
प्रबुद्ध लेखक, रंगकर्मी और संस्कृतिकर्मी।
21वीं सदी में हिंदी कथा साहित्य के प्लैनेट पर स्त्रियों ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। अपनी प्रतिरोधात्मकता और रचनात्मकता से और अपने संख्या-बल से भी। पेरिस की सिमोन द बुआ का प्रसिद्ध कथन है, औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है यह धारणा विचार क्षेत्र में 20वीं सदी में आई। नई स्त्री की प्रतिरोधक ऊर्जा तेजी से 21वीं सदी में विस्तार पा रही है। 21 वीं सदी में स्त्री कथाकारों ने अपने होने और अपनी आवाज का खूब एहसास कराया है। इन्होंने बेआवाजों की आवाज बनकर अपना स्वर मुखर किया है।
किसी समय केवल पात्र और विषय बनी रही स्त्रियों ने साहित्य की स्टियरिंग अपने हाथों में ली। वे खुद पात्रों की रचना करने लगीं। उनकी रचने की रेसिपी अपनी-अपनी थी। इंग्रेडिएंट था उनका जीवन अनुभव। स्त्री कथाकारों का ध्यान तत्व पर रहता था। वह तत्व था उनका जीवन-संघर्ष। मन्नू भंडारी से मनीषा कुलश्रेष्ठ तक की नजर तत्व पर रही है। वे केवल पितृसत्ता को चुनौती देने तक सीमित नहीं रहीं है। अपने जीवन की जटिलताओं को अपनी कहानियों में खोलने के साथ उन्होंने ‘पितृसत्ता को चुनौती’ को भी अपना एक बड़ा पड़ाव अवश्य बनाया। यहां वह स्त्री-दृष्टि पैदा हुई जिसने स्त्री कथाकारों के क्षितिज का विस्तार किया। हिंदी कहानी के एक दौर में क्षितिज के एक ध्रुव पर निर्मल वर्मा थे तो दूसरे छोर पर फणीश्वरनाथ रेणु थे। आज हिंदी कहानीकारों काइसके समानांतर एक नया क्षितिज देखा जा सकता है।
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‘स्त्री लेखन ने आज नए विमर्शों को जन्म दिया है। धर्मसत्ता की पड़ताल की है। वर्जनाओं की जड़ें खोदी हैं। पितृसत्ता के किले ढहाए हैं और समतामूलक मूल्यों की स्थापना की है। |
पूनम सिंह ने अपनी संपादित पुस्तक ‘रौशनी के दरमियां’ की भूमिका में लिखा है, ‘स्त्री रचनाकारों ने जाति, धर्म, वर्ण, नस्ल से जुड़ी हिंसाओं को लेकर देश विभाजन, विस्थापन, पर्यावरण, भूमंडलीकरण जैसी जमीनी सच्चाइयों से जुड़े मुद्दे को भी अपनी लेखनी का उपजीव्य बनाया है। धार्मिक क्रूरता और सामाजिक संरचना ने स्त्री को दोयम दर्जे की नागरिकता देकर हमेशा पितृसत्ता के अधीन रखा, जिसे लेकर स्त्री रचनाकारों ने विचार और चिंतन की कई खिडकियां खोली हैं। ‘उपनिवेश में स्त्री’ (प्रभा खेतान), ‘औरत औरत के लिए’ ( नासिरा शर्मा ), ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’ (अनामिका), ‘सुनो मालिक सुनो’ (मैत्रेयी पुष्पा), ‘हम सभ्य औरतें’ (मनीषा कुलश्रेष्ठ), ‘स्त्री विमर्श, समाज और साहित्य’ (क्षमा शर्मा), ‘स्वप्न और संकल्प’ (रोहिणी अग्रवाल), ‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ (कात्यायनी) और ‘सपनों की मंडी’ (गीता श्री) आदि ऐसी कृतियां हैं जो स्त्री के वैचारिक क्षितिज को एक बड़ा आयाम देती है।
स्त्री कथाकारों ने सांप्रदायिकता को भी अपनी कहानियों में विषय बनाया है। यह कहानी संग्रह विभिन्न लेखिकाओं की इसी विषय पर केंद्रित कहानियों का संकलन है। स्त्री कहानीकारों ने हिंदू-मुस्लिम संबंध की जटिलताओं की परतें खोलने के लिए प्रेम संबंध और विवाह को अपनी कहानी का एक मुख्य उपकरण बनाया है। इनमें दो भिन्न धर्म में जन्मे और पले-बढ़े लोगों के बीच उपजे प्रेम और विवाह के माध्यम से दोनों समाजों के आंतरिक गठन का खुलासा हुआ है। यह भी देखने को मिलता है कि ऐसे अवसर पर व्यवस्था और सत्ता का व्यवहार किस हद तक समाज और शांति के स्वास्थ्य के प्रतिकूल होता है। दोनों धर्मों और समाजों में औरतें हैसियत के किस पायदान पर खड़ी हैं, यह भी स्पष्ट हुआ है।
सामान्यतः पात्रों की पहचान उन परिस्थितियों से बनती है जिनमें कहानीकार उन्हें रचता है। इस संकलन में शामिल स्त्री कथाकारों के ऐसे अनेक पात्र हैं जिनकी वजह से वे अलग से जानी जाती हैं।
स्त्री कथाकारों की सांप्रदायिकता विषयक कहानियों के कुछ पात्रों से रू-ब-रू होना लाजमी है। एक है रेहान। रेहान वह है जो नुक्कड़वाली पंचूरिया की दूकान वाले राम खेलावन की बेटी को अगवा करके ले गए लोगों से बचाया। जब रेहान से किसी ने कहा, ‘हिंदू लौंडिया के लिए मुस्लिम भाई पर हाथ उठाओगे?’ रेहान ने जवाब में कहा, ‘मेरे जीते जी इस मुहल्ले में किसी जालिम औरंगजेब की पैदाइश नहीं हो सकती। तारीख दोबारा मेरे सामने नहीं दोहराई जाएगी।’ रेहान ने अपने यार परवेज को बताया, ‘जो शायर दिलों को काटने की बात करते हैं, इंसानी रिश्तों को तोड़ने की बात करते हैं, उनका अदब कोयला है जिसे छूकर हाथ काले होते हैं और दिमाग तारीक।’ इशारा मशहूर कवि-दार्शनिक इकबाल की तरफ है। यह रेहान नासिरा शर्मा की कहानी ’सरहद के पार ’का एक दिलचस्प किरदार है।
अब रेहान के दर्द पर नजर डालें : ’मारो साले हिंदुओं को , गले दबा दो इनके, साले कहते हैं कि तुम पाकिस्तानी हो। जाकर पूछो इनसे, तुम्हारे बाप-दादा कहां हैं? मेरे बाप-दादा इसी धरती के आगोश में गड़े हैं। सबूत चाहिए तो जाकर देखो हमारे कब्रिस्तान, सब के सब मौजूद हैं वहां -खुद गद्दार हैं और हम पर इल्जाम लगाते हैं … नौकरी न देने का अच्छा बहाना ढूंढ़ा है। नारायण जी का जुमला रेहान को नश्तर-सा चुभता है, ‘रहते हैं हिंदुस्तान में, मगर सपने देखते हैं पाकिस्तान के।’
एक दूसरी कहानी में दो पात्र हैं। एक जफर और दूसरी गरिमा। लेखिका का लक्ष्य इन दो पात्रों के माध्यम से उन स्थितियों से साक्षात्कार कराना है जो दोनों के बीच प्रेम संबंध की वजह से उनके भाग जाने पर बनती हैं। लेखिका ने लड़की के पिता और भाई के व्यवहार पर फोकस किया है। हिंदू संगठनों और मीडिया के व्यवहार को दर्शाया है। किसी उद्घाटित तथ्य पर कहानी लिखी जा सकती है ,मगर लेखक या लेखिका को यह चुनौती लेनी होगी कि पाठक को लगे कि उसके अनुभव में कुछ इजाफा हुआ है। लेखिका ने अपना दर्द इस रूप में लिखा है, ‘उनकी बातों का कुल यह अर्थ था कि ऐसी लड़कियां (गरिमा जैसी लड़कियां) परिवार, समाज और जाति की नाक कटवा देती हैं… इनको तो सात परदों के पीछे रखना चाहिए… तथाकथित समाज सुधारकों ने फरमान जारी कर दिया था कि फिलहाल लड़कियों को बाहर निकलना बंद कर देना चाहिए। अभिवावकों को कहा जा रहा था कि वे अपनी लड़कियों को मोबाइल, स्कूटर न दें। उन्हें घर से अकेला न जाने दें। को-एड स्कूल और कालेज में न भेजें। यानी अब शहर में खुली सड़कों की नहीं, बाग-बगीचों की नहीं, बाजार और हाटों की नहीं, मेलों और उत्सवों की नहीं, कस्बाई बाड़ों की संख्या बढ़ाई जाए। दोस्तों को नहीं, पहरेदारों को तैनात किया जाए …वैलेंटाइन डे की तरह हर दिन को सख्त पहरे और डंडे के साए में बीतने दिया जाए …फूल खरीदती मुस्कराती लड़कियों और लड़कों के हँसते और मुस्कुराते चेहरे पर कालिख पोती जाए।’ एक दूसरा अंश देखें जो कहानी के अंत में दर्ज है, ‘एक एरिया विशेष की झुग्गी बस्ती में आग लगा दी गई थी, जिसमें सैकड़ों परिवार बेघर हो गए थे, सैकड़ों लोग झुलस गए थे… और ये वे लोग थे जिनका न जफर के परिवार के साथ कोई संबंध था, न गरिमा के परिवार के साथ… पर हमेशा की तरह उन्हें अपनी जान और माल की कीमत चुकानी पड़ी थी।’ जाहिर है लेखिका उनकी जुबान बनी हैं जो बेजुबान हैं। यह कहानी है उर्मिला शिरीष की ‘अंगारों की हँसी’।
भारती कलारिन से आपकी मुलाकात होनी ही चाहिए। भारती ने अपने परिचय में जो कहा है, वह है, ‘हम तो लंठ औरत हैं दुबे जी! टोटल! औरतन के मुंह से पानी की नाईं गाली निकले तो लोग मुहं बा के सुनते हैं। हां, तो विरोधी पार्टी की एमसी बीसी करनी हो, आपके नेता के जन्मदिन पर, ‘लग जा तोहें उमर हमारी, हो रज्जा अबकी पहिया की बारी’ टाइप के गाने पर नाभि में नथुनी पहन के आईटम डांस देना हो, याकी अस्पताल में किसी कार्यकर्ता के बाप की टट्टी-पेशाब धोनी हो … चाहे किसी के लिए अपना एकाध बोतल खून चपवाना हो… सौ काम को एक नाम – भारती कलारिन।’ इसी भारती कलारिन को पहिया पार्टी के वफादार शिवेंद्र जेल में बंद पार्टी सुप्रीमो अरिमर्दन के पास ले जाते है। अरिमर्दन और भारती की बातचीत का जायजा लीजिए :
‘तेरा नाम?’ अरिमर्दन ने पूछा। -भारती कलारिन! जैसे विजय लक्ष्मी पंडित… प्रज्ञा ठाकुर… सोनल राजपूत वैसे हम हुए भारती कलारिन!… अरिमर्दन मेरी (भारती) ढिठाई पर मुस्कराया ओर बोला शिवेंद्र इसे बहुत बड़ी नेता बनाना है।
इसी कहानी में एक दूसरी पात्र दीदी है। दीदी और भारती की बातचीत का एक छोटा-सा अंश कितना कुछ कहता है- ‘दीदी जी ने अपने कमरे का दरवाजा बंद किया। मुझे प्रेम से बैठाकर कहा- तुम मेरी छोटी बहन हो। इसलिए सावधान कर रही हूँ। मेरे पति (अरिमर्दन) कहते हैं- मैं जिस औरत को आंख उठा कर देख लूं वो मेरे बिस्तर पर सोती है और जिस आदमी को आंख उठाकर देख लूं वो चिता पर।’
-आपने तो प्रेम विवाह किया है?
-मैं खुद इस बात को भूल गई थी। तुम्हें किसने बताया?
-अरे वो… कौन-सी एकता… हां, कौमी एकता के लिए इस रिश्ते की चर्चा कर रहा था।
-झूठ ,सारे रिश्ते पॉलिटिकल हैं। मेरा आदमी बुजदिल हिंदुओं की महफिल में कहता है – देखो मैंने एक मुसल्ली को हिंदू बना दिया और जेहनी जड़ मुसलमानों के बीच कहता है- मैंने अपनी शरीके-हयात, मिल्कियत की मालकिन और अपने वारिसान की मां बनने के लिए आपके कौम की औरत को चुना।… मेरे बड़े दुख हैं। ये अरिमर्दन मेरी शायरी और जबान का दीवाना था। शादी के दो दिन बाद इसने मेरी बांह मरोड़ते हुए कहा कि मेरी बातचीत में उर्दू का एक भी लफ्ज आया तो वह मेरी जुबान खींच लेगा’। भारती कलारिन की कथा किरण सिंह की कहानी ‘यीशू की कीलें’ में है।
पूनम सिंह द्वारा संपादित संग्रह ‘रोशनी की दरमियां’ में उपर्युक्त के अतिरिक्त हैं: सुषमा मुनींद्र, रजनी गुप्त, जयश्री राय, गीता श्री, वंदना राग, प्रत्यक्षा, कविता, निवेदिता, प्रज्ञा,पंखुरी सिन्हा, वंदना गुप्ता और अर्चना पैन्यूली। इसके अतिरिक्त स्वयं पूनम सिंह भी हैं। इस पुस्तक में कुल सोलह कहानियां हैं जिनपर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।
पूनम सिंह ने स्त्री लेखन के संदर्भ में अपनी भूमिका में कहा है, ‘स्त्री लेखन ने आज नए विमर्शों को जन्म दिया है। धर्मसत्ता की पड़ताल की है। वर्जनाओं की जड़ें खोदी हैं। पितृसत्ता के किले ढहाए हैं और समतामूलक मूल्यों की स्थापना की है। जरूरत है उसके नैरेटिव को समझने की। आज स्त्री रचनाकार हर विषय पर लिख रही हैं। उनके लेखन में समकाल को परखने की दृष्टि है, जिसकी गुरुता और गहराई पर अगर आलोचना की तर्जनी उठती है तो इससे हमेशा लेखकीय संभावनाओं का विस्तार होता है। स्त्री कलम समय से आज सीधा संवाद कर रही है लेकिन स्त्री लेखन के लिए वाद-विवाद और संवाद का दरवाजा पुरुष आलोचकों द्वारा भी खुलना चाहिए।’ पूनम सिंह का यह कहना कि स्त्री रचनाकार हर विषय पर लिख रही है, कइयों को सच्चाई से दूर लग सकता है।

जिज्ञासा : यह संग्रह क्यों?
पूनम सिंह : धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता पर आधारित यह पुस्तक एक वैचारिक बहस की आंतरिक संगति के रूप में स्त्री कथा की छोटी सी मुनादी है। ‘वागर्थ’ अक्टूबर 2023 के अंक में एक युवा समीक्षक जीतेश्वरी ने धर्मसत्ता और पितृसत्ता को लेकर कुछ लेखिकाओं से वैचारिक संवाद स्थापित किया था, जिसमें मैं भी सम्मिलित थी। प्रश्नकर्ता का सीधा सवाल था- ‘स्त्री विमर्श की रचनाओं में अधिकतर स्त्रियों ने पितृसत्तात्मक समाज का विरोध किया है। क्या पितृसत्ता समाज के साथ-साथ उन्होंने इसके संरक्षक धर्मों को भी अपने विषय के भीतर लाने की कोशिश की है? क्या धार्मिक कट्टरता पुरुषसत्ता का संरक्षण करती है?’
निश्चित रूप से ऐसे सवाल स्त्री चेतना और अस्मिता विमर्श में सबसे अधिक विचारणीय हैं लेकिन एक छोटी सी परिचर्चा में इसका निदान समग्रता में नहीं ढूढ़ा जा सकता था। इसे विस्तार देने की जरूरत थी।
जिज्ञासा : फिलहाल स्त्री रचनाकार अपने समय पर कहां-कहां चोट कर रही हैं?
पूनम सिंह : स्त्री रचनाकार आज हर विषय पर लिख रही हैं। वे वर्जनाओं की जड़ें खोद रही हैं। उन्होंने विचार और चिंतन की कई खिड़कियां खोली हैं। स्त्री रचनाकारों ने अपने लेखन में केवल महलों और मध्यवर्गीय परिवारों में कैद स्त्री को ही नहीं आदिवासियों, दलितों, सदियों से उत्पीड़ित जनजातियों के शोषण और संघर्ष को भी विषय बनाया है। अपने समकाल को देखने समझने की उनकी अपनी दृष्टि है, जिसकी लघुता, गुरुता और गहराई पर खुलकर बात होनी चाहिए। आज पितृसत्ता, धर्मसत्ता और राजसत्ता का चेहरा एक हो गया है। धर्मसत्ता और राजसत्ता की दुरभिसंधि में राम रहीम जैसे अनगिन चेहरे स्त्रियों का भक्षण कर रहे हैं। शास्त्र-पुराणों द्वारा निर्धारित दर्ज स्त्री के धर्म-कर्म उसे आज भी गुमराह करते हैं।
यह संग्रह अपने छोटे से कलेवर में धर्म और शरीयत की गुंजलक में कैद स्त्री और धार्मिक कट्टरता तथा सांप्रदायिक उन्माद में हिंसक बनते जा रहे समाज का चेहरा दिखाकर अपना एक छोटा सा हस्तक्षेप दर्ज करता है।
जिज्ञासा : स्त्री कथाकारों को आलोचना में कितनी जगह मिलती है ?
पूनम सिंह : हमें यह कहने में गुरेज नहीं कि हमें मुक्त मन से नहीं पढ़ा जाता। आलोचना में आज भी हमारा लेखन लिंगानुग्रह से अभिशप्त है।
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शर्मिला समाज को बदलना जरूरी समझती है ताकि लड़कियों को लोग मान-सम्मान और इज्जत की दृष्टि से देख सकें। |
शर्मिला जालान पिछले पच्चीस वर्षों से अपनी लेखकीय सक्रियता से काफी शोहरत हासिल कर चुकी हैं। इनकी पहली कृति थी ‘शादी से पेशतर’। ताजा किताब है, ‘साख’। इस संग्रह में 18 कहानियां हैं। किसिम-किसिम के लोग हैं तो कहानियां भी किसिम-किसिम की हैं। जैसे एक हैं केसर बाबू। शर्मिला जालान ने बताया है, ‘केसर बाबू के पास अपने व्यवसायी जीवन के उतार-चढ़ाव की कहानियां हैं। उनके सफल होते जाने और उनके मित्रों तथा परिवार जनों के उनसे दूर होते जाने और उनके अकेलेपन की कहानी है। ‘शर्मिला अपनी कहानी में लोगों का स्केच बनाती हैं, उसी तरह समय का स्केच भी बना देती हैं। वे बताती हैं, ‘कैसा समय है कि किस तरह से लोगों के व्यवसाय पर चोट पड़ रही है।’
उनके एक चरित्र नामू अग्रवाल का परिचय, ‘नामू घर में रचे-बसे व्यक्ति हैं। मित्रों के बीच बहुत उठने-बैठने वाले व्यक्ति वे नहीं हैं। घर-परिवार के अलावा उन्होंने अपनी कोई दुनिया भी नहीं बनाई। कुछ दिनों पहले पत्नी नहीं रहीं। कपड़े का छोटा-सा कारोबार था। वह बेटे को सौंप दिया। पहले व्यापार को लेकर थोड़ी व्यस्तता रहती थी। फिर धीरे-धीरे खाली हो गए। बेटा कहता रहता है- साथ में दुकान चलो पर नहीं जाते। ग्राहक, कर्मचारी सब बेटे से बात करते वह अकेले-थकेले पड़ जाते।… अकेले ही बैठना है तो बस स्टैंड क्या बुरा है। इस उम्र में घर से निकलकर जाएं भी कहां! कहां बैठें! घर के अलावा कुछ घंटे बैठने की कोई जगह बनाए रखनी चाहिए थी। यह उन्होंने पहले सोचा ही नहीं। बस स्टैंड बचपन से उन्हें लुभाता रहा है।’
शर्मिला मूवी कैमरा के टॉप शॉट से कथा परिदृश्य को अर्थपूर्ण बनाती हैं। इन्होंने अपनी कहानियों में ऐसे परिदृश्य रखे हैं कि वे सहज ही स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं। वे हमेशा एक कंट्रास्ट बनाती हैं, मसलन वे केसर बाबू के सामने पद्माक्षी और नामू के सामने रिटायर्ड अध्यापक, एक बंगाली महिला और सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त सुभाष अधिकारी को रखती हैं। पद्माक्षी समाज को बदलना जरूरी समझती है ताकि लड़कियों को लोग मान-सम्मान और इज्जत की दृष्टि से देख सकें। इसके बरक्स केसर बाबू हैं जो बताते हैं, ‘हमारे घर की लड़कियों को हम लोग चार्टर्ड बनाते हैं, व्यवसाय के लिए ट्रेंड करते हैं, आजकल एमबीए भी करने लगी हैं। हम उन्हें जर्नलिज्म में नहीं जाने देते। वहां रिस्क है।
शर्मिला लोकल ट्रेन में अपने पात्रों के साथ चढ़ जाती हैं। कभी मेदिनीपुर कभी मुर्शिदाबाद और कभी बहरमपुर जानेवाली ट्रेन में! वे सामान्यतः उन्हीं की कहानी लिखती हैं जो अपने कर्म जीवन से मुक्त हो चुके हैं। अपनी कई कहानियों में वे यह दोहराती हैं कि वाणिज्य-व्यापार मंदा है। वे परिवार के भीतर के बदलाव को पकड़ती हैं जो केवल परिवार के भीतर का बदलाव नहीं है, पूरे समाज और समय के बदलाव का संकेतक है।

जिज्ञासा : आपके बचपन, पारिवारिक परिवेश और दो अलग-अलग सांस्कृतिक क्षेत्रों-मिथिला और बंगाल के अनुभवों ने आपके व्यक्तित्व और आपकी कहानियों के स्वर को किस प्रकार गढ़ा?
शर्मिला जालान : मेरा जन्म मध्यवर्गीय मारवाड़ी व्यवसायी परिवार में मिथिलांचल में हुआ। मिथिलांचल की राजधानी दरभंगा में कस्बे का जीवन था। धीरे-धीरे अपनी लय में चलता और बहता हुआ। प्रकृति के बहुत करीब। सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत पास से देखा। आकाश में उड़ते बगुले भी लगता था पास से उड़े जा रहे हैं। बड़ा मकान था और उसमें रहनेवाले लोग कम। मां ही भोजन बनाती थीं।
कोई साहित्यिक माहौल नहीं था। वहां कोई पुस्तकालय होगा, पर कभी जाना नहीं हुआ। अखबार घर में आता था या नहीं, याद नहीं, पर पढ़ा कभी नहीं। ‘कल्याण’ पत्रिका घर में रहती थी, उसमें खूब सुंदर देवी-देवता के रंगीन चित्र होते थे। इस तरह के परिवार में संघर्ष और चुनौतियां अलग तरह की होती हैं, अलग कथा-किस्से और कहानियां होती हैं। इन परिवारों के जीवन में गांधीवादी, समाजवादी विचारधारा पर न तो बात होती है न ही लोग उससे जुड़े होते हैं। हां, हृदय में इन महान विचारों के प्रति श्रद्धा का भाव बना-बचा रहता है। हमारे यहां मारवाड़ी और हिंदी बोली जाती है और पुराने लोग मैथिली समझ-बोल लेते हैं।
दरभंगा से कोलकाता आने के बाद बंगाल में मेरी पूरी शिक्षा-दीक्षा हुई, विवाह हुआ। मैं मिथिला और बंगाल दोनों को अपने अंदर पाती हूँ। बंगाल में उन शिक्षित, नौकरी पेशा बंगाली महिलाओं को देखा, जिनकी तीसरी पीढ़ी नौकरी कर रही हैं। इन अपने पैरों पर खड़ी बंगाली महिलाओं में स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान का जो भाव है वह हमारे परिवार की स्त्रियों में नहीं देखा ।
मैंने अपने परिवार में जिन स्त्रियों को देखा वे जानकी (सीता) की तरह धीरज वाली, संयमी और धीर-गंभीर गरिमापूर्ण महिलाएं रहीं। जो घरों को संभाले हुए ऐसे स्तंभ की तरह थी कि अगर स्तंभ हिल जाए तो घर ढह जाए।
जिज्ञासा : आपके लेखन की जो स्त्रियां अपने अस्तित्व और आकाश की तलाश में हैं-उनका स्वर बनने में किन अनुभवों और किन व्यक्तित्वों ने निर्णायक भूमिका निभाई?
शर्मिला बोहरा : मैंने बचपन में जिन पुरुषों को देखा उनमें अधिकतर के मन में स्त्रियों के लिए कोई सम्मान नहीं था। ऐसे पुरुष थे जो बच्चों के प्रति असंवेदनशील और क्रूर रहे हैं। छुटपन में घर में जिन स्त्रियों को देखा उनमें अपने ‘आत्म’ की तलाश की छटपटाहट और व्याकुलता रही है पर वे अपना आकाश खोजे बिना त्याग और समर्पण का जीवन जीकर चली गई हैं। वे सभी गहरी समझ और संवेदना वाली महिलाएं थीं। मेरा जीवन उनसे कहीं अधिक होने वाला नहीं था, अगर मैं 90 के दशक में 60 के दशक के कथाकार और समाजवादी विचारवाले श्री अशोक सेकसरिया से नहीं मिली होती। उनसे मिलना संयोग ही था। उनके सान्निध्य में गांधीवादी विचारधारा और समाजवादी आंदोलन को समझने की राहें खुलीं। हर जाति और हर शहर का अपना इतिहास होता है उसको समझने की जिज्ञासा मन में हुई। स्त्रियों के जीवन की एक समझ बनी।
श्री अशोक जी से हुई भेंट के द्वारा मेरे अंदर के कथाकार ने अनवरत कहानियां लिखीं। ऐसा नहीं था कि वे कहानी लिखने की कोई प्रशिक्षणशाला चला रहे थे। पर एक तरह से अनौपचारिक प्रशिक्षण तो हो रहा था।
मेरी कहानियों में वे स्त्रियां आती हैं जो घर-परिवार में अपने होने का अर्थ तलाश रही हैं। बचपन में मैंने जिस जीवन को देखा, जिन स्त्री-पुरुषों को देखा, वे लौट-लौट कर आते हैं। कई कहानियों में नए संदर्भ भी मिलेंगे।
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स्त्री रचनाकारों ने बाजारवाद के कारण देशकाल, समय-समाज के हुए बदलाव को नए जीवन संदर्भों में उद्घाटित किया है।… इन कहानियों में एक ऐसी जद्दोजहद है जो वस्तुपरक यथार्थ की सहभोक्ता बनकर बाजार के छद्म को उजागर करती है। |
वंदना गुप्ता ने ‘सरे बाजार कथा बांचती स्त्रियां’ बारह स्त्री कथाकारों की सत्रह कहानियों का संकलन तैयार किया है। इस संग्रह के बारह स्त्री कथाकार हैं: मधु कांकरिया, चंद्रकला त्रिपाठी, उर्मिला शिरीष, पूनम सिंह, किरण स़िह, रजनी गुप्त, जयश्री राय, प्रज्ञा रोहिणी, आशा पांडे, वंदना वाजपेयी, कल्पना मनोरमा और निधि अग्रवाल। इस संकलन में लेखिकाओं की वे कहानियां हैं, जिनमें बाजार की विभीषिका और उसकी मार किसी न किसी रूप में है। सुलभ संदर्भ के लिए अरुण होता की एक आलोचना पुस्तक ‘भूमंडलीकरण, बाजार और समकालीन कहानी’ यहां है। हालांकि स्त्री कथाकारों ने अपनी कहानियों में बाजार के साथ क्या व्यवहार किया है, यह जाना जा सके इसके लिए स्वतंत्र अध्याय नहीं है।
वंदना गुप्ता ने इस संग्रह की भूमिका में लिखा है, ‘आलोच्य पुस्तक की कहानियां बाजार के भयावह यथार्थ की तस्वीरें हैं। स्त्री रचनाकारों ने बाजारवाद के कारण देशकाल, समय-समाज के हुए बदलाव को नए जीवन संदर्भों में उद्घाटित किया है।… बाजार केंद्रित इन कहानियों में जीवन की सुंदरता को बचाकर रखने की एक ऐसी जद्दोजहद है जो वस्तुपरक यथार्थ की सहभोक्ता बनकर बाजार के छद्म को उजागर करती है। … अनुभव और संवेदना की जमीन पर ये कहानियां मुझे बाजार के वर्चस्व के विरुद्घ एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह लगीं।’
पूनम सिंह की कहानी ‘बागबां आया गुलिस्ता में कि सैय्याद आया’ में एक हैं प्रोफेसर कैलाश बाबू। कैलाश बाबू उस कहानी में हैं जहां फूल की खेती करने के लिए एनआरआई हुलास बाबू गांव में अपनी इत्र फैक्ट्री का शिलान्यास कर चुके हैं और साठ एकड़ जमीन हथियाने के लिए कैंप कर रहे हैं। इस विडंबना पर प्रोफेसर कैलाश ने जो कहा है वह गौरतलब है, ‘स्वतंत्रता के बाद जिस तरह लोगों के भीतर आजादी से मोहभंग हुआ था उसी तरह इस उदारवादी अर्थव्यवस्था से भी लोगों का मोहभंग होगा। क्योंकि यह विकास पर्वत और खाई के समान असंतुलित हैं।… हुलास बाबू अगर रामडीह की धरती पर फूल ही फूल उगाना चाहते हैं तो इसके पीछे वहां के किसानों के जीवन में रंग-गंध भरने की बात नहीं है, बल्कि अपने चेहरे की लाली और अपने जीवन को सुगंधित बनाने की बात है।’
प्रज्ञा रोहिणी की कहानी ‘मन्नत टेलर्स’ में एक है मास्टर साहब का सुपुत्र जो वर्तमान की ब्रांड महामारी और रेडिमेड संस्कृति से पीड़ित है। वह एक तरफ वर्तमान से क्षुब्ध है, दूसरी ओर मन्नत टेलर्स को याद करते हुए उस जमाने के सान्निध्य और आपसी सौहार्द को याद करता रहता है। वह अपनी खीझ और समझ प्रकट करता है, ‘हर रोज नया फैशन बाजार में उतारने का पैंतरा है ये स्लिम फिट। …इस भागदौड़ की जिंदगी में टीवी चैनल और फिल्मों में ही सब कुछ है। शरीर के लिए कपड़ा है न कि कपड़े के लिए शरीर।…उन्हें तो हर दिन नया धमाका करके सेल को बढ़ाना है। …हजारों तरह के ब्रांड उतरे हुए हैं बाजार में। उनमें भी देसी कंपनियों पर विदेशी भारी। फास्ट लाइफ ने बाजार के पुराने चलन ’ इंतजार’ को कबका तोड़ मरोड़ कर फेंक दिया था। अब कौन जाए कपड़े सिलवाने?’
अब एक गृहिणी से मिलिए। आशा पांडेय की कहानी ‘जेब सोखती दोपहर’ में गृहिणी कहती हैं, ‘इधर कुछ दिनों से महसूस कर रही थी कि हमारे अपार्टमेंट में फेरीवालों की आवक कुछ अधिक बढ़ी है और उसी हिसाब से महिलाओं की लक-दक भी प्रशंसनीय हुई है। जब देखो तब नई-नई साड़ी में लिपटी हुई दिख जाती हैं। एक मैं ही हूँ जो होली, दीवाली में खरीदी गई साड़ियों में ही हर दिन बाहर हो आती हूँ। बाकी तो लंबे अर्से तक एक साड़ी को दुहरा कर भी नहीं पहनतीं। मिसेज गोडबोले कह रही थीं-दोपहर का समय। बहुत अच्छे से बीत जाता है इन फेरीवालों के साथ। तरह-तरह की साड़ियां देखो, मोलभाव करो और उधारी में उठा लो।’ निस्संदेह यह कहानी इस संपादित संग्रह की उपलब्धि है। ऐसी कई कहानियां आज लिखी जा रही हैं जो अंधे की लाठी बनी हैं।
हिंदी कहानी की उम्र लगभग 120 साल है। इस दौर में हिंदी कहानी ने कई मोड़ पर अपनी सार्थकता हासिल की है। हिंदी के अनेक कहानीकारों ने ऐसी कहानियां दी हैं, जिन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। जिन कहानियों को लेखक के नाम के बगैर भी पहचाना जा सकता है, वे स्वतंत्र पहचान की कहानियां कही जाएंगी। हिंदी कहानी में कई बार ऐसा दौर आया जब प्रभाव में आकर कहानियां लिखी गईं। मान्यता यह है कि कथा की प्रस्तुति और कहन ऐसी हो कि लेखक अपने पाठकों पर जो प्रभाव चाहता है, पाठक वही ग्रहण करे। यह अनायास नहीं कहा गया है कि भूत के पांव उलटे होते हैं। इन दिनों उलटे पांव वालों ने हर तरफ हड़कंप मचा रखी है। सुखद है कि हिंदी कथा साहित्य ने अपनी भूमि इनसे बचा रखी है। इसकी वजह यह है कि हिंदी के अधिकांश कहानी लेखकों – लेखिकाओं ने उलटे पांव वालों से ताल नहीं मिलाया है अभी।

जिज्ञासा : आपके मन में बाजारवाद पर केंद्रित कहानियों का संग्रह निकालने का विचार कैसे आया?
वंदना गुप्ता : ‘जादू भरी जगह है बाजार तुम ना जाना/इक बार हम गए थे बाजार होके निकले।’ लोकेश कुमार सिंह के इस शेर में बाजारवादी गिरफ्त में जकड़े समाज की अनुगूंज सुनी जा सकती है।
बाजारवाद पर स्त्री कथाकारों की कहानियों के संपादन की संकल्पना के पीछे विषय केंद्रित कहानियों पर समीक्षात्मक काम करने की मंशा रही है। कई कहानी संग्रहों, उपन्यासिकाओं की समीक्षा करने के बाद जेहन में यह बात आई कि कुछ अलग काम किया जाए। इस संग्रह के कहानीकारों के पास इतिहास सम्मत-दृष्टि, वर्तमान, अतीत के बदलावों को आंकने की परख और संवेदनाओं का ताप है। वे एक सचेतक की तरह बाजार के नए-नए रूपों, नित नई साजिशों, हलचलों और तेजी से ढहती सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था से हमारी संवेदनाओं को जोड़ती हुई हमारे बोध को झकझोरती हैं। बाजार केंद्रित इन कहानियों में जीवन की सुंदरता को बचाए रखने की जद्दोजहद है। ये कहानियां मुझे बाजार के वर्चस्व के विरुद्ध एक सार्थक हस्तक्षेप लगीं।
जिज्ञासा : स्त्री कथाकारों के सामने आज क्या-क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?
वंदना गुप्ता : वर्तमान सदी में रचनात्मकता से जुड़ी स्त्री कथाकरों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं भूमंडलीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोटक प्रभाव, बाजारवाद के बढ़ते प्रभुत्व और उसके चक्रव्यूह में घिरे लोग और कई तरह की विसंगतियां।
बाजारवाद के प्रभाव ने न केवल हमारी संस्कृति की जड़ों को कमजोर किया है अपितु विभिन्न जातियों, धर्म-संप्रदाय के आचार-विचार, रहन-सहन, वेश-भूषा, तीज-त्यौहारों और जन्मदिन जैसी रस्मों पर भी अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है। विज्ञापनों की चकाचौंध ने युवाओं की मानसिकता को प्रभावित किया है। आज युवा पीढ़ी बाजार द्वारा सौंपे गए नकली वैभव के अनुरूप अपने भविष्य का निर्धारण कर रही है।
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