वरिष्ठ कवयित्री। एक साझा संग्रह सहित विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

 

स्वैटर

उसने एक बूढ़े को देखा
ठंड से दांत किटकिटाते हुए
जो कभी जमींदार था गांव में
जिसको गांव से दूर
इतना भगाया गया
कि वह भागते भागते
किसी अनजान शहर में आ गया है
जहां फुटपाथ पर किसी की छोड़ी गई
पुरानी दरी में लेटकर
वह सुनाता है अब
अपनी जमींदारी की कहानियां
पर ठंड में कांपता रहता है अक्सर
अपनी कहानियां सुनाते हुए

गोया कवि ने लाल रंग की ऊन से
उसके लिए स्वैटर बनाना शुरू किया
उसके सामने के पल्ले में
वह बुनने लगा एक हाथ सलाम करते हुए

पहली रात कवि ने सपना देखा
वह स्वैटर फैल गया है देश के जिस्म पर
जैसे देश के पास
सिर्फ एक ही मौसम था ठंड का साल भर
सुबह उठा तो
टूटा हुआ दिखा अखबार में यू एस एस आर
याद आई उसे दादी की सुनाई
चींटी और टिड्डे की कहानी
‘चींटी ने मेहनत करके
ठंड के लिए अन्न जमा किया
टिड्डे ने मेहनत नहीं की
उसे ठंड में भूखा रहना पड़ा
जब वह मरने के बाद फिर पैदा हुआ
नए कानून की सरजमीं पर
भूखे रहने का अधिकार किसी को नहीं था
चींटी को देने पड़े आधे अन्न के दाने टिड्डे को
वह आधी भूखी रही
देश आधा भूखा रहा
फिर हर बार पहले से
थोड़ा और ज्यादा भूखा
जब कई चींटियों ने काम करना छोड़ दिया
आपस में सब भूख बांटने लगीं

कवि ने उधेड़ दिया स्वैटर
शिक्षा का हो रहा था निजीकरण
गरीब के पास से पढ़ने का मौका जाने लगा
गरीब की ‘गरीब जात’ स्थायी होने लगी
मेधा औसत की लकीर पर रुकने लगी

कवि उधेड़बुन में है
कौन-कौन से रंग की ऊन चुने
स्वैटर के लिए
और वह भी कितनी-कितनी
कि कोई भी रंग
न कम लगे न ज्यादा
और यह ठंड है
कि निरंतर बढ़ रही है।

दिनचर्या

औरत चल रही है रास्ते पर
दिमाग दिनचर्या की सोच में है
‘चूल्हे में दाल चढ़ानी है
रिंकी का होमवर्क चेक करना है
सासू जी की आरती खत्म होने से पहले
घर के भीतर पहुंच जाऊं कैसे भी’

आदमी चल रहा रास्ते में
दिमाग दिनचर्या की सोच में है
‘घर पहुंचते ही बीवी हाथ में
सब्जी का थैला पकड़ा देगी
पिंकू को गणित करानी है ठीक से
आफिस में कल मीटिंग है
उसकी तैयारी करनी है

रास्ते में बीस साल का लड़का
घोंप रहा है लगातार
सोलह साल की लड़की के पेट में चाकू
बगल से गुजर रही है औरत
बगल से गुजर रहा है आदमी
न दोनों के हाथों में
लड़के को रोकने के लिए हरकत है
न कोई शोर मचता है
न ही डर से चीख निकलती है।

दीमक

अस्सी बरस के बृजभूषण जी की
पतलून की दाईं तरफ की जेब
कभी गीली नहीं हुई
जाने कैसे बच-बच कर धुलती थी पतलून
उनका सत्रह बरस की उमर से
अखबार पढ़ने का शौक
शख्सियत में यह निखार लाया कि
संपादकीय पढ़-पढ़ कर वोकैबलरी बनी
सांड की आंख पर निशाना करतीं
‘आर्थिक’ शब्दावलियां
अर्थ के साथ नस में रच बस गईं
कम अवधि में ही क्लर्क से पदोन्नत होकर
धीरे-धीरे डायरेक्टर हो गए

वे महिला सैक्ररेट्री का सम्मान करते
पर बीवी, बेटी के गाल पर
बात-बेबात थप्पड़ जड़ देते
बेटी को पढ़ाया नहीं ज्यादा यह सोचकर-
नौकरी नहीं करनी हो तो
‘पढ़ना’ औरतों का दिमाग ही खराब करता है
बृजभूषण जी अभी भी
चार घंटे तक अखबार चाटते हैं
पैंट की दायीं जेब में संभाला
पुरखों की कुंठाओं और डर वाला
पुश्तैनी कागज
कभी गीला होकर गला नहीं!

फंतासी के भीतर रियलिटी

दो साल से
वे रोज
थोड़ा-थोड़ा शरीर को पिघलाकर
डाल रहे थे सांचे में

शकीरा की वीडियो देखकर बार-बार
सीख रहे थे डांस स्टैप्स
चेहरे पर रोज थोड़ी
तस्वीर चिपक रही थी
सिंड्रेला और उसके राजकुमार की

यह करते-करते
एक दिन
वह दिन आ ही गया
जिसे वे शादी का दिन कह रहे थे।

नींद

कमाल की ही बात करती है
छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी
झाड़ू, कटका करने वाली
बिन मां-बाप की
तेरह बरस की लछमिनिया

कि वह सपनों में भी कभी
पी टी उषा की तरह नहीं भागी
कल्पना चावला की तरह कभी
राकेट में नहीं उड़ी

कहती है-
‘मुझे तो नींद में
सिर्फ नींद के सपने आते हैं।’

वैलेंटाइन डे

वह तसले में बजरी उठाए
अधूरी इमारत की
सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रही थी
सूरज ने बादलों की ओट से झांकते हुए
उस एक कोण के क्षण में
उसके तांबई माथे पर
धूप का बोसा दे दिया
जो पिघलने लगा बूंद-बूंद
सोने की तरह।

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