बोरिस पॉस्तरनाक
(1890-1960) नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रूस के प्रसिद्ध कवि।उपन्यास डॉक्टर जिवागोके लिए प्रसिद्ध।यह कविता हिटलर द्वारा लेनिनग्राड के कब्जे के समय रूसियों के प्रतिरोध पर लिखी गई थी।

विजेता

क्या तुम्हें याद है
वह गले की खराश,
शैतानों का मुकाबला करते हुए
जो तड़पा रही थी बारबार
वे ताली बजाते शोर मचाते जा रहे थे
और कुछ ही दूरियों पर था वसंत
लेकिन सच्चाई एक ऐसी ढाल थी
जिसे कोई हथियारबंद भेद नहीं सकता था
लेनिनग्राड की नियति का करिश्मा देखिए
वह दुश्मनों की आंखों का किरकिरा था
आखिर आ गया वह पल
जिसका था सदियों से इंतजार
तोड़ दी गई लेनिनग्राड की जंजीरें
दुनिया भर के लोगों की भीड़ जम गई
और देखती रही उसे चैन की निगाहों से
कितना अद्भुत है वह, अमर बेल!
इन दंतकथाओं की कड़ी बड़ी है निराली
जो कुछ धरती-गगन पर मुमकिन था
वह कर दिखाया उसने और सबको राहत दी।


अन्ना अख्मतोव
(1889-1966) 20वीं सदी की एक विख्यात रूसी कवयित्री।जीवन और मृत्यु, प्रेम और इसे खो देने, विश्वासघात और भय पर श्रेष्ठ रचनाएं लिखीं।सत्ता व्यवस्था का कभी समर्थन नहीं किया।यह कविता 1942 की है, जब विश्वयुद्ध के दौरान उन्हें ताशकंद ले जाया गया आजादी और शांति के लिए संघर्ष के दौरान।

साहस

हमें पता है नसों में क्या बेचैनी है
आखिर क्या हासिल करना है हमें
साहस की घड़ियां ही हैं जब सबकुछ खो चुके हों
हिम्मत हो तो कभी हार न होगी
चाहे रोजाना लाशों का दर्दनाक ढेर हो
आंखों के सामने
चाहे हमारी छत हमसे क्यों न छीन ली जाए
हम मर भी जाएं
फिर भी रूसी वाणी को मरने न देंगे हम
हम जिंदा रखेंगे रूसी जुबान को
उस रूह को, रूसी धड़कन को
सौंपते जाएंगे अपने बेटों और वारिशों को
यह अमानत
स्वच्छ और आजाद
फिर सौपेंगे भावी पीढ़ियों को
जो हमेशा चलता रहेगा।


ओल्गा बरघोल्ज
(1910-1975) युद्ध काल की रूसी कवयित्री।

कभी तो होगा सवेरा

डेरिया व्लासिएवना, ओ मेरे पड़ोसी
आओ! कुछ देर बैठकर बात करें
अमन की, चैन की, राहत के दिनों की बातें करे
जिस अमन के लिए हम सभी बेक़रार हैं
जंग लड़ते हुए छह महीने बीत चले
छह महीनों की दहशत और खौफ लिए
देश तड़पता रहा, तड़पते रहे लोग
डेरिया, तुम तड़पते रहे और मैं भी
मायूसी से भरी रातें, दर्द भरी रातें
हरदम खौफ फैलाती बम की आवाजें
भूख की ज्वाला और जिंदा जलते लोग
राशन की रोटी के टुकड़ों के लिए लोगों की तड़प
गुलामी की जंजीरों के साथ जीते रहे इतने दिन
करते रहे हर पल मौत का इंतजार
साथी! मन में हलचल मची रही है हमेशा
क्या है ताकत, क्या है नफरत, क्या है मोहब्बत!
कई बार मन में उलझन रही
कि सारा जुनून फीका पड़ गया
‘क्या मुझे हिम्मत है? क्या मैं लड़ सकता हूँ?’
‘हाँ, तुममें है हिम्मत, तुम लड़ सकते हो
आखरी दम तक लड़ते जाओ’
डेरिया व्लाासिएवना, रुक जाओ जरा
अंततः वह दिन फिर आएगा
जब जीत की शहनाइयां गूंज उठेंगी
ग़म की दीवारें टूटने लगेंगी
आग की लपटें फीकी पड़ जाएंगी
जंग का अहंकार चूर-चूर होगा
पैरों की जंजीरें तोड़ डालेंगे हम
हर अंधेरी रात का सवेरा होगा
शहर में दिवाली मनाएंगे हम
पतझड़ का अंत और बहारों का मौसम आएगा
शांति से आंसू बहाएंगे आहिस्ता मुस्कुराएंगे और
जी भरकर अमन का आनंद उठाएंगे
अपनी उंगलियों से ताजा रोटियां बनाएंगे
स्वादिष्ट रोटियां, कुरकुरी और अच्छी खासी
लाल चमकते-दमकते गिलासों में
एक-दो घूंट शराब भी पिएंगे ऐश के साथ
और तुम्हारे लिए, तुम्हारा तो बुत बनाएंगे
बोलशोई स्क्वायर करेंगे तुमपर कुर्बान
सख्त इस्पाती बुत होगा तुम्हारा
और तुम्हारे उस नायाब रूप की करेंगे इबादत
जैसे कि तुम पहले थे निर्भीक निडर
दुनिया थी तुम्हारे जज्बे की दीवानी
डर और गुलामी की अंधेरी रातों में भी
तुम्हारी आंखों में उम्मीद की चमक झलक रही थी
डेरिया व्लासिएवना तुम्हारी उम्मीद की चिन्गारी ही
एकदिन पूरी दुनिया के सीने पर शमा जला देगी
उम्मीद की उस चिंगारी का नाम होगा रूस
उसी तरह डटकर खड़े रहना है
जैसे यह देश हमेशा रहता है।

अंग्रेजी से अनुवाद :रेशमी सेन शर्मा
युवा लेखिका और अनुवादक।विभिन्न पत्रिकाओं में अनूदित कविता प्रकाशित।

रेशमी सेन शर्मा,136,मेट्रोपोलिटन को -ऑपरेटिव सेक्टर-ए, कोलकाता-700105 मो.8902711026