झांक रहे हैं, जहां अलग-अलग रूपों में ढेर सारा अंधेरा मौजूद है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
शैलजा पाठक : बहुधा औरतों की जिंदगी एक घर के अंदर चक्कर लगाते खतम हो जाती है। मैंने ऐसी औरतें भी देखी हैं या कह लें जानती भी हूँ जो घर का आंगन तक नहीं पार कर पाईं कभी। उनको जिंदगी ने कभी ऐसा मौका नहीं दिया कि अपने लिए सोचें या सपने देखें। ऐसी औरतों ने मुझे अंदर तक बेचैन किया है। कविताओं में मैं उस बेबसी को बस दर्ज करती हूँ। रोशनी का कोई सिरा कभी तो मिले जिसकी डोर थामे ये अपने उन अंधेरों से बाहर निकलें। फिर दुख और उदासी का रंग गहरा होता है। मैं जस का तस लिख देती हूँ। हो सकता है कि कोई भाषाई चमत्कार पाठक तक पहुंच जाए।
जिज्ञासा : आपकी ‘बहनें’ शृंखला के अंतर्गत लिखी गई दस कविताएं बहुत मार्मिक और करुणा से भरी हैं। आपका निजी अनुभव जैसे इसमें दर्ज होकर सार्वजनीन हो गया है!
शैलजा पाठक : कवि की कोई कविता जिस तरह उसकी अपनी होती है, उसी तरह सबकी भी होती है। बहनें शृंखला की कविताएं मेरे मन के बिलकुल नजदीक हैं। बहनों का झुंड एक-एक कर टूटता है फिर सभी अपने-अपने घर की हो जाती हैं। सबके अपने अंधेरे-उजाले होते हैं, दुख-सुख भी। ये ही होती हैं जो पेट की बात जान जाती हैं। मैंने इस रिश्ते को बहुत मुहब्बत के साथ बरता है।
जिज्ञासा : आप अपनी कविता को जिस तरह से बुनती हैं, वह कई कवयित्रियों की प्रचलित कविताओं से बहुत भिन्न है!
शैलजा पाठक : आधी आबादी की आवाज बनना आसान नहीं। बहुत सारे लोग लिख रहे हैं। मुझे पढ़ने वाले पाठक बहुत तरह के हैं। अगर वह किसी कार्पोरेट में काम करती स्त्री है तो खेत और घर के चूल्हे पर दाल पकाती औरत भी है। कभी-कभी किसी कार्यक्रम में कुछ अजनबी स्त्रियां बिना कुछ बोले आकर गले लग जाती हैं, मैं शुक्रगुजार होती हूँ।
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अंकिता आनंद के काव्य संग्रह ‘अब मेरी बारी है’ में संग्रहीत कविताओं में प्रतिरोध के स्वर हैं। अपने स्त्री होने को लेकर बाहर और भीतर का संघर्ष यहां भी है। अंकिता आनंद की इन कविताओं के भीतर एक लावा फूट पड़ने को जैसे आतुर है। 21वीं शताब्दी में भी भारतीय स्त्रियां केवल कहने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें मुट्ठी भर आजादी देकर संतुष्ट करने की चालाकियों को अंकिता आनंद बखूबी समझती हैं। इसलिए बिना किसी लाग-लपेट के सीधेे कहती हैं : ‘रंडी वेश्या कहकर/हमें अपमानित करने की लालसा रखने वाले/ऐ कमअकलो/एक पेशे को गाली बनाने की तुम्हारी फूहड़ कोशिश से/हमपर तो कोई गाज गिरी नहीं/पर अपनी चिल्ल-पों और पढ़ाई लिखाई से छानकर/क्या तुम इतनी सदियों में/कोई शब्द कोई नाम ढूंढ़ पाए।’ (‘स्पष्टीकरण’)
अंकिता आनंद की कविताओं में एक अलग किस्म की तल्खी है। स्त्री होने का दंश उनके यहां अन्य कवयित्रियों से थोड़ा अलग है। वे जैसे स्त्री होने की पीड़ा और स्त्रियों के साथ हो रहे हर अन्याय को अपनी कविता के माध्यम से प्रकट कर देने के लिए बेचैन हैं। अपनी एक कविता में वह स्त्री के दंश को इन शब्दों में व्यक्त करती हैं : ‘क्या गजब की बात है/कि जिंदा हूँ/गाड़ी के नीचे नहीं आई/दंगों ने खात्मा नहीं किया/बलात्कार नहीं हुआ।’ (‘जो तटस्थ है’)
अंकिता आनंद के यहां प्रेम का एक अलग अर्थ है। यह घृणा और युद्ध का विलोम है। संसार में केवल साहित्य और दीगर कलाएं ही दुनिया को नफरत से बचने का प्रयास करती हैं। पॉब्लो नेरुदा से लेकर शमशेर बहादुर सिंह तक की कविताओं में प्रेम की विराटता को देखा जा सकता है।
इस संग्रह में अंकिता आनंद की एक छोटी कविता है: ‘दुनिया से बचने के लिए/नहीं लिखती/प्रेम कविता/लिखती हूँ/ताकि दुनिया बची रहे।’ (‘संरक्षण’)

जिज्ञासा : आपकी कविताओं में ऐसा बहुत कुछ है जिससे उस स्त्री के अभ्यंतर की झलक मिलती है जो जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहती है!
अंकिता आनंद : स्त्री को प्राय: यही बताया जाता है कि उसे बाहर से कैसा दिखना या होना चाहिए। दूसरे भी इसी आवरण से उसे आंकते हैं। जब हम औरतें स्वयं अपने भीतर देखती हैं और उस आधार पर खुद को परिभाषित करती हैं, तो यह थोपी गई परिभाषाओं को चुनौती देता है। हम अपने विषय में और अपने लिए बोल सकते हैं। किसी और को यह तकलीफ न उठानी पड़े, इसलिए ये कविताएं हैं।
जिज्ञासा : मुझे लगता है कविता आपसे वह सब कुछ उगलवा लेती है जो आपके अंतर्मन में छलकता रहता है। आप क्या सोचती हैं?
अंकिता आनंद : जी, कविताएं मुझे कुहनी मारती हैं। ‘देखो, यहां कुछ है!’ कभी कुछ ही पलों में वे चीज दिख जाती है। कभी बरसों लग जाते हैं। जब साफ दिखाई देने लगे, तब कविता आकार लेती है।
जिज्ञासा : आपकी कविताओं में स्त्री के बने-बनाए ढांचे को छिन्न-भिन्न कर देने का एक गहरा प्रयत्न है, क्या यह सब अनायास है?
अंकिता आनंद : हम सब अपने शरीर में कई पीढ़ियों का इतिहास लिए घूम रहे हैं। साथ में हमारा खुद का अतीत होता है, जो हमने जिया और अपने आसपास देखा। बहुत कुछ अनायास प्रतीत हो सकता है पर ऐसा है नहीं।
जिज्ञासा : आपका साहस और प्रतिरोध आपकी कविताओं में अलग से दिखता है। यह आपके भीतर कहां से आता है?
अंकिता आनंद : साहस और प्रतिरोध हमारे साथ होते हैं जन्म से। तभी बच्चे विरोध में चीख पड़ते हैं। हमें सिखाया जाता है कि सबको साथ लेकर चलें वरना अकेले पड़ जाएंगे। जिस दिन हमें एहसास होता है कि हम सबके साथ होते हुए भी अकेले हैं, उस दिन साहस का हाथ वापस थाम लेते हैं। फिर कभी अकेले नहीं होते।
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पार्वती तिर्की का पहला काव्य संग्रह है ‘फिर उगना’। ये आदिवासी जीवन को उसकी संस्कृति और परंपराओं को अपनी कविताओं में एक अलग तरह से चित्रित करने वाली कवयित्री हैं। उनका एक भिन्न काव्य मुहावरा है, जो उनकी कविताओं की शक्ति है। वे झारखंड के आदिवासी समुदाय से संबंध रखती हैं। इसलिए उनकी कविताओं में आदिम राग के साथ एक गहरा स्थानीयताबोध भी है। प्रकृति के अनेक धूसर और उज्ज्वल बिंब हैं जो उनकी कविताओं को विश्वसनीय बनाते हैं। इस तरह प्रकृति को एक अलग दृष्टि से देखने की कोशिश करती हुई पार्वती तिर्की अपनी कविताओं में एक आदिम लोक की सृष्टि करती हैं, जो कृत्रिम या वायवीय नहीं है अपितु कवयित्री के जीवनानुभव की प्रतिच्छाया है।
एक जगह पीले रंग वाला जटंगी का चटख फूल प्रेम का प्रतीक है :
‘जटंगी फूलों के रंग से/खेत जब भरा होता है/तब स्मृतियां भी/सुनहरी होती जाती हैं/ओ प्रिये!/इन पीली स्मृतियों में/तुम हो।’ (जटंगी’ )
कोलाहल से दूर, इस यांत्रिक समय में पार्वती तिर्की की कविताएं हमें पीछे छूट चुकी पूर्वजों की स्मृतियों के निकट ले जाने का प्रयास करती हुई दिखाई देती हैं, ‘बसंत के मौसम में/फूलों के खिलने पर वे लोग/चिड़ियों के साथ खुश हुए/क्योंकि इन चिड़ियों ने ही/हवाओं में मधुर राग छेड़ा/और उनके अनुराग ने ही/बादलों को धरती पर उतारा/जिससे उसकी मिट्टी/हमेशा उपजाऊ बनी रही।’
आदिवासी समूह बदलावों से गुजरता हुआ आधुनिक वर्तमान का जिस तरह शिकार हो रहा है, भाषिक संरचना के बिखराव के दौर से गुजर रहा है। आज के कठिन दौर में आदिवासी अस्मिता दांव पर लगी हुई है, जंगल और पहाड़ों पर बड़े-बड़े डायनासोरों की नजर लगी हुई है। आदिवासियों की वैभवपूर्ण संस्कृति चहुं ओर खतरों से घिरी हुई दिखाई दे रही है। ऐसे विकट समय में पार्वती तिर्की एक जिद की तरह हमें आदिवासी समाज के पास ले जाने के लिए आतुर दिखाई देती हैं। एक आदिवासी स्त्री की मृत्यु के बहाने वह जैसे हमें बहुत कुछ याद दिलाना चाहती हैं : ‘मृत्यु के बाद जब वह/काया से विलगती है/शरीर के सारे गोदने/अपने साथ ले जाती है/ताकि जीवित रह सके उस संसार में/और शामिल रहे/हमारे कुल में/अदृश्य लेकिन अहर्निश।’
पार्वती तिर्की की कविताओं का लोक हमारे आदिम पूर्वजों का विस्मृत लोक है।

जिज्ञासा : आपकी कविताओं की रागात्मकता किस तरह भिन्न है?
पार्वती तिर्की : मेरे पुरखों ने आसपास की प्रकृति से सहिया बर्ताव किया। वे सहियापन को जीते हैं। सहियापन यानी साथ-साथ के रिश्ते। प्रकृति की समानांतरता में जीवन को देखने का तरीका उन्होंने दिया। जीवन का महत्व और उसके उत्सव का मुझपर गहरा प्रभाव हुआ जो मेरी कविताओं में आया। धान के बढ़ने पर समूह के लोगों का खुश होना मुझे एक बड़ी बात लगी। हमारे समाज में समूह में जीवन को बहुत अहमियत दिया गया है। इसी जीवन ने आसपास की हर चीज से प्रेम को मेरे भीतर जगाया है। साथ ही, आसपास के माहौल से तालमेल और संघर्ष भी मेरे भीतर पैदा किया है।
जिज्ञासा : आपकी कविताओं में भाषा और बिंब कुछ अलग तरह से आते हैं। क्या कारण है?
पार्वती तिर्की : मुझे भाषा किसी जादू की तरह लगती है। मनुष्य अपने हृदय में प्रेम भाव महसूस करता है, उस भाव को यदि भाषा अभिव्यक्त कर देती है तो इससे बड़ा चमत्कार कुछ नहीं। मेरी कविता में पंछी और मनुष्य के मध्य चमत्कारिक ढंग से प्रेम का रचाव है। प्रेम संबंध की स्थापना में गीत माध्यम बनते हैं, कविता माध्यम बनती है। स्मृतियों के सुंदर चित्र जो पुरखों ने खींचे हैं, इन्होंने मुझे संवाद का तरीका सिखाया है। मेरा लक्ष्य जीवन की छोटी-छोटी हरकतों के लिए सुंदर चित्रभाषा और बिंब तैयार करना है।
जिज्ञासा : आपकी कविता पाठकों को ऐसे संसार में ले जाती है, जो आदिम पुरखों का समाज है। क्या वह इस समय काफी विस्मृत और धुंधला-सा नहीं हो चला है?
पार्वती तिर्की : मेरे लिए आदिम पुरखा का मतलब संसार से गहरा लगाव है। जब पीछे की ओर लौटती हूँ और दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लोगों को देखती हूँ, तो एक दृश्य मेरे सामने बनता है। उस समय के लोगों के मध्य रिश्तों में गाढ़ापन था, संवाद की मधुरता थी। उनके मांदर बजाने और गीत गाने की कला मन-काया के भीतर अलग तरह का सुकून पैदा करती थी। आज भी पदचाप पर नाचने की कला धरती से अलग तरह का प्रेम पैदा करती है। मेरा वर्तमान जीवन कठिनाइयों में बीतता है। इसके विपरीत मैं उन दिनों का जीवन जीती हूँ। धुंधलेपन में जीवन जी लेने का संघर्ष चल रहा है।
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मृदुला सिंह का प्रथम काव्य संग्रह ‘पोखर भर दुख’ है। उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल सरगुजा के दृश्य और ध्वनियां उपस्थित हैं। आदिवासी लड़कियां मृदुला सिंह की कविताओं में अपनी विवशता और दरिद्रता के साथ उभर कर सामने आती हैं, यही नहीं हमारे सारे विकास के आंकड़ों को ठेंगा दिखाती हुई आज के विकराल सच से हमें रू-ब-रू कराती हैं।
आजादी के 75 वर्षों बाद भी देश के आदिवासी अंचलों की दशा बुरी है। शिक्षा के अधिकार का नारा आदिवासी अंचलों में किस तरह एक मजाक है यह किसी से छिपा नहीं है : ‘गांव की कच्ची दीवारों पर/गेरुआ रंग से लिखे हैं/शिक्षा अधिकार के/बहुत क्रांतिकारी नारे/उसकी पोती स्कूल नहीं जाती/लकड़ा की पत्तियां और फूल चुनती हैं।’
आग और धुएं से भरे हुए इस उद्विग्न समय में जब एक बेहतर जीवन की आस लगातार छीजती जा रही है, मृदुला सिंह की यह प्रत्याशा जीवन के प्रति है- ‘लगातार गुम हो रही है/उजाड़ के अंधकार में/कठफोड़वे की आवाज/इनके चोंच का लोहा/काटता है काठ का हृदय/बुनता है टक टक की ध्वनि/जिसमें गूंजती है/जीवन की उम्मीद।’
मृदुला सिंह के यहां प्रेम का एक अलग रूप है। प्रेम का आवेग इन कविताओं में दृश्यमान है। प्रेम में आकाश हो जाने की उपमा यहां कुछ इस तरह से है- ‘ऊंचाइयों को नापते/आकाश को मन ने छुआ ही था कि/बादलों ने रोक लिया/कहा इतना ऊंचा मत जाओ/मैंने हँस कर कहा/ उसने मिलने की नहीं/आकाश होने को कहा है मुझसे।’
मृदुला सिंह अपनी कविताओं में अपने आसपास के जिस जटिल संसार को अपनी कविताओं में रचती हैं, जिस तरह से स्थानीय दृश्य और ध्वनियों को अपनी कविताओं में चित्रित करती हैं, वह उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।

जिज्ञासा : आपकी कविताओं के केंद्र में ज्यादातर गरीब आदिवासी लड़कियां हैं, जो अपनी उदासियों के साथ अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतातुर दिखाई देती हैं!
मृदुला सिंह : ये कविताएं अनुभूत सच और संवेदना का प्रतिफल हैं। सभी निम्न-मध्यमवर्गीय स्त्रियां मेरे परिवेश की हैं। देश और समाज किसी एक वर्ग से नहीं चलता। हमारा समाज समावेशी समाज है। मैं जिस परिवेश में हूँ वहां सफाईकर्मी, मजदूर, किसान के रूप में स्त्रियां कर्मरत हैं जो मेरी कविताओं में स्वत:स्फूर्त रूप से आती हैं। कविता एक जिम्मेदारी है, इसलिए अपने आसपास के प्रति चिंता स्वाभाविक है।
जिज्ञासा : आदिवासी परिवेश की कविताओं का क्या भविष्य है?
मृदुला सिंह : यह सच्चाई है कि जल, जंगल और जमीन पर संकट गहरा होता जा रहा है। वास्तव में यह मनुष्य के अस्तित्व पर संकट है। मेरे परिवेश में प्रकृति और मनुष्य की खासतौर से उपस्थिति है। इसके अलावा स्त्री की मनुष्यता है। जाहिर है, वह कविता में आएगी।
जिज्ञासा : एक स्त्री विरोधी, प्रकृति विरोधी समाज में आप क्या महसूस करती हैं?
मृदुला सिंह : स्त्री के संघर्षों को मैंने बचपन से महसूस किया और जिया है। उसके दुख को नजदीक से देखा है। शहर की सफाईकर्मी आदिवासी स्त्रियों को देखती हूँ, उनके साथ होने वाले भेदभाव को देखती हूँ। वे घर और बाहर दोनों ओर से छली गई स्त्रियां हैं। समानुभूति के कारण वे सब कविता में आती हैं उनके जीवन की निराशा और अवसाद को दूर करने के विचार आते हैं। इसे अवसाद में सृजन कह सकते हैं।
जिज्ञासा : आपकी कविताओं में आदिवासी जनजीवन के प्रति इतनी रागात्मकता का क्या कारण है?
मृदुला सिंह : मैं सरगुजा जैसे जनजातीय बहुल क्षेत्र में बरसों से काम कर रही हूँ। मैं देखती हूँ कि आदिवासी लड़कियां जो दूर-दराज के गांवों से उच्च शिक्षा के लिए शहर आती हैं उनके रहने, खाने, फीस आदि का ठिकाना नहीं होता। वे दूसरों के घर जूठन धोकर, आया का काम करके पढ़ाई के लिए फीस जुटाती हैं। यह भी देखती हूँ कि उनमें पढ़ने की लगन है। अपनी परस्थितियों से निकलने की छटपटाहट है। मैं उनसे प्रेरित होने लगती हूँ।
चारों युवा कवयित्रियों के काव्य संग्रह की कविताएं हमें आश्ववस्त करती हैं कि वे अपने समय-संसार से बखूबी वाकिफ हैं। वे अपनी नियति को लेकर भ्रम की स्थिति में नहीं है। वे अपने समय की चुनौतियों से मुठभेड़ करना जानती हैं। वे 21वीं शताब्दी की ऐसी चौकस कवयित्रियां हैं जो अपनी कविताओं में अपनी बात कहना जानती हैं, अपने समय के यथार्थ के साथ जिरह करना जानती हैं। एक तरह से ये अब तक की स्त्रियों की बनी-बनाई छवि को अपनी कविताओं के माध्यम से ध्वस्त कर देना चाहती हैं।
समीक्षित पुस्तकें
(1) कमाल की औरतें – शैलजा पाठक – राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, पेपरबैक संस्करण 2024, मूल्य -250 (2) अब मेरी बारी है – अंकिता आनंद, राजकमल नई दिल्ली, पेपरबैक संस्करण 2024, मूल्य -199 (3) फिर उगना – पार्वती तिर्की, राधा कृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली, पेपरबैक संस्करण 2023, मूल्य -199 (4) पोखर भर दुख – मृदुला सिंह, बोधि प्रकाशन जयपुर, पेपरबैक संस्करण 2021, मूल्य -150
जी-63, फेज -3, वुड आई लैंड कॉलोनी, अमलेश्वर, जिला दुर्ग-491 111 (छत्तीसगढ़) मो. 62647 68849




