रामकरण शर्मा (१९२७ २०१८)

साहित्य अकादेमी, भारतीय भाषा परिषद, बिड़ला फाउंडेशन से पुरस्कृत।करीब १८ काव्यसंग्रह , 2उपन्यास प्रकाशित।समकालिक संस्कृत कविता के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर।

ज्यों-ज्यों पाता हूँ सुख
लंबी आयु
ताकत, पद, सोना और अभिज्ञता
त्यों-त्यों मेरी पिपासाएं बढ़ती जातीं
नहीं जानता, क्या चाहता हूँ मैं
किसे पाने के इंतजार में हूँ
इधर-उधर व्यर्थ भटकता रहता
दो-दो हाथ
दो-दो पांव, मन और बुद्धि को ढोते हुए
यह किया, वह करूंगा
इसे जीत लिया, उसे भी जीत लूंगा
लडूंगा नाखूनों से, दांतों से
बाणों से, वज्रों से
और धोखाधड़ियों से, परमाणुओं से
मैं ताकत से
सारी दुनिया को ग्रहण करना चाहता
दुनिया नहीं चाहती मुझे जरा भी
यह पेड़ आम का स्वसंस्थ
आगे बढ़ रहा अपने ही पत्तों से
रहता समाहित, गाता गीत
न कहीं भागदौड़ करता, न दुखी होता
वसंत खुद आता इसके पास
और हवा भी
सितांशु स्वयं अपने सितसूत्र-जालों से
बुनता है इसका महांबर।
स्वयंव्रत स्वयं पाए इन फलों को
कर त्वरित विसर्जन/ चैन की नींद लेता
नहीं जानता, मैं आखिर किसकी चाहत में हूँ
यह सामने पेड़ ताड़ का
मंडित उदारता से
ऊर्ध्वगामी, महाध्वनि यह खेल रहा है व्योम में
अजस्र अपने मधु को लुटाता हुआ
अपने चंवर तथा अपने छत्र की छाया का
सेवन करता यह
होता नहीं कभी रोगग्रस्त
दुख दिए बिना किसी को
दुष्कंटक-दंडों का, यह बचाए हुए है बड़प्पन से
निज राज्य को
जीतता है, नहीं जीत लेने की इसकी इच्छा
फलता है, पर किसी चाहत से नहीं
बढ़ता है, पर नहीं कोई ऊंचाई छूने की तमन्ना
महाधन है यह पर कोई लूट नहीं
झरने से निकली, पर सागरमात्र-लक्ष्या
न मांगती यह किसी भी दूसरे से
शरणागत सबको पालती-पोषती
स्वयंकृत नीर से
स्वयंवहा जलधि में समाती रात-दिन
वृद्धिमती है यह
न चिंताएं न कोई शोक
न जानता कि मैं आखिर किसकी चाहत में हूँ?

संपर्क : प्रवीण पांड्या, १७३, शास्त्रीनगर, साँचैर, जिलाजालौर, राज३४३०४१ मो. ९६०२०८१२८०