
प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।
इधर अंग्रेजी की दो पुस्तकों ने ध्यान आकर्षित किया है। पहली है रामचंद्र गुहा की द कुकिंग ऑफ बुक्स : अ लिटरेरी मेमॉएर (हिंदी अनुवाद : सामने आते ही नहीं) । दूसरी है अरुंधती राय की मदर मेरी कम्स टु मी। दोनों पुस्तकें संस्मरण विधा की हैं। इन्हें पढ़ने से ऑक्सीजन लेवल में सुधार होता है।
आधुनिक हिंदी लेखन में संस्मरण विधा को अज्ञेय से अखिलेश तक ने ऊंचाइयां दी हैं। संस्मरण वह है जहां लेखक अपने अनुभव और स्मृति को समेटता है। इसमें समय समाज और परिवेश प्रमुख नायक होते हैं। पाठक अपने को इन्हीं से कनेक्ट करता है।
संस्मरण में लेखक निजी को सार्वजनिक करते हुए सामाजिक दस्तावेज तैयार करता है। साथ में उसका निजी जीवन प्रकट होता चलता है। वह वर्तमान को बीते समय और बीते समय को वर्तमान के संदर्भ में परखता चलता है।
संस्मरण आत्मीयता और लगाव का नरम पाक है, बंगाल की ‘जलभरा संदेश’ मिठाई की तरह! संस्मरण ऐसी मिठाई है जिसकी भाषा में बूंद भर शहद होता है। संस्मरण पढ़ना सुखकर है। जरूरी नहीं कि संस्मरण की हर पंक्ति के बीच में शहद की बूंद हो, वहां टीस और दर्द भी होते हैं। इसमें बहुत सारी वे बातें उद्घाटित होती हैं जो नितांत व्यक्तिगत दायरे में कही, सुनी और अनुभव की गई होती हैं।
महाकवि निराला ने कभी कहा था, ‘निराला इज डेड’। अज्ञेय ने इसे अपने संस्मरण में दर्ज किया है। निराला ने यह तब कहा था जब अज्ञेय और शिवमंगलसिंह सुमन मिलने गए थे उनके घर। इस संस्मरण से जानकारी मिलती है कि निराला ने अपना कौन-सा काव्य संग्रह उन्हें अंग्रेजी में लिखकर भेंट किया था।
अमृतलाल नागर ने रामविलास शर्मा को केंद्र में रखकर एक संस्मरण लिखा। इस संस्मरण में निराला के साथ-साथ कई और दोस्त हैं। रामविलास को बीए की पढ़ाई करते समय ही निराला ने उन्हें डॉक्टर कह कर बुलाना आरंभ कर दिया था। अमृतलाल नागर की कलम से पता चलता है कि बैसवाड़े के रामविलास के स्वभाव के तीखेपन का रहस्य क्या है। नागर जी ने लिखा है, ‘सेर के जवाब में यदि वे (रामविलास) सवा सेर फेंकते (तर्क) तो शायद इतने बदनाम कभी न होते, लेकिन सेर पर ढैया, पसेरी या दससेरा बटखरा खींच मारना रामविलास का स्वभाव है। बैसवाड़े के लोग बड़े अक्खड़ जबर्दस्त लट्ठमार होते हैं- विलास हैं तो ठेठ बैसवाड़े के।’ अमृतलाल नागर जी ने जो लिखा है, वह संस्मरण जैसी विधा में सजीव रूप में है।
यशपाल गांधी से सेवाग्राम में मुलाकात करने गए थे। मकसद था गांधी को ‘भगवान के फंदे से छुड़ाना’। यशपाल के लिखे संस्मरण में संस्मरण का फ्लेवर कम है। इसे रिपोर्ताज कहना अधिक समीचीन है। संस्मरण एक ऐसा लेखन है जिसमें कई विधाओं का फ्लेवर एकसाथ मिल सकता है। यशपाल का यह लेखन-अंश सेवाग्राम में गांधी से ऐतिहासिक मुलाकात का है। यहां गांधी के विचार और अपने विचार को यशपाल ने तराजू को बिना अपनी ओर झुकाए लिखा है।
संस्मरण में पाठक को वह मिलता है जो सहज ही किसी और पुस्तक या आलेख में नहीं मिलता। संस्मरण इसीलिए खास है कि यह बहुत हद तक प्रामाणिक होता है। संस्मरण लेखक अगर सारा फोकस अपने आप पर रखता है तो वह संस्मरण को बरगला रहा होता है। रामचंद्र गुहा ऐसे संस्मरण को ‘मूव्ड बाई मायसेल्फ’ कहते हैं।

अरुंधती राय की नवीनतम कृति ‘मदर मेरी कम्स टू मी’ है। आम धारणा है कि संस्मरण सीक्रेट खोलने वाली प्रामाणिक विधा है। है, मगर ध्यान रहे कि यह रचनात्मक विधा भी है। संस्मरण कथा साहित्य का तथ्य-आधारित विस्तार है। यह अदालत में पेश किया जाने वाला किसी वकील का तैयार किया हुआ दस्तावेज नहीं है। संस्मरण में लेखकीय योजना और कुछ हद तक कल्पना की जरूरत पड़ती है। वह अभिप्रायपरक विधा है।
इस कृति में मिसेज राय हैं, इन्हें मदर मेरी के रूप में पेश किया गया है। आवश्यक नहीं है कि अरुंधती राय की मां का वास्तविक नाम मेरी ही हो। संभव है मदर मेरी की छाया में उन्होंने अपनी मां को ही देखा हो।
ईसाई समाज में मदर मेरी का एक सांस्कृतिक संदर्भ है। इन्हें वर्जिन मेरी के रूप में भी देखा जाता है। वर्जिन मेरी ईसा मसीह की मां है। वर्जिन मेरी के अविवाहित संभोग से ईसा पैदा हुए थे। वर्जिन मेरी दया, करुणा और संवेदना की प्रतीक हैं। मदर मेरी को दिव्य मातृत्व,स्मृति और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।
अरुंधती राय ने अपनी कृति का नाम आठवें दशक के एक प्रसिद्ध पॉप गीत से लिया है, पंक्ति है, ‘ह्वेन आई फाइंड मायसेल्फ इन ट्रॉबुल, मदर मैरी कॉम्स टू मी’। यह बीटल्स की ‘लेट इट बी’ की पंक्ति है। यह शांति, स्वीकृति और विश्वास देने वाला गीत माना गया है। पॉप संगीत के इतिहास में यह एक प्रभावशाली प्रतीकात्मक और भावनात्मक पंक्ति है। इस पंक्ति में निहित है कि जीवन में जब-जब परेशानी और संकट के दौर आते हैं, मदर मेरी आ जाती हैं। इस कृति की ‘मैं’ को भी अपनी मां की याद ऐसे अवसरों पर आती रहती है, ‘अब वह मुझसे अक्सर मिलने आती है – गुस्से में नहीं, बल्कि हवा के रूप में।’
मिसेज राय का समय वह है जब भारत सामंती दौर को चिटका कर आधुनिक हो रहा था। ठीक आजादी के बाद का समय है यह। मिसेज राय अपने व्यक्तित्व की तलाश में हैं। वे अपनी एक दुनिया बनाती हैं, अपना प्रभाव पैदा करती हैं। अपनी दुनिया ऐसी बनाती हैं कि किसी दूसरे द्वारा दखल के लिए जगह नहीं है उसमें। एक स्तर पर कुछ हद तक इंदिरा गांधी जैसा। अरुंधती राय लिखती हैं, ‘मेरी मां एक दुनिया बनाना चाहती थीं लेकिन उनकी दुनिया में किसी और इच्छा के लिए जगह नहीं थी।’
मिसेज राय ने अपने पति को छोड़ा। यह घटना 1950-60 के दौर की है। उस जमाने में यह विद्रोही कदम था, एक परिवर्तनगामी कदम भी। मिसेज राय का यह प्रसंग मोहन राकेश की पहली पत्नी की याद दिलाता है, कालखंड भी वही है। इस संस्मरणात्मक कृति का कालखंड बीसवीं सदी के सातवें दशक से इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक फैला हुआ है। मिसेज राय का निधन 2022 में हुआ है। गौर करने की बात है कि मिसेज राय शुरू से अंत तक दमा से पीड़ित रही हैं। इसे ऐसे पढ़ा जाना चाहिए कि मिसेज राय शुरू से अंत तक जिस वातावरण और हवा में जी रही थीं, वह निर्वाध सांस लेने और जीने के अनुकूल नहीं था। हवा अपने अनुकूल बनाने के लिए अपने पति को छोड़ अपने दोनों बच्चों के साथ निकल पड़ी थीं।
मिसेज राय ने तिनका-तिनका जोड़ कर एक स्कूल बनाया। यह स्कूल आरंभ में एक गैरेज से अपने दोनों बच्चों समेत सात बच्चों से शुरू होता है। यह स्कूल अंततः उस ऊंचाई पर पहुंचता है कि शिशु के पैदा होने के पहले ही माता-पिता उसके लिए स्कूल में दाखिले की अर्जी करते हैं!
मिसेज राय ने स्कूल कैंपस के लिए जैसी जमीन तलाशी और निर्माण की जो पद्धति अपनाई, वह रवींद्रनाथ ठाकुर की याद दिलाती है। मिसेज राय का नवनिर्माण यह बताना भी है कि भारत को मिली आजादी का फल शिक्षा से हासिल किया जा सकता है। गांधी से प्रभावित आर्किटेक्ट से निश्चित रूप से अरुंधती राय भारत के लिए अनुकूल अर्थनीति भी तजवीज कर रही हैं। लेकिन आजादी के बाद नए भारत की रचना अंग्रेजी में हो रही थी, यह एक बड़ी वास्तविकता है।
मदर मेरी उर्फ मिसेज राय का दूसरा पक्ष स्कूल के बच्चों और अन्य लोगों के प्रति परवाह रखना है। अपने इस व्यवहार के विपरीत वे अपने दोनों बच्चों – संस्मरण का मैं और उसका भाई-के प्रति क्रूर बरताव करती हैं। इस कृति में दोनों अपनी मां के उदासीन और क्रूर व्यवहार से पीड़ित हैं। वे इस हद तक पीड़ित हैं कि उनकी अपनी मां उनके लिए मिसेज राय में तब्दील हो जाती हैं। अरुंधती राय ने लिखा है कि वे केवल दो भाई-बहन नहीं थे, एक तीसरा भी था। वह सबसे छोटा था। मां सबसे ज्यादा केयर उसका करती थीं। वह था स्कूल। यह स्कूल से नए भारत की रचना का जो भाषाई मॉडल है वह रवींद्रनाथ के मॉडल के विपरीत है।
अरुंधती राय अपनी मां की ओर से किए गए अपमान और अवहेलना के दंश को झेलती रहती हैं। वे अपने बेटे को पितृसत्ता के संदर्भ में देखती हैं तो बेटी को अपनी सत्ता के समानांतर! इसके बावजूद उनका कथन है, ‘मां ने मुझे गढ़ा भी और खंडित भी किया।’ वह स्वीकार करती हैं कि उनकी मां ने उन्हें यह समझ दी कि आर्थिक और मानसिक आत्मनिर्भरता से सम्मान हासिल किया जाता है। अरुंधती ने अपनी मां के बारे में कहा, ‘शी वाज माई शेल्टर एंड स्टॉर्म’! मां की कठोर बंदिशें बेटी के भीतर विद्रोह पैदा कर रही थीं, उसे अशांत कर रही थीं। उन्हें लग रहा था कि मां के साए में अगर वह और रहीं तो वह अपनी मां को प्यार नहीं कर सकेगी। नतीजतन वह अपनी मां के साए से बाहर हुईं।
वे लिखती हैं कि मेरी उम्र की लड़कियां अपने माता-पिता के साथ रहती थीं या शादी-शुदा होती थीं, वे बेघर जिंदगी नहीं जीती थीं। मगर जो लड़कियां इस स्थिति से ऊब या थक चुकी थीं, वे मुक्त हो रही थीं और सामने आ रही थीं। अरुंधती राय एक ऐसी ही लड़की हैं।
उनकी केरल से दिल्ली के लिए रवानगी हुई। दिल्ली वस्तुतः अरुंधती के लिए आत्म संधान की यात्रा रही। नियंत्रण से बाहर निकलकर अपना मत बनाने और उसे प्रकट करने की अभ्यासशाला बनी दिल्ली। अरुंधती दिल्ली से गोवा जाती हैं। यह उनकी जिंदगी का संक्रमण काल है, जब वे अपने एक मित्र के साथ दांपत्य जैसा जीवन जीती हैं, मगर वे उसे छोड़कर दिल्ली लौट आती हैं। उन्होंने लिखा है, ’मेरे जैसी बंजारा मिजाज की लड़की के लिए यह बेहतरीन अवसर था दोस्ती के लिए। दोस्ती मेरे लिए वह पतवार थी जिसके सहारे मैं सागर पर यात्रा कर रही थी। दोस्ती मेरे लिए वह ध्वज थी जिसे मैं फहरा रही थी, इस कृति में मैं यानी अरुंधति राय की निजी जिंदगी और लेखकीय यात्रा का खुलासा है।
यह कृति स्त्री-स्वतंत्रता, धर्म, पितृसत्ता, असमानता और राष्ट्रवाद के प्रश्नों से टकराती है।
मेरे लिए हर निजी उपलब्धि के साथ एक अनिष्ट की भावना जुड़ी रहती है। जब भी मेरी प्रशंसा होती है या मुझे सराहा जाता है, मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि कहीं कोई दूसरा व्यक्ति निःशब्द दूसरे कमरे में पिट रहा है। अगर तुम रुककर इसपर सोचो, तो यह सच है। ऐसे अवसर पर सचमुच कोई न कोई पिट रहा होता है। (मदर मेरी कम्स टु मी)

रामचंद्र गुहा ने लिखा है, ‘कई मायनों में संस्मरण एक विलुप्त हो चुकी दुनिया का दस्तावेज है।’ रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘द कुकिंग ऑफ बुक्स : अ लिटरेरी मेमॉएर’ एक अनूठी पुस्तक है। इस पुस्तक का अनुवाद हृदयेश जोशी ने किया है।
लेखक ने अपनी इस पुस्तक के बारे में बताया है कि जहां तक मैं जानता हूं,एक संपादक और लेखक के बीच के संबंधों पर कभी कोई पुस्तक नहीं लिखी गई – कम से कम अंग्रेजी में। हिंदी में ऐसी किताब के बारे में सोचने की स्थिति ही नहीं है। हिंदी लेखन जगत में संपादक रखने की परिपाटी नहीं है। इसे निंदाजनक माना जाता है। हिंदी की हर कृति एक संपादनविहीन कृति होती है।
अंग्रेजी के हर लेखक की पुस्तक में विशेषज्ञ संपादक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अंग्रेजी का उपन्यास हो या समाजविज्ञान की कोई किताब, वह दोहरी बौद्धिक प्रक्रिया से गुजर कर पाठक तक पहुंचती है।
अंग्रेजी में संपादकीय कार्यप्रणाली के बारे में रामचंद्र गुहा लिखते हैं, ‘संपादकीय कार्यप्रणाली में बढ़ती विशेषज्ञता व्यापार के लिए बड़े काम की चीज साबित हुई है। इससे संपादन का काम शीघ्रता से होने लगा है जिसका नतीजा प्रकाशन में मुनाफे के रूप में बढ़ता गया। ऐसे लेखकों के लिए यह इतना प्रसन्न करने वाली बात नहीं है, जिनको अपना सर्वश्रेष्ठ प्रकाशक तय करते वक्त एक ऐसा निपुण कॉपी एडिटर मिलने की भी चिंता रहती है जिसपर वह भरोसा कर सके उसकी पांडुलिपि में सही काट-छांट करे या विस्तार दे और उसे निपुणता के साथ चमकाए।’ हिंदी की किसी कृति को किसी और ने अगर चमका दिया हो त़ो लेखक इस अपना मान-सम्मान खोना समझता है।
रामचंद्र गुहा का लेखन अंग्रेजी का है। एक योग्य और निपुण संपादक उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी। उन्होंने लिखा है, ‘मैं भाग्यशाली था कि मुझे ऐसा प्रकाशक-संपादक मिला, किसी संभावित या भावी पुस्तक पर जिसकी सलाह को मैं बड़ा महत्व देता देता था। एक बार पांडुलिपि तैयार हो जाने के बाद वही व्यक्ति मेरी पुस्तक का बड़ा ही सजग और निपुण कॉपी एडिटर भी होता था। इन मायनों में रुकुन के साथ मेरे रिश्ते, जो अब चालीस साल से अधिक पुराने हैं, कोई ऐसा सप्ताह नहीं बीतता कि हमारे बीच ई-मेल पर लंबी वार्ता न होती हो, बड़े नायाब रहे हैं। लेखन और प्रकाशन की जिस बदली हुई दुनिया में हम जी रहे हैं, उसे देखकर मुझे नहीं लगता कि ऐसा रिश्ता किन्हीं दो लोगों के बीच फिर दोहराया जाएगा।’
जाहिर है, नई ‘नई दुनिया’ में रिश्ते नहीं बच रहे हैं, न लंबे रिश्ते बनते हैं। नए जमाने में अगर सूरज निकलने से रिश्ते बनते हैं तो चांद निकलते ही रिश्ते दम तोड़ देते हैं।
रामचंद्र गुहा की इस किताब में उनकी और रुकुन आडवाणी की जज्बाती दोस्ती की दास्तान हैं तो प्रोफेशनल रिश्ते की कहानी भी है। अगर उनके बीच वैचारिक सहमति हैं तो वैचारिक द्वंद्व भी हैं। साथ ही दोनों की निजी जिंदगी के कुछ अंश भी हैं। रुकुन का संपादकीय संघर्ष और रामचंद्र गुहा के लेखकीय संघर्ष का विवरण भी है। इसीलिए इस पुस्तक का नाम ‘द कुकिंग ऑफ बुक्स’ सही रखा गया है।
इन दोनों की दोस्ती की एक महत्वपूर्ण वजह है, रुकुन और मैं दोनों नेहरूवादी भारतीय’ थे, ऐसे इंडियन जिनके माता-पिता भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रशंसक थे। … नेहरूवादी होने का मतलब जरूरी नहीं है कि आप कांग्रेस के समर्थक हों बल्कि इसका तात्पर्य होता है- सोच और व्यवहार में इंसान क्षुद्र क्षेत्रीय भेदों से परे जाना चाहता है और इसका मतलब यह भी है कि लैंगिक सवालों को लेकर आपका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत प्रगतिशील हो। दूसरे रूढ़िवादी परिवारों से अलग, बेटियां और बेटे दोनों ही कॉलेज जाएं और चिकित्सक या विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर बने। नेहरूवादी भारतीय ऐसे आधुनिकतावादी थे जिनकी भारत को बदलने और ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की शक्तियों में बड़ी आस्था थी। हमने धर्म और अनुष्ठानों की कभी निंदा नहीं की, भले हम स्वयं यह सब न करते हों।’
रामचंद्र गुहा ने वेरियर एल्विन की जीवनी लिखी है। गुहा यह जीवनी एक बार में नहीं लिख पाए। चौथी बार लिखने पर यह अंतिम रूप में आया। इसके पीछे गुहा के संपादक रुकुन आडवाणी से निरंतर मिलने वाली सलाह थी।
गुहा की आत्म स्वीकृति है, ‘वेरियर एल्विन की जीवनी का पहला ड्राफ्ट लिखने में मुझे एक नहीं बल्कि तीन साल लगे। मेरे संपादक ने मुझे गहन और विस्तृत बदलाव के लिए कहा। असल में रुकुन ने मुझसे जो कहा उसका मतलब यह था मैंने जो लिखा है उसे फाड़कर फेंक दूं और पूरी किताब फिर से लिखूं!’ अपने संपादक की सलाह पर गुहा ने दोबारा लिखा और रुकुन को ड्राफ्ट भेज दिया। इस ड्राफ्ट पर हर जगह हरे रंग की स्याही से बने निशानों के साथ यह वापस आया। इस पर आखिरी कमेंट था, ‘एल्विन के एक अध्येता और बुद्धिजीवी के तौर पर यह ठीक है। एल्विन इसमें इंसान के तौर पर कहां है?’ स्पष्ट था कि अभी जीवनी बनी नहीं है!
रामचंद्र गुहा ने दिसंबर 1996 में रुकुन को एक पत्र में लिखा, ‘मैं एल्विन की जीवनी एक बार फिर से लिख रहा हूँ। आपके सुझावों को ध्यान में रखते हुए।’ गुहा ने अप्रैल 1977 में अपनी पांडुलिपि को अंतिम रूप दिया और रुकुन आडवाणी को फिर से भेज दिया। गुहा लिखते हैं, उन्होंने पांडुलिपि पढ़ी और अंतत: स्वीकार किया, ‘यह एक शानदार ड्राफ्ट है’ लेकिन फिर नए सुझावों के साथ एक बार फिर से मुझे काम पर लगा दिया।
काश हिंदी में लिखी किताबों की दुनिया में भी यही दृश्य होता! हिंदी का लेखक भी इतना अनुशासित और धीरज वाला होता। हिंदी के एक लेखक ने धीरज के साथ बारह साल लगा कर ‘आवारा मसीहा’ लिखा था। वह कोई और जमाना था जब ‘टू मिनट्स नूडल्स’ की तरह हिंदी में किताबें नहीं लिखी जाती थीं।
रुकुन ने गुहा को लिखा था: मेरा मानना है कि किसी लेख को चुनते वक्त यह देखना जरूरी है कि (अ) वह तत्व और विचार के हिसाब से कितना गहरा है; (ब) निबंध की पठनीयता और स्टाइल कितनी अच्छी है। अगर आप और मैं हर लेख को इन पैमानों पर परखें और वह दोनों ही कसौटियों पर खरा उतरता है तो उसे पुस्तक में ले लेना चाहिए।’
इस पुस्तक के संदर्भ में रामचंद्र गुहा का यह पैरा पढ़ना मुनासिब रहेगा :
‘रुकुन और मेरे बीच साहित्यिक और राजनीतिक मामलों में कुछ गंभीर मतभेद रहे हैं और आने वाले पृष्ठों में आपको यह विवरण पढ़ने को मिलेगा। साथ ही, इस पुस्तक में साहित्य और समाज विज्ञान से जुड़े बड़े सवालों को भी जगह दी गई है, जैसे कि पुस्तकों और लेखकों को ढालने में संपादकों की भूमिका, इतिहास लेखन का शिल्प और जीवनी लेखन की कला, भाषा और आचरण में शुचिता के विषाणु के कारण हुआ मानवतावादी विद्वतापूर्ण लेखन का क्षय, और … हम दोनों बूढ़े हो रहे हैं, के समय तक सार्वजनिक विमर्श में हुआ बदलाव।’
दोनों पुस्तक हिंदी लेखकों को यह सीख देती प्रतीत होती है कि संस्मरण अभिप्रायपरक विधा है, केवल अपने को उल्लेखनीय बनाने का माध्यम नहीं है।
मैं खुद को एक देशभक्त के रूप में देखता हूँ। मैं नौकरशाहों के परिवार से था और गांधी के जीवनी–लेखक के रूप में मैंने निश्चित रूप से भारत की धारणा को समझा था।… मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि ‘भारत की धारणा’ जो 1950 में अपनाए गए संविधान की आत्मा थी, हाल के वर्षों में विकृत हुई है, फिर भी उम्मीद है कि यह पुनर्जीवित की जा सकती है और अमल में लाई जा सकती है। (द कुकिंग ऑफ बुक्स : अ लिटरेरी मेमॉएर)
सी–11.3, एनबीसीसी विबज्योर टावर्स, न्यू टाउन, कोलकाता–700156, मो.9433076174


