युवा कवयित्री। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

1. वेंटिलेटर

चार जुलाई की सुबह दस बजे
जब तुम कहते हो
नखासकोने की सड़क पर चलते हुए-
इलाहाबाद कितना अच्छा है न!
जी चाहता है कह दें कसम से
यह हमारा दिल है, दिलजले!
इस तरह हमारा दिल न जलाओ
न लो इस तरह से उसका नाम मेरे आगे
क्या यह कम बात है!

तुम्हारे पास इलाहाबाद बचा है लूकरगंज में
बची है 100 लूकरगंज में
शेखर जोशी की अशेष यादें
जहाँ से चौक का रास्ता है दो फ़र्लांग
चौक से पहले डफ़रिन का अस्पताल

जन्म लिया था जहाँ एक रोज़ मरने के लिए
एक रोज़ के लिए मैं जीती हूँ
मरते-मरते बच गई उन्नीसवें साल में
देखा था कातिल को जब मोहब्बत की आँख से
वह आँख पीछा करती है 2020 में

यह बात कम नहीं आज के समय में
अतरसुईया की पतली गली अब भी वहीं है
लाल गिरजे के पीछे
नए ज़माने की धूल उस पर चढ़ती नहीं
गली के उस मोड़ पर रोक लेते थे पक्षी
महादेवी वर्मा का रिक्शा
पक्षियों को नाम मिला महादेवी से

बात यह बड़ी है कि दुनिया के जंगल में
बच गई गिलहरियाँ गिल्लू के नाम से
गिल्लू का बचना महादेवी के इलाहाबाद का बचना है
इलाहाबाद बस गया बच कर
लोकनाथ की गली में
जहाँ तवे पर नाचती है हर शाम आलू टिकिया
मीर गंज के नशे में
इस नशे की नमक हलाली नहीं उतरेगी
शहर की ज़ुबान से

न देगी शहर को किसी सूरते हाल मरने
चलाए रखेगी नेतराम की कचौड़ी उसकी साँसें
वह कचौड़ी नहीं वेंटिलेटर है कसम से!

2. वुहान की चिड़िया

2019 दिसंबर की रात देखता रहा मुझे
वर्ष का आखिरी चाँद
देखता रहा मेरी आँखों में
2020 के प्रथम सूर्य का इंतज़ार
सूरज अकेले आता तो बात होती
सूरज के पीछे कोरोना वायरस चला आया
अभिशप्त थे हम वायरस के हाथ आने के लिए
कि ग़ालिब को मिलने वाला वह बरहामन
साल की पहली तारीख़ हमें मिला नहीं
जो कहता था – यह साल अच्छा है

वह साल तो यूँ भी अच्छा था
जब मुसलमाँ का हाथ एक बरहामन देखता था
अब तो आदमी के पास आदमी रहा नहीं
देखती है फिर भी दुनिया की आँख
2021 का सपना
खिलती है रोज़ चंपाकली
चंपाकली को आप फूल समझिए या स्त्री
स्त्री और फूल जुदा नहीं
अब भी सीताराम केले बेचते हुए
कमीज़ का घिसा कॉलर थाम कर कहता है –
अपुन को कुछ होंइगा इच नहीं
विश्वास अटल है उसका जीवन पर
जीवन को चलाने के लिए
वह चलाता है केले का ठेला
पठार की दीवार के पीछे वायरस को
है ताकत से ठेलता
फलटन का पठार सीताराम की दुनिया है

सीताराम बरहामन नहीं
पर जानता है इतना
खचाखच भरी दुनिया में
एक और वायरस की कोई जगह नहीं

सीताराम ने व से वायरस किताब में पढ़ा नहीं
व से होता है विद्यालय जाकर देखा नहीं
व से वुहान की चिड़िया के चक्कर में पड़ता नहीं

सीताराम जाता है सीधे रास्ते
लाता है बेचने व से वसई का केला

वसई केला सीताराम के जीवन का फल है
जिसे खाती है फलटन की चिमनी चिड़िया

खाते हुए सीताराम की कसम खाती है
कि वुहान की चिड़िया से
उसका दूर-दूर तक वास्ता नहीं।

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