रांची विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर। वरिष्ठ आलोचक और टिप्पणीकार। प्रमुख कृतियां : ‘रामविलास शर्मा का महत्व’, ‘वैकल्पिक भारत की तलाश’।

1960 के दशक में केवल कला-साहित्य में ही नहीं, प्राय: सभी क्षेत्रों में हम अभूतपूर्व बदलाव देखते हैं- यह दशक सत्ता-विरोधी दशक है। रंग-विरोधी आंदोलन, शीत युद्ध और पॉप संस्कृति के उदय का दशक है। इस दशक में यूरोप में छात्र-आंदोलन हुए, सोवियत ब्लॉक में दरारें दिखीं, पश्चिमी यूरोप में छात्रों ने यथास्थिति के विरुद्ध प्रदर्शन किए।

संयुक्त राज्य अमरीका में इस दशक को ‘सांस्कृतिक दशक’ और यूके में ‘स्विंगिंग सिक्सटीज’ कहा गया है। बर्लिन की दीवार का निर्माण और आरंभ इसी समय हुआ। विश्व भर में चीजें बड़ी तेजी से बदलने लगी थीं। इस बदलाव से वंचित कोई महादेश नहीं था। 60 के दशक में 16 अफ्रीकी देशों ने अपने यूरोपीय औपनिवेशिक शासकों से स्वतंत्रता प्राप्त की। वियतनाम युद्ध-विरोध का आंदोलन सर्वत्र फैला। ’60 के दशक को ‘एक खतरनाक दशक’ कहा गया है क्योंकि इस समय दुनिया कई समस्याओं में घिरी-फंसी थी।

साठ के दशक में विविध क्षेत्रों में, विविध स्तर पर एक साथ घटनाएं, विचार, आंदोलन, प्रति-संस्कृति आदि हम देखते हैं। यह दशक सोवियत समाजवाद एवं पश्चिमी पूंजीवाद के बीच युद्ध का दशक है। इस दशक के आरंभ में मिल्टन फ्रीडमैन ने ‘कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम’ पुस्तक में आधुनिक ‘करेंसी मार्केट’ की अवधारणा रखी, राजनीतिक और सामाजिक स्वतंत्रता के लिए मुक्त बाजार और मुक्त विनिमय प्रणाली को आवश्यक माना, राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक स्वतंत्रता का तर्क प्रस्तुत किया, न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप को मुक्त बाजार के लिए आवश्यक बताया। साठ का दशक कला, साहित्य, संस्कृति, राजनीति के साथ ही नए आर्थिक विचारों और सिद्धांतों का भी दशक है।

इसपर कम विचार होता है कि अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार की शुरुआत इस दशक के अंत में, 1968 में क्यों हुई? प्रमुख अर्थशास्त्री वॉन हाएक ने 1960 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द कांस्टीट्यूशन ऑफ लिबर्टी’ में साफ शब्दों में सरकार को समाप्त करने, उद्योगों के निजीकरण, सब्सिडी की समाप्ति, सामाजिक सुरक्षा पर खर्च में कटौती और ट्रेड यूनियन की शक्ति को कम करने की बात कही है। 1968 में गुन्नार मिर्डल की किताब आई- ‘एशियन ड्रामा : ऐन इन्क्वायरी इनटू द पॉवर्टी ऑफ नेशंस’। मैक्लुहन ने इसी दशक में ‘ग्लोबल विलेन’ का कंसेप्ट दिया। फूको, डेल्यूज, देरिदा की प्रमुख किताबें प्रकाशित हुईं, रेजिस देब्रे की किताब ‘रिवोल्यूशन इन दि रिवोल्यूशन’ का प्रकाशन वर्ष 1967 है।

इंटरनेट की शुरुआत इसी दशक में अमरीकी रक्षा-विभाग में अन्वेषक-कार्य के लिए हुई थी। जनवरी 1961 के ‘लुक’ मैगजीन के संपादक जार्ज लियोनार्ड ने ‘यूथ ऑफ द सिक्सटीज : द एक्सप्लोसिव जेनेरेशन’ लिखा और इस दशक की मूक पीढ़ी एवं पारंपरिक पीढ़ी से भिन्न, असंतोष और गड़गड़ाहट के साथ एक विस्फोट के रूप में देखा। यह दशक बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण एवं आकर्षक दशक है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद, पहली बार फ्रांस लोकप्रिय विद्रोह के समीप था। फ्रांस में एक करोड़ श्रमिक हड़ताल पर थे। वहां के छात्र और ब्रिटिश छात्र भी राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे, सवाल पर सवाल कर रहे थे। फ्रांस के छात्र आंदोलन के समर्थन में ज्यां पाल सार्त्र भी थे। महिलाओं ने इसी दशक में समान अधिकारों और वेतन के लिए संघर्ष किया, युवाओं ने यौन-क्रांति की बात की, व्यवस्था और सरकार को कठघरे में रखा, युद्ध के खिलाफ शांति की मांग की गई, पारंपरिक मानदंडों को अस्वीकार कर प्रति-संस्कृति विकसित हुई।

यह दशक युवा आंदोलन, छात्र आंदोलन, स्त्री आंदोलन, नागरिक अधिकार आंदोलन, भेदभाव से मुक्ति के आंदोलन का है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद किसी एक दशक में आज तक साठ के दशक जैसा आंदोलन दिखाई नहीं देता।

साठोत्तरी साहित्य पर विचार के लिए भारत सहित सभी देशों और विश्व-परिप्रेक्ष्य पर ध्यान देना आवश्यक है। स्वाधीन भारत में केवल इसी एक दशक के साथ साहित्य का नाम (साठोत्तरी साहित्य) जुड़ता है। इस साहित्यिक आंदोलन के पीछे वैश्विक स्तर पर घटी घटनाएं भी हैं।

उस समय के साहित्यिक माहौल को समझने के लिए आवश्यक है सामाजिक-राजनीतिक माहौल को समझना। अब तक व्यवस्थित रूप से साठ के दशक के हिंदी साहित्य पर, साहित्यिक आंदोलन पर कम विचार किया गया है। अमरकांत की ‘हत्यारे’ कहानी 1962 में प्रकाशित हुई थी। पचास के दशक में ‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ का आंदोलन प्रमुख था। ये आंदोलन विशुद्ध साहित्यिक आंदोलन थे। साठोत्तरी साहित्य में हम एक साथ मोहभंग, आक्रोश, स्वप्न-भंग, निराशा, कुंठा, हताशा, दिग्भ्रम देखते हैं।

1960-62 में राजनीति और साहित्य में भी बदलाव दिखाई देता है। सुरेंद्र चौधरी जिन दो-तीन कहानियों- ‘हत्यारे’, ‘घंटा’, ‘रक्तपात’ में एक प्रकार का उत्तेजक आवेश देखते हैं, वह इस दशक में है। अस्तित्ववाद और आधुनिकतावाद दोनों हिंदी साहित्य में इसी समय प्रमुख होते हैं। एक प्रकार से यह दिशाओं की तलाश का समय है।

‘साठोत्तरी आंदोलन’ से बेहतर पद साठोत्तरी बदलाव है। पचास के दशक में ‘नई कविता’ और ‘नई कहानी’ अपनी पहचान बना चुकी थी। आज हमें वह आंदोलन के रूप में दिखाई देता है, पर उस समय वह कोई बड़ा आंदोलन नहीं था क्योंकि सभी कवियों एवं कहानीकारों के स्वर और विचार एक समान नहीं थे। ‘नई कविता’ पत्रिका का प्रकाशन पचास के दशक में हुआ था और ‘नई कहानियां’ का प्रकाशन साठ के दशक के आरंभ में। नामवर सिंह के चार लेख ‘कहानी’ पत्रिका में पहले प्रकाशित हो चुके थे। कहानी के आलोचक के रूप में उन्हें जनवरी 1960 से दिसंबर 1962 तक ‘नई कहानियां’ के ‘हाशिए पर’ स्तंभ में प्रकाशित 13 निबंधों से प्रसिद्धि मिली।

हिंदी के लेखक साठ के दशक में मोहभंग के साथ नई तरह से नए मार्गों की तलाश कर रहे थे। व्यवस्था-विरोध का कोई एक स्वर नहीं था। 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले और बाद के व्यवस्था-विरोध में अंतर है। 21 फरवरी 1967 के बाद नक्सलबाड़ी आंदोलन आरंभ हुआ। नामवर सिंह इसी वर्ष ‘आलोचना’ के संपादक बने।

राजनीति और साहित्य दोनों ही क्षेत्र में साठ का दशक विशेष महत्वपूर्ण है। भारत ने दो युद्ध झेले- भारत-चीन युद्ध (1962) और भारत-पाक युद्ध (1965)। बिहार में अकाल पड़ा। खाद्यान्न संकट बढ़ा। लेखकगण बाहरी आवाज अधिक सुन रहे थे। स्वतंत्र भारत में बीस वर्ष बाद ‘बसंत की गर्जना’ सुनाई पड़ी। उस समय के व्यवस्था-विरोध में सारवान आज भी व्यवस्था-विरोध ही है। राजनीति और साहित्य दोनों में वैसा व्यवस्था-विरोध आज हम नहीं देखते। पचास-साठ वर्ष बाद का भारत पूरी तरह बदल चुका है। साठ का दशक साहित्यिक और राजनीतिक आंदोलन का दशक था। आज वैसा आंदोलन नहीं है।

साठोत्तरी पद जितना कहानी में प्रसिद्ध हुआ, उतना कविता में नहीं। इस दशक के आरंभ में लिखी गई कुछ कहानियों को नामवर सिंह ने ‘नई कहानी’ से भिन्न मानकर एक नई शुरुआत की ओर ध्यान दिलाया।

विजममोहन सिंह ने ‘साठोत्तरी कहानी’ शीर्षक से 15-16 कहानीकारों की कहानियों का एक संकलन निकाला था। ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, रवींद्र कालिया (और विजयमोहन सिंह भी) इसी दशक के कथाकार हैं। कहानी के क्षेत्र में, क्या आलोचना के क्षेत्र में भी यह दशक सर्वाधिक उर्वर है। नामवर सिंह की ‘कहानीः नई कहानी’, सुरेंद्र चौधरी की ‘हिंदी कहानी : प्रक्रिया और पाठ’ पुस्तकें इसी दशक में आईं। देवीशंकर अवस्थी की ‘नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति’, राजेंद्र यादव की ‘एक दुनिया : समानांतर’, कमलेश्वर की ‘नई कहानी की भूमिका’ पुस्तकों का भी प्रकाशन-दशक यही है। कलकत्ता में एक बड़ा ‘कथा समारोह’ आयोजन हुआ था।

साठोत्तरी लेखन एवं आंदोलन कुछ लेखकों तक सीमित नहीं था। इसको व्यापकता और समग्रता में देखने की अधिक कोशिशें नहीं हुईं। सर्वाधिक चर्चा जिन कथाकारों की हुई, उन्होंने नई कहानी की मित्र-त्रयी (मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव) की तरह बढ़-चढ़कर न तो आंदोलन में भाग लिया, न आलोचना पुस्तकें लिखीं। साठ के दशक का उसकी विविधता एवं समग्रता में कम आकलन हुआ। अमरकांत की ‘हत्यारे’ और ज्ञानरंजन की ‘घंटा’ कहानी पर एक साथ विचार नहीं किया गया। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ का प्रकाशन 1964 में हुआ।

‘नई कविता’ के आठवें अंक में प्रकाशित ‘नई कविता ः किसिम किसिम की कविता’ में जगदीश गुप्त ने लगभग चार दर्जन नामों को सूचीबद्ध किया। ‘अकविता’ से सब सुपरिचित हैं, पर ‘युयुत्सावादी कविता’, ‘सूर्योदयी कविता’, ‘विद्रोही कविता’, ‘क्षुत्फातर कविता’, ‘ताजा कविता’, ‘टटकी कविता’, ‘ठोस कविता’ (कंक्रीट पोयम), ‘शुद्ध कविता’, ‘सही कविता’, ‘अभिनव कविता’, ‘अधुनातन कविता’, ‘एब्सर्ड कविता’ आदि अब केवल पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों पर हैं। आज खिलकर कल मुरझाने वाले आंदोलन, काव्यांदोलन इस दशक में अधिक हैं।

जगदीश गुप्त ने अपने निबंध में समकालीन कविता संबंधी विचारधारा का एक परिदृश्यात्मक अवलोकन किया था। तारे अनेक थे, सितारे कम थे। ‘लहर’ और ‘वातायन’ पत्रिका की भूमिका अधिक थी। 1961 में ‘लहर’ का कवितांक, 1964 में इसी पत्रिका का ‘भारतीय काव्यांक’ और 1967 में इसका ‘कवितांक उत्तरार्द्ध’ प्रकाशित हुआ था। सूर्योदयी कविता (वीरेंद्र कुमार जैन) में नई कविता से अपने को अलग करने का प्रबल आग्रह था।

1963 में जगदीश चतुर्वेदी ने चौदह कवियों के कविता संग्रह ‘प्रारंभ’ के संपादकीय ‘नए काव्य की भूमिका’ में कवियों को ‘अभिनव काव्य का नियंता’ कहा। वीरेंद्र कुमार जैन ने साठ के दशक की आरंभिक कविताओं को, काव्य-चेतना को पतन-पराजय, कुंठा, आत्मपीड़न और जीवित आत्मघात के असूझ अंधकार में आत्महारा-दिशाहारा होकर ‘भटकने’ की बात कही।

राजकमल चौधरी, धूमिल अकविता से जुड़े थे। वे ‘मुक्ति-प्रसंग’ और ‘पटकथा’ में सर्वथा भिन्न रूप में दिखाई पड़े। गंगा प्रसाद विमल, जगदीश चतुर्वेदी और श्याम परमार की तिकड़ी ने ‘विजप’ निकाला। नई कविता और नई कहानी से अलग कर इस दशक के अनेक कवियों-कहानीकारों ने अपनी विशिष्टता और मौलिकता की ओर ध्यान आकृष्ट किया। 1967-68 के समय से दृश्य बदलने लगा। राजनीतिक आंदोलन ने साहित्यिक आंदोलन को किनारे किया।

साठोत्तरी साहित्य में हम बड़ी आसानी से उस कल खंड को समझ सकते हैं। अगर कविता की ही बात करें, तो मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’, राजकमल चौधरी की ‘मुक्ति प्रसंग’, सौमित्र मोहन की ‘लुकमान अली’ और धूमिल की ‘पटकथा’ के साथ ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ और ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (रघुवीर सहाय) को एक साथ रखकर देखें, बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा। ‘राग दरबारी’ और ‘अलग-अलग वैतरणी’ उपन्यास को देखें और आलोचना में नामवर सिंह की ‘कविता के नए प्रतिमान’ के साथ अमृत राय की ‘नई समीक्षा’ पर ध्यान दें तो नवता के प्रति आग्रह अभी शेष था। निस्संदेह उस दौर की रचनात्मक उपलब्धियां अधिक महत्वपूर्ण हैं। इलाहाबाद की ‘विवेचना’ गोष्ठी को देखें, देश की पत्र-पत्रिकाएं उल्टें, साठ के दशक जैसी रचनात्मक उपलब्धियों का ऐसा समर्थ दशक और कोई नहीं है।

साठोत्तरी साहित्य के प्रतिवाद और विद्रोह के दो चरण हैं- पहला 1960 से 1967 तक है। दूसरा, 1967 के बाद का है। पहले चरण में कई बाह्य प्रभाव भी हैं, जिनमें ‘भूखी पीढ़ी’, गिंसबर्ग, हिप्पी और बीटल्स प्रमुख हैं। कुछ नया कर गुजरने की चाह है, इसमें प्रदर्शनप्रियता के साथ अनुकरण भी है। श्रीराम वर्मा ने ‘मरी हुई औरत के साथ संभोग’ जैसी कविता लिखी और इसे ‘अंतश्चेतना द्वारा लिखी गई कविता’ कहा।  विकृत संबंधों को लेकर कुछ कहानियां भी लिखी गईं। कविताएं अधिक। प्रतिवाद और विद्रोह के ऐसे आरंभिक स्वर अधिक समय तक कायम नहीं रहे। साहित्य से बाहर भी कवियों-लेखकों का ध्यान गया।

रघुवीर सहाय ने ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967) के वक्तव्य में लिखा- ‘लोकतंत्र -मोटे, बहुत मोटे तौर पर लोकतंत्र ने हमें इंसान की शानदार जिंदगी और कुत्ते की मौत के बीच चाँप लिया है।’ अकविता से जुड़े अधिसंख्य कवियों ने साहित्य के बाहर समाज को, राजनीति को देखना आरंभ किया। कविता को ‘स्वाभाविक कविता की दिशा’ कहने वाले श्याम परमार ने ‘अकविता और काव्य-संदर्भ’ (1968) पुस्तक की ‘प्रस्तावना’ में मुक्तिबोध को याद किया- ‘साहित्य के साहित्य में निर्वासन आवश्यक है।’ उन्होंने अकविता को ‘विद्रोह की कविता’ नहीं कहा है। अकविता की ‘नियति’ को उन्होंने ‘अकेलेपन की नियति’ न मानकर ‘विकृत संबंधों को नियति’ माना।

उस समय के साहित्यिक आंदोलनों से बाद का साहित्य नहीं जुड़ता है। कहानी में महीप सिंह ने ‘सचेतन कहानी’ और अमृत राय ने ‘सहज कहानी’ की बात की, पर इसने आंदोलन का रूप नहीं लिया। इसके बाद सत्तर के दशक में कमलेश्वर की ‘समानांतर कहानी’ ने एक कथा-आंदोलन का रूप लिया था, कुछ अंशों तक जनवादी कहानी ने भी, लेकिन उस समय से आज तक कोई बड़ा या प्रभावशाली आंदोलन साहित्य से गायब है। बाद का साहित्य अलग है, क्योंकि राजनीति में हलचलें कहीं अधिक हुईं।

सत्तर के दशक से आज तक की कविता, कहानी को समकालीन कविता, समकालीन कहानी कहा जाता है। 1990 के दशक से बदले परिदृश्य में ये ही मौजूद हैं, केवल कुछ अंशों में ‘भूमंडलोत्तर साहित्य’ का नाम प्रयोग में है। साहित्य साहित्यिक आंदोलनों से अलग होकर सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ता है। साहित्य की पहचान का तरीका बदल गया। साहित्यिक आंदोलन, राजनीतिक आंदोलनों के समक्ष अधिक प्रभावशाली और टिकाऊ नहीं होता। साठ के दशक में साहित्यिक बहसें कहीं अधिक थीं। ‘परिमल’ कहीं अधिक सक्रिय था। इलाहाबाद में जीवंतता एवं सरगर्मियां थीं। लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस साही ने की थी। उस दौर में कई साहित्यिक संस्थाएं सक्रिय थीं।

साठोत्तरी विद्रोह अब इतिहास है। वर्तमान में, इक्कीसवीं सदी में विद्रोह का वैसा रूप शेष नहीं है। वैसे तो साहित्य की विद्रोही परंपरा एवं प्रतिपक्ष की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती। वह समयानुसार अपने रूप और आकार ग्रहण करती है। ’60 के दशक में सच बोलने का साहस था। उस समय के साहित्य से ही नहीं, राजनीति से भी आज का साहित्य और राजनीति भिन्न है। साहित्यकार आज कहीं अधिक साधन-संपन्न है। कुछ अर्थों में वह अब ‘मैनेजर’ और ‘कैलकुलेटिव’ भी है। सच बोलने और लिखने के साहस में कमी आई है। उस समय कहने को ही सही, कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) था। आज कॉरपोरेट राज्य (कॉरपोरेट स्टेट) है।  यह समय उस समय से कहीं अधिक विद्रोह का है, वास्तविक विद्रोह का। उस समय निर्भयता थी, आज भयग्रस्तता है। इक्कीसवीं सदी में मेरी समझ से उस समय के विद्रोह का कुछ भी अंश मौजूद नहीं है।

उस समय केवल साहित्य में हीं नहीं, साहित्य के बाहर भी विद्रोह था। एक विद्रोही चेतना थी, जिसका आज के समय में अभाव है। उस दौर से सीखने को बहुत कुछ है। पहली बात यह है कि जनांदोलन से कटकर, विमुख होकर साहित्यिक आंदोलन का न कोई अर्थ है, न पहचान है। साहित्य की पहचान उसके सामाजिक सरोकारों से होती है।

आज के समय में कोई सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई नहीं देता। कुछ स्थानों में निश्चित रूप से आंदोलन दिखाई देते हैं, पर उनका कोई देशव्यापी प्रभाव नहीं है। साहित्यिक आंदोलन साहित्य में अपने को, अपने साहित्य और विचारधारा की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए होता है।

साहित्यिक आंदोलन का समय बीत चुका है, पर विद्रोह का समय कभी नहीं बीतता। इस समय साहित्य में विरोध, विद्रोह, प्रतिरोध के जो स्वर सुनाई देते हैं, उनमें कवि-लेखकों की इनके जरिए अपने को प्रतिष्ठित करने की इच्छा ज्यादा रहती है। हालांकि 21वीं सदी में साहित्यकार की भूमिका पहले से बढ़ी है और यह इसपर निर्भर करती है कि परंपरा से क्या ग्रहण किया जा रहा है।

(मई अंक में असावधानीवश बिना प्रूफ देखे छप जाने के लिए खेद है। -सं.)

204, रामेश्वरम साउथ ऑफिस पाड़ा, डोरंडा, रांची-834002 (झारखंड) मो.9431103960