युवा कवयित्री।

अपना आकाश

स्त्रियों के पास पर नहीं होते
न अपने मन का आकाश होता है
फ़िर भी वे टांक लेती हैं
अपनी आंखों से सपनों के सुनहरे सितारे
उनकी देह ही उनकी ज़मीन होती है
जिसमें वे उगा लेती हैं उम्मीद का कल

वे अपनी पीड़ा बादलों को सौंपे रहती हैं
बारिश की बूंदों को हथेलियों में भर-भर कर
रो लेती हैं, हँस लेती हैं

स्त्रियां नदी की तरह बहती रहती हैं
वे जब उफनती हैं, किनारे घेर लेती हैं
वे जब सिमटती है, रास्ते उकेर देती हैं

प्रेम में, बिछोह में, उमंग में, शोक में
रखती हैं कलेजा चीरने को भय
वे बावली हैं छली भी

स्त्रियों को बड़े-बड़े हुनर आते हैं।

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