शंभुनाथ

 

आज के उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में क्या यह माना जाए कि आधुनिकता एक निष्फल परियोजना थी और आधुनिक मूल्य निरर्थक थे। 20वीं सदी में दुनिया का कोई समाज पूरी तरह आधुनिक नहीं हो पाया। आज भी हमारे देश में नस्ल, प्रांत, धर्म, जेंडर, जाति, पुराजातीयता आदि के आधार पर भेदभाव और हिंसा मौजूद है, बल्कि कई जगहों पर बढ़ी है। आज भी व्यक्ति का विवेक पर्याप्त उन्नत नहीं हो पाया है। हम ऐसे युग में जी रहे हैं, जब लोकतंत्र के दो बड़े सांस्कृतिक स्तंभ- तर्क और नैतिकता रसातल में हैं।

क्या उत्तर–आधुनिकता एक सांस्कृतिक दिवालियापन है

मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखा है, ‘यदि यह आधुनिक भावबोध ऊँचा उठाया न जा सका और इसके द्वारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक कार्यानुशासन न हो सका तो क्या होगा? खंडनकर्ता खंडित हो जाएगा। मूर्ति-भंजक की स्व-मूर्ति का सिर काट लिया जाएगा।’

खंडनकर्ता कौन है? सामंती रूढ़ियों और एक हद तक उपनिवेशवाद की खंडनकर्ता आधुनिकता है। आधुनिकता मूर्ति-भंजक है। वह 19वीं सदी से ही भारतीय जीवन में उथलपुथल मचाती आ रही थी। वह सदियों की अज्ञानता, सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं, जाति व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वास, अशिक्षा जैसी बुराइयों को चुनौती दे रही थी। वह मानवता, लौकिकता और स्वतंत्रता की बात करती थी।

मुक्तिबोध अपने समय में लक्षित कर रहे थे कि आधुनिकता के आदर्शों को पुराने-नए खलनायक बिगाड़ रहे हैं। आधुनिकता का अर्थ होता जा रहा है नया फैशन, अधिकाधिक सुख और सौंदर्यवाद। आधुनिकीकरण में गति है, पर आधुनिक दृष्टि गायब है। अब एक छद्म आधुनिकता है जो आततायी होती जा रही है। मुक्तिबोध चेतावनी देते हैं, ‘मूर्ति-भंजक का सिर काट लिया जाएगा!’

उत्तर-आधुनिकता द्वारा लगभग 1960 के दशक से आधुनिकता पर बौद्धिक आपत्ति शुरू होती है। उसने एक नए मोड़ पर 21वीं सदी में वस्तुत: समस्त आधुनिक तथा मानवीय मूल्यों के संहार, अतीत की प्रेतलीला और उपभोक्तावाद का रूप धारण कर लिया!

उत्तर-आधुनिकता को बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने दार्शनिक तार्किकता दी है, पर भारतीय संदर्भ में यह स्पष्टत: एक सांस्कृतिक दिवालियापन है। बड़ी संख्या में जनता भी वैश्विक निराशा और अस्तित्वगत संकट के कारण इसमें शामिल है।

वैश्वीकरण के बाद राष्ट्रीय क्षितिज पर सांस्कृतिक हवा तेजी से बदलने लगी थी। सत्य पहले से टुकड़ों में बिखरने लगा था। तर्क पिछवाड़े चला गया था। अब नए सिरे से अनगिनत हम-वे निर्मित किए जाने लगे थे। ‘भिन्नता’ ही सत्ता की गंगोत्री बन गई। 1991 से आर्थिक सुधारों के समानांतर अतीत की निबुर्द्धिपरकताएं लौटने लगीं। बाजार एक होने लगा और समाज विभक्त!

क्या आधुनिकता दमनकारी थी और उत्तर-आधुनिकता मुक्तिदायी है? उत्तर-आधुनिक युग में गंभीर साहित्यिक और दार्शनिक विचारों में किसी की दिलचस्पी नहीं है। नई टेक्नोलॉजी और नए मीडिया की शक्ति से बौद्धिक सतहीकरण का काम आसान हो गया है। मुक्ति के नए राजदूत उभरे हैं जो समाज की जगह समुदाय को प्रधानता देते हैं, जबकि सामाजिक विभाजन और मुक्ति दोनों एक साथ संभव नहीं है। एलीट वर्ग भले पहले से थोड़ा और विस्तृत हो जाए और हर समुदाय से कुछेक लोग उच्च प्रतिष्ठा पा लें, चिह्न बन जाएं पर सामग्रिक मुक्ति असंभव है।

उत्तर-आधुनिक काल को बड़े पैमाने पर भ्रांतियों के निर्माण का दौर कहा जा सकता है, ‘माया महा ठगिनि हम जानी’! बाद्रिला ने इसे ‘हाइपर रियलिटी’ कहा है।

आखिर उत्तर–आधुनिकता क्या है?

उत्तर-आधुनिकता को किसी ने आधुनिकता की संतान बताया तो किसी ने उसका प्रतिवाद। उत्तर-आधुनिकता वस्तुत: आधुनिकता की नहीं, आधुनिकता की विफलताओं की संतान है। यदि वह आधुनिकता की संतान होती, उसमें धार्मिक कट्टरता, प्रांत, जाति और नस्ल के अतीतवादी तत्व नहीं होते। उसमें परंपरा के जीवंत तत्व होते। उत्तर-आधुनिकता आधुनिक विचारधाराओं के संकट का सुयोग लेकर पनपीं जटिल राजनीतिक-सांस्कृतिक स्थितियों की देन है। यह अंतरराष्ट्रीयतावाद को विसर्जित करके ‘एक्ट ग्लोबली- थिंक लोकली’ का एक अनोखा विरोधाभास है जो देश के सामाजिक हितों को विभाजित करता है।

उत्तर-आधुनिक परिदृश्य में लक्षित किया जा सकता है कि दुनिया के प्राय: हर देश के लोग नई टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं पर दूसरी तरफ एक अभूतपूर्व घृणा, अनिश्चितता और भय के माहौल में जी रहे हैं। उत्तर-आधुनिक समय में चरम निर्बुद्धिपरकता और घनघोर अनैतिकता है। इस दौर में भी स्त्रियों, दलितों सहित वंचितों को न्याय नहीं मिल पा रहा है, जिन्हें प्रतीक्षालयों में रखने का आरोप आधुनिकता पर लगाया गया था। वे वस्तुत: ‘चिह्न’ बना दिए गए हैं और कूपमंडूकता का जबर्दस्त पुनरुत्थान हुआ है।

उत्तर-आधुनिक दौर में यथार्थ की जगह ‘चिह्न’ हैं। चिह्न यथार्थ को संकुचित और कई बार निष्कासित कर देते हैं। चिह्नों में लड़ने और तर्क को दबाने की बड़ी ताकत होती है। चिह्नों के लिए भावुकता में आदमी जान दे सकता है। यह भी ध्यान में रखना होगा कि देश में ‘कंफ्लिक्टिंग रियलिटीज’ हैं, यथार्थ की समझ में अटलांटिक दूरियां पैदा हो चुकी हैं। कुछ भी साझा बन और टिक नहीं पा रहा है। सभी ‘भिन्नता’ के चिह्नों से खेल रहे हैं। यह हमारी भाषा पर हमला है, शब्द फुटबॉल हैं।

इस दौर में क्लासिकल संस्कृति और लोक संस्कृति दोनों ही दुरुपयोग की शिकार हैं। जीवन शैली अधिक ‘माडर्न’ होती जा रही है, लेकिन जीवन दृष्टि में संकीर्णता है। लैपटॉप और अंधविश्वास जुड़वा भाई की तरह हैं, क्योंकि बुद्धिवाद अब सामाजिक शक्ति न रहकर केवल तकनीकी बुद्धिवाद तक सीमित है। यथार्थ पहले अंधेरे में था, अब अत्यधिक रोशनी से ढका है!

रामायण की एक कथा में कबंध एक ऐसा विशाल राक्षस है जिसके पास मस्तक नहीं है। उसका शरीर ही मस्तक है। उसके चौड़े सीने में केवल एक आंख है जिससे ज्वाला निकलती रहती है। उसके बड़े पेट में उसका मुंह है और पेट में अनंत भूख है। वह केवल अपने भारी शरीर से सोचता है। क्या आज का आदमी आमतौर पर ऐसा ही नहीं है, अनंत क्षुधा लिए हुए केवल अपनी धड़ से सोचता हुआ? कबंध पहले गंधर्व था, अभिशप्त होकर राक्षस बना। क्या उत्तर-आधुनिकता अभिशप्त आधुनिकता है? वह कबंध-जैसी है, स्मृति और संवेदना से विहीन एक भूखी सत्ता! क्या हमारे मन में कोई अफसोस बचा है मुक्तिबोध का यह कथन देखकर- मूर्तिभंजक का सिर काट लिया जाएगा!

स्मृति पर आक्रमण का अर्थ

मानवता की दो सुदंर चीजें हैं- स्मृति और आशा। ये दोनों चीजें केवल मनुष्यों के पास हैं। स्मृति का संबंध अतीत से है और आशा का भविष्य से। आधुनिकता ने स्मृति की रचनात्मकता को नया विस्तार दिया था, जबकि उत्तर-आधुनिकता उसे एक आक्रामक शक्ति बना लेती है। यदि किसी देश के लोगों की आशाओं को मिटाना हो, यह उनकी जातीय स्मृतियों की रचनात्मकता को समाप्त करके संभव है।

सबसे पहले देखें कि स्मृति के आक्रमण का क्या अर्थ है। स्मृति का आक्रमण अतीत या इसकी किसी परंपरा का लोगों के मन पर इतना अधिक हावी हो जाना है कि वह नई सोच को असंभव बना दे। ऐसी स्थिति में वर्तमान के प्रश्नों के उत्तर अतीत में खोजे जाने लगते हैं। वैश्वीकरण ने शुरू में इस प्रवृत्ति को तगड़ा झटका दिया था और अतीत के ज्यादा बोझ को मानव विकास में बाधक करार दिया था। बाद में अपनी विफलता को ढकने के लिए हर देश में अतीत ही एक बड़ा युद्धास्त्र बना।

‘स्मृति के आक्रमण’ के साथ-साथ ‘स्मृति पर आक्रमण’ उत्तर-आधुनिकता का एक दूसरा हथियार है। यह वर्तमान द्वारा अतीत पर आक्रमण है। स्मृति पर आक्रमण किसी समाज की सभी या कुछ खास सांस्कृतिक स्मृतियों को दबा देना या विकृत करना है। यह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद है जो घरेलू उपनिवेशन की शक्ल भी ले सकता है। इसे विस्मरण की राजनीति भी कहा जा सकता है जब लोग अपने देश की उच्च सांस्कृतिक उपलब्धियों को, अपने महान कवियों, दार्शनिकों और साहित्यकारों को भूलने लगते हैं और हास्यास्पद ही श्रेष्ठ हो जाता है। यह इतिहास के ऐसे हिस्सों को मिटाने का अभियान है जो असुविधाजनक होते हैं, खासकर उन हिस्सों को जिनका संबंध अ-पर के बोध से हो, सामाजिक न्याय से हो और बौद्धिक स्वतंत्रता से हो।

मानवता को भविष्यहीन करने के लिए उसके अतीत पर आक्रमण किया जाता है, जिस तरह एक समय अंग्रेजों ने किया था। वे हमारी जातीय स्मृतियों को विरूपित कर रहे थे, हमारी स्मृतियों पर कब्जा कर रहे थे। उदाहरणस्वरूप उन्होंने रामकथा को आर्य-द्रविड़ संघर्ष की छायाओं में बदल दिया था, जो आज भी भारतीय सभ्यता को तमिल-हिंदी विभेद के रूप में कांटे की तरह चुभता है।

इतिहास को जब-जब राजनीतिक दृष्टिकोण से दुबारा लिखने की कोशिश होगी, कुछ बिंदुओं पर अतीत के प्रति अंधश्रद्धा तथा कुछ बिंदुओं पर अतीत का विस्मरण या अतीत के महान हिस्सों का विस्मरण घटित होगा।

इसलिए सत्ता के राजनीतिक दृष्टिकोण से लिखा गया इतिहास हमेशा अधकचरा होगा। ऐसा इतिहास पढ़ाने का उद्देश्य नौजवानों को विकास के लिए तैयार करना नहीं बल्कि उनके दिमाग को बारूदखाना बनाना हो सकता है। विकास के लिए नौजवान दूसरे होंगे और इतिहास पढ़कर युद्ध करने के लिए नौजवान दूसरे होंगे जो प्रधानत: अभावग्रस्त और गरीब परिवारों के होंगे। जाहिर है, इतिहास की स्वायत्तता हर युग में जरूरी है।

कहना न होगा कि ‘स्मृति का आक्रमण’ वर्तमान को दबाकर तथा ‘स्मृति पर आक्रमण’ अतीत को मिटा या विकृत करके मनुष्यजाति की आशा-आकांक्षाओं को संकुचित कर देता है।

ऐसी घड़ियों में ‘बुद्धिपरक और रचनात्मक समावेशिकता’ की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसी समावेशिकता ही देश के हृदय को खोल सकती है।

हिंदी में आधुनिकता पर ठोस चिंतन क्यों नहीं आया

भारतीय स्थितियों की भिन्नता के बावजूद हिंदी में ‘आधुनिकता’ पर स्वतंत्र चिंतन नहीं आ सका, हलांकि 19वीं सदी से आधुनिकता का विकास एक नहीं कई सरणियों से हुआ था। पिछली दो सदियों ने धार्मिक सुधार, बुद्धिवाद और उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय जागरण तथा जन आंदोलन के दृश्य देखे हैं। वे दो सदियां नवजागरण, छायावाद (रोमांटिसिज्म) और विषमताओं से मुक्ति के लिए श्रमिक आंदोलनों सहित कई लोकतांत्रिक आंदोलनों की साक्षी हैं।

उस दौर की एक बड़ी घटना यह है कि लोगों के मन में प्रश्न उठ रहे थे, पुराने विश्वासों और विचारों की जांच-परख हो रही थी। आधुनिकता का एक बड़ा लक्षण है प्रश्नों का उठना, जबकि प्रश्नों का खत्म हो जाना और अंतिम प्रश्न का भी उत्तर पा जाना उत्तर-आधुनिकता है। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में बड़े पैमाने पर लोग उत्तर-आधुनिक होते गए। वे अपने विश्वासों और विचारों को निरंतर जांचना-परखना, आत्मनिरीक्षण करना भूलते गए। उनके विश्वास और विचार पुन: शाश्वत हो गए।

आधुनिकता ने बंद दिमागों को गहरा झटका दिया था। उन्हें खोला था। दिमागी खुलापन नए विचारों को पूर्वग्रहमुक्त होकर समझने का अवसर देता है। हम प्राचीन साहित्य को पुराने घिसे-पिटे की जगह नए दृष्टिकोण से देख पाते हैं। दिमागी खुलापन ज्ञान, सहिष्णुता और नवोन्मेषों को बढ़ावा देता है। आइंस्टीन ने कहा था, ‘बुद्धि की पहचान ज्ञान नहीं कल्पना है, क्योंकि खुला मस्तिष्क ही कल्पना को जगह देता है।’ इसका एक और गुण है, दिमागी खुलापन हमें दूसरों के विचारों को सुनने की क्षमता देता है।

यह गजब बात है कि हिंदी में प्रेमचंद यथार्थवादी थे, प्रसाद छायावादी थे और अज्ञेय आधुनिक थे। प्रेमचंद और प्रसाद आधुनिक नहीं माने जाते थे!

आधुनिकता पर 1960 के दशक में जब बहस शुरू हुई तो उसे केवल अकेलापन, विलगाव, निस्सहायता, उद्विग्नता, रिक्तता, भय, संत्रास, निषेधवाद और शिल्प के स्तर पर उसे अनेकार्थता, अस्पष्टता, अमूर्तता आदि रूपों में देखा गया। नए आधुनिक लेखक जिन दमनात्मक यथार्थों से घिरे थे, इनके बीच वे विलगाव का अनुभव  करते थे और कई बार आत्मव्यंग्य, आक्रोश या अवांगार्द का रास्ता पकड़ते थे।

कैसी विडंबना है कि एक समय यथार्थवादी लेखन में आधुनिकता अछूत थी और आधुनिकताबोध में यथार्थ वर्जित थे! माना जाता था कि जो यथार्थवादी हैं उन्हें आधुनिक नहीं होना है और जो आधुनिक हैं उन्हें यथार्थ की चिंता नहीं करनी है। इस बौद्धिक संबंध विच्छेद को दिमागी खुलापन पर तभी से बढ़ रहे संकट के रूप में देखना चाहिए।

इस तरह हमारे देश में न केवल आधुनिकता पर ठोस चिंतन नहीं हुआ, बल्कि भारतीय लोग शहरीकरण और आधुनिकीकरण से गुजरते हुए भी अपने दृष्टिकोण को पर्याप्त आधुनिक नहीं बना सके। इस वजह से उनके भावजगत का प्रसार भी न हो सका। यह विचार लोकप्रिय हुआ कि आंगन वाले घर की जगह फ्लैट में रहना, डाइनिंग टेबल पर छुरी-चम्मच से खाना, नए फैशन के कपड़े पहनना, सिगरेट पीना, अंग्रेजी में बोलना ही आधुनिकता है। प्रेमचंद के ‘गोदान’ के होरी-धनिया जिन्होंने अपने बेटे गोबर के दूसरी जाति की एक विधवा लड़की झुनिया से विवाह को मंजूरी दी या निराश्रित अछूत सिलिया चमारिन को अपने घर में जगह दी, वे भला कैसे ‘आधुनिक होने’ के उदाहरण हो सकते हैं!

आधुनिकता का योगदान

आधुनिकता का कोई एक वैश्विक मॉडल नहीं हो सकता। हमारे देश में उपनिवेशवाद से संपर्क के कारण लंबे समय तक पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण पर्याय की तरह देखे गए थे। हमारे जीवन की हर चीज यूरोप से प्रभावित होने लगी थी। कुछ दशक पहले तक हिंदी साहित्य में वही सब ‘आधुनिक’ था, जो यूरोपीय बुद्धिजीवियों द्वारा निर्मित था। यह सब देखकर आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने सवाल उठाया था, ‘क्या अपने स्वतंत्र रूप-विकास की हमारी शक्ति सब दिन के लिए मारी गई?’

आधुनिकता मानवीय स्वतंत्रता की अविराम खोज और परिवर्तन है। मानव इतिहास में आधुनिक काल को एक श्रेष्ठ समय के रूप में देखा गया। कहा गया कि धर्म, सौंदर्यबोध और उद्यम के मामलों में आधुनिक लोगों की बुद्धि परंपरावादियों की तुलना में अधिक परिष्कृत और विकसित रही है। वह सत्य को अधिक गंभीरता से अपनाती है।

आधुनिक काल में ज्ञान का बुद्धिसम्मत पुनर्गठन हुआ। यह दार्शनिक बहस, तर्क और संवेदना के विस्तार का दौर था। वह बौद्धिक स्वतंत्रता का युग था। विश्व में नए अनुसंधान हो रहे थे। इस काल में प्रकृति और मानव प्रगति की धारणाओं, शिक्षा, दर्शन, उद्योग-धंधों के स्वरूप, विज्ञान, व्यापार, कानून, कला, नैतिकता और जीवन शैली पर नए चिंतन, नई कल्पना और नई खोजों का असर पड़ा। प्रिंटिंग प्रेस के उदय ने ज्ञान पर विशिष्ट वर्गों का एकाधिकार समाप्त किया। नगर बढ़े, आधुनिकीकरण का विस्तार हुआ। यह संरक्षणवाद और उदारवाद के बीच टकराव का समय था। नए सामाजिक और बौद्धिक संगठन बनने लगे। पत्र-पत्रिकाएं निकलने लगीं। ‘कॉमन प्लेस’ और स्वतंत्रचेता नागरिक समाज का उदय हुआ। बहुत सीमित पर गांवों की तरफ भी ये हवाएं गईं।

डेढ़ सौ साल की अपनी छोटी-सी विकास यात्रा में आधुनिकता ने तर्क, बुद्धि और अनुभव के बल पर कई प्रचलित रूढ़ियों, झूठी भिन्नताओं और कृत्रिम बाउंडरियों को तोड़ना शुरू किया था। आधुनिकता ने यह काम इस देश की प्राचीन आदर्शवादी और बुद्धिवादी परंपराओं के संपर्क में रहकर किया। विधवा पुनर्विवाह के मामले में विद्यासागर ने परासर संहिता का साक्ष्य दिया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र राधा-कृष्ण के उपासक थे। प्रसाद ने ‘कामायनी’ में शैव दर्शन से अपने को जोड़ा तो ‘तोड़ती पत्थर’ और ‘कुल्ली भाट’ लिखने वाले निराला ने वेदांत से अपने को जोड़ा। स्त्री मुक्ति की आवाज उठाने वाली महादेवी स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी थीं। अज्ञेय ने ‘असाध्य वीणा’ लिखी तो नागार्जुन ने अपने को कालिदास से जोड़ा, ‘कालिदास, सच-सच बतलाना’!

आधुनिकता ने भारतीय समाज को अतीत के अंधकार से बाहर निकालने की कोशिश की। समाज और साहित्य में इसके प्रयोग रूढ़ियों से विद्रोह थे। इसके अलावा, जब एक आधुनिकता  खुद रूढ़ि बन गई, एक दूसरी आधुनिकता ‘प्रचलित’ को तोड़कर सामने आ गई। हर आधुनिक नवोन्मेष एक परिवर्तन का आह्वान रहा है। कोशिशें हुईं, हालांकि आधुनिकता लोगों की मानसिकता बदल नहीं पाई। पितृसत्तात्मक और जाति भेदभाव कायम रह गए, जो आज बढ़-चढ़कर हैं। फिर भी कहा जा सकता है, आधुनिकता ने कभी बाउंड्री नहीं बनाई, इसने बाउंड्री तोड़ी है। वह ‘पर’ निर्मित करके कृत्रिम शत्रु नहीं बनाती, वह ‘अ-पर’ का बोध है। वहसामंतवाद- स्वेच्छाचारिता विरोधी चेतना है। हजारों साल से मानवता अपने को पुनर्परिभाषित करती आई है। इसने आधुनिक काल में भी अपने ‘स्थान’ की सीमाओं में यह काम किया।

उत्तर–आधुनिकता औपनिवेशिक आधुनिकता का नया रूप है

1492 में कोलंबस द्वारा अमरीका की खोज से लेकर 1947 में भारत के स्वाधीन होने तक औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी मॉडल दागों से भरे थे। लक्षित किया जा सकता है कि यूरोप में औद्योगिक आधुनिकता की शुरुआत अमरीका के मूल निवासियों के व्यापक जनसंहार, सांस्कृतिक सफाए और लूट से हुई थी। एशिया की लूट से हुई थी। अफ्रीका से बड़ी संख्या में लोग गुलाम बनाकर अमरीका लाए गए थे।

निश्चय ही आधुनिकता में ही उपनिवेशवाद और अति-भौतिकवाद से विद्रोह की प्रवृत्ति जन्मी। फ्रेंच क्रांति के बुद्धिवादी अग्रदूत वाल्तेयर भले उपनिवेशवाद को ‘सभ्यता के मिशन’ की तरह देखते हों कवि शेली, दार्शनिक कांट, थोरो आदि उपनिवेशवाद के विरोधी थे। 19वीं सदी में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सवाल उठाया था, ‘होहि मनुष्यहि क्यों भए हम गुलाम वे भूप?’

पश्चिमी चिंतन से प्रभावित बहुत थोड़े भारतीय बुद्धिजीवी हैं जो उपनिवेशवाद और आधुनिकता में अंतर्विरोध देखते थे और आधुनिकता को एक भारतीय सोच के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसलिए आधुनिकता की खाल ओढ़कर बौद्धिक उपनिवेशवाद का तरह-तरह से आगमन हुआ। एक तरफ आधुनिकता के नाम पर सांस्कृतिक उच्छेदवाद पनपा। दूसरी तरफ नस्ल, जाति, धर्म, पुराजातीयता, प्रांतीयता आदि के आधार पर ‘भिन्नता’ की विचारधाराएं पनपीं।

यह भी देखने की जरूरत है कि धर्म-चिंतकों की आधुनिक परंपरा में रामकृष्ण परमहंस, रामलिंगम, विवेकानंद, गांधी, श्रीअरविंद जैसे व्यक्ति भी रहे हैं। इन्होंने सुधार, सेवा कार्य और भारतीय चित्त को बड़ा बनाने पर जोर दिया। इन्होंने राष्ट्रीय स्मृतियों में युद्ध के बंकर नहीं बनाए, शांति और प्रेम के गान ढूंढ़े। ऐसे धर्मचिंतक अंग्रेजी राज और आगे चलकर अमरीका के आगे कभी घुटने नहीं टेकते।

आज सुखवादी उपभोक्ता संस्कृति और राजनीतिक भिन्नतावाद का दबाव इतना अधिक है कि सच्ची आधुनिकता के प्रति कोई उत्साह नहीं है। जीवन शैली और सुख-सुविधाएं अत्याधुनिक हैं, पर जीवनदृष्टि से आधुनिकता लापता है। विज्ञान भी चाहिए, पर दृष्टि में उसकी ‘नो एंट्री’ है! घर में आई फोन आ गया, पर मेहमान आने पर चाय लड़की ही बनाएगी। जिंस पहनने वाले की अंगुलियों में ग्रह शांतिकारक अंगूठियां हैं। अंतरिक्ष में यात्री पहुंच गए, पर जाति की दुम अभी तक सलामत है!

आधुनिकता ने नृशंस भौतिक बल पर बौद्धिक बल को प्रधानता दी थी। उसके मुख्य तत्व हैं- भेदभाव मुक्त प्रेम, तर्क की महत्ता, राष्ट्रीय भावना, समानता और लोकतांत्रिक चेतना। ये स्थिर महा-आख्यान नहीं, जैसा उत्तर-आधुनिकतावादियों ने कहा। ये सहृदयता, तर्क और मानवता के उच्च मूल्यों के लिए दीर्घ काल के असमाप्त आंदोलन हैं। बाजारसत्ता और राजसत्ता ने नए उभारों को रौंद दिया। आंदोलन असफल हुए, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि उपर्युक्त सचाइयां निरर्थक हैं।

स्मरण रखना चाहिए, संस्कृतिविहीन आधुनिकता उपभोक्तावाद की देन है, जबकि आधुनिकताविहीन संस्कृति राजनीतिक भिन्नतावाद की देन है। उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद उत्तर-आधुनिकता के एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उत्तर-आधुनिकता वस्तुतः पिछड़ेपन का उत्सव है।

दरअसल तकनीकी महाक्रांति के बाद देश में सचाई सबसे बड़ी ताकत नहीं रह गई, ‘सत्यमेव जयते’ सत्य नहीं रह गया। हर बार जीतने वाला और जो सबसे कुशलतापूर्वक ‘प्रचारित’ है, वह सत्य बन गया।

क्या आधुनिकता की विदाई मानव हित में है

समुदाय-केंद्रिक साहित्य उत्तर-आधुनिक साहित्य है। इसने निश्चय ही इतिहास में दबा हुआ बहुत कुछ उद्घाटित किया और वर्चस्वों को अर्थपूर्ण झटका दिया, पर वह जल्दी ‘होमोजीनियस’ हो गया। हर विमर्श में ‘सच्ची आवाजों’ के बावजूद एकायामी यथार्थ है और केवल चिह्न की प्यास है। वह आर्थिक, पर्यावरणीय और धार्मिक कूपमंडूकता तथा नई तकनीकजनित कई समस्याओं से विमुख है। उसमें प्रेम, प्रकृति जैसी चीजें प्राय: गायब हैं, केवल चयनित स्वानुभव है।

हम देख सकते हैं कि उत्तर-आधुनिकता के तीव्रतम क्षणों में कुछ प्रेरक व्यक्तित्व किस तरह लाभ के लिए खत्म कर दिए जाते हैं। इसका एक उदाहरण अंबेडकर हैं। इन्होंने जिस तरह के लोगों की आलोचना की, वे ही इन्हें माला पहनाने लगे। वे हर सब्जी में आलू जैसे बना दिए गए!

इन दिनों सत्ताएं रामायण के बाली की तरह हैं। वे विपक्ष की शक्तियों का अपहरण कर लेती हैं। आमना-सामना होने पर विपक्ष का आधा बल हमेशा बाली के पास आ जाता था। आज वही बाली सिंड्रोम है!

आधुनिकता ने मनुष्य के अंदर ‘व्यक्ति’ को बचाकर रखा था। व्यक्ति बचेगा, तभी समाज बचेगा। झुंड में व्यक्ति के ‘स्व’ का कोई अर्थ नहीं है, वह झुंड धर्म का हो, जाति का हो, या पुराजातीयता, प्रांतीयता और नस्ल का। उत्तर-आधुनिक दशाओं में ‘व्यक्ति’ का विलोप हो जाता है, झुंड बनते हैं और ‘सामुदायिक चिह्न’ प्रधान हो जाते हैं। तर्क की जगह अंधविश्वास छा जाता है। आधुनिकता नहीं बचेगी तो केवल निर्बुद्धिपरकता पनपेगी। प्रबल विमर्श कमजोर विमर्शों को निगल लेगा। अंतत: स्वेच्छाचारिता का जन्म होगा, ‘डी-ह्यूमनाइजेशन’ बढ़ेगा और हिंसा पनपेगी। हम आज के माहौल में इन चीजों का अनुभव कर सकते हैं।

ग्लोबल परिवेश में ऐसे व्यक्तियों के साथ काम करना पड़ता है जिन्हें हम सामान्यत: नहीं जानते हैं। रोज नए लोग मिलते हैं। पिछले सौ सालों से व्यावहारिक दुनिया में समुदायों से ऊपर उठकर संबंधों का निर्माण हुआ है। जाति, प्रांत और देश के बंधन तोड़कर अनगिनत वैवाहिक संबंध बने हैं। ऐसे लाखों परिवार हैं। प्रेम ने दीवारें तोड़ी हैं। विस्थापन एक जातीयता के लोगों को दूसरी जातीयता के लोगों के बीच ले गया है। दुनिया में सामाजिक अंतर्मिश्रण बढ़ा है। स्पष्ट है, देश का विकास और अंध-समुदायवाद एक साथ संभव नहीं है।

कहने की जरूरत है कि आधुनिकता की परियोजनाओं का पूरा न होना और नीचे तक न पहुंचना औपनिवेशिक विघ्नों तथा ‘नीचे फूट-ऊपर लूट’ की नीतियों की सफलता है। संसार में लालच जितना बढ़ा है, असुरक्षा भी उतनी अधिक बढ़ी है। भय बढ़ा है।

उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद ने मानवीय सहृदयता, मूल्यबोध, तर्क, दिमागी खुलापन और ऐसी सारी चीजों पर हमला किया है जो आधुनिकता को रच रही थीं। उपर्युक्त दोनों ने 21वीं सदी में मानवता को अनिश्चितता की बंद गलियों में खड़ा कर दिया है। दोनों ने आधुनिकता को एक ‘असुरक्षित जोन’ बना दिया है। हम असुरक्षित हैं यदि आधुनिक हैं, हम असुरक्षित हैं यदि सिर्फ नागरिक हैं या सिर्फ मनुष्य हैं!

यह उपभोक्तावाद और राजनीतिक भिन्नतावाद द्वारा लोगों का कैसा सांस्कृतिक आत्महरण है कि मनुष्य खुद कुछ सोच नहीं पा रहा है। वह किसी भी ‘प्रचारित’ सूचना पर संदेह नहीं कर पा रहा है। वह हर बाढ़ में निर्जीव वस्तु की तरह बह रहा है। आखिर कहां की और कैसी चालाकी है कि वह बाजार में एक है, समाज में विभक्त है! वह बाहर से सुखों के बीच चमकता हुआ दिखता है, पर अंत:करण से खोखला है।

इन स्थितियों पर पर्दा डालने के लिए अत्याधुनिक मीडिया के बल पर खंड-खंड-महापाखंड फैलाए जाते हैं। नि:संदेह मानवता के सामने फिलहाल ‘प्रचलित’ और ‘प्रचारित’ दोनों ही बड़े खतरे हैं।

क्या आधुनिकता की विदाई समाज को सचमुच किसी सच्चे विकास की तरफ ले जा सकी? क्या तर्क और सहृदयता का ह्रास कूपमंडूकता से भिन्न कुछ दे सका? क्या उत्तर-आधुनिकताएं पर्यावरण, सामाजिक संबंधों, संस्कृति और रोजी-रोजगार में उन्नति ला पाईं? क्या वे दलितों और स्त्रियों का उत्पीड़न कम कर सकीं? क्या श्रमिकों का सम्मान और उनके अधिकार बच पा रहे हैं? बुद्धिजीवियों के संसार में आत्मलिप्तता चरम पर है, लोभ बढ़ा है और ‘रारि सी मची है त्रिपुरारी के तबेले में’!

आधुनिक पुनर्जागरण की जरूरत

‘अमेरिका फर्स्ट’ से लेकर अंध-राष्ट्रवाद और उत्तर-आधुनिकता के अन्य सभी रूपों तक जब कहीं भी मानव भविष्य सुरक्षित नहीं है आधुनिकता का पुनर्गठन, उत्तर-आधुनिकता में स्पेस और दिमागी खुलापन जरूरी हो उठा है।

नई स्थितियों में आधुनिकता की अपूर्ण परियोजनाओं को हाथ में लेना आधुनिक पुनर्जागरण है। यह मनुष्य में धर्मांधता, जातिवाद, प्रांतीयता जैसी पुरानी सामंती दासताओं से मुक्ति की नई भूख जगाना है। यह लोगों को नकारात्मक स्मृतियों से मुक्त करके सकारात्मक स्मृतियों से जोड़ना है ताकि वे अपने मानवीय अंत:करण की पुन: उपलब्धि कर सकें।

आधुनिक पुनर्जागरण का संबंध ‘पर’ और ‘काल्पनिक शत्रु’ के निर्माण से नहीं, अ-पर के बोध से है। यह निश्चय ही पुरानी आधुनिकताओं को दुहाराना नहीं है बल्कि उनमें लगेमकड़जालों को साफकर आधुनिकता के गुणों- सहृदयता, तर्क, मूल्यबोध, न्याय और दिमागी खुलेपन को मिटने से बचाना है। युग बदला है तो निश्चय ही आज आधुनिकता पहले जैसी नहीं होगी। फिर भी नई स्थितियों में आधुनिक पुनर्जागरण का अर्थ एक बार फिर भिन्नता, बाह्याडंबर और बर्बर कबंध-वृत्तियों को चुनौती देना है।

21वीं सदी का आधुनिक पुनर्जागरण आत्ममुग्ध एलीट वर्गों के प्रयास से नहीं बल्कि स्त्रियों, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, कृषकों, युवाओं तथा अन्य वंचितों के सम्मिलित संघर्ष के बीच से होगा, वह नीचे से होगा। इन लोगों के हाथों ही होगा आधुनिक सोच का पुनर्गठन। यह तभी होगा जब चिह्नों का छल अनावृत्त होगा। लोग अपने संकुचित स्वार्थ और कलह से ऊपर उठेंगे और हमारी सभ्यता को इतिहास की सबसे बड़ी घुटन से बाहर निकालेंगे।

आधुनिक पुनर्जागरण उत्तर-आधुनिकता में स्पेस का निर्माण है, ताकि उत्तर-आधुनिकता और आधुनिकता के बीच टूटा संवाद शुरू हो। दोनों मुक्तदायी सहचर बनें!