वरिष्ठ लेखिका और समीक्षक। अद्यतन पुस्तक ‘स्त्रीवादी चिंतन की विविध दिशाएं’। संप्रति इलाहाबाद में शिक्षिका।

 

सभ्यताओं के विकास ने स्त्री और पुरुष को दो अलग-अलग शिविरों में डाल दिया है। विश्व की सभ्यतम कही जाने वाली परंपराओं में भी स्त्री के प्रति एक विशिष्ट द़ृष्टिकोण रहा है। हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। स्त्री से रिश्तों को पितृसत्ता ने व्याख्यायित किया है। वह मां, बहन, बेटी, पत्नी के नाम से जानी जाने लगी, लेकिन व्यक्ति के रूप में उसकी पहचान स्वीकारी नहीं गई। उसने जब भी व्यक्ति के रूप में अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा की, उसे खामियाजा भुगतना पड़ा। ज्ञान परंपरा तथा इतिहास के चालक तत्व के रूप में सदैव पुरुष आगे रहा इसलिए सभी मानक उसी ने तय किए जो सार्वभौमिक रूप से स्वीकार लिए गए।


बचपन से यही सुनती आई थी कि प्रत्येक प्रसिद्ध व्यक्ति के नेपथ्य में एक महिमामयी स्त्री मुस्काती खड़ी होती है। बाद के जीवन में जब तरह-तरह की स्त्रियों का जीवन करीब से देखने का मौका मिला तो मेरे जी में आया कि जो नेपथ्य में है, उसकी तरफ से देखना भी जरूरी है, सत्य की सम्यक समझ के लिए।

अनामिका एक बड़ी संवेदनशील और सजग रचनाकार हैं। उनकी कथाभाषा में जो रोचकता, सरसराहट और प्रवाह है, वह उनके लेखन को पठनीय बनाता है। उनका नवीनतम उपन्यास ‘दूर देश के परिंदे’ पांच खंडों में विभक्त बीसवीं सदी के दैदीप्यमान महापुरुषों से संबंधित स्त्रियों की कहानी सामने लाता है। उन स्त्रियों के त्याग और गुण का अवलोकन लेखिका ने स्त्री मन से किया है। उपन्यास में स्त्री और पुरुष के उस भाव की संकल्पना है जो दोस्त समाज निर्मित कर सके। रवींद्रनाथ टैगोर, निराला, महात्मा गांधी और रोमारोलां के जीवन में जिन स्त्रियों का कहीं न कहीं योगदान रहा है, उन्हें विवेचित करने का प्रयत्न यह उपन्यास करता है।

‘दूर देश के परिंदे’ उपन्यास का प्रथम खंड निराला की पुत्री सरोज पर केंद्रित है। द्वितीय खंड में ज्यॉ क्रिस्तोफ की मां डोरोथी है जिनके विषय में कल्पना की गई है कि वे रोमारोलां की केयरटेकर थीं। तृतीय खंड में वे स्त्रियां हैं जो गांधी के प्रयोगों की साक्षी हैं और सहचर मीरा बेन और कस्तूरबा से संबंधित हैं। चतुर्थ खंड में भारत में ग्रामोफोन की प्रथम गायिका गौहर जान हैं और पंचम खंड में रवींद्रनाथ टैगोर की प्रेरणा रानू की कथा है।

उपन्यास की ये पंक्तियां दिल में उतर जाती हैं- ‘मेरे इस जीवन की अगर कोई उपलब्धि है तो यह त्रिभंगी मुद्रा महासम की जो मैंने रोलां, निराला, गांधी, टैगोर, निर्मला और उन सब स्त्रियों में प्रत्यक्ष देखी जिनका जीवन किसी कारण पटरी से उतर गया था- गौहर जान, रानू मुखर्जी, मीरा बेन…. इसके अलावा नए भारत की वे शिक्षादीप्त स्त्रियां- आशा बहू, उनकी बहनें और स्वयं अपनी विद्या जैसी स्त्रियां जिनके मन में दोस्त पुरुषों के साथ मिलकर एक दोस्त समाज, पदानुक्रममुक्त समाज बनाने का महास्वप्न जग गया है, इसलिए जो दोस्त पुरुषों में भी पूरी धरती की मां बनने का जज्बा जगा रही है।’

अंतर्वैयक्तिक संबंधों में संवाद ही वह माध्यम है, जिसके जरिए बहुत कुछ सुलझाया जा सकता है।

इस उपन्यास की कहन शैली विशिष्ट है। स्त्रियां स्वयं अपनी कथा कहती हैं। वे पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों से आत्म-परिवर्तन की उम्मीद भी रखती है ताकि संसार में बदलाव लाया जा सके। उपन्यास पात्रों के अंतर्मन को व्यक्त करता हुआ दशा और दिशा देता है।

‘दूर देश के परिंदे’ में अनामिका की भाषा काव्यात्मक और अलंकारिक है। समुद्र की लहरों की तरह ध्वन्यात्मक भी। इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों के विभिन्न स्तरों की गहन पड़ताल है जैसे- ‘मां के रूप में, बेटी के रूप में, प्रेयसी के रूप में, गणिका और पत्नी के रूप में, सिर्फ गुरु-शिष्य रूप में भी क्या स्थिति थी स्त्रियों की? स्त्री-पुरुष संबंधों पर जो झिलमिल छाया उन दिनों तारी थी, उसकी ही छाया में छायावाद पनपा क्या…. ये ही कुछ मूल प्रश्न थे उन किरदारों के भी जिनके आलोक में देशी-विदेशी-परदेशी, अपना-पराया की व्याप्तियां टटोलनी थीं। लोककथा के भूतों की तरह जब कुछ विकट प्रश्न जान को लग जाते हैं, कलम हारिल की लकड़ी बन ही जाती है।’

‘दूर देश के परिंदे’ उपन्यास का वैशिष्ट्य इसी में है कि लेखिका ने आशा बहू जैसी गौण पात्र को भी बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत किया है। यह स्त्री के प्रति सामाजिक सोच को बदलने का सार्थक प्रयास है। यह उपन्यास स्त्रियों की साझा संस्कृति का भी दिग्दर्शन कराता है।

जिज्ञासा: आपने इस उपन्यास में स्त्री मन के त्रास और वेदना को गहराई से महसूस किया है। क्या पुरुष स्त्रियों की उम्मीद पर खरे उतरते हैं?

अनामिका : परिवर्तन एक प्रक्रिया है- एक सूफियाना सिलसिला, आत्मपरिष्कार के संकल्प से यह प्रक्रिया शुरू होती है। यदि एक बार वह घट गया यानी व्यक्ति में अपनी क्षुद्रतर वृत्तियों से निजात पाने की धुन जग गई और एक हद तक वह इस अभियान में सफल हो गया तो फिर खास कुछ करना नहीं होता। उसका सकारात्मक बदलाव स्वयं एक मूक संदेश बन जाता है। इसका असर सामने वाले के मन को द्रवित किए बिना नहीं रहता है।

काम, क्रोध, लोभ से मताए हुए अतिपुरुषों के सामने भी तब यह स्पष्ट हो जाता है कि सामने वाली के जीवन का स्विच मेरे हाथ में नहीं है कि जब चाहूं, उसे ऑन-ऑफ कर दूं। यह मेरे स्तर पर उतरकर कोई प्रतिक्रिया नहीं देगी। वह चलेगी अपने विवेक से और सही राह पर। स्त्री के बढ़े हुए तेज से पहले तो वह चिढ़ता है, फिर खौफ खा जाता है और सत्तर प्रतिशत केसों में वह थोड़ा बदलता भी है। सविनय अवज्ञा की यह तकनीक गांधी जी ने स्त्रियों से ही सीखी है। अंतर्वैयक्तिक संबंधों में सविनय अवज्ञा की यह रणनीति अभी भी काम करती है।

संवेदित मांओं/दादियों/नानियों के पाले हुए लड़के निश्चित ही बदले हैं। वे घर के कामों में और बच्चे पालने में भी पत्नियों के साथ खड़े होते हैं। और मां-बहन-पत्नी या बेटी अपने किसी सर्जनात्मक काम में लगी हो तो वे उसे ब्रीदिंग स्पेस भी देते हैं। जो बीस-पच्चीस-तीस प्रतिशत लोग अभी भी चिकने घड़े हैं, उनके साथ बस इतना करना पड़ता है (जीवन के त्रास या वेदना का सिलसिला कम करने के लिए) कि उन्हें अपने जीवन के केंद्र से उठाकर परिधि पर खिसका दें, यानी देखभाल तो कर दें उनकी, पर मन से तटस्थ हो जाएं- किसी और व्यक्ति या सृजनात्मक कार्य को जीवन के केंद्र में ले आएं।

स्त्रियों में यह द़ृष्टि किताबों से ही नहीं, एक-दूसरे से साझा किए किस्सों के कारण भी सहज ही विकसित हो गई है। अब कोई स्त्री अकेले में घुटती नहीं रहती।

जिज्ञासा:‘दूर देश के परिंदे’ उपन्यास में आप ने विश्व प्रसिद्ध पुरुषों के जीवन में आने वाली महिलाओं के जीवन को आधार बनाया है, उन्हें केंद्र में रखने का विचार आपके दिमाग में कैसे आया?

अनामिका: किशोरावस्था में एक पुस्तक पढ़ी थी- ‘मैरेड टु जीनियस’। ये किस्से ज्यादातर विदेशी लेखकों के जीवन से जुड़े थे और इसका मूल उद्देश्य था उन लोगों के वैयक्तिक जीवन का त्रास उजागर करना, जिनकी शादी ऐसे व्यक्ति से हुई थी, जिसकी जान को कोई और धुन लगी थी और जो अपने को विशिष्ट समझकर कुछ अतिरिक्त छूटें लेना चाहते थे, जो उनका साथी छूटें दे नहीं पाता तो लगातार तनातनी रहती थी घर में। रूपा से छपी इस किताब का हिंदी अनुवाद बाद में ‘शुभागता’ नाम से छपा था! यह नाम बहुत व्यंजक है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस किताब में केंद्र में पुरुष ही है। मैडम क्यूरी और एकाध स्त्री भी हैं केंद्र में पर इनके वैयक्तिक जीवन में वह तनाव नहीं है, हो भी तो रेखांकित नहीं है।

वैसे भी बचपन से यही सुनती आई थी कि प्रत्येक प्रसिद्ध व्यक्ति के नेपथ्य में एक महिमामयी स्त्री मुस्काती खड़ी होती है। बाद के जीवन में जब तरह-तरह की स्त्रियों का जीवन करीब से देखने का मौका मिला तो मेरे जी में आया कि जो नेपथ्य में है, उसकी तरफ से देखना भी जरूरी है, सत्य की सम्यक समझ के लिए।

महापुरुषों के जीवन में स्त्रियां या तो नेपथ्य में थीं या ‘अनदर अफेयर इन द कैप’ यानी ‘अन्या’ के रूप में किसी अपयश की भागी। या तो गायब, या फिर विद्रूपता से चित्रित। उनके अंतरंग जीवन का चित्रण कहीं भी नहीं था, बस कुछ बिखरी हुई सूचनाएंं थीं। उन्हें पिरोते हुए संभाव्यता के सिद्धांत के अनुरूप कुछ काल्पनिक संवाद या मन:संवाद रचने पड़े और इससे मुझे तृप्ति हुई।

जिज्ञासा: क्या स्त्री-पुरुष दोस्त के रूप में समाज की यह नई संकल्पना साकार हो सकती है?

अनामिका: बुद्धत्व या देवत्व के बीज सब में हैं। धीरज से भाषा-जल उसे सींचता चले, कानून और समाज जमीन तैयार करते चलें। भाषा कल्पना कर सकती है, एक यूटोपिया गढ़ सकती है- इसी के आधार पर जमीन तैयार करने वाले अपना काम करते हैं।

मैक्रो धरातल पर इसे चरितार्थ करने में ‘काल’ भी एक बड़ी भूमिका निभाता है, खासकर जब सारे संयोग घटित करके सर्जनात्मक ऊर्जाएं इकट्ठा हों और सही दिशा में अपना काम कर सकें जैसा कि नवजागरण के समय हुआ था। ‘स्त्री शिक्षा’ औपनिवेशिक ताकतों की परियोजना का हिस्सा थी, पर विनिवेशन को तैयार स्वाधीनता संग्राम भी स्त्री मुक्ति के विषय में सोचने लगा। स्त्रियां भी वृहद मुक्ति मिशन से जोड़ी गईं। शिक्षादीप्त स्त्रियों ने जागरण के नए आयाम मुक्ति मिशन में जोड़े। बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह आदि को रोकने का कानून जब अंतत: लागू हुआ और स्त्रियां अन्य तरह के जनतांत्रिक अभियानों से जुड़ीं तो उन्हें यह महसूस हुआ, जैसा कि मैंने उपन्यास में दिखाया भी है- ‘दूर देश के परिंदे’ में ही नहीं, ‘दस द्वारे का पींजरा’ में भी। दोस्त पुरुष गढ़े बिना पदानुक्रम मुक्त दोस्त समाज की कल्पना असंभव है।

उसके बाद लगातार अंतर्वैयक्तिक संबंधों में ‘सविनय अवज्ञा’ और ‘जिओ और जीने दो’ की धार आजमाई गई। सुधार आंदोलन चलाए गए थे स्त्रियों की दुर्दशा रोकने के लिए, पर सुधरना पुरुष को ही था। उसे नए ढांचे में ढलना था। उसे शिक्षादीप्त नई स्त्री के योग्य बनना था। समाज रामगुप्तों का था, पर नई ध्रुवस्वामिनी को तलाश चंद्रगुप्त की थी जो उसे स्वयं अपने यत्न से गढ़ना था। एक ऐसा पुरुष जो अतिपुरुष न हो, काम-क्रोध-लोभ का अतिरेक न हो जिसमें। बाद के दिनों में जब जनतंत्र गहराया, इंटरनेट शासित नए युग में फिल्में, किताबें, ब्लॉग आदि स्त्रियों में यह चेतना भी जगा गए कि उन्हें भी अति-स्त्री बार्बी डॉल बनने से बचना है। स्त्री-पुरुष के बीच भेड़-भेड़िया का रिश्ता खत्म हुआ तो नहीं है, पर स्त्रीवाद के गर्भ से जन्मे नवल पुरुष अधिक संवेदित हैं।

जिज्ञासा : दुनिया के हर विलगाव की अचूक काट क्या रिश्ते हैं?

अनामिका:‘रिश्ता’ शब्द व्यापक है। समाज भी संबंधों का एक अंर्तजाल ही तो है। भेद भाव की संरचनाएं जब तक कायम हैं- खुलकर बातचीत नहीं होगी। हर शासक-शासित के बीच विलागावबोध घुमड़ेगा ही। इसके अलावा जो काम हम करते हैं, उससे भी हमारा विलगावबोध जगा रहेगा। व्यक्ति को जब तक अपनी पसंद का काम नहीं मिलता, उसकी गति वही होती है जो विद्योत्तमा के छोटे बेटे की हुई। उसके अपने पिता भी सगे न रहे। फिर उसको उबारा किसने? विद्योत्मा ने उसे जेल से रिहा कराके उसकी प्रवृत्ति के अनुसार किसी काम में लगा दिया। उसका दायित्व सौंपा किसे? ‘ज्यां क्रितोफ’ को! ज्यां क्रिस्तोफ से उसका रिश्ता अपरिभाषित है। मैंने उस रिश्ते को गुरु-सखा का रिश्ता कहा है। हम सब प्राध्यापिकाओं का अपने छात्रों से, डॉक्टरों का अपने पुराने मरीजों से गुरु-सखा वाला रिश्ता ही होता है। जो सिखाता तो है, परिमार्जन भी करता चलता है लेकिन गुरुडम त्यागकर, दोस्त बनकर!

मैंने अपने प्राय: सब उपन्यासों में स्त्रियों के रचे ऐसे बंधु परिवार का सपना देखा-दिखाया है, जिसका नियामक यौन-संबंध या रक्त संबंध नहीं होता, आत्मा के रिश्ते होते हैं। ‘द सोल सेलेक्ट्स इट्स ओन सोसायटी’। किसी समय एमिली डिकिंसन की इस पंक्ति का अनुवाद मैंने (थोड़ा छूट लेकर) ऐसे किया था : आत्मा अपना स्वयंवर स्वयं ही रचाती है! वरण सिर्फ ‘वर’ का नहीं होता। कोई भी चुनाव वरण है। दोस्त समाज ऐसे बंधु परिवारों/समुदायों का समुचित समुच्चय है।

जिज्ञासा :उपन्यास के पांच खंडों में केंद्रित स्त्री चरित्रों में आप किससे अधिक प्रभावित हैं?

अनामिका : सच पूछिए सरोज, तो यह प्रश्न पूछकर आपने मेरा मर्म छू लिया है। अकसर जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता, अपनी आत्मा के सबसे करीब मैं उसे ही पाती हूँ- किसी भी भीड़ में मेरी आंखें उसी इंसान पर टिक जाती हैं। अपने ही नहीं, किसी भी उपन्यास में कोई न कोई गौण पात्र ही मेरी आत्मा में सहचर हो जाता है।

यहां यह गौण पात्र है ‘आशा बहू’। देश जब स्वतंत्र हुआ था, कई नए विश्वविद्यालय खुले थे, उन विश्वविद्यालयों में पढ़ने आई लड़कियों की जो पहली पीढ़ी थी- वह मेरी मां और उसकी पांच बहनों की पीढ़ी थी। इसने अपनी आत्मा का संगीत अपनी संततियों में उड़ेला ताकि वे आदर्श नागरिक हो सकें नए जनतंत्र के। इस तरह नए भारत के निर्माण में वे जी-जान से आजीवन जुटी रहीं। आजीवन इसका सजग साक्ष्य मैंने बचपन से सहा है। जब मां अंतिम सांसें गिन रही थीं, वैसे तो मैं अपने आपे में नहीं थी, पर इतना मुझे याद है कि उधर उसकी अंतिम सांस अंतरिक्ष में विलीन हुई, इधर मेरे गर्भ में एक सिरहन-सी हुई। उसका सिर मेरी गोद में था और यह संकल्प मेरे मन में कि इसे गर्भ में छुपा लूं, जैसे कभी इसने मुझे छुपाया होगा, और अपने प्राणों से सींचकर इसे दुबारा धरती पर लाऊं। इस आंतक पीड़ित दुनिया को ऐसी मांओं की बहुत जरूरत है जो सारी दुनिया की मां होने का जज्बा रखती हैं। जब पुरुषों की आंखों में भी पूरी दुनिया की मां होने का यही भाव उतर आएगा, दरअसल तब बदलेगी दुनिया, तब वह आतंकमुक्त होगी!

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उपन्यास लिखते वक्त किसी विभाजन कथा के बारे में नहीं सोचा था लेकिन मन आज के समाज में बढ़ती असहिष्णुता खासतौर से माइनॉरिटीज को लेकर बढ़ती नफरत ने मुझे बहुत विचलित किया है। मैं हमेशा से धार्मिक कट्टरता के खिलाफ रही हूँ। इसीलिए यह उपन्यास भी ‘अदरिंग’ (अन्य) के खिलाफ है। मैं मानती हूँ कि ऐसे उपन्यासों का लिखा जाना बहुत जरूरी है।

सरक फंदा उपन्यास लेखिका वंदना राग का है। उन्होंने बड़ी गंभीरता के साथ एक गहरी राजनीतिक समझ के साथ यह उपन्यास लिखा है। उपन्यास एक ऐसी विधा है जिसमें अभिव्यक्ति के लिए बहुत स्पेस होता है, लेखक कई मोड़ों पर रुककर समस्याओं को दिखाकर आगे बढ़ता है। वंदना राग ने भी इस उपन्यास में नेहरू, गांधी और आजादी के संघर्ष में शामिल लोगों के संघर्ष और कुर्बानियों को विस्तृत रूप से लाजवंती के जरिए अंकित किया है। उपन्यास में हमारे समय का यथार्थ बहुत बारीक ढंग से आया है। तीन पीढ़ियों में फैला है इस उपन्यास का कलेवर। यह बताने की कोशिश करता है कि हमने क्या-क्या खोया है और क्या-क्या पाया है- ‘एक रहस्य से भरा अद़ृश्य खंजर है कहीं जो देश के दिल के आर-पार कर दिया गया है। कितना गहरा जख्म खुब गया है। लेकिन समझ रहा हूँ, हमें इस जख्म के बावजूद जीना होगा। देश आजाद हो गया है, इसीलिए अब हमें जीना ही होगा।’

‘सरक-फंदा’ उपन्यास में गुलाम भारत की तस्वीर है और आज के वर्तमान भारत की भी। दोनों के साथ एक भविष्य है जिसपर बहुत दबाव है। उपन्यास की नरैटर बिट्टो अपनी मां लाजो उर्फ लाजवंती के जीवन और समाज को समझने का प्रयास करती है। उसके स्कूल के दोस्त भिन्न-भिन्न धर्म से ताल्लुक रखते थे, उन्हें भगा दिया गया है। बिट्टो इस विभाजन और बंटवारे को स्वीकार नहीं कर पाती। उससे पूछा जा रहा है  ‘सू, हमेशा गुस्से में क्यों रहती है, आजकल तू।’

उपन्यास में उलझाव अधिक है, बहुत गंभीरता से पढ़ने और मनन करने की आवश्यकता है तभी भूत, वर्तमान और भविष्य स्पष्ट हो सकता है। परिवेश स्पष्ट है, ‘यह वही दशक था, जब एक महिला प्रधानमंत्री ने देश की नकेल को अपनी नाजुक उंगलियों के इर्द-गिर्द लपेट रखा था और हर प्रभावित, प्रगतिशील पिता अपनी बेटी को उसके ही नक्शे-कदम पर चलने को प्रेरित करने लगा था।’

‘सरक फंदा’ उपन्यास विभाजन की भयानक तस्वीर पेश करता है। इस उपन्यास में बिल्ला उर्फ लाइब्रेरियन का चरित्र बड़ा सशक्त है जो उपन्यास के प्रारंभ से लेकर अंत तक आवाजाही रखता है। लाइब्रेरियन एक मेटाफर है जो जीवन जीने का तरीका सिखाता है। आज के समय में लाइब्रेरियन जैसे लोगों की आवश्यकता बढ़ी है। इसी के माध्यम से ‘सरक फंदा’ की स्वाभाविकता को परखा जा सकता है। लाजो, बिल्ला और बिट्टो के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है और मानवीय जिजीविषा को उत्प्रेरित भी करती है। विभाजन की पीड़ा से देश तो बंट गया, किंतु न हिंदू को सबर पड़ रहा था न मुसलमान को। उपन्यास में इस तनाव पर सुंदर चित्र है।

जिज्ञासा:‘सरक फंदा’ उपन्यास हमारे देश के अतीत और वर्तमान के राजनीतिक परिद़ृश्य को रेखांकित करता है, क्या आप को लगता है कि आपसी प्रेम और बंधुत्व की भावना समाप्त होती जा रही है?

वंदना राग:‘सरक फंदा’ आजादी के बाद से आजतक के इस देश के संविधान के सहिष्णुता के मूल्यों के विपरीत कम्युनल भाव एवं राजनीति के सूत्रों को ही तलाशने की कोशिश है! जिस वक्त देश को आजादी दिलाने की बात थी उस वक्त सभी लोग प्राणपण से त्याग और उत्सर्ग की भावना से भरे थे। देश के विभाजन ने उस बंधुत्व की भावना को नष्ट किया। फिर भी देश अपने को गढ़ने के क्रम में इस मनभेद, वैमनस्य और ‘अन्य’ की भावना को कुछ हद समाप्त कर चुका था। आज समाज फिर से आजादी के बाद वाले विभाजनकारी नफरती तेवर अख्तियार कर चुका है। लगता ही नहीं है कि जिस देश में हम पले-बढ़े उसका यह हश्र हो रहा है!

जिज्ञासा: बिल्ला अर्थात लाइब्रेरियन का चरित्र सृजित करने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है?

वंदना राग: बिल्ला एक मेटाफर है। वह हमें जीवन में आगे बढ़ने, दुख सहने और लड़ने के गुर सिखलाता है। उसके पास किताबों का जखीरा है, हर मौके के लिए एक खास किताब का सजेशन। आज जब लाइब्रेरियन का रोल सीमित हो गया है और किताबें पढ़ी नहीं जा रही हैं तो बिल्ला किताबों की अहमियत को रेखांकित करता है।

जिज्ञासा: क्या सचमुच पीढ़ी-दर-पीढ़ी मां की ही कहानी होती है, पिता की नहीं हो सकती?

वंदना राग: पीढ़ी-दर-पीढ़ी मां की कहानी इसलिए है कि वह सिर्फ अपना डीएनए सौंपने वाली जननी नहीं बल्कि बिट्टो के जीवन की कर्ताधर्ता भी है। सिर्फ बिट्टो की ही नहीं सभी की कहानी पिता की कहानी भी हो सकती है और पिताओं की कितनी ही कहानियां उनके शौर्य और पराक्रम की लिखी जा चुकी हैं। लेकिन मां जैसी कहानियां कम हैं और तो और मां के पराक्रम की कहानियों को कितना कम स्पेस मिला है। समझिए बस थोड़ी-सी और जगह हासिल करने की यह एक कवायद है।

जिज्ञासा: लाजो और बिट्टो के चरित्र के माध्यम से जिस समय और समाज की अभिव्यक्ति आप कर रही हैं, उससे आप कितनी प्रभावित हैं?

वंदना राग: लाजो और बिट्टो का समय लंबा है। चूंकि बिट्टो देर से पैदा हुई संतान है, वह आज के समय के अधिक करीब है और मां कितनी ही पीढ़ियों के बीच से गुजर चुकी है। दोनों का संधि स्थल कहीं मन और मूल्यों के बीच का है। यह बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के किसी भी वर्ष में जीते लोगों की कहानी हो सकती है। मैंने मां और बेटियों को सदियां लांघ एक जगह जुड़ते देखा है। मैं इस चमत्कार से बहुत प्रभावित होती हूँ।

जिज्ञासा: उपन्यास में देश विभाजन की जो तस्वीर झलकती है, क्या आपको कभी लगा कि इस तरह के उपन्यास की आज जरूरत है?

वंदना राग:  देश विभाजन की यंत्रणा का बखान कभी पूरा नहीं हो सकता। हमें उसे बार-बार याद करने, समझने और दोहराने की जरूरत है ताकि बंटवारे की पीड़ा का मर्म पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहे। हम उस त्रासदी को दोबारा होने न दें। हम साहसी और सहिष्णु बने रहें। उपन्यास लिखते वक्त किसी विभाजन कथा के बारे में नहीं सोचा था लेकिन मन आज के समाज में बढ़ती असहिष्णुता खासतौर से माइनॉरिटीज को लेकर बढ़ती नफरत ने मुझे बहुत विचलित किया है। मैं हमेशा से धार्मिक कट्टरता के खिलाफ रही हूँ। इसीलिए यह उपन्यास भी ‘अदरिंग’ (अन्य) के खिलाफ है। मैं मानती हूँ कि ऐसे उपन्यासों का लिखा जाना बहुत जरूरी है।

क्योंकि जनमत सिर्फ टीवी चैनलों और रील्स से प्रभावित नहीं होना चाहिए, बल्कि साहित्य को अपना समावेशिक मत लिखकर जनमत तैयार करना चाहिए। संविधान के मूल्यों को पुष्ट करने का यह एक तरीका है।

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एक सामान्य पाठक इसे अतीत की कथा समझ सकता है, किंतु अनुवादक के लिए यह वर्तमान की संरचनात्मक सच्चाई बनकर सामने आती है। भाषा बदलते ही यह भ्रम हो सकता है कि सामाजिक दूरी भी बदल गई है, जबकि वास्तविकता में अपमान और बहिष्कार के रूप केवल आधुनिक हो गए हैं।

गुजराती दलित साहित्य का एक बहुचर्चित उपन्यास है दलपत चौहान का ‘मुलक’। इसका अनुवाद किरन सिंह ने किया है। उपन्यास में भारतीय समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, भेदभाव और छुआछूत को नवीन द़ृष्टिकोण से लिखा गया है। भेदभाव और सवर्ण-अवर्ण की विचारधारा आज भी मनुष्यता का निरादर करती है। यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की एक कड़ी है। विस्थापन की समस्या बहुत विकट है। इसे विशिष्ट प्रश्न के रूप में ‘मुलक’ उपन्यास में रेखांकित किया गया है। अपनी मूलभूमि को छोड़कर अन्यत्र बसना बहुत कष्टप्रद होता है। लेखक ने बुनकर जाति के कष्ट, दुर्दशा, उत्पीड़न, जातिगत वैषम्य, अस्पृश्यता एवं दलितों के विस्थापन को मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है।

किरन सिंह ने अनुवाद करते समय कथा परिवेश को पूर्ण रूप से उजागर किया है। ‘हिजरत’ दलितों की जिंदगी से जुड़ा शब्द है। अनुवादिका ने इसकी जगह देशांतरण शब्द रखा है, पर ‘हिजरत’ शब्द मूलभाव को सहजता से व्यक्त करता है। गुजरात की दलित जातियों में बुनकरों की संख्या अधिक है। ‘मुलक’ उपन्यास में दलित बुनकरों की व्यथा कथा है। चौधरियों के दिखावे और जरूरत के अनुसार संतानोत्पत्ति की जरूरत तथा संतानें पैदा होने पर गांव में हड़कंप मच जाता है। बुनकरों की बस्ती में आगजनी का प्रयास किया जाता है। अनुवादक किरन सिंह ने ‘सहभागी चेतना’ के रूप में ‘मुलक’ का अनुवाद किया है। इसमें साहित्य का फोकस प्रत्यक्ष सामाजिक क्रूरता से हटकर स्थान, स्मृति और राष्ट्रबोध में सक्रिय सूक्ष्म जाति की संरचनाओं की ओर संकेत करता है। इस दर्द और पीड़ा की दास्तान बुनकरों की जुबान में है।

भारतीय दलितों की दुर्दशा सिर्फ हिंदुओं के बुरे बर्ताव का नतीजा नहीं है बल्कि यह हिंदू धर्म की व्यवस्था में शामिल है। जाति का प्रश्न सिर्फ अस्मिता का प्रश्न नहीं है वह हमारी एक पहचान भी बना देता है। जो सदियों से वंचित हैं, सत्ता और संपत्ति के भौतिक उत्पादन के लाभों से वंचित वर्ग हैं- उनकी लड़ाई के चित्र हैं ‘मुलक’ उपन्यास में। अनुवादक किरन सिंह ने बड़े संवेदनशील ढंग से स्वानुभव के प्रश्न को समझते हुए उस दर्द को जीकर यह अनुवाद कार्य किया है।

‘मुलक’ दलित लेखन का वह गुजराती उपन्यास है जो बड़ा चर्चित रहा है। यह जीवन की विस्थापन की उस स्थिति को व्यक्त करता है, जहां ‘घर’ की परिकल्पना एक टीस बन जाती है।

जिज्ञासा: आपने अनुवाद के लिए दलपत चौहान के ‘मुलक’ उपन्यास का ही चयन क्यों किया?

किरन सिंह: दलपत चौहान के उपन्यास ‘मुलक’ का गुजराती से हिंदी में अनुवाद मेरे लिए केवल एक भाषिक या साहित्यिक कार्य नहीं है। यह मेरे लिए जीवित स्मृतियों, आत्मानुभव और सामाजिक चेतना से गहराई से जुड़ी एक प्रक्रिया बन गया था।

मेरा बचपन गुजरात के मेहसाणा जिले के एक गांव में बीता है। ‘मुलक’ में चित्रित गांव, उसकी सामाजिक संरचनाएं, जातिगत दूरी, मौन अपमान और रोजमर्रा के व्यवहार मेरे लिए किसी अपरिचित पाठ के हिस्सा नहीं थे, बल्कि पहचाने हुए जीवनानुभव थे। यद्यपि मेरी निजी अनुभूतियां उपन्यास में व्यक्त पीड़ा जितनी तीव्र नहीं थीं, फिर भी वे सामाजिक वास्तविकताओं के अत्यंत निकट थीं। इसी कारण ‘मुलक’ का अनुवाद करते समय मुझे एक ओर नॉस्टेल्जिया का अनुभव हुआ, दूसरी ओर गहरी सामाजिक चेतना का।

मेरे पिता के अध्यापन कार्य की शुरुआत पिलवाई कॉलेज से हुई थी। वे हरिजन बस्तियों में समय बिताते, विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते और आंबेडकर जयंती जैसे सामाजिक अवसरों में सक्रिय सहभागिता करते थे। एक बच्चे के रूप में मैं इस सामाजिक संवाद, संबंध और संवेदना की साक्षी रही हूँ।

मैं दलित विमर्श से किसी बाहरी पर्यवेक्षक की तरह नहीं, बल्कि एक सहभागी चेतना के रूप में जुड़ी रही हूँ। मैंने देखा है कि प्रारंभिक चरण में गुजराती दलित साहित्य जहां जातिगत उत्पीड़न के प्रत्यक्ष और नग्न रूपों को उजागर करता है, आगे चलकर वह अधिक आत्मपरक और चिंतनशील स्वर ग्रहण करता है, जिसमें अपनापन, नागरिकता और चेतना जैसे प्रश्न केंद्रीय हो जाते हैं। इसी विकास-क्रम में दलपत चौहान एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन लेखक के रूप में उभरते हैं।

‘मुलक’ गुजराती दलित लेखन का एक निर्णायक क्षण है। इस उपन्यास में दलित पीड़ा किसी प्रदर्शन या अतिरंजना के माध्यम से नहीं बल्कि संयम, मौन और आंतरिकता के सहारे अभिव्यक्त होती है-और यह दृष्टि मेरी अपनी देखी-समझी सामाजिक सचाई से मेल खाती है।

जिज्ञासा:  गुजराती से हिंदी में अनुवाद करते समय आपके सामने किस प्रकार की समस्याएं आईं?

किरन सिंह: गुजराती और हिंदी-दोनों ही मेरी मातृभाषाएं हैं। किंतु भाषा केवल शब्दों का तंत्र नहीं होती वह जीवनानुभवों, स्मृतियों और सामाजिक यथार्थ की संवाहक भी होती है।

इसलिए जब एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुभव-स्तरों को स्थानांतरित करने का प्रयास किया जाता है, तो यह आशंका बनी रहती है कि अभिव्यक्ति की वे सूक्ष्म कोशिकाएं-जिनके सहारे अनुभव बाहर की ओर आकार लेता है- कहीं क्षतिग्रस्त न हो जाएं।

सबसे बड़ी चुनौती मौन और संयम के अनुवाद की थी। गुजराती में अनेक भाव, अपमान और सामाजिक दूरी सीधे कथन के बजाय अधूरे वाक्यों, ठहरावों और संकेतों के माध्यम से व्यक्त होती है। दलित साहित्य के अनुवाद में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि अनुवादक कहां हस्तक्षेप करे और कहां स्वयं को रोक ले। कई बार अर्थ को स्पष्ट करने या भावनाओं को थोड़ा खोल देने का प्रलोभन आता है, किंतु ऐसा करना मूल पाठ और उसकी आंतरिक राजनीति को भंग कर सकता है। इसलिए मेरे सामने एक चुनौती यह थी कि जो मूल में अनकहा है, उसे उसी तरह अनकहा रहने दिया जाए।

दूसरी प्रमुख समस्या जाति से जुड़े सामाजिक संकेतों की थी। गुजराती पाठ में जाति प्रायः प्रत्यक्ष नामकरण के माध्यम से नहीं आती। वह इस बात से पहचानी जाती है कि कौन कहां खड़ा है, कौन पहले बोलता है, कौन किसकी ओर आंख मिलाकर नहीं देखता। इन संकेतों को स्पष्ट कर दूं तो पाठ पर अनावश्यक व्याख्या आरोपित हो जाती और मौन बनाए रखूँ तो कुछ अर्थ छूट जाने का जोखिम रहता। इस संतुलन को साधना एक सूक्ष्म चुनौती थी।

जिज्ञासा: उपन्यास में विस्थापन और स्थानांतरण की समस्या को आप किस रूप में देखती हैं?

किरन सिंह:‘मुलक’ में विस्थापन और स्थानांतरण केवल विषय नहीं, बल्कि उपन्यास की आंतरिक संरचना और उसकी संवेदनात्मक धुरी हैं। यहां विस्थापन किसी एक घटना के रूप में नहीं बल्कि पूरे पाठ में अनकहे, बिखरे हुए और अनुभवजन्य रूप में उपस्थित है।

उपन्यास के दलित पात्र उसी गांव के हैं जहां पीढ़ियों से उनके पूर्वज बसे रहे हैं, फिर भी वे सामाजिक रूप से ‘बाहर’ हैं। वे गांव की अर्थव्यवस्था को श्रम से जीवित रखते हैं, किंतु निर्णय, सम्मान और अधिकार से वंचित हैं। यह स्थिति भौगोलिक विस्थापन नहीं, बल्कि अपने ही स्थान में पराया बना दिए जाने की पीड़ा है।

उपन्यास में शहर की ओर जाने की आकांक्षा भी है, किंतु शहर को मुक्ति-स्थल के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। वहां जाति समाप्त नहीं होती, केवल अपना रूप बदल लेती है। वह और अधिक सूक्ष्म और संस्थागत हो जाती है। इस प्रकार मूक यह स्पष्ट करता है कि विस्थापन उस स्थिति का नाम है, जहां व्यक्ति कहीं भी पूरी तरह ‘घर’ में नहीं होता।

जिज्ञासा: क्या इस उपन्यास में अभिव्यक्त सवर्ण और अवर्ण की रेखाओं में अतीत और वर्तमान के बीच कोई अंतर अनुभव होता है?

किरन सिंह: मूक का अनुवाद करते हुए यह अनुभव लगातार गहराता गया कि सवर्ण और अवर्ण के बीच की रेखाएं अतीत और वर्तमान के बीच किसी स्पष्ट काल-विभाजन का अनुसरण नहीं करतीं। जाति यहां सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि स्थान, व्यवहार, दृष्टि और मौन के माध्यम से कार्य करती है।

एक सामान्य पाठक इसे अतीत की कथा समझ सकता है, किंतु अनुवादक के लिए यह वर्तमान की संरचनात्मक सच्चाई बनकर सामने आती है। भाषा बदलते ही यह भ्रम हो सकता है कि सामाजिक दूरी भी बदल गई है, जबकि वास्तविकता में अपमान और बहिष्कार के रूप केवल आधुनिक हो गए हैं।

जिज्ञासा: कानून की बंदिशों के बावजूद क्या सामाजिक विषमता समाप्त हो पा रही है?

किरन सिंह: समकालीन भारत में कानूनों के माध्यम से सामाजिक विषमता को नियंत्रित करने के प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। संविधान, आरक्षण नीति और अत्याचार निवारण जैसे कानूनों ने भेदभाव के खुले रूपों पर अवश्य अंकुश लगाया है। किंतु कानून का प्रभाव प्रायः व्यवहार तक सीमित रह जाता है, वह चेतना को अनिवार्य रूप से रूपांतरित नहीं कर पाता।

आज जाति-आधारित अपमान और बहिष्कार सार्वजनिक हिंसा की जगह अधिकतर मौन, संस्थागत और निजी रूपों में घटित होते हैं-और यही उनका सबसे जटिल और खतरनाक रूप है।

सामाजिक परिवर्तन केवल दंड, आदेश या संवैधानिक शब्दावली से नहीं होगा और चेतना का विकास एक धीमी, आंतरिक और नैतिक प्रक्रिया है। यह अनुभव, संवाद, शिक्षा और साहित्य से आकार लेती है। आंबेडकर का यह विचार मेरे लिए मार्गदर्शक रहा है कि कानून सामाजिक परिवर्तन का साधन हो सकता है, किंतु उसकी जड़ें सामाजिक चेतना में ही होनी चाहिए।

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समीक्षित पुस्तकें :

  1. दूर देश के परिंदे, अनामिका, राजकमल प्रकाशन, 2026, मूल्य 499 रुपए
  2. सरक फंदा,वंदना राग, राजकमल प्रकाशन, 2026, मूल्य 399 रुपए
  3. मुलक – दलपत चौहान, अनुवाद- किरन सिंह, राजकमल प्रकाशन, 2025, मूल्य 250 रुपए

12/24/47/1-सी, मुइर रोड, ट्रैफिक पुलिस लाइन के पास, प्रयागराज-211001 मो.9415616083

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