शंभुनाथ

 

क्या भारतीयता में कोई आकर्षण नहीं है, क्या यह 20वीं सदी का एक फ्यूज्ड बल्ब है? देश में स्वार्थ कभी इस तरह सर्वोपरि नहीं हुआ था। इसलिए अब धर्म, जाति और प्रांत-आधारित धारणाओं में ज्यादा आकर्षण है। लोगों की भारतीय पहचान धूमिल होती जा रही है।

भारतीय राष्ट्र ऐसा है जिसकी भोर होते-होते फिर रात आ गई। यह जितनी मुश्किल से हासिल हुआ, उतनी ही आसानी से कुछ को काल्पनिक और कुछ को बोझ लगने लगा है। एक समय भारतेंदु, प्रेमचंद, निराला आदि लेखक जब भारत कहते थे, इसका एक बड़ा अर्थ था। आज किसी का भारत उसके धर्म में है, किसी का उसकी जाति में है, किसी का उसके प्रांत में है। कुछ के खुद ही भारत बन जाने के उदाहरण हैं। आज ‘राष्ट्र राज्य’ जब तेजी से ‘बाजार राज्य’ में बदल रहा है और इसमें रोशनियों की बाढ़ है, मनुष्य को अपने भीतर का अंधेरा अंधेरा नहीं लग रहा है।

गांधी ने 100 साल पहले, 1925 के ‘यंग इंडिया’ में एक महत्वपूर्ण बात कही थी, ‘हमें भारत को जीना सीखना होगा।’ भारत को जीने से दो अन्य चीजें जुड़ी हैं- भारत को जानना और बदलना। भारत को जीने में कुछ खामियां रह गईं जिनके कारण इस देश को जानने और बदलने के मार्गों में गड़बड़ियां पैदा हुईं। लोग भूल गए कि उन्हें भारत को जीना सीखना है।

दरअसल भारत के लोग क्या थे, क्या हो गए और अभी क्या होंगे, ये सवाल हर युग में रहेंगे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली ने 1946 में स्वतंत्रता की देहरी पर कहा था, ‘मैं महसूस करता हूँ कि भारत लोकतंत्र के सिद्धांतों पर चलने वाला एक ऐसा देश बनेगा जो एशिया का प्रकाश हो सकता है।’ दुनिया के लोग भारत की स्वतंत्रता में एशिया का नया भविष्य देख रहे थे।

लोग तब औपनिवेशिक ध्वंसावशेष पर स्वतंत्र भारत को लेकर बड़े-बड़े सपने देखते थे, नई-नई कल्पना करते थे और इन्हीं नई लहरों में भारत का संविधान बना। दूसरी तरफ, देश को मुक्त करके गए अंग्रेज शासक इतने शरीफ लगने लगे कि उनके द्वारा न केवल देश की हुई बहुतरफा तबाही ओझल होने लगी, बल्कि उनकी विदाई के साथ उपनिवेशवाद के प्रति बौद्धिक सम्मोहन बढ़ता गया। बुद्धिजीवियों के एक वर्ग को अंग्रेजी राज की भूमिका प्रगतिशील लगने लगी। कुछ लोग अपने देश का पुराना अंधेरा मिटाए बिना अपने को एशिया का प्रकाशस्तंभ समझने लगे।

इस विडंबना को समझना चाहिए कि 1947 से कुछ समय बाद ही भारत के लोग समाज से पुन: समुदाय में बंद किए जाने लगे। अंग्रेजों ने अपनी कूटनीतिक विद्वता से जिन सामुदायिक खाइयों को सींचा था, नवोदित उदार समाज को तोड़कर वे फिर चौड़ी की जाने लगीं। नायक पूजा बढ़ने लगी तो विचार मरने लगे। बड़े स्वप्न नारे बनकर रह गए या सिकुड़ने लगे। हां, टेक्नोलॉजी के विकास के साथ संविधान की छपाई जरूर अधिक सुंदर होती गई।

क्या चर्चिल सही था

भारतीयता का भोली ‘अंतरराष्ट्रीयता’ में विसर्जन या ‘स्थानीयता’ में कठोर संकुचन पिछले सौ सालों की सबसे बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी है। फ्रांस में ऐसा बहुत कुछ है जो केवल ‘फ्रेंच’ है, अमेरिका में ऐसा बहुत कुछ है जिसे खासतौर से ‘अमेरिकन’ कहा जाता है और इसी तरह जापान में बहुत कुछ ‘जापानी’ है। भारत में ऐसा क्या है जिसे हम ‘भारतीय खूबी’ कह सकते हैं? क्या ‘अमेरिकन’, ‘फ्रेंच’, ‘इंग्लिश’, ‘जापानी’, ‘चीनी’- ये यथार्थ हैं और ‘इंडियन’ एक काल्पनिक मामला है?

‘भारतीय राष्ट्र’ को एक काल्पनिक समुदाय या एक अवास्तविक कल्पना के रूप में देखने की धारणा मुख्यत: बेनडिक्ट एंडरसन के विचारों की देन है। उसने राष्ट्रीयता के लिए न केवल इकहरे यूरोपीय राष्ट्रवाद को मॉडल बनाया, बल्कि इसे सिर्फ ‘प्रिंट कैपिटलिज्म’ के उदय तक सीमित रखकर सरलीकृत भी किया। उपनिवेशवाद से गुजरे भाषिक-सांस्कृतिक बहुलता वाले देश भारत में राष्ट्रीयता के उदय के विशिष्ट स्वरूप से वे अपरिचित थे, बल्कि भारतीय समाज की औपनिवेशिक तोड़फोड़ उनकी नजर में कोई मुद्दा न थी।

एंडरसन से पहले भी भारतीय राष्ट्रीयता के अस्तित्व को नकारने की घटनाएं हैं। एक उदाहरण अंग्रेज सज्जन एडवर्ड ऑटन की दुर्लभ पुस्तक ‘माइ मेमोरीज ऑफ इंडिया’ है।  उन्होंने 1909-16 के बीच कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में इतिहास पढ़ाया था। वे बंगाल के शिक्षा विभाग में निदेशक बने। उन्होंने भारत को नजदीक से देखा था। उन्हें श्रीअरविंद पसंद नहीं आते थे, जो उस समय राष्ट्रवादी राजनीति में सक्रिय थे, पर उनके मझले भाई मनमोहन अच्छे लगते थे जो अंतरराष्ट्रीयतावादी थे। उन्हें वे भारतवासी अच्छे लगते थे जो पोलो-क्रिकेट खेलते हों, अंग्रेजों के साथ टेबल पर बैठकर लंच लेते हों। उन्हें भारतीय होना संकुचित होना लगता था।

एडवर्ड ऑटन अकबर की महानता का भावातिरेक में वर्णन करते हुए लिखते हैं, ‘अकबर एक नई रोशनी का बादशाह था, लेकिन उसमें भारतीय ढंग का आत्मगौरवबोध भी था।’ ऑटन को राष्ट्रीय आत्मगौरव के प्रसंग देश को सभ्य बनाने में बाधक नजर आते थे। अकबर ने 16वीं सदी के अंतिम दशकों में कई बार अंतरसामुदायिक बहसों का आयोजन कराया था और बहुलता को स्वीकृति दी थी, जैसा उससे पहले किसी राजा या सुल्तान-बादशाह ने नहीं किया था। अकबर कई इस्लामी रूढ़ियों का विरोधी था, उससे मुस्लिम कठमुल्ले खफा थे। सामान्यत: अंग्रेजों ने अकबर की जगह औरंगजेब के प्रसंगों की ज्यादा याद दिलाई।

एक दूसरा उदाहरण चर्चिल का है। वह कहता था, ‘भारत कई टुकड़ों का बंडल है’। वह मानता था कि इतनी भिन्नताओं से भरा देश कभी इकट्ठा और स्वाधीन नहीं रह सकता। क्या आजकल के अंतर्देशीय टकरावों को देखते हुए हमें लगता है कि उसका कथन सही था?

सिकंदर के समय से दुनिया ने भारत को एक देश के रूप में देखा है। विदेशी यात्री ह्वेनसांग, फाहियान, इत्सिंग और अलबिरूनी भारत को एक देश के रूप में देखकर गए थे। कालिदास ने ‘मेघदूत’ में भारत देश की झलक दिखाई है और प्रेम का संदेश दिया है। 1200 सालों तक भक्त कवि लगातार ‘अ-पर’ का संदेश देते रहे हैं। लेकिन नस्लवादी चर्चिल को भारत में कुछ भी ‘भारतीय’ नहीं दिखा और वह भारत को ‘कई टुकड़ों का बंडल’ कहता रहा।

बौद्धिक उपनिवेशवाद से प्रभावित भारतीय बुद्धिजीवियों ने भी भारत को हमेशा ‘टुकड़ों’ में देखा और खंड-खंड पाखंड खड़ा किया। उन्होंने हाशिये की कुछ समस्याओं को सूक्ष्मता से जरूर उजागर किया, लेकिन वे समस्याओं और समस्याओं से जूझने वालों के बीच पुल नहीं देख पाए। क्या वे चर्चिल की उक्तियों को सिद्ध कर रहे थे?

भारतीयता एक कल्पित धारणा नहीं है

दुनिया में समाजवाद नहीं आ पाया। अंतरराष्ट्रीयता बिखर गई। लोकतंत्र अधिकांश देशों में न्यूनतम बचा है। आधुनिकता जीवन शैली में आई, जीवन दृष्टि में नहीं आ पाई। राष्ट्रीयता को व्यक्तिवाद और कई दूसरी बुराइयों ने खोखला कर दिया। आज धर्मनिरपेक्षता अलोकप्रिय है। क्या तब समाजवाद, अंतरराष्ट्रीयता, लोकतंत्र, आधुनिकता आदि कल्पित फेनोमेनां हैं, अ-वास्तविक हैं?

पिछले सौ सालों में हमारे देश में किसिम-किसिम के अंतरराष्ट्रीयतावादी हुए। उनमें कुछ अपने को ‘विश्व मानव’ और कुछ ‘विश्व क्रांतिकारी’ समझते थे। उनके लिए देश हमेशा एक छोटी जगह रही है। उन सभी ने अपने-अपने नशे में भारतीयता की धारणा को अवास्तविक माना, जबकि अंतरराष्ट्रीयतावाद खुद एक कल्पित भावना में बदल गया- कल्पित बंधुत्व, कल्पित स्वतंत्रता और कल्पित समानता! दूसरी तरफ, देश में मतांधता से प्रेरित धारणाएं इतनी मजबूत होती गईं कि यथार्थ खंडित और धूमिल होते गए। बहुत से लोग पेड़ की एक डाल लेकर उसे ही नचा-नचाकर पूरा पेड़ बताने लगे। वे पूरे भारत की चिंता नहीं करते। वे कहते हैं- ‘लोकेल फर्स्ट’!

अब धर्म और जाति के बाद स्पर्धा में  प्रांतीयतावादी प्रचार जोरों पर है। हिंदी भाषियों को लेकर तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब आदि में ‘बाहरी’ की उग्र धारणा से देश के सुलगने का खतरा है। दरअसल एक संकीर्णता दूसरी संकीर्णता को बढ़ाती है। फलस्वरूप देश खंड-खंड रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे लोगों के दृष्टिपथ में प्रेम नहीं घृणा है। घृणा सत्ता का श्रोत है। इसके कई रंग हैं, पर नतीजा एक है- विनाश!

नि:संदेह सैकड़ों साल से जाति व्यवस्था और स्त्री-पुरुष असमानता बड़ी चुनौतियां हैं। इनके विरुद्ध उठी आवाजें सच्ची हैं। आदिवासियों का जल, जंगल और जमीन से प्रेम स्वाभाविक है। लेकिन 21वीं सदी का विश्व नई समस्याएं लेकर आया है जिनका सामना पिछली सदी की खंडवादी मानसिकता से नहीं किया जा सकता। साथ ही, हजारों साल की भारतीय पहचान की खोज और अ-पर के बोध से विच्छिन्न होकर भी नहीं किया जा सकता।

भारत के लोग हजारों साल की उथल-पुथल के बीच से बने हैं। वे विविधता के बावजूद सहयात्री रहे हैं। मुश्किल है कि हम आज भी नहीं जान पाए हैं कि इनके लक्ष्य कहां भिन्न हैं और कहां सामान्य हैं, विशिष्ट हितों के साथ इनके साझा हित इतने कम क्यों हैं। हम यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत के लोग अपने बारे में खुद कुछ सोचने और फैसला लेने के लिए अब कितने स्वतंत्र रह गए हैं।

इन दिनों दुनिया के देश वैश्वीकरण से कठोर राष्ट्रवाद की तरफ मुड़ रहे हैं। वैश्वीकरण लक्ष्य-भ्रष्ट हो चुका है और राष्ट्रवाद यदि फिर एजेंडे पर है तो इसके परिप्रेक्ष्य के रूप में भारतीयता को समझना होगा। फिलहाल इसपर चर्चा खाइयों में फँसी है।

कहना न होगा कि भारत के किसान, श्रमजीवी, दलित, स्त्रियां, आदिवासी, अन्य वंचित और मध्यवर्ग के जागरूक लोग ही भारतीय राष्ट्र की बुनियाद हैं। लेकिन वैश्वीकरण के युग में ‘आर्थिक उदारीकरण-सामाजिक अनुदारता’ की जोड़ी ने इनकी एकता को तोड़ दिया है। इस युग में खंड-खंडवादी अस्मिता की राजनीति ने अपने पृथक-पृथक सैद्धांतिक ड्रेस बना लिए हैं। किसी को किसी ‘अन्य’ से मतलब नहीं है।

निश्चय ही भारतीयता कोई गलनघट नहीं है जिसमें सभी धर्म, जातीयताएं, जनजातियां या लोग अपनी विशिष्ट पहचान खोकर एक तत्व हो जाएं। भारतीयता का सबकुछ ‘एक’ हो जाने से विरोध है। उसका ‘मुख्यधारा’ की कल्पना से विरोध है। भारतीयता में ‘शुद्ध’, ‘मूल’ और ‘असली’ की खोज की जगह ‘साझा जीवन-साझी संस्कृति-साझा संघर्ष’ प्रधान तत्व है। इस मामले में समझदारी विकसित करके ही जाना जा सकता है कि हम भारतीय क्यों हैं!

कवि निराला ने कहा था, ‘जिस भारतीयता के गर्व से दूसरे तुच्छ जान पड़ते हैं, वह भारतीयता में कुछ रूढ़ियों से चलती हुई अभारतीयता है।’ (1933)। इस कथन से स्पष्ट हो सकता है कि हमें कैसा भारतीय होना चाहिए। एक समय भारतीयता में ‘प्रभुत्व’ की जगह ‘साझा’ और ‘हार्मोनी’ की बात होती थी। मुश्किल यह है कि भारत के लोग इतिहास-भुलक्कड़ हैं।

दरअसल हमें अपनी स्मृतियों के घर में जमी धूल बुहारते रहना चाहिए, जैसे अपने कमरों को रोज साफ रखते हैं। मेरे जैसे लोगों को यह देखकर तकलीफ होती है कि देश में अंध-राष्ट्रवादी आवेश में ‘दूसरों’ के विरुद्ध जहर उगला जा रहा है। यह जहर लोक चेतना में फैल रहा है। एक न एक को निशाना बनाकर विद्वेष फैलाना आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। कहना न होगा कि इस समय कमजोर लोग जिस भी शहर-गांव में जिस भी धर्म, जाति या प्रांत के हों, वे भय से भरे हैं और सुरक्षित नहीं हैं।

हमारी अर्जित अस्मिता कहां खोती जा रही है

चिंताजनक है कि आजकल व्यक्ति की पहचान इससे निर्धारित होती है कि दूसरे लोग उसे किस रूप में देखते हैं। अब कोई व्यक्ति मनुष्य नहीं दिखता। ब्राह्मण दिखता है, दलित दिखता है, आदिवासी दिखता है, मुसलमान दिखता है। कभी दक्षिण भारतीय, कभी उत्तर भारतीय दिखता है और कभी तिब्बती-बर्मी मूल का। भारत में कोई व्यक्ति भारतीय नहीं दिखता। यह एक बहुत बड़ी विडंबना है, यह मानसिक पिछड़ापन है।

मनुष्य के पास एक पूर्वप्रदत्त परंपरागत अस्मिता होती है और एक अर्जित अस्मिता। अर्जित अस्मिता वह है जो शिक्षा और श्रम से अर्जित की जाती है, जैसे- वकील, शिक्षक, जज, डाक्टर, लेखक, दुकानदार, सरकारी कार्मिक, चपरासी होना! इसी तरह ‘भारतीय’ भी एक अर्जित अस्मिता है। आज व्यक्ति स्वतंत्र नहीं है कि वह अपनी पहचान खुद चुन सके।  तिब्बती-बर्मी मूल के व्यक्ति को देश के महानगरों में देखकर कुछ शरारती उन्हें चीनी कह देते हैं। मुसलमान को देखते ही कइयों को लगता है कि पाकिस्तान का आदमी है।

यह हम कहां आ गए कि दूसरे बता रहे हैं कि हम क्या हैं और खुद नहीं पहचान पा रहे हैं कि हम कौन हैं। 1947 में जब स्वतंत्रता मिली थी, गरीबी थी पर संस्कृति उत्थान पर थी। आज भौतिक समृद्धि के बड़े-बड़े द्वीप हैं पर सांस्कृतिक उजाड़ है।

हमारे देश के नागरिकों को अपनी पहचान चुनने की स्वतंत्रता नहीं है। कोई लाख चाहे तो भी वह भारतीय के रूप में देखा नहीं जाता। यदि नाम से साफ पता नहीं चलता है तो लोग खोदकर उसकी जाति जानने के लिए उत्सुक रहते हैं!

यह भी देखा जा सकता है कि ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’ किस तरह अपराधों को सांस्कृतिक वैधता देती है। अपनी जाति का आदमी माफिया हो, वह समाजसेवी दिखता है। दूसरे धर्म या जाति के आदमी की लिंचिंग करके जो हत्या कर दे, वह वीर दिखता है। सियारामशरण गुप्त की एक कहानी है ‘आखिरी आकांक्षा’। इसमें एक दलित नौकर रमला (रामलाल का विकृत रूप) के हाथों मालिक का घर लूटने के लिए आए डाकू की हत्या हो जाती है। सभी उसकी बहादुरी पर प्रसन्न होते हैं। लेकिन जैसे ही देखते हैं कि मृत डाकू की देह पर जनेऊ है, वे डाकू की जगह दलित रमला पर दोष मढ़ने लगते हैं! तर्क का पहिया तत्काल पटरी बदल देता है।

वस्तुत: जब यह सिद्धांत काम करने लगता है कि यह हमारे समुदाय का आदमी है, तब उसका अपराध अपराध नहीं लगता। यही वजह है कि आज भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और स्थानीय गुंडागर्दी सांस्कृतिक आश्रय पाकर खूब फल-फूल रहे हैं। कूपमंडूकता भी अब पॉप कल्चर का हिस्सा है।

इतिहास में इनकी पदचापों को सुनना चाहिए

भारत की परंपराओं में ऐसा बहुत कुछ है जो भेदभाव से भरा और दमनात्मक है। उसमें सांप्रदायिक भेदभाव ही नहीं धार्मिक पाखंड, जाति उत्पीड़न, स्त्री पर-अधीनता, स्वेच्छाचारिता, हिंसा, अंधविश्वास  और न जाने ऐसी कितनी चीजें हैं। आमतौर पर भारत कहते ही आपस में लड़ते-झगड़ते राज्यों और एक अनगिनत समुदायों वाले तनाव-भरे देश का बिंब सामने आता है। यह बिंब  जितना सैकड़ों साल पुराना है, उतना ही आज भी ताजा है।

इतिहास पीछा करता है। अतीत के प्रेत ऊधम मचाते हैं। पर इसी इतिहास में भारत के लोगों के श्रम-सौंदर्य के बहुत से स्मारक हैं। धर्मों में उच्च आदर्श हैं। साहित्य में विपुल ज्ञान और संवेदना है। लघु चित्त से ऊपर उठकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘असतो मा सद्गमय:’ जैसी बातें हैं। भारत के इसी इतिहास में सृष्टि से एकात्मता और ‘अ-पर’ का बोध लेकर ॠषि-कवि आते हैं, बुद्ध और लोकायतिक आते हैं, संत-भक्त आते हैं, सिद्ध-नाथ आते हैं, सुधारक आते हैं, इंकलाबी आते हैं। हमें भारत के इतिहास में उनकी पदचापों को सुनना चाहिए।

भारत के अतीत में सबकुछ इकहरा, पाखंड-भरा और दमनात्मक नहीं है जैसा कुछ सांस्कृतिक उच्छेदवादी बताते रहे हैं। उसमें सुंदर और मूल्यवान बहुत कुछ है जिसमें सबका साझा हो सकता है। उसकी उपयोगिता हिंदू-मुसलमान, ब्राह्मण-दलित, स्त्री-आदिवासी, मराठी-तमिल-हिंदी-बांग्ला आदि सभी भाषाभाषियों के लिए है। इस साझी विरासत की पहचान के बिना भारतीयता और भारतीय पहचान को समझना मुश्किल है। इधर कई लोग तालाब में जहाज पकड़ने के लिए खड़े हैं!

हमारे देश में ‘अंश’ की पृथकतावादी चेतना से ऊपर उठे हुए ‘समग्रता’ के जो द्रष्टा रहे हैं, उन्हें निश्चय ही कई बार अपने ही देश में विलगाव झेलना पड़ा है। वेदव्यास को महाभारत में कहना पड़ा, ‘ऊर्ध्यबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे’, अर्थात अपने दोनों हाथ उठाए मैं चिल्लाकर कहता हूँ, पर मेरी कोई नहीं सुनता! फिर भी हर अंधेरे में ऐसे लोग थे जो प्रकाशस्तंभ बनकर खड़े थे। वे शांति और समृद्धिमय भारत की धारणा रच रहे थे।

यह ध्यान में रखने की जरूरत है कि भारतीयता में केवल संस्कृत से ही सबकुछ नहीं आया। तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं, लोक साहित्य और कलाओं से भी बहुत कुछ आकर शामिल हुआ है। वस्तुतः बुद्धिपरक समावेशी दृष्टि से ही  भारतीयता को समझा जा सकता है, जिसका फिलहाल अकाल है।

आज कई ज्ञानी व्यक्ति मधु में फूलों के अलग-अलग रंग-रस खोज रहे हैं। कबीर अपनी अस्मिता घोषित कर रहे थे, ‘तू बाभन मैं काशी का जुलाहा’, पर यह भी कह रहे थे, ‘कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर’। वे जुलाहाबोध तक सीमित नहीं थे, सबकी खैर चाहते थे। उनकी पहचान का गहरा संबंध अपृथकताबोध से है। महादेवी वर्मा कहती हैं, ‘अली मैं कण कण को जान चली/सबका क्रंदन पहचान चली।’ सबका क्रंदन सुनने के लिए एक बड़ी सोच चाहिए।

पश्चिम में ‘आइडेंटिटी’ की बुनियाद ‘पृथकता’ है, जबकि भारतीय दृष्टि में पहचान और अपृथकता में अंतर्विरोध नहीं है। हर युग में सत्ता का खेल है ‘पृथकता’ पैदा करना, जबकि जागरूक लोक हमेशा ‘साझा जीवन-साझी संस्कृति’ लेकर चला है।

इसमें संदेह नहीं कि अलग-अलग सामुदायिक आवाजों से इनके समर्थ प्रतिनिधियों के लिए स्पेस बनता है, पर जमीनी यथार्थ में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आ पाता। ज्यादा से ज्यादा यह होता है कि वंचित समुदायों के भी कुछ लोग वर्चस्व का हिस्सा बन जाते हैं। वे ‘चिह्न’ बना दिए जाते हैं। लोग अपने को खोकर चिह्नों के खेल का मैदान बन जाते हैं।

अंततः बड़े चिह्न छोटे चिह्नों को निगल लेते हैं। इसलिए चिह्नों के कुओं से निकालकर एक नई दृष्टि से साझी भारतीय राह भी खोजनी होगी, यदि स्वेच्छाचारिताओं से बचना है।

समाज की अलग-अलग चीखें एक सामूहिक संकल्प में ढलें, इसके लिए किसी बिंदु पर अस्मिताओं का पिघलना और इतिहास का पुनर्गठन जरूरी है। लेकिन हमारे देश में ऐसे ज्ञानियों की संख्या पिछले दशकों में बढ़ी है जो भारत की साझी विरासत को पहचानने से परहेज करते हैं और दो-चार ग्रंथों, दो चार नामों, घिसे-पिटे विचारों, नायक पूजा तथा चुनी हुई चुप्पियों से काम चलाते हैं। उनकी दृष्टि न आलोचनात्मक है और न समावेशी।

हमारे देश में विविध रूपों में पृथक अस्मिता का अहंकार इधर काफ़ी बढ़ा है। छोटे-छोटे अनगिनत ट्रंप पैदा हो गए हैं, जबकि हमें सह विकास, आलोचनात्मक समावेशिकता और नवोन्मेषों के बारे में सोचने की जरूरत है।

भारतीयता का बोध तभी निर्मित होगा, जब अपनी संस्कृति का कैदी होंकर दूसरी संस्कृतियों के बारे में और अपनी पहचान का कैदी होकर दूसरी पहचानों के बारे में शत्रुतामूलक धारणाएं निर्मित करना बंद होगा। इधर के सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययनों में उच्छेदवाद और संरक्षणवाद दोनों पनपे हैं। दोनों ही निर्बुद्धिपरकता की देन हैं। लगता है, इधर अंग्रेजों के औपनिवेशिक पाठ अधिक प्रेरक हो उठे हैं।

भारतीयता में जरूरी है कि देश ही नहीं विश्व में और ‘दूसरों’ में भी जो सारवान है उसे शामिल किया जाए और जो अनावश्यक है उसको त्यागा जाए। शुद्धतावाद नहीं मिश्रणशीलता ही सदा से भारत की परंपरा है।

क्या हमने सबकुछ खो दिया सिवाय जंजीरों के

भारतीयता की बुनियाद है मानवता। यह ऐसी चीज है जिसे अति संवेदनहीन दौर में भी नष्ट नहीं किया जा सकता। यह मनुष्य की प्राकृतिक शक्ति है, भले वह कभी वि-मानवीयकरण का शिकार हो जाए। नि:संदेह मानवता से बौद्धिकता और सहृदयता अविभाज्य हैं। नजीर अकबराबादी की कविता ‘आदमीनामा’ की पंक्तियां हैं :

यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी।

आदमी के भीतर बुरी-अच्छी दोनों चीजें हैं। कोई किसी की जान लेने के लिए प्यासा है तो कोई जान बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा देता है। ट्रेन दुर्घटना के समय कराहते यात्रियों को लूटने वाले और बचाने वाले दोनों तरह के लोग देखे गए हैं। हर दौर में चीख को सुनने वाले लोग रहे हैं। वर्तमान युग में जब पूरी सभ्यता की छत चू रही है, यह नहीं सोचना चाहिए कि कोई कमरा सुरक्षित बचेगा। मरम्मत पूरी सभ्यता की करनी होगी। इस दुनिया को एक नई छत चाहिए।

ऐसा समय बार-बार आया है जब इतिहास में दबा दी गई चीखें इतिहास को सुधारते और पुनर्गठित करते हुए सामने आई हैं। आज का दौर भी इतिहास का आखिरी बिंदु नहीं है। कोई जितना भी शक्तिशाली हो, वह इतिहास को एक निश्चित बिंदु में सीमित नहीं कर सकता। एक समय आता है जब वर्चस्ववादी ताकतें इकट्ठी हो जाती हैं। लक्षित किया जा सकता है कि पिछली सदी में दुनिया के गरीब इकट्ठे नहीं हो सके, बड़े-बड़े पूंजीपति एक हो गए। उनकी शिखरवार्ताएं होती हैं, गरीबों की शिखरवार्ताएं नहीं हो पातीं। क्या उन्होंने सबकुछ खो दिया है सिवाय जंजीरों के?

भारत दिखाई दे और भारतीयता न दिखे यह कैसी बात हुई

समुदाय और समाज में फर्क है। समुदाय में कोई व्यक्ति स्वेच्छा से शामिल नहीं हो सकता, जबकि समाज एक ‘कॉमन प्लेस’ है। 19वीं सदी और 20वीं सदी के 60-70 के दशकों तक हमारे देश के समुदाय पिघल कर समाज बन रहे थे, पर इन दिनों केवल मॉल-मल्टीप्लेक्स या बाजार में कॉमन प्लेस है। समाज में लोग हाथियों-हिरणों, कौवों-कबूतरों की तरह अब अपने-अपने झुंड में दिखाई देते हैं। इसलिए भारतीयता के बारे में सोचना कठिन होता जा रहा है और यह एक बड़ा संकट है।

भारतीय महाजातीयता की परियोजना अधूरी रह गई जिससे भेदभाव ब़ढ़े हैं, अत्याचार बढ़े हैं। भारतीय मनुष्य अस्मिता के कैदखानों में अपना बहुत कुछ खोता गया है। दरअसल लोकतंत्र के दुरुपयोगों ने भारतीय महाजातीयता को संकट में डाला। आज देश का मनुष्य कितनी देर तक भारतीयता के उच्च लहरमान पर रहेगा और कब अचानक अपने धर्म, अपनी जाति या प्रांतीयता के चौखटे में घुसकर हिंसक हो उठेगा, कहा नहीं जा सकता। शिक्षित वर्गों के लोग ही हमें समुदाय से समाज में लेकर आए थे, अब शिक्षित वर्गों के नए लोग समाज से फिर समुदाय में ले जा रहे हैं। यह सफलता की ओर खुलने वाला द्वार है जो तात्कालिक फायदा और दीर्घकालिक विनाश की ओर ले जाता है।

19वीं-20वीं सदियां यदि ज्ञान के विस्फोट की सदियां थीं, 21वीं सदी अज्ञान के विस्फोट की सदी है। यह विडंबनाओं और विरोधाभासों से भरी सदी है। यह ज्ञान बल से ज्यादा भौतिक बल की सदी है। ऐसे हालात में भारतीयता के बारे में कौन सोचेगा? भारत दिखाई दे और भारतीयता न दिखे, यह कैसी बात हुई! आखिर यह इतनी अमूर्त भी नहीं है। दरअसल हमें भारत को जीना सीखना होगा।

अभी आंधी है, पतंग नहीं उड़ सकती। कन्नी हाथ में थामी जा सकती है, पतंग फड़फड़ाए तो कम से कम!