‘रेत समाधि’ को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिलने के बाद उसे पढ़ने की उत्सुकता स्वाभाविक है।खुशी-खुशी पढ़ा।ग्लोबल मिजाज के उपन्यास में जो खिलंदड़ापन होता है, करुणा को भी विनोद में बदलते हुए, वह इस उपन्यास में है।इसमें बिंबों की एक माला है।तालाब में पत्थर मारकर एक किनारे से दूसरे सिरे तक पहुंचाते समय जिस तरह कई स्वतंत्र वृत्त बनते हैं, वृत्तांतों की एक वैसी ही माला है ‘रेत समाधि’- एक खास गूंज से भरी हुई।फ्रेंच लेखक पाल वैलरे ने कहा है, ‘एक अच्छा उपन्यास अंततः संगीत होता है!’

हर उपन्यास को संभावनाओं की तलाश होना चाहिए, पर गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ अतीत की निजी स्मृतियों  से बनता है।यह इतिहास के आतंक से बाहर रचा जाता है, ‘इस दुनिया में कितना है जो दर्ज नहीं इतिहास के पन्नों में।हवा में बह रहा है।पहचान सको तो पहचानो’।यह ऐसे समय इतिहास से बाहर निकलना है, जब नया जमाना पुराने जमाने में उलझा हुआ है- 21वीं सदी की एक टांग 16वीं सदी में फँसी है!

उपन्यास अपने जन्म से स्वतंत्रता की संतान है।इसलिए वह इतिहास में उन दबी चीखों, हँसने और रोने को भी दर्ज करता है जो अनसुना रह जाते हैं।जिस दौर में इतिहास एक आतंक के रूप में उपस्थित किया जा रहा है और फिल्म से लेकर उपन्यास तक  इतिहास खेलने की वस्तु है, ऐसे समय  में सामाजिक स्मृति के समानांतर निजी स्मृति को इतिहास की आवाज बनाना  अर्थपूर्ण माना जा सकता है।क्योंकि यह वह धरती है जहां कहीं भी कुदाल चलाओ, उसकी नोक एक मूर्ति से टकराती है!

ऐसा नहीं है कि इतिहास के आतंक का अनुभव पहली बार किया गया है।निर्मल वर्मा इतिहास की जगह वैयक्तिक स्मृति खंडों को महत्व देते थे, ‘कला मनुष्य के उन स्मृति खंडों को नष्ट होने से बचाती है जिन्हें इतिहास भविष्य के जोम में जाकर कूड़ेदानी में फेंक देता है।… (स्मृतियों के)बगैर हम अपने आप से अजनबी बने रहते हैं’।इन दिनों स्मृतियों को बाजार की वस्तुओं ने ढक दिया है और विचारों को प्रचारित कृत्रिम छवियों ने।

गीतांजलि श्री का उपन्यास 1988-90 के दौर की कथा है, जब ‘महाभारत’ सीरियल आया था।यह मुख्यतः मां-बेटी की कथा है,  जो ‘विजन’ और ‘मुक्त वर्णन’ दोनों जमीनों पर निर्मल वर्मा से काफी प्रभावित है।उनकी कहानी ‘माया दर्पण’ की छाया उपन्यास ‘रेत समाधि’ पर है।कहानी में एकाकी विधुर पिता काफी बूढ़े हो चले हैं और अपने एक पुराने प्रेम की स्मृति में अंटके जी रहे हैं।जवान बेटी अपना भविष्य जलाकर सोचती है, ‘वह अकेली रहेगी, किंतु बाबू (पिता) की छाया से बंधी हुई।’ ‘रेत समाधि’ में पिता की जगह मां है।

निर्मल वर्मा की कहानी ‘कव्वे और कालापानी’ के कव्वे ‘रेत समाधि’ में भी हैं।दकियानूसीपन और दुनियादारी से दूर, निर्मल वर्मा के सहजी बाबा अपना परिवार छोड़कर पहाड़ पर  दूसरी दुनिया में चले गए हैं, जहां ‘अदर्स’ का बोध नहीं है।गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ में ‘दूसरे’ की जगह ‘सरहद’ लांघने की बात है, ‘बार्डर माने कूदो।है ही कि लांघो, लौटो, खेलो, मुस्कराकर स्वागत करो, वहां मिलो रचो।मजा है उसे लांघने में।… मत मानो बार्डर को।बार्डर से अपने टुकड़े मत करो।इंसानी रिश्तों की सरहदें न कभी थीं, न कभी होंगी।’ देखा जाए तो उपन्यास का मुख्य संदेश है- बार्डर से अपने टुकड़े मत करो!

बांग्ला कथाकार नारायण गंगोपाध्याय की कई दशक पुरानी एक कहानी है।भारत-पूर्व पाकिस्तान  बार्डर के दोनों तरफ के सैनिक एक-दूसरे पर राइफल ताने पहरा दे रहे थे।एक तरफ के एक सैनिक ने देखा कि दूसरी तरफ के एक सैनिक की तरफ डंसने के लिए एक सांप तेजी से बढ़ रहा है।वह फुर्त्ती से सरहद की दूसरी तरफ कूदा।उसने सांप को राइफल से उठाकर दूर फेंका, फिर झट अपने देश की तरफ लौटकर राइफल ताने पहले की तरह खड़ा हो गया!

‘रेत समाधि’ का यह संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, ‘उम्र के आखिरी पड़ाव पर क्या इच्छाएं मृत हो जानी चाहिए?’ पति की मृत्यु के कुछ समय बाद 80 साल की चंद्रप्रभा देवी अपनी रिक्तताओं के बीच से जागती है।वह सुप्त ज्वालामुखी नहीं रह जाती, ‘बेटी ने मां बनकर मां को बेटी बनाया’।बेटी की इच्छाएं दफन हुईं, मां की जाग्रत।मां पति के मरने के बाद किसी आध्यात्मिक आश्रय में नहीं जाती।वह परिवार में सीमाबद्ध नहीं होती।बिना वीजा के वह अचानक पाकिस्तान के अपने यौवन के शौहर-प्रेमी  अनवर से मिलने चल देती है  खैबर दर्रे में, जहां सिर्फ आतंक है।मां को विभाजन के बाद अपने प्रेमी से बिछुड़ जाना पड़ा था और भारत आकर अलग तरह से जिंदगी शुरू करनी पड़ी थी।

यह अनोखी बात है कि नए सफर में मां छोटी होती जा रही है- इच्छाओं और उमंग से भरी, जबकि बेटी बड़ी होती, बुढ़ाती जा रही है- मां के साथ रहते हुए।यह ‘दो औरतों का देश’ है। समाधि की रेत से बाहर आकर मां की स्मृतियां जीवित हो गईं।वह चारों तरफ फैली सुंदर सृष्टि के साथ आनंदमय कौतुक में लीन होती गई।

चंद्रप्रभा यानी ‘ग्रैनी’ यानी ग्रांड मदर को पोते सिद्धार्थ यानी विदेशी संस्कृति में ढले ‘सिड’ ने एक सुंदर छड़ी उपहार में दी।इससे वह कभी पौधों को संवारती है, कभी अपने में तितली के रंग भरती है और कभी इसे माचिस की तीली जैसा बनाकर आसमान के सूरज से सुलगा लेती है! वह अपनी रेत से एक ऐसी चिड़िया बनकर जी उठी थी, जिसके लिए सरहद कोई अर्थ नहीं रखती।

देखा जाए तो दूसरी तरफ, बेटी की संभावनाओं की समाधि बन रही थी।पाकिस्तान में बेटी अचानक आत्मसचेत होती है, ‘मैं नहीं झेल सकती उसके नित बदलते रंग।’ वह मां द्वारा घसीटी जा रही थी, ‘धोखा हुआ है मेरे साथ।मैं समझ रही थी कि रास्ता दिखा रही हूँ।… उसकी कहानी में मैं नहीं।…मैं हूँ? किसी की? अपनी?’ बेटी की समाधि भी हिली।उसे अपने प्रेमी केके की याद आई, जिससे वह दूर आ चुकी थी।यह एक विचारणीय बिंदु है कि सरहद लांघने वाली मां अपनी बेटी के लिए सरहद बनकर खड़ी है।सरहद लांघने और बन जाने में कब कोई फर्क नहीं रह जाता?

इस जमाने में खूब कमाने और निजी जीवन जीने की इच्छा से ही दुनिया की सारी चीजें पैदा हो रही हैं।ग्लोबल समय का दर्शन है, ‘तन को तो पृथ्वी समझो।’ क्या दो औरतों के देश में कोई  भविष्य कल्पना है? आज के आधुनिक जीवन में निर्मल वर्मा के जमाने के ‘ऊलजलूल’ की जगह ‘मजेदार’आ गया है।दूसरी तरफ, ‘वे मारकाट, चीख, चिल्लाहट त्योहार की तरह मनाते हैं।’ ऐसी स्थितियों में, जब ‘स्मृति ध्वंस’ एक बड़ी घटना है, यह उपन्यास बिना किसी भविष्य कल्पना के स्मृति का महत्व बता रहा है।

निर्मल वर्मा और गीतांजलि श्री में फर्क यह है कि पहले के साथ रिक्तता में डूबीं निष्क्रिय स्मृतियां हैं तो दूसरे के साथ  क्षण-क्षण आनंदमय क्रीड़ा में डूबीं सक्रिय स्मृतियां। ‘रेत समाधि’ में खासकर हिंदी के कुछ कथाकारों को बेवजह याद नहीं किया गया है।इसमें राजेंद्र यादव द्वारा उत्प्रेरित विमर्शवादी परंपरा की जगह निर्मल वर्मा और कृष्णा सोबती की आधुनिकतावादी परंपरा के प्रति आकर्षण स्पष्ट  है।दिल्ली तक सीमित होकर कुछ स्त्री कथाकारों को अपने स्वाद के अनुसार याद किया गया है।गीतांजलि श्री पितृसत्ता का विरोध करते हुए भी ‘फेमिनिज्म’ से अपने को अलग करती हैं।वे अपने को ‘स्थानीयता’ से भी मुक्त कर लेती हैं।रोजी का चरित्र उठाकर लिंग के स्तर पर सरहद लांघती हैं, लेकिन थर्ड जेंडर के चरित्र का निर्वाह नहीं कर पातीं- रोजी को मरना पड़ता है।हालांकि भूपेन खक्कर के उन चित्रों का जिक्र है, जिनमें वे पुरुषों को औरतों जैसी आभा देते हैं।

क्या ‘रेत समाधि’ चेतना-प्रवाह उपन्यास (स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस) है? इसमें यशपाल के ‘झूठा सच’ और कमलेश्वर के ‘कितने पाकिस्तान’ का जिक्र नहीं है, पर इनका प्रभाव मौजूद है।

दुनिया के यथार्थ और कल्पनाशीलता बड़े साहित्य में कभी दो विपरीत छोर नहीं रहे हैं।देखा जा सकता है कि प्रेमचंद पर शोध करने के बावजूद गीतांजलि श्री सामाजिक यथार्थों में नहीं उलझतीं, ‘किस्से कथाएं दुनिया में अपने को घोल के नहीं चलते, उससे अपने को अलग करके चलते हैं।’ साहित्य को दुनिया की जरूरत नहीं है, पर ‘दुनिया को साहित्य की सख्त जरूरत है, क्योंकि वह उम्मीद और जीवन का द्योतक है।’ क्या इस उपन्यास में वस्तुतः आधुनिकतावाद ही एक सम्मोहक ग्लोबल छड़ी लेकर लौटा है? क्या जादुई यथार्थवाद की भाषा को जादुई आधुनिकतावाद का रूप दे दिया गया है? या उपन्यास एक वृद्ध विमर्श है?

‘रेत समाधि’ एक मिक्शचर है – उपर्युक्त सभी सिद्धांतों और आंदोलनों से जुड़ा, पर किसी से बंधा हुआ नहीं।यह फंतासियों पर आधारित मुक्त चिंतन-प्रवाह उपन्यास है, पर उद्देश्यहीन।क्योंकि इसमें थर्ड जेंडर की रोजी, मां और बेटी, तीनों अंततः मर या खो जाते हैं।वे कहीं नहीं पहुंचते।लेखिका थक जाती है छड़ी घुमाते-घुमाते!

‘रेत समाधि’ की भाषा कहीं अंधेरे में काली बिल्ली की तरह है, पर कहीं बिलकुल आलोकित, ‘चमकोइंग’! इसमें शब्दों के ही नहीं, अक्षरों के बीच भी घंटी-सीटी बजती है।भाषिक ध्वनियां  अर्थ -विकिरण करती दिखती हैं।उपन्यास पढ़ते समय पाठक को कई जगहों पर कुछ ज्यादा ही कलात्मक विपर्यस्तता से गुजरना पड़ सकता है।निश्चय ही कला का अर्थ कृत्रिमता नहीं है।

गीतांजलि श्री स्त्री-विमर्श में नहीं अंटकतीं।वे सांप्रदायिकता की समस्या को छूती हैं और कई हिंदी लेखिकाओं की तरह इससे दूर-दूर नहीं रहतीं।कहना न होगा कि सांप्रदायिक हिंसा की मार सबसे ज्यादा स्त्रियां झेलती हैं।

भारत-पाक विभाजन अयथार्थ पर आधारित था, दो देशों के पागलपन की होड़ का नतीजा ।मां का मन इस विभाजन को स्वीकार नहीं कर पाता।पिता की मृत्यु के बाद मां का अचानक जादुई कायाकल्प होने लगता है- कीड़ी में (काफ्का)! उससे कोई पूछता है- ‘पाकिस्तान कितनी दूर है?’ वह जवाब देती है, ‘वह वहीं है, हम दूर हैं’! माँ अवसाद और ऊब से बाहर निकलते हुए  तितली, चींटी, हाथी और अन्य स्वच्छंद जीवों में अपनी नई जिंदगी खोजने लगती है।अंततः मां-बेटी बिना वीजा के पाकिस्तान पहुंचती हैं, ‘दो औरतें अपनी दुनिया में, और कोई गवाह नहीं, कोई इतिहासकार नहीं कि देखे और दर्ज करे कि क्या हो रहा है।’ अंततः वह विस्मय ही है जो घटित होता है।इसपर कहा जा सकता है कि एक दमनात्मक समाज में इच्छापूर्ति सोच स्वाभाविक है, उसका महत्व है।क्योंकि इतिहास किसी युग में सपनों का गवाह नहीं रहा है।

स्मृतियां दो तरह की होती हैं- सकारात्मक और नकारात्मक, अच्छी और बुरी।इतिहास कई बार आदमी को बुरी स्मृतियों का कैदी बनाकर रखता है, ‘किसी सदी में किसी और की लगी गोली उस सदी में नहीं रह जाती।गोली बाद वालों को लगती रहती है और वो ढेर होते रहते हैं।’ ऐसे  हिंसक दौर में हिचकियां एकरेखीय इतिहास को तोड़ने का काम करती हैं।कभी क्रिकेटर के भीतर से निकलती हिचकियां, कभी मां चंद्रप्रभा की न रुकने वाली हिचकियां।करीब-करीब हर जमाने में हिम्मत से भरकर ‘मलबे का मालिक’ (मोहन राकेश) आ जाया करता है।हिचकी का एक अर्थ है, कोई प्रेम से याद कर रहा है! कुछ अच्छा पीछे छूट गया है और उसकी याद आ रही है-चलो वहां! नास्टैल्जिया, अतीत-विरह! मां अपनी बेटी से कहती है, हिचकियां बंद करने के लिए पीठ पर कसकर लात मारो, ताकि वह उछले और गिरे!

मां  जब अपने पुराने शौहर-प्रेमी अनवर से खैबर में मिलकर लौटती है, प्रेम को संपूर्णता में जीकर, जे स्वामीनाथन के चित्र में पहाड़ पर बैठी अकेली चिड़िया की तरह, तभी उसे पाकिस्तान की गोली लगती है।वह खैबर दर्रे से वैसे ही उछलती है और गिरती है चिड़िया की तरह।एक इच्छापूर्ति सोच (फैंटेसी) ट्रैजडी का शिकार होती है।यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि आतंक के सामने प्रेम करने की शक्ति कहां से आती है?

‘रेत समाधि’ पढ़ते हुए कृष्णा सोबती की ‘ऐ लड़की’ की याद आ सकती है।इसमें मां और बेटी साथ-साथ जी रहे हैं।मृत्यु की तरफ बढ़ती अम्मू अकेलापन चुन चुकी अपनी बेटी से कहती है, ‘संग-संग जीने में कुछ रह जाता है, कुछ बह जाता है।अकेले में न कुछ रहता है और न बहता है।’ कृष्णा सोबती ‘समय सरगम’ में कहती हैं, ‘अकेले अकेलों की अपनी जीवन शैली है।करते रहते हैं स्व-निर्माण और आराम।परिवार का कोलाहल, शोर, तनाव, ऊँच-नीच और तनातनी आसपास नहीं।’ गीतांजलि श्री के उपन्यास में परिवार, इतिहास, राष्ट्र और यहां तक कि आम स्त्री समुदाय की तरफ  भी पीठ है।कृष्णा सोबती के इस कथन की प्रतिध्वनि ‘रेत समाधि’ में है, ‘अब तारीखें न याद रखो।बस जीती रहो, जीती चलो।’ जीवन एक  उत्सव है, दीवारों और दरवाजों के बाहर आओ! वैश्वीकरण यही कह रहा है।

उपन्यास की स्वतंत्रता कई बार यथार्थ से विद्रोह होती  है।क्या ‘रेत समाधि’ यथार्थ से विद्रोह ठाना हुआ एक अति-काल्पनिक उपन्यास है, पाठकों को राष्ट्रविहीन ग्लोबल जीवन की तरफ आकर्षित करता हुआ? यहां कोई सरहद नहीं है, कोई दीवार या दरवाजा नहीं है।है सिर्फ पतंग-सा उड़ता, चिड़ियों-सा सरहद लांघता और तितलियों की तरह रंगों से भरा मुक्त जीवन।यह उपन्यास एक स्वतंत्र मनोराज्य प्रस्तावित करता है!

ग्लोबल जीवन अपना चुके, अपना  राष्ट्र  खो चुके अति-आधुनिक लोगों को और औपनिवेशिक अवशेष ढो रहे एलीट पाठकों को ‘रेत समाधि’ का यूटोपिया पसंद आ सकता है।लेकिन जिनपर वैश्वीकरण के बुरे दबावों के साथ ‘राष्ट्र’ पहले से ज्यादा सवार होता जा रहा है, जिनकी आत्मा को इतिहास रोज लहुलूहान कर रहा है और जो परिवार कभी छोड़ नहीं सकते या कमजोर-वंचित हैं, वे क्या करें? वे हर तरफ सरहद ही सरहद देखते हैं, कैसे लांघें, कहां-कहां लांघें? उन्हें विदेश से लाकर जादुई छड़ी देने वाला कोई सिद्धार्थ  यानी सिड कहां मिलता है!

‘रेत समाधि’ में चमकीली भाषा के अलावा वे सारे गुण हैं जो बुकर प्राइज देने वालों को आकर्षित कर सकते थे।बस  किसी कुशल व्यक्ति द्वारा संपादित होकर, सुंदर अंग्रेजी अनुवाद में इंग्लैंड के किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन से छपकर उनके पास पहुंचने की देर थी।आखिरकार पिछले दशकों में भारतीय भाषाओं के कितने महत्वपूर्ण उपन्यासों के इंग्लैंड से अंग्रेजी अनुवाद छपे हैं कि वे बुकर टेबुल तक पहुंच पाते? हिंदी उपन्यासों का संपादन भी कौन कराता है! कहना न होगा कि बुकर संसार में भी घटनाओं के बीच कम सीटियां नहीं हैं।

हिंदी के कथाकार सामान्यतः आलसी होते हैं।अधिकतर कलह-कलरव में मस्त रहते हैं।बहुत हुआ तो यह गिनते हैं कि उनकी कृतियों पर कितनी थीसिसें हैं! दूसरी भारतीय भाषाओं के कथाकार भी प्रायः आत्ममुग्ध रहते हैं।वे विदेशी इंटेलेजेंसिया से घुलने-मिलने, एलीट-वृत्तीय एक्टिविज्म और पश्चिम में जाकर अपने एक्सपोजर के प्रति प्रायः उदासीन होते हैं।फिर भी इतना हमेशा स्पष्ट रहना चाहिए कि कौन-सी कृति अंततः कितनी दूर तक जाएगी – इसका फैसला जल्दी नहीं होता।

रवींद्रनाथ 17 साल की उम्र में, 1878 में ही करीब साल भर इंग्लैंड रह चुके थे और पश्चिम का काफी अनुभव पा चुके थे, जबकि प्रेमचंद पश्चिमोत्तर प्रांत के बाहर नहीं निकल सके।निराला की दौड़ कलकत्ता से बैसवाड़े तक थी! प्रसाद ने बहुत कम बनारस लांघा।रेणु खेत-गांव देखते रह गए।अज्ञेय और निर्मल वर्मा पश्चिम के दरवाजे तक गए।पर अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के लिए मानसिक रूप से पश्चिम में ही बस जाना पड़ता है, जैसे अरुंधती राय, अरविंद अडिगा आदि बसे हुए हैं और विभिन्न देशों में लगातार आते-जाते रहते हैं।

बुकर प्राइज का 1969 से अपना एक लंबा इतिहास है, जो सलमान रुश्दी को मिलने के बाद चर्चित हुआ।देखा जा सकता है कि इसका मुख्य मकसद दुनिया में अंग्रेजी उपन्यासों का बाजार बनाना है।यही नहीं, अंग्रेजी को अंतरराष्ट्रीय सम्मान का वाहक जताते रहना भी है।

उपनिवेशवाद ने यह कैसी नियति निर्धारित कर दी है कि भारत से कभी कोई अंतराराष्ट्रीय सम्मान दिया नहीं जा सकेगा, यह देश हमेशा अंग्रेजी का मुंह ताकेगा! यहां तो बुकर की शार्ट लिस्ट में आ जाने भर से मन बल्लियों उछलने लगता है, इस हद तक औपनिवेशिक हैंगओवर है!

कुछ साल पहले बुकर प्राइज वालों ने महसूस किया कि अंग्रेजी के बाहर भी श्रेष्ठ उपन्यास लिखे जा रहे हैं।अतः इनके अंग्रेजी अनुवाद का भी बाजार बने और इंग्लैंड के प्रकाशकों की आमदनी बढ़े।उन्होंने अभी कुछ साल पहले से एक नया ‘अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार’ देना शुरू किया है, जिसकी आधी राशि वे अंग्रेजी अनुवादक और आधी कथाकार को देते हैं।इस बार उनका ध्यान लिस्ट में आई कृतियों में से हिंदी उपन्यास की तरफ गया है तो इसका श्रेय हिंदी की शक्ति और ‘रेत समाधि’ की श्रेष्ठता दोनों को है।यह एक बड़ी आबादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी की उस बहुस्वरता का सम्मान है, जो वस्तुतः गीतांजलि श्री के उपन्यास में भी मौजूद है, लेकिन निश्चय ही यह भ्रम किसी को नहीं होगा कि अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान मिलने भर से गीतांजलि श्री भारतीय भाषाओं की सर्वश्रेष्ठ कथाकार हो गईं।कोई पुरस्कार सर्वश्रेष्ठता का मानदंड नहीं बन सकता, बल्कि बड़े पुरस्कार आमतौर पर पाठकीय रुचि में बाउंडरी बनाते हैं- पाठकीय रुचि की विविधता को मिटाते हैं।

‘रेत समाधि’ के मामले में यह कहना जरूरी है कि यह मुख्यतः निर्मल वर्मा और कृष्णा सोबती में मंटो का तड़का है! भारत-पाक सरहद पर मरे टोबाटेक सिंह और ‘तमस’ के जरनैल सिंह की रूहें गीतांजलि श्री का पीछा नहीं छोड़तीं।यह उपन्यास की एक लाचारी है।दूसरे, इसमें इच्छापूर्ति सोच का किसी भविष्य कल्पना से संबंध नहीं है।तभी एक संदर्भ में सरहद तोड़ने वाला व्यक्ति दूसरे संदर्भ में खुद सरहद बन जाता है।अनोखी मां जीवन यथार्थों से दूर अंततः एक ट्रैजिक-कॉमिक चरित्र होती है।फिर भी वह यह चिरंतन संदेश दे जाती हैं कि सरहदों से अपने टुकड़े न करो और यह भी कि अपने खंडित वजूद को संपूर्णता देने के लिए कोई उम्र ज्यादा नहीं है।पुनः उड़ान की इच्छा होनी चाहिए।कभी-कभी हिचकी भी आनी चाहिए!