शंभुनाथ

21वीं सदी में राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, तकनीकविदों आदि की साहित्य से दूरी एक आम दृश्य है। तीनों किस्म के लोग तुरंत लाभ वाले मॉडल पर चलते हैं, जबकि साहित्य सोचने के लिए समय, संवेदनशीलता और दीर्घकालिक दृष्टि की मांग करता है। देखा जा सकता है कि इन दिनों राजनीतिक दृष्टि से क्षमतावानों और शिक्षित-संपन्न मध्यवर्ग द्वारा साहित्य की उपेक्षा बढ़ती जा रही है। इस घटना से देश-दुनिया की कितनी अधिक भावनात्मक क्षति हो रही है, इसपर विचार करने की जरूरत है।

साहित्य हमें एक भाषा ही नहीं देता हमें स्मृति, करुणा और सौंदर्यबोध भी प्रदान करता है। इसलिए साहित्य से विमुख राजनीति एक सामाजिक क्षय है। राजनीति, व्यापार और तकनीक के संसारों के नेता अब साहित्य को निरर्थक वस्तु समझते हैं। 60-70 साल पहले यह स्थिति नहीं थी, साहित्य पढ़ने-पढ़ाने और लिखने वालों की प्रतिष्ठा थी। लेखक अपना सिर ऊंचा रख पाते थे। प्राचीन काल में ॠषि या कवि आते थे, राजा उठ खड़ा होता था। इन दिनों साधारण मंत्री-विधायक आता है, लेखक खड़ा हो जाता है। कई बुद्धिजीवी और कलाकार राजनीतिक सीढ़ी खोजते रहते हैं। यह दोतरफा पतन है, जिसे समझना चाहिए।

जिस देश-समाज में स्मृति, करुणा, सौंदर्यबोध- एक तरह से भाषा का ध्वंस हो जाता है उसमें राजनीति हमेशा सत्ता प्रबंधन, भावनात्मक हेरफेर और भीड़ के उन्माद में सिकुड़ जाती है। मनुष्य मतदाता में सीमित हो जाता है। जटिल समस्याएं तात्कालिक नारों से ढक जाती हैं। संवाद आरोप-प्रत्यारोप में अवरुद्ध हो जाता है। साहित्य से दूरी के कारण भाषा सोचने का औजार न होकर हमला करने की मिसाइल होती है। हम राजनीति ही नहीं बाजार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संसार में भी देख सकते हैं कि इनका मानव बुद्धि पर कैसा तेज आक्रमण है।

साहित्य से दूरी आत्मध्वंस की ओर ले जाता है। हम इधर ‘आत्मज्ञान’, ‘आत्मसचेतनता’, ‘आत्मसंघर्ष’ आदि के युग से ‘आत्मध्वंस’ के युग में पहुंच गए हैं। यह वर्तमान सभ्यता का एक बड़ा संकट है जो आत्मविसर्जन, आत्म के वस्तुकरण, सेल्फ-ब्रांडिंग, ‘मैं’ के बाह्य जगत द्वारा निर्धारण आदि शक्लों में है। आत्मध्वंस का एक नतीजा है आत्मनिरीक्षण का अभाव, अपने से संवाद टूट जाना। आत्मविमुग्धता भी आत्मध्वंस का ही एक रूप है। वह आत्मनिरीक्षण असंभव बना देती है। आत्मध्वंस की स्थिति में हम अंतत: वह होते हैं जो कपड़े हमें पहना दिए जाते हैं। हम खुद आत्मपहचान की ख़ोज न करके ‘दूसरे’ द्वारा बताए जाने लगते हैं कि हम कौन हैं और हमें क्या चाहिए।

साहित्य मनुष्य की संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता, आलोचनात्मक दृष्टि, सौंदर्यबोध और नैतिक मूल्यों का संरक्षण और विकास करता है। वह निरीहता के बोध से बाहर निकालता है। उसका काम मानव चित्त को बड़ा बनाना है। वह ‘अपरिचित’ से परिचय कराता है। साहित्य सैकड़ों साल से बताता आया है कि हमारे जीवन का क्या अर्थ है। वह यह तरह-तरह से बताता आया है और चुनने की स्वतंत्रता देता है। साहित्य से दूरी मनुष्य की उपर्युक्त प्राकृतिक और सांस्कृतिक क्षमताओं का ही ध्वंस नहीं करती, उसे एक न एक झुंड का अंग बना डालती है। धर्म, जाति, प्रीत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। झुंड में किसी के पास ‘आत्म’ नहीं होता। इस तरह साहित्य से दूरी का अर्थ है मनुष्यता के इतिहास से बाहर निकल जाना, उत्तर-मानवतावाद का कैदी होना।

संस्कृति का स्वतंत्र लोक प्रवाह  कहां खो गया

कहा जाता है कि समय बदल गया है। समय आम लोगों के हाथ से बाहर चला गया है- इतिहास, संस्कृति और राजनीति देश के लोगों के हाथ में नहीं हैं। सत्ता और संस्कृति के संबंध बदल गए हैं।

पहले भी सत्ताएं कला, साहित्य और संस्कृतियों का संरक्षण करती थीं। प्राचीन दरबार हो या आधुनिक अकादमियां- वे सेमिनार करके, अनुदान-पुरस्कार आदि देकर ऐसा करती थीं। तब एक खुलापन था, योग्यता का सम्मान था। अब संरक्षण कठोर नियंत्रण और शर्तों से जुड़ गया है। सत्ताएं कला, साहित्य और सांस्कृतिक रूपों को अपने वैचारिक औजार में तब्दील कर चुकी हैं। अब राजनीति के संस्कृतिकरण और संस्कृति के राजनीतिकरण के दृश्य हैं। धर्म, जाति, प्रांत और तमाम परंपराएं सत्ता की भाषा बन गई हैं।

पहले संस्कृति पर राजसत्ता और बाजारसत्ता का दबाव कम था, बल्कि टकराव का संबंध था। भक्त कवियों ने राजदरबार से नाता नहीं रखा, ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’! (कुंभनदास)। प्रसाद की कहानी ‘आकाशदीप’ में चंपा व्यापारिक मुनाफे की दौड़ में शमिल हो रहे बुद्धगुप्त का साथ नहीं देती। छायावादी कवयित्री महादेवी ने लिखा है, ‘राह में तुझको मिलेंगे तितलियों के पर रंगीले/ जाग तुझको दूर जाना।’ किसी समय बाजार बहुत कुछ था, पर सबकुछ न था। आजकल टकराव का स्थान ‘आंतरिक अनुकूलन’ ले चुका है। संस्कृति अपना स्वतंत्र लोक प्रवाह खोकर राजसत्ता और बाजारसत्ता की भाषा का अंग बन गई है।

डिजिटल दुनिया भी सत्ता और संस्कृति के संबंध निर्धारण में एक बड़ी भूमिका निभाती है। आने वाले दिनों में एल्गोरिद्म ही संस्कृति की दृश्यता निर्धारित करेगा, कविताएं भी रच देगा। एआई झूठ को अधिक सफलतापूर्वक सत्याभासी बनाएगा।

समय ऐसा बदला है कि पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह अब भावनात्मक मामले नहीं हैं, इवेंट हैं। अब इवेंट मैनेजर हैं। बाजार में संस्कृति मूल्यबोध का स्रोत नहीं बल्कि  उत्पादित माल है।  वह उपभोग की वस्तु है जो सत्ताओं को निरापद बनाती है। कहना न होगा कि आज की उपभोगवादी संस्कृति उच्च आदर्शों के ध्वंसावशेष पर खड़ी हो रही है। उसका एक लक्ष्य असुविधाजनक राष्ट्रीय स्मृतियों को मिटाना है जो मुख्यत: साहित्यिक कृतियों में हैं।

हजारों साल की मानवीय भावराशि का ध्वंस

सत्ता और संस्कृति के बीच एकतरफा संबंध का एक नतीजा मनुष्य का विचारशील नागरिक से उपयोग में आने वाली ‘वस्तु’ में बदलता जाना है। इस स्थिति में मनुष्य का मूल्य उसके मानवीय और रचनात्मक गुणों से नहीं उसकी वर्तमान उपयोगिता से आंका जाता है। परिवार में ‘अनुपयोगी’ बुजुर्गों की दशा देखिए, अनुपयोगी चीजें तत्काल हटाओ!

सत्ता और संस्कृति के बीच एकतरफा संबंध का एक और नतीजा मनुष्य में आलोचनात्मक  विवेक का क्षय है, उसमें सत्ता के प्रति आज्ञाकारिता का भाव आ जाता है। उसकी खुद सोचने की क्षमता मिट जाती है, मानवीय राष्ट्रीय स्मृतियों का भी क्षरण हो जाता है। इधर व्यापारियों में ही नहीं, लेखकों और कलाकारों में भी सच बोलने की क्षमता खत्म होती जा रही है। सबसे बड़ा क्षय है सैकड़ों साल की उदार साहित्यिक भावराशि का मिटना, लोग उथले होते जा रहे हैं। संसार की पीड़ा एक आंकड़ा भर होती है।

साहित्य मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनने, बेहतर समाज बनाने और एक वैकल्पिक भविष्य की कल्पना करने की क्षमता देता है। इस समय विभिन्न सत्ता केंद्रों द्वारा कला, साहित्य और संस्कृति के संसार का ‘स्वयंसक्रिय आंतरिक अनुकूलन’ उभार पर है। यह ‘जो है’ को ही ‘जो होना चाहिए’ बनाकर उपस्थित कर रहा है। कुछ दशक पहले तक कला, साहित्य और संस्कृति के रूप सत्ताओं को आईना दिखाते आ रहे थे। क्या वह आईना टूट गया? यदि ऐसा है, भय ही भावी सभ्यता का स्थायी भाव होगा। हजारों साल की मानवीय भावराशि खंडहरों में बदल जाएगी!

जहां दीवारों पर हथौड़े बज रहे हैं

हम वर्तमान सभ्यता में दो खास प्रचार से घिरे हैं। व्यापारिक विज्ञापन बताते हैं- दूसरा तुमसे बेहतर जी रहा है। राजनीति बोलती है- दूसरा तुम्हारा हक मार रहा है! दोनों बार-बार ‘दूसरों’ के बारे में बताते हैं। हम तनिक भी समझ नहीं पाते कि ये ‘भिन्नता’ पैदा करने वाले खतरनाक किस्म के प्रचार हैं। फिर हम वह सब चाहने लगते हैं जो आने वाले कल के लिए बोझ बन जाता है!

हमें सबसे पहले सामाजिकता चाहिए। केवल धर्म, केवल राजनीति हमारी सामाजिकता की रक्षा नहीं कर सकती। बाजार ने ‘होम डेलिवरी’ का विकल्प दे दिया है, यह सामाजिकता को एक और धक्का है। खासकर जब हर तरफ घृणा और शत्रुता की दीवारें उठ रही हों, हमें सामाजिकता के लिए धर्म, राजनीति और बाजार के अलावा कुछ और  चाहिए। हमें साहित्य चाहिए!

पढ़ना लड़ना है- अपने भीतर और बाहर! इधर बड़ी तेजी से खुद लेखकों के बीच पढ़ने की संस्कृति उजड़ रही है। हजारों हिंदी शिक्षक साल में दो-चार नई साहित्यिक पुस्तकें खरीदकर पढ़ सकते थे, वे ऐसा नहीं करते। सैकड़ों साल से पढ़ना मानव सभ्यता का ऐसा उपहार था जिसने हमें सिखाया कि हम आदमी के शरीर में कैसे मनुष्य बन सकते हैं। केवल मोबाइल में डूबे रहना, बिना सोचे-समझे प्रचारों से प्रभावित हो जाना और पेशागत उपयोगिता से बाहर पढ़ने से नाता तोड़ लेना हमें आदमी के शरीर में अंतत: क्या बनाता जा रहा है यह जानने के लिए हर व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए, यदि उसका ‘आत्म’ ध्वंसावशेषों के बीच थोड़ा बचा हो।

लोगों को हर चीज पैकेज में चाहिए। नेताओं को अंधे फॉलोअर्स चाहिए। लेखकों को लाइक चाहिए। खरीददारों को ब्रांड चाहिए। युवाओं को जल्दी अमीर बनना है, जबकि यह सभ्यता उन्हें ‘दौड़’ में जल्दी अकेला, थका हुआ और बूढ़ा बना दे रही है! वे कब सोचेंगे कि उन्हें वस्तुओं से अधिक रिश्ते चाहिए। उन्हें प्रचार की बाढ़ में बहने की जगह खुद सोचने, कल्पना करने और रचनात्मकता की शक्ति चाहिए। वे कब सोचेंगे कि उन्हें खुशी चाहिए! आज के शहरी जीवन में सुख के सामान बढ़े हैं, पर खुशी घटी है। वस्तुएं बढ़ी हैं, पर रिश्ते घटे हैं और मन संकीर्ण हुआ है। निश्चय ही हमारा जीवन महज एक प्रोजेक्ट नहीं है कि हम इसके लिए अपनी स्वतंत्रता बेच दें!

अब ऐसा जमाना है जब बाजार और राजनीति के हमलों से रिश्ते बिखर रहे हैं। दुनिया स्पर्धा और हिंसा में मुक्ति खोज रही है। इतना बौद्धिक और भावनात्मक उथलापन कभी न था। दूसरी तरफ, अब लोग झुंड में हैं जैसे कौवा कौओं के साथ, सियार सियारों के साथ और हाथी हाथियों के साथ होते हैं! हमने समाज खो दिया है जो झुंड से भिन्न होता है। हमें निश्चय ही समाज चाहिए- हिंसक की जगह शांतिप्रिय समाज।

मुझे ऐसी जगहें अच्छी लगती हैं जहां ‘अ-पर’ का बोध हो, जहां झुंड नहीं आत्मचेतस समाज हो! मुझे ऐसी सभी जगहें अच्छी लगती हैं जहां खुले आकाश के नीचे आने के लिए दीवारों पर हथौड़े बज रहे हों!

रचनात्मकता पर आंतरिक संकट

इस समय देश में रचनात्मकता (क्रिएटिविटी) का बड़े पैमाने पर क्षय हो रहा है। यह देश के लिए एक बड़ा क्षय है। साहित्य संसार में पुरस्कार-सम्मान पर चर्चा ज्यादा होती है- किसे मिला, किसे मिलेगा! यहां व्यक्तिगत आक्रमण-प्रतिआक्रमण या अति-राजनीतिक चर्चाएं ज्यादा हैं। खेमे हैं और जो खेमे का विरोध करते हैं वे भी एक खेमे से सटे होते हैं। ऐसी खोखली हलचलें रचना की गुणवत्ता और दिशा को ही प्रभावित नहीं करतीं, ये बौद्धिक उथलापन और अनावश्यक विभाजन भी लाती हैं। कई लेखक यह सोचते हुए लिखते हैं कि वे ऐसा कुछ न लिखें जो पुरस्कार, प्रतिष्ठा और सत्ता पाने के मार्ग में समस्या बन जाए। वे आंतरिक प्रेरणाओं से अधिक बाहरी प्रलोभनों से अनुप्राणित होते हैं।

कला, साहित्य और संस्कृति के पुरस्कार सामाजिक कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए होते हैं, जबकि ये राजनीतिक बख्शीश में बदल दिए गए हैं। इसका एक नतीजा यह है कि काफी लेखक अब जोखिम उठाने की जगह कुछ मुद्दों पर चुप रहते हैं। वैचारिक चर्चा का स्तर गिरता जा रहा है, हालांकि इन दिनों गिरावट ही यशस्वी बनाती है। कई घटनाओं से समझ में आ सकता है कि कला, साहित्य और संस्कृति के परिसर कितने स्वाधीन हैं और कितने ‘अनुकूलित’ हैं। एक सवाल यह भी है कि लेखक अपने को कैसे देख रहा है और समाज द्वारा किस तरह देखा जा रहा है!

लेखक में पुरस्कार, पद, सम्मान की इच्छा स्वाभाविक है। कुछ इसके लिए प्रयत्न करते हैं। कुछ प्रयत्न नहीं करते, केवल इच्छा रखते हैं। कई बार पुरस्कारों की उनकी प्रतीक्षा उसकी रचनात्मकता की शत्रु होती है। इस कारण वे निराशा और अवसाद के शिकार हो जाते हैं। फिलहाल देश में किसी भी मामले में गुणवत्ता की जगह वफादारी का महत्व अधिक है।

बदली दुनिया में कोई सत्ता अपने विरोधी के गले में माला नहीं डालती। वह असहमति पसंद नहीं करती। कुछ दशक पहले स्थिति दूसरी थी। अब वफादारी ही एकमात्र कसौटी है और जबसे यह कसौटी है चारों तरफ स्तर गिर रहा है।

जाहिर है लोभ और निर्भयता के बीच संबंध नहीं हो सकता। लोभ कई गुल खिलाता है। वह आत्मनिरीक्षण से विरत करता है। लोभ सत्तावान व्यक्तियों को अप्रसन्न करने से रोकता है। यह लेखक में एक आंतरिक सेंसर बैठा देता है। लोभ में लेखक अपने ही विचारों, संदेहों और अनुभवों से भागता है या इन्हें सीमित कर लेता है। सबसे बड़ी क्षति है, लोभ लेखक को विस्तृत कल्पनाशील अन्वेषण की जगह ‘स्वयंसक्रिय आंतरिक अनुकूलन’ की तरफ ठेल देता है। लेखक कोई बड़ी या कालजयी कृति देने में सदा के लिए अक्षम हो जाता है। दरअसल लोभ रचनात्मकता में दीमक है! ऐसे लोभी व्यक्ति को सम्मान मिल जाने पर उसे दूसरों के प्रति अन्याय नहीं दिखता। सामान्यत: उसे सम्मान ग्रहण करते हुए ग्लानि नहीं होती, इसकी जगह एक विजयी भाव होता है!

साहित्यिक कलाकारों के व्यापारीकरण का लक्ष्य

इधर जगह-जगह कारपोरेट घरानों द्वारा प्रायोजित लिटरेरी फेस्टिवल हो रहे हैं। लल्लन टॉप जैसे कार्यक्रम होते थे। रचनात्मक प्रतिभाओं का व्यापारीकरण नए रूपों में होता रहेगा। ऐसे व्यक्तियों में यह इच्छा होती है कि अपनी कलात्मक क्षमता को बेचकर वे जल्दी अमीर बनें, आखिर अपनी क्षमता वे बड़े मानवीय उद्देश्यों के लिए जाया क्यों करे!

व्यापारिक मंचों पर ऐसी रचनात्मकता का लक्ष्य दर्शक में सोचने की प्रवृत्ति पैदा करना न होकर बौद्धिक मनोरंजन होता है। ऐसी प्रतिभाएं असहमति दर्ज करने से बचती हैं। नजर रेटिंग पर होती है, कम तो नहीं हो रही है! आश्चर्यजनक नहीं है यदि व्यापारीकृत रचनात्मकता का किसी रूढ़िवाद या उत्तर-सत्य से कभी टकराव न हो तथा प्रतिभाशाली साहित्यिक कलाकार गहराई में उतरने की जगह केवल कथाओं, आवेगों और शब्दों से खेलें।

इधर साहित्यिक क्षेत्र में मनोरंजन उद्योग का प्रसार हो रहा है। यह साहित्य के महत्व की स्वीकृति और साथ ही उसका दुरुपयोग है। ऐसे कार्यक्रम संवादधर्मी होने के कारण लोकप्रिय होते हैं। लक्षित किया जा सकता है कि मनोरंजन उद्योग से जुड़े साहित्यिक कलाकारों का प्रदर्शन सत्ता-व्यवस्था के लिए जो असुविधाजनक प्रश्न हैं, उनसे बचता है। जानकारी कमजोर होती है। ऐसे प्रदर्शनों में लोकप्रियता ही गुणवत्ता की कसौटी बन जाती है। ये प्रदर्शन नई पीढ़ी में किसी विषय पर गहराई से सोचने की प्रवृत्ति मिटा देने के लिए हैं।

कलाकारों की प्रतिभा के व्यापारीकरण का बुरा असर खुद कलाकारों पर पड़ता है। वे आत्म-विच्छिन्न हो जाते हैं और वस्तुत: व्यापार के औजार होते हैं। उनका हर प्रदर्शन वैचारिक ह्रास का उत्सव है। वह समाज कभी कल्पनाशील नहीं हो सकता जिसकी उच्च बौद्धिक प्रतिभाएं बाजार की गुलाम हों।

इन दिनों यही सब हो रहा है। तीन-चार सौ साल पहले रीतिकाल में भी यही हुआ था- शृंगार और वीर रस के काव्य से भक्त कवियों की महान जीवनानुभूतियों को ढका जा रहा था!

कहना न होगा कि रचनात्मकता जब बाजार का उपकरण बन जाती है, वह अपनी आलोचनात्मकता खो देती है। व्यापारी कलाकारों-लेखकों के बौद्धिक प्रदर्शन हों या उनकी पुस्तकें हों, वे उपभोग के बाद फेंक दी जाती हैं।

कुल मिलाकर बाजार और राजनीति दोनों जगहों पर साहित्य और संवेदनशीलता अ-लाभकारी मामले माने जाते हैं। दोनों जगहों पर नैतिक दरिद्रता शिखर पर होती है। दोनों सत्ताएं ही कलाओं और साहित्य को जीवनबोध की जगह महज ‘दृश्य तमाशा’ या ‘प्रचार वस्तु’ बना देना चाहती हैं। उनके लिए साहित्य केवल शोभा की चीज है, जबकि साहित्य हमें डेटा बनने से बचाता है। मनुष्य को मनुष्य समझने की दृष्टि देता है। साहित्य भग्न स्वप्नों के बीच भविष्य की नैतिक चेतावनी है।

ऐसे मानव भविष्य से थोड़ा डरना चाहिए

साहित्य से दूरी के बुरे नतीजे बौद्धिक क्षेत्रों में ही नहीं सामाजिक और नैतिक क्षेत्रों में भी दिखाई देते हैं। इन दिनों उत्पादकता में भले वृद्धि हो रही हो, रचनात्मकता का ह्रास हुआ है। समाज में बौद्धिक ठहराव आया है। लोग आधुनिक जीवनशैली के बावजूद बने-बनाए पुराने रूढ़िवादी विचारों के पुनः दास होते जा रहे हैं। उनकी भविष्य दृष्टि संकुचित होती जा रही है। वे धर्म, जाति, प्रांत या दल के बाहर अपना अस्तित्व असुरक्षित महसूस करते हैं। हमारे देश में अपराध को सांस्कृतिक वैधता मिल गई है अर्थात अपने धर्म, अपनी जाति और अपने दल के व्यक्तियों के अपराध को अपराध की तरह नहीं देखा जाता।

लगता है आने वाले दिनों में असहिष्णुता, हिंसा और क्रूरता अधिक बढ़ेगी। हर तरफ मनुष्य को नगण्य, भिक्षा-निर्भर और दयनीय बना देने का चक्रव्यूह शक्तिशाली होगा। शिक्षा केवल परीक्षा और नंबर या ग्रेड लाने तक सीमित होती जाएगी। शिक्षा में साहित्य पहले से नगण्य या विस्थापित है। लक्षित किया जा सकता है कि मनुष्य के साथ वस्तुओं जैसा व्यवहार होने लगा है।

आने वाले दिनों में सबसे बड़ी क्षति यह होगी कि मनुष्य में आत्म-विस्थापन घटित होगा। रचनात्मकता व्यक्ति को अपने अंदर झांकने की क्षमता देती है, उसे कल्पनाशील बनाती है। इसके अभाव में व्यक्ति रिक्तता से भर जाएगा और खर्चीले दिखावों से क्षतिपूर्ति करेगा। वह बुद्धि और कल्पनाशीलता की अपनी प्राकृतिक शक्तियों को धीरे-धीरे खो देगा। मनुष्य  डिजिटल खिलौना बन जाएगा, हालांकि भ्रमवश सोचेगा कि वह खिलाड़ी है! ऐसे मानव भविष्य से थोड़ा डरना चाहिए। डर एक सबक है। डरकर ही सही, अपने जीवन और सोच से मिट रही उस रचनात्मकता को बचाने की कोशिश करनी चाहिए जिसका एक बड़ा स्रोत साहित्य है।

नक्कारखाने में तूती क्यों न बोले

सभ्यता की मृत्यु हो जाती है, जब मनुष्य में नए प्रश्नों के सामने खड़ा होने की क्षमता खोने लगती है। प्रश्न उठाना और प्रश्नों का सामना करना जागरण का चिह्न है। आंख मूंदकर सबकुछ मान लेना कूपमंडूकता है। इन दिनों पाठकों से कई गुना अधिक दर्शक हैं। इनके मस्तिष्क पर कब्जे के लिए अज्ञानता निर्माण के हजारों डिजिटल कारखाने खुल गए हैं जो सतही या झूठी चीजें तैयार करते हैं।

इस समय सबसे ज्यादा ‘प्रचारित’ ही सबसे बड़ा सत्य है। इतना ही नहीं, सामाजिक खाइयों में राजनीतिक भविष्य ढूंढ़ा जा रहा है। बाजार सुंदरता की परिभाषा दे रहा है। भिन्नतावादी मनु महाराज और सुखवादी चार्वाक की जुगलबंदी है। इन सबके बीच एक मौन आवाज यह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं और पुस्तकों को अपनी मौत मरने दो!

अखबारों में अब पहले पेज पर ही ‘बोलो जुबां केसरी’ जैसे कैंसर-प्रसारक पान मसाले के विज्ञापन मिल जाएंगे या बड़े-बड़े अभिनेताओं की छवियों के साथ झूठ से भरे अन्य विज्ञापन। डिजिटल मीडिया के प्रचार के कारण समाज में अंधविश्वास बढ़ा है, भिन्नता बढ़ी है, हिंसा बढ़ी है। छोटी खबर को बड़ी और बड़ी खबर को छोटी बनाने का खेल है। सोशल मीडिया में कठोर बौद्धिक पंचायतें हैं। आदमी कहां बोले?

क्या किया जाए? आयरलैंड की एक लोककथा है : रास्ता भूले आदमी ने एक किसान से पूछा- ‘यहां से डबलिन कैसे जाऊँ?’ उसने थोड़ी देर सोचकर जवाब दिया- ‘निश्चय ही मैं अपनी यात्रा कभी यहां से शुरू नहीं करता!’ इसका मतलब मंजिल दूर है और रास्ता जटिल! यात्रा शुरू करते समय ही न जाने कितनी भूलें हो सकती हैं!

हम ऐसे समय में हैं जब लोगों को अन्याय सहने, असुरक्षा और दुख-कष्टों के बीच जीने का अभ्यास हो गया है। अब आदमी किसी खास आशा में नहीं जीता और हर अस्वाभाविक घटना को आसानी से स्वाभाविक मान लेता है। यह सुख का समय नहीं है और न आशाओं का। प्रतिदिन ही समझौते, सांठगांठ करते हुए और कई बार अपमान सहते हुए जीना पड़ता है। समाज ऐसा होता जा रहा है कि शांति से रहने के लिए चुप रहना जरूरी माना जाता है!

समाज का जितना अध:पतन हो गया हो, 5-10 व्यक्ति भी सच बोलें तो रोशनी होती है। साहित्य के नाम पर काफी बौद्धिक कचरा है तो क्या लेखक न रचे? मीडिया में इतना जहर भरा हुआ है तो क्या जर्नलिस्ट न बोले? आज लिखना अरण्यरोदन ही हो, याद रखना चाहिए कि बहेलिये द्वारा क्रौंच वध के बाद एक अकेली चिड़िया के रोने से ‘रामायण’ का जन्म हुआ था!

यह संपूर्ण विश्व नक्कारखाना हो, कोई सुनने वाला न हो तब भी तूती बोलेगा क्यों नहीं! हजार-हजार तूती बोलेंगे, क्योंकि शोर के मध्य किसी भी लेखक का, पत्रकार का इससे भिन्न धर्म नहीं हो सकता। इससे भिन्न जीवन नहीं हो सकता। हमें रचना होगा, ‘प्रचारित’ के नीचे जो दबा है, वह उद्घाटित करना होगा। क्या पता इन्हीं सब के बीच से रचना और प्रतिवाद के आकाश में नया सूर्योदय हो!

यह भी है, कुएं में सूर्योदय नहीं होता!

आखिर मैं क्यों लिखता हूँ

कई बार सोचता हूं कि इन स्थितियों में भी मैं क्यों लिखता हूं, जब धैर्यपूर्वक साहित्य पढ़ने वाले न केवल न्यूनतम हो गए हैं, बल्कि दूसरे को नकारने की प्रवृत्ति और असहिष्णुता बढ़ गई है। बौद्धिक कुएं बढ़ गए हैं। दुनिया दृश्यात्मक चुटकुलों में इतनी ज्यादा फंसी हुई है कि गंभीर लेखन में किसी को दिलचस्पी नहीं है। यह सब एक नए तरह के अकेलेपन में ठेल देता है जहां आशा की कुछ उदास किरणें भर हैं।

फिर भी नए विश्व में मुझे  लिखना ही एक ऐसे आंतरिक शरणस्थल की तरह दिखता है जहां मैं अपनी आवाज साफ-साफ सुन सकता हूं। मैं ‘प्रचारित’ के दबाव से मुक्त होकर अपनी मानवीय पहचान अर्जित कर सकता हूं और अपनी भूलों को सुधारते हुए अपने ‘समावेशी आत्म’ की पुनर्खोज भी कर सकता हूं।

लिखने का एक और कारण मेरी समझ में आता है। आज स्मृति केवल अतीत की धरोहर नहीं एक राजनीतिक रणभूमि है। इतिहास की संकुचित व्याख्याएं सामने आ रही हैं। ऐसे में लिखना एक सामान्य रचनात्मक कर्म से अधिक एक नैतिक दायित्व है- कुछ जरूरी स्मृतियों को भूलने न देने, बचाने और सार्वभौम पतन के प्रतिवाद का दायित्व!

प्रेमचंद ने साहित्य मात्र को ‘जीवन की आलोचना’ कहा था। कई भोले रचनाकार आलोचना को अपनी पुस्तक की समीक्षा और अपने कृतित्व के मूल्यांकन से अधिक नहीं समझते, भले उन्हें अपने लिए आकाश से कम कुछ न चाहिए। विचारों की दुनिया में आलोचना इतनी छोटी चीज नहीं है। इस दुनिया का भी अपना एक बड़ा आकाश है जहां व्यक्ति का चित्त बड़ा होता है, उसका विजन बड़ा होता है और ढका-दबा तथा नया दिखता है। विचार का आकाश जितना बड़ा होगा, भाव जगत उतना ही विस्तृत होगा।

मेरे लिए लिखने का एक उद्देश्य मनुष्य की विशिष्टता- उसकी बुद्धि और कल्पनाशीलता की अनोखी प्राकृतिक शक्तियों तथा उसकी स्वतंत्रता की अमिट चाह की ओर ध्यान आकर्षित करना रहा है, ताकि हमारा परिवर्तन की अपनी क्षमता पर भरोसा बना रहे। हमें ‘अ-पर’ के बोध की महत्ता का बोध हो। दरअसल ऐसा हर परिवर्तन निरर्थक है जो मनुष्य में ‘अ-पर’ का बोध पैदा न कर सके!

मेरे लिए लिखना स्वतंत्रता के एक नए बोध से गुजरना है। लिखते हुए मुझे अनुभव होता है कि मैं लोकप्रियतावाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दबावों से मुक्त हो रहा हूं। मुझे लिखते हुए अनुभव होता है कि मैं गुलाम नहीं हूं!