वरिष्ठ लेखिका और पूर्वप्रोफेसर। साहित्य, संस्कृति, रंगमंच संबंधी लेखन और अनुवाद की 19 पुस्तकें प्रकाशित। संप्रति सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली की सचिव।

स्त्री के प्रश्न, जरूरतें, समस्याएं सब जगह समान होने के बावजूद सभ्यता, समाज और संस्कृति विशेष से जुड़ी होती हैं। अतः उन्हें वैश्विक संदर्भ में देखने के साथ-साथ देश काल के संदर्भ में भी देखा और समझा जाना चाहिए। स्त्री के प्रति अन्याय के खिलाफ आवाज पश्चिम के समृद्ध समाजों में 18वीं सदी के अंतिम दशकों में उठी। 19वीं सदी के दौरान स्त्री-अधिकारों की जरूरत और मांग के संदर्भ में ‘फेमिनिज्म’ शब्द चलन में आया जो पितृसत्तात्मक मानसिकता के चलते समाज में, परिवार में, जीवन के विविध क्षेत्रों में स्त्रियों के शोषण के खिलाफ स्त्रियों की आवाज का सूचक था।

पश्चिमी समाज में स्त्रियों के प्रति सामाजिक भेदभावपरक मानसिकता का एक दिलचस्प उदाहरण यह है कि 18वीं- 19वीं सदी की सुप्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यासकार जेन ऑस्टिन के बारे में प्रसिद्ध है कि वे अपनी रचनाएं किसी नोट बुक में न लिख कर कागज़ के पन्नों पर लिखती थीं ताकि किसी पुरुष अतिथि के आने पर उन्हें सहजता से मेजपोश के नीचे छिपाया जा सके। सहज सवाल है कि वे ऐसा क्यों करती थीं? इसलिए कि तत्कालीन सभ्य समाज में स्त्रियों द्वारा उपन्यास लेखन सम्माननीय बौद्धिक कर्म नहीं माना जाता था।

अंग्रेजी साहित्य में वर्जिनिया वुल्फ की पुस्तक ‘ए रूम ऑफ़ वंस ओन’ (1929) ने पश्चिमी सुसंस्कृत समाज में मर्दवाद के खिलाफ आवाज उठाई। विश्वकवि नाटककार शेक्सपियर की बहन अपने भाई के समान प्रतिभाशाली थी, किंतु अपनी काव्य प्रतिभा की अभिव्यक्ति नहीं कर पाई और वह माता-पिता के दमन और सामाजिक उत्पीड़न की शिकार होती हुई अंततः निराश होकर आत्महत्या कर लेती है। वर्जिनिया वुल्फ का लेखन एलिजाबेथ युग के नवजागरणकालीन समाज के पितृसत्तात्मक रवैए का खुलासा करता ही है, उसके माध्यम से बीसवीं सदी के विक्टोरियन समाज को भी उजागर करता है जो दुनिया भर को सभ्य बनाने के बहाने एशिया और अफ्रीका के देशों पर काबिज होकर उनका दमन-शोषण कर रहा था। वह अपने समाज में स्त्रियों को साहित्यिक-बौद्धिक कार्य-कलाप के लायक नहीं समझता था। वस्तुतः 20वीं सदी के उत्तरार्ध में विशेषकर सिमोन द बुआ  की पुस्तक ‘सेकेंड सेक्स’ (1949) के प्रकाशन के साथ स्त्री-विमर्श में सक्रिय उभार आया और आगे के दशकों में सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक जीवन में एक महत्वपूर्ण विमर्श बन कर उभरा।

स्त्रीवाद से तात्पर्य उस सोच के प्रवर्तन से है, जो लिंग-भेद के परिणामस्वरूप स्त्री के प्रति होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाती है।

हमें यह सोचने की भूल नहीं करनी चाहिए कि स्त्री-विमर्श हमने पश्चिम से ही सीखा। दूसरी ओर, न यह समझना चाहिए कि भारतीय स्त्रियां लिंग-भेद की शिकार नहीं थीं। भारत में स्त्री जागरण नवजागरण का एक अनिवार्य पहलू रहा है, चाहे वह भक्ति आंदोलन के रूप में मध्यकालीन भारतीय नवजागरण हो अथवा स्वाधीनता की आकांक्षा से प्रेरित आधुनिक भारतीय नवजागरण। अंडाल, अक्क महादेवी, ललद्यद, मीराबाई मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देती संत कवयित्रियां न केवल जनमानस में बल्कि संत समाज में भी प्रतिष्ठित थीं। फिर भी स्त्री सामान्यतः पुरुष-वर्चस्वपरक मानसिकता द्वारा अन्याय से बची न रह सकी।

आधुनिक भारतीय समाज में स्त्री की दुर्दशा के खिलाफ आवाज आधुनिक नवजागरण के समय नए सिरे से उठनी शुरू हुई। सबसे बड़ा कदम राजा राममोहन राय द्वारा सती प्रथा उन्मूलन के रूप में उठाया गया। फिर स्वधीनताकामी भारत में स्त्री की गिरी हुई दशा को सुधारने, शिक्षा प्रदान करने, सामाजिक कार्यों में सक्रिय बनाने के बहुविध प्रयास समाज सेवियों, स्वाधीनता सेनानियों और साहित्यकारों द्वारा किए गए। आजादी की लड़ाई में स्त्रियां कंधे से कंधा भिड़ा कर पुरुषों के साथ मौजूद रहीं। रवींद्रनाथ के निबंध ‘काव्य की उपेक्षिताएं’ से प्रेरणा पाते हुए मैथिलीशरण गुप्त के कवि-कर्म में उर्मिला, यशोधरा जैसे ऐतिहासिक सांस्कृतिक पात्रों को सशक्त केंद्रीय व्यक्तित्व मिला। इतना  ही नहीं, ‘पंचवटी’ में उन्होंने शूर्पनखा जैसे पात्र को भी स्त्री-प्रश्न उठाने का अवसर देते हुए लक्ष्मण से प्रश्न करवाया-

नरकृत शास्त्रों के सब बंधन
हैं नारी को ही ले कर,
अपने लिए सभी सुविधाएं
पहले ही कर बैठे  नर।

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रेमचंद और जैनेंद्र के कथा साहित्य में स्त्री की विविधरूपेण समस्याओं को बड़ी संवेदना एवं सहानुभूतिपूर्ण अभिव्यक्ति मिली। छायावादी कविता का एक पक्ष स्त्री-सशक्तिकरण है। प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी के रचना कर्म में स्त्री को निजी व्यक्तित्व, स्वाभिमान और हौसला मिला। प्रसाद के स्त्री पात्र पुरुषों के अनुगामी न होकर उनके सामने प्रश्न उठाते हैं, उनकी भूलों-ज्यादतियों को उजागर करते हैं, उन्हें सुधरने की प्रेरणा देते हैंं। स्त्रियां पुरुष-वर्चस्व को चुनौती देते हुए स्वाधीनता संग्राम की राजनीति की आग में कूद पड़ती हैं। उपर्युक्त लेखकों की निगाह उच्चवर्गीय स्त्रियों तक सीमित न थी, बल्कि पिछड़ी-उपेक्षित स्त्रियों की दुर्दशा की व्यथा-कथा को भी संवेदनापूर्ण अभिव्यक्ति मिली थी।

महादेवी का लेखन, विशेष रूप से उनका गद्य हिंदी में स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में एक युगांतरकारी घटना है, यद्यपि लंबे समय तक उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। उनके निबंधों का संग्रह ‘शृंखला की कड़ियां’ (1942) का प्रकाशन स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। गौर करने की बात है कि यह पुस्तक सिमोन द बुआ की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक से सात वर्ष पहले आई थी। इसके निबंध भारतीय समाज और स्त्री को केंद्र में रखते हुए तीस के दशक में लिखे गए थे, उस समय भले इन्हें नोटिस में न लिया गया हो।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में और विशेष रूप से सत्तरअस्सी के दशक में स्त्रीलेखन के चर्चा के केंद्र में आने के बाद शृंखला की कड़ियांके महत्व को पहचाना गया। ये निबंध आज भी दबीकुचली, पिछड़ेगरीब समाज की स्त्रियों की व्यथाकथा को उजागर करते हुए हमारी शैक्षिकसांस्कृतिक उन्नति और विकास के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। स्त्रीचिंतनपरक निबंधों के अलावा महादेवी के रेखाचित्र भी स्त्रीविमर्श की दृष्टि से विचारणीय हैं। भक्तिन, सबिया, घीसा की मां के विवरण भारतीय समाज के स्त्रीविषयक सोच और व्यवहार पर सवालिया निशान लगाते हैं।

पुरुष-वर्चस्व के खिलाफ स्त्री की आवाज हमारे समाज और साहित्य में पिछले चार-पांच दशकों से काफी स्पष्ट और प्रबल स्वरों में सुनाई दे रही है। निश्चय ही स्त्री के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ सामाजिक, शैक्षिक, वैधानिक, संस्थागत स्तर पर भरपूर प्रयास किए गए हैं। ऊपर से देखने पर स्त्रियां लाभान्वित होती प्रतीत होती हैं, किंतु कुल मिला कर तस्वीर अच्छी नहीं दिखाई देती।

भारतीय समाज में बहुत से हाशिए हैं जो पितृसत्तात्मकता से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम पुराने ज़माने के उन राजपूत राजपरिवारों की निंदा-भर्त्सना का पाठ तो पढ़ते-पढ़ाते रहे जो मिथ्याभिमान के दंभ में कन्या को जन्म लेते ही नृशंसतापूर्वक मृत्यु के घाट उतार देते थे। किंतु आज की वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से स्त्री को जन्म लेने के अधिकार से वंचित करने में नहीं चूकते। यह सब आज भी समाज के साधन-संपन्न चतुर तबकों और चिकित्सा-कर्मियों की मिलीभगत से होता है।

हमारे समाज में पुरुष-अभिमान में होने वाली बलात्कार और हत्या की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं, बल्कि बढ़ती प्रतीत होती हैं। यह काम दारुण प्रसंग नहीं है स्त्री को अपमानित करने के लिए उसे निर्वसन कर सबके सामने परेड के लिए मजबूर किया जाना। कभी जातिगत, कभी संप्रदायगत और कभी धन-दौलत के अभिमान में पुरुष/पुरुष समूह इस तरह की हरकतें  सामाजिक अथवा कानूनी दंड-विधान से बेफिक्र रहते हुए करता रहता है। अब अक्सर इस तरह की घटनाएं सुनाई दे रही हैं।

प्रश्न यह है कि आज के हमारे विकसित, सभ्य समाज में भी ऐसे नृशंस व्यवहार की पुनरावृत्ति बार-बार क्यों होती है। महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के दावों और वादों के बावजूद स्त्रियों को अपमान के दंश से बचाने में हमारा समाज अक्षम सिद्ध हो रहा है।

पिछले दशकों में निर्भया कांड अथवा उससे पहले भंवरी देवी कांड पर जैसा सामाजिक प्रतिरोध दिखा था, वैसी प्रवृत्ति अब दिखाई नहीं देती। उस समय महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘दि सेक्सुअल हैरेसमेन्ट ऑफ वूमेन ऐट वर्कप्लेस प्रीवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल एक्ट, 2013’ आया। किंतु आज के जागरूक समाज में इन घटनाओं को लेकर वैसी चिंता नहीं दिखाई देती, जैसी वास्तव में पहले थी। ध्यान देने की बात है कि ‘वर्कप्लेस’ के अंतर्गत दफ्तर ही नहीं है, ऐसी हर जगह है जहां स्त्री-पुरुष दोनों संपर्क में हों या कार्य-कलाप में सलग्न हों, चाहे वह विद्यालय हो या खेल का मैदान या मेहनत-मजदूरी की जगह।

भारतीय स्त्री विमर्श के सामने यह एक ज्वलंत चुनौती है जिसका उसे सामना करना होगा। याद रखने की बात है स्त्री के प्रति यह जघन्य अपराध किन्हीं विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा नहीं, हमारे समाज में मौजूद आततायियों द्वारा किया जा रहा है। इस तरह की जघन्य क्रूरताओं के प्रति हमारे स्त्री-विमर्श में किस तरह प्रतिरोध हो रहा है, यह प्रश्न हमारे सामने है

अब स्त्रियों के आगे बढ़ने के अवसर शहरों तक सीमित नहीं हैं, शिक्षा का प्रसार ग्रामीण इलाकों में भी हुआ है। आज बड़ी तादाद में गांवों-कस्बों से लड़कियां शहरों-महानगरों में शिक्षा, खेल जगत और रोजगार के लिए आ रही हैं और सफलता पा रही हैं। उन्होंने बहुत कुछ हासिल किया है – हर क्षेत्र में  पद, प्रतिष्ठा, धन, आत्म-विश्वास, अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की क्षमता भी। लेकिन जहां एक ओर स्त्रियों के सुख-समृद्धि का विस्तार हुआ है, उनके जीवन में कई नई संभावनाएं खुली हैं, वहीं नई समस्याएं भी आई हैं।

पश्चिमी प्रभावों के चलते उनमें से बहुतों की सोच और जीवन-पद्धति में कई तरह के बदलाव आए हैं। स्त्रियों में कई ऐसी हैं जो पितृसत्तात्मक सोच से छूट लेते हुए अपने पुरुष मित्र के साथ सहजीवन (लिव इन रिलेशनशिप) का निर्णय लेती हैं। और वे पुनः पुरुषसत्ता की शिकार होती हैं। कुछेक हैं जो सहज आनंदपूर्ण जीवन बिता लेती हैं। उनके संबंध लंबे समय तक कायम रहते हैं। लेकिन काफी मामले ऐसे होते हैं, जहां लड़कियों की खुशियां बहुत समय तक नहीं टिक पातीं। विवाहित स्त्रियों को प्राप्त क़ानून की सुरक्षा भी उनके पास नहीं होती। वे निराशा-अवसाद की शिकार हो जाती हैं। यह समस्या विभिन्न आर्थिक वर्गों में मौजूद है, संपन्न वर्ग में भी और मध्य वर्ग में भी। अकसर होता यह है कि ऐसे जीवन को स्वीकार करने वाली लड़कियां अपने माता-पिता के परिवार से जीवंत संपर्क में नहीं रहतीं। अत: दुविधा अथवा संकट की घडी में भावनात्मक सहयोग से भी वंचित रह जाती हैं।

भारतीय परिवार व्यवस्था अपनी अनेक खामियों के बीच एक तरह से भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करती रही है। इसमें स्त्रियां ही नहीं पुरुष भी घोर मानसिक तनाव की स्थिति में सौहार्द और संवेदना की मरहम पाते हैं। बदलाव के वर्तमान समय में सह-जीवन व्यक्ति को इस परिवार व्यवस्था से विच्छिन्न कर देता है, क्योंकि लड़की के सुरक्षित भविष्य की आकांक्षा में माता-पिता  इस स्थिति से अक्सर समझौता नहीं कर पाते। सह-जीवन में रहने वाली लड़कियां क्रांतिकारी कदम उठा लेती हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहते हुए संकट के समय में अपने को अकेला और असहाय पाती हैं।

भारतीय समाज आत्मपराजय का समाज नहीं है। इस समाज में भयंकर विपदाओं के बावजूद व्यक्ति अपनी जीवट कायम रखता है, संघर्ष करता है। वह अपने को अकेला-असहाय पाकर सामान्यतः जीवन को समाप्त नहीं करता। भारतीय साहित्य इसका प्रमाण है-पारंपरिक साहित्य भी और आधुनिक साहित्य भी। प्रेमचंद या जैनेन्द्र के उपन्यासों को ही लें। इनके स्त्री चरित्र में दकियानूसी कुरीतियों के बावजूद जीवट और संघर्षशीलता कायम है। इनका साहित्य हार मानकर आत्म-हनन का पक्षधर का साहित्य नहीं है।

वर्तमान तीव्र होड़ के दौर में व्यक्ति अकेला पड़ गया है। उसका मन बदल गया है। गरीबअमीर, स्त्रीपुरुष  दोनों ही, यहां तक कि किशोर वर्ग भी इस विडंबना के शिकार हुए हैं। वे अपने को असहाय पाकर जीवन की बाजी हारने लगे हैं। आए दिन किसानों द्वारा, किशोर छात्रों द्वारालड़कियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की ख़बरें सुनाई देती रहती हैं। अवसाद, घुटन, पराजय बोध, निराशा के बीच वे अपने को निस्सहाय पाते हैं, संघर्ष को झेलते हुए जीने का हौसला और परिवार के स्नेह एवं सौहार्दपूर्ण अवलंब के अभाव में वे घातक कदम उठा लेते हैं।   

एक सवाल यह है कि जिन गरीब स्त्रियों/लड़कियों द्वारा की गई सेवा-टहल के दम पर मध्यवर्गीय, उच्च वर्गीय स्त्रियां अपने बौद्धिक-सामाजिक कार्य-कलाप अथवा सुख-सुविधापूर्ण मनोरंजन के लिए समय निकालती हैं, उनका स्थान हमारे स्त्री-चिंतन में कितना है? वैयक्तिक स्तर पर सेविका/नौकारानी की परिकल्पना विकसित देशों के बजाए विकासशील देशों की विशेषता है। पश्चिमी देशों की समाज-व्यवस्था घरेलू कामगार- केंद्रित नहीं है, किंतु भारतीय समाज में स्त्रियों का बहुत बड़ा तबका साधनहीन और शिक्षाविहीन है। इस वर्ग की स्त्रियां अपने पारिवारिक दायित्व निभाती ही हैं, साधन-संपन्न घरों में घरेलू श्रम करके अपने परिवार को आर्थिक सहयोग प्रदान करती हैं। इस असंगठित श्रमजीवी स्त्री-वर्ग के हित रोजगारदाता परिवार/परिवारों पर आश्रित होते हैं।

ज़ाहिर है कि श्रम कानूनों के अंतर्गत मिलने वाले लाभों से वे वंचित रहते ही हैं, रोजगार कायम रहना भी नौकरीदाता की मर्जी पर आधारित होता है। अकसर इनकी स्थिति अपने परिवारों में भी संवेदनशील होती है। अधिकांश मामलों में उन्हें अपना वेतन पति को सौंपना होता है, जिसे वह अपनी मर्जी से खर्च करता है। वह कभी-कभी तो काफी पैसा नशा-जुआ जैसे दुर्गुणों में उड़ा देता है और स्त्री को मार-पीट कर उसकी आवाज बंद करने की कोशिश करता है।

इस श्रेणी के अंतर्गत एक और श्रमिक वर्ग है, जो 24 घंटे की ड्यूटी पर ‘़फुल टाइम मेड’ कहलाती हैं। घर के लगभग समस्त शारीरिक श्रम का दारोमदार इनपर होता है। अधिकांश रोजगारदाता परिवार इन्हें अच्छी तरह से रखने का प्रयास करते हैं, ताकि ये उनकी सेवा के लिए बनी रहें, हालांकि कई बार शारीरिक-मानसिक यंत्रणा के मामले भी सुनने में आते हैं। सोलह-अठारह-बीस बरस की उम्र के आसपास की ये लड़कियां गरीब घरों से, अक्सर दूर-दराज के आदिवासी इलाकों से लाई जाती हैं। इन्हें लाने का काम एजेंट अथवा कुछेक एनजीओ करते हैं। वे इनके माता-पिता को आर्थिक लालच देते हैं, मातृहीन बालिकाओं के मामले में पिता को लड़की की जिम्मेदारी से मुक्त करने, आर्थिक साधन बन जाने की बात करते हैं, या किन्हीं मामलों में लड़कियों को शहर में रोजगार देने का सीधे लोभ देकर शहर जाने के लिए राजी कर लेते हैं। कुछेक मामलों में लड़कियां अपने काम और आमदनी से संतुष्ट भी रहती हैं। लेकिन काफी ऐसे मामले सुनने में आते हैं, जब लड़कियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरन लाया जाता है और निकल भागने की कोशिश करने पर एजेंट द्वारा इन्हें प्रताड़ित किया जाता है। यह अमानुषिक अत्याचार है, क्योंकि ये लडकियां कानून की मदद लेने की हैसियत में नहीं होतीं। कई मामले ऐसे हैं जिनमें नौकरी दिलाने का झांसा देकर लाने वाले दलाल इन लड़कियों का यौन उत्पीड़न करते हैं और मजबूरी की हालत में इन लड़कियों के पास अपनी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं होता।

स्त्री कामगारों का एक बड़ा वर्ग दिहाड़ी मजदूरों का है जो शहर-कस्बे में, सड़क पर चल रहे निर्माण कार्य-स्थल पर तसला ढोने, ईंटे ले जाने पत्थर तोड़ने जैसे शारीरिक श्रम पर लगा हुआ है। पुरुषों के समकक्ष परिश्रम के बावजूद यह स्त्री वर्ग पुरुष के बराबर पगार का अधिकारी नहीं माना जाता। इसलिए कि वह पुरुष के बराबर ताकतवर नहीं है। सवाल है कि यह दलील कितनी तार्किक है?  जब स्त्री पुरुष की तरह गर्मी-सर्दी-बरसात झेलती हुई पूरे दिन उसके साथ काम पर लगी है तब उसे  कम पगार मिलना कहां तक न्याय संगत है? ऐसी अधिकतर मजदूर स्त्रियां या तो सूखा-बाढ़ आदि विपदाओं से ग्रस्त इलाकों की हैं या बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के लिए निर्धारित की गई जमीनों से बेदखल किए गए किसानों-आदिवासी परिवारों की हैं।

क्या स्त्री-चिंतन में इस घरेलू श्रमिक वर्ग की स्त्रियों के जीवन से जुड़े सवालों को, चुनौतियों को उठाया गया है?

भारतीय स्त्री साहित्य में इन कामगार महिलाओं के जीवन यथार्थ को भी जगह मिलने की जरूरत है। इसी भावना से निराला ने ‘वह तोड़ती पत्थर’ में स्त्री को देखा था। इस पर भी विचार किए जाने की जरूरत है कि ऐसी स्त्रियों और उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के मामले में समाज और सरकार क्या कर सकते हैं। हिंदी स्त्री-चिंतन में प्रभा खेतान ने अवश्य फैक्ट्रियों में कार्यरत स्त्री मजदूरों की समस्याओं, उनके साथ होते अन्याय के खिलाफ लिखा है। किंतु असंगठित क्षेत्र के स्त्री श्रमिकों के दुख-दर्द का बखान, अंकन और राहत के प्रयास अभी भी बाकी हैं।

वस्तुत: स्त्री विमर्श में भारत के बहुलतावादी समाज के यथार्थों और प्रश्नों को केंद्र में लाने की जरूरत है। यह काम समर्थ बुद्धिजीवी महिलाओं को ही करना होगा, क्योंकि हाशिए पर पड़ी महिलाएं स्वयं अपनी आवाज़ बनने में सक्षम नहीं हैं। पश्चिमी महिला-प्रश्न अपनी जगह वाजिब हैं, लेकिन हम उतने ही तक सीमित रहेंगे तो एकांगी दृष्टि के  शिकार होंगे।

हमारे देश में स्त्री-पुरुष समानता के प्रसार के प्रयास शैक्षिक स्तर पर भी हो रहे हैं। विश्वविद्यालयों में जेंडर स्टडीज के विभाग खुले हैं और अकादमिक स्तर पर इस क्षेत्र में जागरूकता लाने के प्रयास हो रहे हैं। लेकिन इन जगहों पर भी जब तक भारतीय स्त्री की जमीनी  हकीकत को दृष्टि में रखते हुए अध्ययन, शोध और अनुसंधान नहीं होंगे, तब तक ये अध्ययन पश्चिमी स्थितियों पर हुए शोधों और आंकड़ों का गुणा-भाग ही लगाते रह जाएंगे। भारतीय जेंडर अध्ययन और स्त्री-विमर्श तभी सार्थक बन सकता है, जब उसके पैर देशी जमीन पर  टिके हों।

 

A102/3 एस.एफ.एस. फ्लैट्स, साकेत, नई दिल्ली110017rrpaliwal@hotmail.com