शंभुनाथ
अब भाषा पर टकराव है, मुनादी तमिलनाडु से हुई है। अमेरिका के डलाश शहर के तमिल डायस्पोरा तक इसकी प्रतिध्वनि है। नए युग में सत्ता अपने आधुनिक अभियानों में अतीत के प्रेतों को साथ रखती है।
तमिलनाडु में पिछले दिनों कहा गया, ‘हिंदी भारतीय भाषाओं को निगल रही है। भाषा का युद्ध शुरू हो चुका है, हम तैयार हैं।’ (द हिंदू)। पश्चिम बंगाल की बौद्धिक दुनिया में पूछा जा रहा है, ‘क्या यह अच्छा लग रहा है कि अब हमारे ग्लोबल होने के लिए अंग्रेजी और नेशनल होने के लिए हिंदी है। अपने राज्य की भाषा सीखना, बोलना, पढ़ना, सुनना सब प्रांतीय गंवारूपन है!’ (आनंद बाजार पत्रिका)। पश्चिम बंगाल में तमिलनाडु की तरह उग्रता नहीं है, पर महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली आदि राज्यों की तरह यहां भी कृत्रिम सामाजिक विभाजन कई तरह से व्यक्त होता रहता है।
एक सवाल यह है, क्या हिंदी या कोई भी अन्य राष्ट्रीय भाषा सीखकर नव-उदारवादी विश्व में रोजी-रोजगार मिलेगा? बड़े नगरों में हिंदी माध्यम के विद्यार्थी कम होते जा रहे हैं और स्कूल भवन जर्जर हो चुके हैं। एक क्लर्क भी अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाना चाहता है। समझदार लोग जानते हैं कि नए भारत में अंग्रेजी के सामने हिंदी या कोई भी राष्ट्रीय भाषा मैटर नहीं करती, लेकिन सत्ता संघर्ष के लिए विभाजन की आग सुलगाने में वह अचानक बड़े काम की चीज हो जाती है!
इस घटना की तुलना बूंदी के नकली किले को तोड़ने से की जा सकती है। राजस्थान के एक राजा के बूंदी के असली किले को न जीत पाने पर उनकी प्रण-रक्षा के लिए नकली किला बनाया जाता है। नकली किला पर ही हमला होता है, नकली किले की रक्षा के लिए ही व्यक्ति जान देते हैं। भाषा के मामले में ऐसे ही नकली किले बन रहे हैं और उनपर हमले हो रहे हैं। अंग्रेजी-प्रभुत्ववाद का असली किला अपनी जगह ज्यों का त्यों हैं!
क्या हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं को निगल रही है
इधर कहा जाना शुरू हुआ है कि हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं को निगल रही है। उदाहरणस्वरूप भारत की कुल आबादी में हिंदी बोलने वालों की संख्या 1991 में 39.29 प्रतिशत और 2001 में 41.03 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 43.63 प्रतिशत हो गई। जबकि बांग्ला बोलने वालों की संख्या 1991 में 9.20 से कम होना शुरू करके 2001 में 8.11 प्रतिशत तथा 2011 में 8.03 प्रतिशत हो गई। तमिल बोलने वालों की संख्या 1991 में 6.32 से कम होना शुरू करके 2001 में 5.91 प्रतिशत और 2011 में 5.70 प्रतिशत हो गई। उर्दू को देखें, उर्दू बोलने वालों की संख्या 1991 में 5.18 प्रतिशत से कम होना शुरू करके 2001 में 5.01 प्रतिशत और 2011 में 4.19 प्रतिशत पर आ गई। ये सरकारी आंकड़े ‘लैंग्वेज : इंडिया, स्टेट्स एंड यूनियन टेरिटरीज’ (2018) के हैं। यह मामला अब पेंडोरा बॉक्स है, विपत्तियों की आंधी!
आखिर हिंदी बोलने वालों की संख्या क्यों बढ़ रही है और कुछ अन्य महत्वपूर्ण भारतीय भाषाएं बोलने वालों की संख्या क्यों घट रही है? यह भाषिक स्थानांतरण का मामला है जिसपर तथ्यों की रोशनी में विचार किया जाना चाहिए।
हिंदी बोलने वालों की संख्या बढ़ने का एक कारण हिंदी क्षेत्र की अन्य भाषाओं- बोलियों को मातृभाषा मानना जारी रखने की जगह लोगों का विलंब से आधुनिक हिंदी की तरफ ‘आत्मीय भाषिक स्थानांतरण’ है। 2018 में प्रकाशित उपर्युक्त सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 52.83 प्रतिशत हिंदी भाषियों के बीच में 32.22 करोड़ लोग मानक हिंदी का तथा 20.61 करोड़ लोग इस क्षेत्र की बोलियों का व्यवहार करते हैं। गौर करने की चीज है, एक मगही भाषी जब गैर-मगही हिंदी क्षेत्र में जाता है या एक भोजपुरी भाषी गैर-भोजपुरी हिंदी क्षेत्र में, उसे हिंदी में बात करना जरा भी अस्वाभाविक नहीं लगता। वह यदि धीरे-धीरे अपने को हिंदी भाषी कहने लगे, इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है।
मुख्य बात है, हिंदी क्षेत्र की विभिन्न बोलियों और करीबी भाषाओं के लोगों का अपनी-अपनी स्थानीय परंपराओं को न छोड़ते हुए हिंदी को अपनी भाषा समझना स्वाभाविक है। हालांकि यह जातीय से अधिक सामाजिक घटना है, अर्थात ‘हिंदी जाति’ नहीं, ‘हिंदी समाज’!
हिंदी एक उदार और बहुसांस्कृतिक राष्ट्रीय भाषा है। लेकिन हिंदी का कई क्षेत्रों में स्वाभाविक सामाजिक प्रसार अभी बाकी है। अभी भी बहुतों द्वारा इसे मातृभाषा मानना शेष है। निश्चय ही हिंदी बोलने वालों की संख्या वृद्धि की वजह ‘आत्मीय भाषिक स्थानांतरण’ है जो हिंदी द्वारा अन्य भारतीय भाषाओं को निगलना या बलात आत्मसातीकरण नहीं है, जैसा हिंदी में दरारें पैदा करने के उद्देश्य से कहा गया। हिंदी क्षेत्र की बोलियां और भाषाएं ही हिंदी की मांएं हैं। हिंदी क्षेत्रों में हिंदी बोलने वालों की संख्या बढ़ने की एक वजह इन क्षेत्रों में अन्य जगहों की तुलना में अधिक जनसंख्या-वृद्धि है। दरअसल ऐसे मामलों के विस्तृत क्षेत्र-अध्ययन की जरूरत है।

हिंदी को अन्य राष्ट्रीय भाषाओं के साथ ही उठना या साथ ही गिरना है
हिंदी को उसके विलंबित राष्ट्रीय विकास में देखने की जरूरत है। देश की मान्यताप्राप्त क्लासिकल भाषाओं, अर्थात 1500 सालों से पहले अस्तित्व में आ चुकी भाषाओं- तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, बांग्ला आदि के जातीय विकास में प्राचीन और औपनिवेशिक व्यापारिक गतिविधियों का बड़ा योगदान रहा है। कालीकट, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसी जगहों का तीव्र नगरीकरण हिंदी क्षेत्र के किसी भी नगर से बहुत पहले हुआ था। उपर्युक्त भाषाओं को औपनिवेशिक प्रोत्साहन भी मिला था। हिंदी को ये सुविधाएं सुलभ नहीं हुईं। 19वीं सदी में हिंदी के औपनिवेशिक दमन और हिंदी-उर्दू झगड़े को हवा देने का जो काम अंग्रेजों ने किया, उसके इतिहास को यहां दुहराने की जरूरत नहीं है।
हम जानते हैं कि हिंदी का लगभग 1200 सालों का दीर्घ इतिहास है। यह हमें समझने का अवसर देता है कि सिद्धों और नाथों के युग से शुरू होकर कितने कठिन रास्तों से गुजरते हुए इसका एक कितने विराट क्षेत्र में धीरे-धीरे विकास हुआ। देखा जा सकता है, सिद्ध सरहपा और नाथपंथी गोरख की वाणी में धार्मिक पाखंडों का विरोध और सामाजिक सुधार की आवाज है। एक तरह से हिंदी का जन्म प्रतिवाद से हुआ था। उसका विकास एक ‘साझी भाषा-साझी संस्कृति’ के रूप में हुआ। इसलिए हिंदी से प्रेम का अर्थ है इस देश के ‘साझे जीवन-साझी संस्कृति’ से प्रेम!
यह समझना जरूरी है कि एक दीर्घ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बावजूद 19वीं-20वीं सदियों में हिंदी कितने अधिक झगड़ों-झंझटों से गुजरते हुए राष्ट्रीय भाषा बनकर उभरी है। वह नि:संदेह किसी राजनीतिक टेस्ट ट्यूब में नहीं बनी, बल्कि उसका लंबी ऐतिहासिक-भाषिक सरणियों से स्वाभाविक विकास हुआ। एक बड़ा क्षेत्र होने के कारण उसके विकास के मार्ग में कठिनाइयां ज्यादा थीं। इसके अलावा, हिंदी को जो विरोध झेलने पड़े, वे तमिल, मराठी या बांग्ला को नहीं झेलने पड़े थे।
हिंदी राजभाषा के रूप में जितना काम करती है, उससे ज्यादा वह बदनाम है। आज ऊंचे पद तक पहुंचाने वाली भाषा अंग्रेजी है। देश के सभी बड़े शिक्षण संस्थान अंग्रेजी माध्यम के हैं। समाज में इज्जत और सुरक्षा अंग्रेजी पढ़ने से है। हिंदी वे पढ़ते हैं, जो गरीब या साधारण वर्गों के हैं। हिंदी पढ़ने का अर्थ है मुख्यत: शिक्षक, अनुवादक बनना। हिंदी पर बढ़-चढ़कर गर्व करना पेशे की मजबूरी हो सकती है, पर हिंदी की वास्तविक हालत बहादुरशाह जफर जैसी है जो नाममात्र का बादशाह था। हिंदी का दर्द भी जफर के दर्द-सा है!
हिंदीतर राज्यों में एक प्रचार यह है, आप भूखे नहीं रहेंगे यदि हिंदी जानते हैं, अर्थात- हिंदी मतलब तुरंत नौकरी। हिंदी मतलब बहुत पैसा। हिंदी मतलब केंद्र। हिंदी के विरुद्ध इस तरह के प्रचार होते हैं। कहना जरूरी है कि हिंदी लोगों के भी दुख-कष्ट वैसे ही हैं जैसे हिंदीतर राज्य के लोगों के। इनेगिने काइयां होंगे जो हिंदी की सेवा करने के नाम पर हिंदी का सेवन करते हों।
ऐसा बिलकुल नहीं है कि हिंदी की सामाजिक प्रतिष्ठा और उपयोगिता अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में बढ़ गई है। नए विश्व में हिंदी की नियति अन्य राष्ट्रीय भाषाओं की नियति से भिन्न नहीं है। दरअसल हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं को साथ ही उठना या साथ ही गिरना है।
गौर करने की जरूरत है कि पश्चिमी देशों में भारतीय लेखकों के केवल अंग्रेजी में लिखे साहित्य को ही भारतीय साहित्य कहा जाता है। वहां न हिंदी साहित्य की पूछ है, न तमिल, मराठी या बांग्ला साहित्य की। ऐसे प्रश्नों पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
अंतरराष्ट्रीय भाषिक अन्याय का अंत कैसे हो
वैश्वीकरण के बाद दुनिया में अंग्रेजी बढ़ी है और अन्य भाषाओं का महत्व कम हुआ है। किसी अन्य मामले में भले नहीं, पर भाषा के मामले में दुनिया एकध्रुवीय हुई है। अंग्रेजी को छोड़कर दुनिया की अन्य सभी भाषाओं के सामने तीन बड़े संकट उपस्थित हैं- एक, अन्य सभी भाषाओं के पास संसाधनों की कमी होती जा रही है। दो, अन्य सभी भाषाओं की राजनीतिक-आर्थिक क्षमता घट गई है और तीन, इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में व्यापक ह्रास आया है।
इधर एक नया गुब्बारा उड़ा है, विश्व भाषा के रूप में हिंदी! क्या इसका अर्थ दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी के ग्लोबल सम्मेलन करना और कुछ खास व्यक्तियों का खाना-पीना-घूमना है? क्या यह मिथ्या गौरवबोध के लिए है? मेरी दृष्टि में विश्व भाषा के रूप में हिंदी के संघर्ष का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय भाषिक अन्याय के विरुद्ध हिंदी का संघर्ष। यदि जातियों की दौड़ में कुछ जातियों के पिछड़ जाने से सामाजिक न्याय की मांग उठती है (और यह वाजिब है), तो भाषाओं की दौड़ में अंग्रेजी के सामने हिंदी सहित अन्य राष्ट्रीय भाषाओं के पिछड़ते जाने पर भाषिक न्याय की मांग क्यों नहीं उठनी चाहिए?
दुनिया में संपत्ति के स्तर पर ही विषमता नहीं बढ़ी है, भाषा के स्तर पर भी विषमता बढ़ी है। इधर भाषिक गूंगे बढ़े हैं। वे सुने नहीं जा रहे हैं, क्योंकि अंग्रेजी में नहीं बोल रहे हैं!
किसी भी भाषा की ‘साधन संपन्नता’ का अर्थ है, उस भाषा में ऊंचे स्तर के कितने अनुसंधान हो रहे हैं, तकनीकी उपकरणों की कितनी उपलब्धता है और उस भाषा में किस-किस ज्ञान क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। किसी भाषा की ‘क्षमता’ का अर्थ है विकसित वर्गों द्वारा उसका प्रगति के लिए कितना उपयोग हो रहा है और वह भाषा व्यक्ति को कितना निर्भय बनाती है। किसी राष्ट्रीय भाषा की ‘सामाजिक प्रतिष्ठा’ का अर्थ है, वह सत्ताधारी वर्गों में कितनी प्रतिष्ठा से देखी जा रही है और कितनी दया से देखी जा रही है!
फिलहाल तस्वीर यह है कि देश की सभी राष्ट्रीय भाषाएं और खासकर हिंदी वस्तुतः उपभोक्ताओं के पॉकेट तक पहुंचने की भाषा है। वह मतदाताओं के वोट तक पहुंचने की भाषा है। असल सवाल हैं, हिंदी और अन्य राष्ट्रीय भाषाएं उच्च ज्ञान तक कितना पहुंचा रही हैं, वे अभी भी आधुनिक जीवन शैली का अंग कितनी बनी हुई हैं?
एक जगह अंग्रेजी काआतंक देखने को मिला। एक जेनरल स्टोर में चार साल का बच्चा चाकलेट की ओर इशारा करके कह रहा था, ‘मुझे यह लेना है’। माँ अंग्रेजी में बोलते हुए बार-बार उसे अंग्रेजी में मांगने के लिए प्रेरित कर रही थी। वह हिंदी में बोले जा रहा था। माँ अगल-बगल के लोगों को देखकर शर्म से गड़ती जा रही थी और अपने बच्चे पर उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था!
हम अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन वैश्वीकरण के बाद उसके प्रभुत्व विस्तार से दुनिया की राष्ट्रीय भाषाओं का महत्व कम होते जाने से चिंतित जरूर हैं। हमारे देश की राष्ट्रीय भाषाओं का सांस्कृतिक विश्व धीरे-धीरे खो रहा है। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं की तरह ही राष्ट्रीय भाषाओं पर उपस्थित संकट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का विषय बनाना चाहिए।
आज केवल हिंदी ही नहीं मराठी, पंजाबी, तमिल, मलयालम, बांग्ला सभी की सामाजिक प्रतिष्ठा में ह्रास आया है। अंग्रेजी कई दृष्टियों से उपयोगी है पर हमारी मनुष्यता, हमारी संवेदना, हमारा हँसना-रोना वस्तुतः हमारी अपनी भाषा में ही संभव है। हम इसे निरंतर साधनहीन होते और हाशिये पर जाते नहीं देख सकते।
कुछ लोग भाषा को राष्ट्रीय टकराव के लिए संवेदनशील बना देते हैं, जबकि राष्ट्रीय भाषाओं पर घिरे नए संकट को लेकर सामूहिक चिंता पहली आवश्यकता है। 2018 की उपर्युक्त रिपोर्ट के अनुसार कुल भारतीय भाषाएं 1369 हैं, जबकि राष्ट्रीय भाषाएं 22 हैं और ये देश की लगभग 95 प्रतिशत आबादी द्वारा बोली जाती हैं। राष्ट्रीय भाषाओं की शक्ति पर आम जनता की शक्ति निर्भर करती है। इसलिए ‘संकटग्रस्त भाषाओं’ के रूप में पहचानी जाने वाली भाषाओं को लेकर चिंता कीजिए, पर इसके साथ राष्ट्रीय भाषाओं पर उपस्थित संकट को भी समझने की जरूरत है।
विभिन्न प्रांतों में अंग्रेजी में लिखते-पढ़ते, सोचते और काम करते हुए हिंदी का विरोध करना आसान है। इसे सत्ता के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना भी आसान है। लेकिन विश्व बाजार की आंधियों में अपनी राष्ट्रीय भाषा के सांस्कृतिक विश्व को उजड़ने से बचाना कठिन होता जा रहा है। राष्ट्रीय भाषाओं के बीच शत्रुता की जगह प्रेम और संवाद के पुल बनाना जितना जरूरी है, उतना ही यह दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।

क्या हिंदी अब केवल मनोरंजन उद्योग की भाषा है
आमतौर पर हिंदी भाषियों में अपनी भाषा को लेकर उस तरह का सांस्कृतिक भावावेग नहीं है, जिस तरह बंगालियों, तमिलों, मराठियों आदि में अपनी-अपनी भाषा और इसकी विरासत को लेकर है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग उपेक्षा से देखे जाते हैं। वे कई जगहों पर गिरमिटिया प्रोफेसरों के बल पर चल रहे हैं और अधोमुखी हैं। हिंदी पुस्तकें-पत्रिकाएं खरीद कर पढ़ने वाले पाठक हिंदी आबादी की तुलना में नगण्य हैं। वे ऑनलाइन पर पढ़ते हैं, यह एक भ्रम है। इस विडंबना पर गौर करना चाहिए कि हिंदी घरों में अंग्रेजी तेजी से घुस रही है।
हिंदी हिंदी समाज के सांस्कृतिक भावावेग की भाषा केवल तब बनेगी, जब लोगों में हिंदी की कला-साहित्यिक परंपराओं से प्रेम होगा और इसकी सांस्कृतिक विविधता से नाता होगा। इन चीजों का अभाव है। इसलिए खुद हिंदी वालों में हिंदी से वास्तविक प्रेम न्यूनतम है। उन्हें अपनी जाति और जिला से ज्यादा प्रेम है!
इन दिनों हिंदी के सामने एक बड़ा संकट यह है कि उसे 19वीं-20वीं सदी के साहित्य की आधुनिक परंपराओं से विशेष रूप से विच्छिन्न किया जा रहा है और साधारण कोटि के साहित्य को उच्च आसन पर बैठाने की कोशिशें हैं!
साहित्य क्या है? वह हमारी भाषा का वैभव है। वह विभिन्न दिशाओं से हमारी संवेदना, सौंदर्यबोध और मूल्य चेतना को उत्कर्ष प्रदान करता है। कई लोग इतिहास-भुलक्कड़ होते हैं, पर इधर कुछ इतिहास-खंड-खंडक लक्षित किए जा सकते हैं। आज अगर हिंदी जीवन में सिर्फ राजनीति ही बची हुई है तो मान लेना होगा कि सबकुछ नष्ट हो चुका है।
क्या हिंदी सिर्फ इसलिए सुरक्षित है कि यह मनोरंजन उद्योग की भाषा है? अखबारों और न्यूज चैनल को भी मनोरंजन उद्योग का हिस्सा समझना चाहिए। किसी दूसरी भारतीय भाषा में हास्य-वीर रस के फूहड़ कवि सम्मेलन नहीं होते, पर लाखों खर्च करके हिंदी में खूब होते हैं। क्या देश में हिंदी भाषियों के बौद्धिक स्तर में अपेक्षाकृत ज्यादा गिरावट आई है, हिंदी क्षेत्र में बौद्धिक सतहीकरण बढ़ा है?
कई लोग अब हिंदी को सिर्फ हिंदी फिल्मों, गानों और म्यूजिक की वजह से जानते हैं। हिंदी लोगों में पॉप सिंगरों के लिए दीवानगी है, पर अपने महान साहित्यकारों के प्रति जरा भी सम्मान भाव नहीं है। उच्च म्यूजिक-तकनीक से हिंदी फिल्मी गानों और ऊपर हाथ- नीचे कमर हिलाने वाले कंसर्ट ने साहित्यक बोध को ढक-उजाड़ दिया। हमें पता भी नहीं, हम क्या खोते जा रहे हैं।
आजकल बहस में अपशब्दों और कुतर्कों का सबसे अधिक प्रयोग हिंदी में हो रहा है। चिंताजनक है कि हिंदी को लेकर हो-हल्ला होता है, पर हिंदी आज तक ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं बनाई जा सकी। हिंदी के विद्यार्थी नए तकनीकी ज्ञान और कलाओं से नहीं जोड़े जा सके। हिंदी आज भी अंधेरी दुनिया में है।
देखा जा सकता है कि हिंदी का इधर व्यावसायिक और राजनीतिक प्रबंधन बढ़ा है। इसमें छल और झूठ का सबसे अधिक प्रवेश हुआ है। यह आज इमोशनल और अतार्किक भाषा के रूप में ज्यादा छाई हुई है। इन दिनों जिस भाषा का ‘डिसइन्फॉर्मेशन’ के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल हो रहा है, वह हिंदी है। हिंदी को चैटिंग की भाषा प्रभावित कर रही है। कहना न होगा कि आज जीवन पर संकट है, इसलिए भाषा पर भी संकट है। इसका अर्थ है, हिंदी का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
भारत में भाषाओं की विविधता को कई तरह से देखा जा सकता है
भारत में भाषाओं की विविधता को एक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए, हालांकि इस देश में विविधता के प्रति जागरूकता का अभाव है। जबकि विविधता ही वस्तुत: लोकतंत्र की सबसे बड़ी गारंटी है। ताजा समय में जब अमेरिका अंतरराष्ट्रीयता से हाथ खींच रहा है, दुनिया के हर देश की तरह भारत पर भी यह दायित्व आ गया है कि वह राष्ट्रीयता की रीढ़ को मजबूत करे, जो विविधता है।
सवाल है कि विविधता के प्रति लोगों में सराहना की प्रवृत्ति कैसे पनपे और वर्चस्व की महत्वाकांक्षा कैसे मिटे। इस मामले में अंतरभाषाई संवाद सहायक होगा। समस्या यह है कि इस तरह का संवाद जितना स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में था, अब नहीं है। अब हर लेखक या बुद्धिजीवी अपनी भाषा के सांस्कृतिक घेटो में रहता है, अपने छोटे-छोटे सुविधायुक्त आधुनिक कबीलों में। उसकी मानसिकता फिलहाल ‘स्थानीयतावादी’ अधिक है। चिंताजनक है कि आमलोगों को भी अपने गहन ‘लोकल’ में सुरक्षा ज्यादा दिखती है, भले मजा वे ‘ग्लोबल’ का लेते हों!
जाहिर है, भाषागत-प्रदेशगत पहचानों के बीच गैप दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। दूसरे राज्यों में जाकर बसे लोग, खासकर हिंदी भाषी सम्मान से नहीं देखे जाते। भाषायी अल्पसंख्यकों का सांस्कृतिक अकेलापन बढ़ता जा रहा है। यह कितना चिंताजनक है कि भारतीय होना एक नुकसानदायक मामला बन गया है। निश्चय ही सर्वत्र एक ‘हायर सेल्फ’ की जरूरत है जो तनाव फैलाने वाले वक्तव्य की जगह तार्किक संवाद और सद्भाव के जरिए ही उपलब्ध हो सकता है। भारत शांति की भूमि बने, इससे पहले उसका ज्ञान की भूमि बनना जरूरी है। हालांकि 21वीं सदी ज्ञान से विद्रोह की सदी है!
उत्तर और दक्षिण भारत दोनों जगहों पर इधर नस्लीय, धार्मिक और जातिवादी विद्वेष बढ़ाए जाने के कारण छोटे स्वार्थों की पूर्ति तो हो जा रही है, पर भारत आत्मज्ञान खोकर भयानक दरारों की तरफ बढ़ रहा है। हम अपनी उच्च परंपराओं और बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य भूलते जा रहे हैं। गलतफहमियां ही सत्य के रूप में प्रतिष्ठित हो रही हैं। बड़े लोगों की चालाकी और आम लोगों की निस्सहायता बढ़ रही है।

हिंदी प्रेम का अर्थ
हिंदी से प्रेम का अर्थ है हिंदी की 1200 साल की साहित्यिक परंपराओं से प्रेम, एक समावेशी सांस्कृतिक बोध। हिंदी की बौद्धिक-सांस्कृतिक विविधता से प्रेम के बिना हिंदी से प्रेम की कल्पना नहीं की जा सकती। हिंदी की आक्रामक छवि का निर्माण आत्मघातक है। इससे हिंदी का प्रसार नहीं होगा, उल्टे ‘बाहरी-भीतरी’ का सामाजिक विभाजन बढ़ेगा। हिंदी विशेषाधिकार की नहीं, प्रेम की भाषा है। यह तोड़ने वाली नहीं, जोड़ने वाली भाषा है। हिंदी का वास्तविक बल उसका संख्या बल नहीं है, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विविधता और परस्परनिर्भरता है।
मैं आगरा के एक संस्थान में था, तब मैंने ‘हिंदी ध्वन्यालोक’ की कल्पना की थी। मैं एक ऐसा ऑडियो संग्रहालय बनाना चाहता था, जहां देश में जहां-जहां जितनी तरह से हिंदी बोली जाती है उनके उच्चारण की ऑडियो क्लिप हो। पता चले हरियाणा के लोग हिंदी में कैसे बोलते हैं, राजस्थान में कैसे बोलते हैं, बिहार या दिल्ली में कैसे बोलते हैं। छोटे-छोटे भाषा- बोली क्षेत्रों के लोग हिंदी कैसे बोलते हैं! बहुत कुछ नहीं कर सका, यह भी नहीं हो सका।
यह समझने की जरूरत है कि किसी देश का विकास केवल आर्थिक वृद्धि से नहीं होता, इसके लिए मनुष्य-मनुष्य के बीच धर्म, जाति, भाषा से ऊपर उठकर परस्पर प्रेम और सहयोग भी जरूरी है। यह एक ऐसी सामाजिक पूंजी है जिसका निर्माण सैकड़ों-हजारों साल में होता है, पर यदि सत्ता संघर्ष में संकीर्णता आई तो उसे खोने में तनिक देर नहीं लगता। हमारा देश सामाजिक प्रेम की बलि देकर कभी विकसित भारत नहीं बन सकता।
एक न एक वजह से देश की हर घरेलू सरहद आज उत्तप्त है। हर तरफ तनाव है। तनाव अब एक उर्वरक है। घी जितना बढ़िया हो, पर आग में घी की जरूरत नहीं है। हिंदी से प्रेम का अर्थ है, सामाजिक विभाजन की चीजों और पक्षपात से बचना। ध्यान में रहना चाहिए, यह सब बूमरैंग करता है। हिंदी से प्रेम का अर्थ है अपनी सैकड़ों साल की उदारवादी सामाजिक थाती को विकसित करना, आत्मलिप्तता से बाहर आना।
हम जिस तरह भारत की विस्तृत भूमि से अन्न-जल ग्रहण करते हैं, सभी जगहों का भोजन पसंद करते हैं, उसी तरह देश की सभी भाषाओं से प्रेम करना सीखें। इस युग में हर तरफ चुपचाप एक अद्भुत भाषायी अंतर्मुखता छा गई है। लोग दूसरी राष्ट्रीय भाषाओं के बारे में, दूसरे राज्यों के दुख-सुख के बारे में जानना नहीं चाहते। दूसरी भाषाएं सीखना और दूसरी भाषाओं के अनुवाद पढ़ना हमेशा मानव चित्त को बड़ा बनाता है, पर इस ओर प्रवृत्ति घट रही है। अब लोग अनुवाद पढ़ेंगे भी तो पश्चिमी या अफ्रीकी- लैटिन अमेरिकी साहित्य का। उनके भीतर यह जिज्ञासा प्राय: सो गई है कि हमारे पड़ोसी राज्य की साहित्यिक घटनाएं क्या हैं? लोकल के बाद वे सीधे ग्लोबल हैं!
यदि हम गौर करें, भारतीय भाषाओं के साहित्य के सबसे ज्यादा अनुवाद हिंदी में हुए हैं। हिंदी चित्त में सदा से एक भारतीय विराटता है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए। हिंदी का जो एक महान विविधतापूर्ण सांस्कृतिक विश्व है। उसे नष्ट होने से बचाने का अर्थ है इस देश की सैकड़ों साल की श्रेष्ठ सामाजिक पूंजी को बचाना और उसे झाड़-झंझार से बाहर लाना।
आज एक बड़ी चुनौती यह है कि हम बहुभाषिकता को किस तरह संबोधित करें और मानवता को समझने के लिए कैसे पाठ तैयार करें कि अन्य ‘अन्य’ न लगे। शिक्षा का एक बड़ा उद्देश्य हमारी भावनात्मक रिक्तता को, कह सकते हैं कि भावनात्मक दरिद्रता को दूर करना है।
मेरा उस भाषा में दम घुटता है, जिसमें स्मृति एक कुंआ हो और कल्पना एक बड़ा पत्थर! अभिनवगुप्त ने एक जगह लिखा है, ‘मैं शैव हूँ, बौद्ध नहीं, लेकिन बौद्धों से तर्क किए बिना हमारा शैव-शाक्त दर्शन तैयार नहीं होता!’ यह है दर्शनों का संवाद। इसी तरह देश की विभिन्न भाषाओं और दुनिया की सभ्यताओं के बीच संवाद जरूरी है। ध्यान में रहे, बर्बरताएं ही टकराती हैं, सभ्यताएं हमेशा संवाद करती हैं। जब बहस में हम ‘अन्य’ (अदर) को सुनते हैं तो थोड़ा और मनुष्य हो जाते हैं!
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