शंभुनाथ

भक्त कवियों ने धर्म को बाह्याडंबर की जगह ईश्वरानुभूति और लोकहित का विषय बनाना चाहा था। लगभग 1200 सालों तक हमारे देश में भक्ति आंदोलन चला। इसका उदय तमिलनाडु में हुआ, तभी कहते हैं- ‘भक्ति द्राविड़ उपजी’! भक्त कवि अपने अनुभव की रोशनी में धर्म को कहीं ‘डि-कंस्ट्रक्ट’ कर रहे थे और कहीं ‘रि-कंस्ट्रक्ट’ कर रहे थे। वे रूढ़ियों का खंडन कर रहे थे और उच्च मूल्यों का सृजन कर रहे थे।
उन्होंने धर्म की रूखी धरती पर अपने संगीतमय पदों की रचना की जो लोक कंठों में बसी। हालांकि कई भक्तों को अपने नए विचारों के लिए अपमान सहना पड़ा। रामानुजाचार्य (11वीं सदी) जैसे दार्शनिक को चोल शासन के तमिल क्षेत्र से भागकर विजयनगर राज्य में शरण लेनी पड़ी। असम के वैष्णव भक्त शंकरदेव (15वीं-16वीं सदी) शाक्तों के डर से कहां-कहां भागते रहे! मीराबाई को घर और बाहर उत्पीड़न सहना पड़ा। क्रूर बादशाहों के हुक्म पर कई सूफी फांसी पर चढ़े। फिर भी सैकड़ों साल से भक्त कवि बोल रहे थे, गा रहे थे, नृत्य कर रहे थे। कई कवि दूर-दूर की यात्राओं पर निकले ताकि धर्म में फैला अंधेरा छंटे और जीवन-प्रवाह के मार्ग से ‘ब्लॉकेज’ अर्थात रुकावटें हटें।
वल्लभाचार्य आंध्र से वृंदावन गए। रामानंद ने दक्षिण भारत की यात्रा की। बंगाल के श्रीचैतन्य पुरी गए। उन्होंने दो शिष्यों को बंग क्षेत्र से वृंदावन भेजा। मीरा राजस्थान से गुजरात गईं। दादू दयाल गुजरात से राजस्थान गए। वे सभी भक्त कवि घूम-घूमकर सामाजिक सरहदों को चुनौती देते हुए सांस्कृतिक जागरण ला रहे थे। उन्होंने कितनी सफलता हासिल की या कितने विफल हुए, इससे अधिक यह देखना जरूरी है कि वह सब कितना अधिक सौंदर्य-भरा था जहां मनुष्य अपना पुनराविष्कार कर रहा था।
भक्त कवियों के आंदोलन पर हरेक को विस्मय होना चाहिए जबकि आज न कोई अपर और बसवण्णा को याद करता है, न ज्ञानेश्वर और तुकाराम को, न सूर, कबीर, रैदास, मीरा और तुलसी कहीं उद्धृत किए जाते हैं। जिन कवियों ने राम और कृष्ण को लोकमानस में प्रतिष्ठित किया, वे अब पिछवाड़े में पड़े हैं।
इतिहासकार और कवि के अतीत को देखने में क्या अंतर है
कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ (1148) कश्मीर के प्राचीन राजवंशों के इतिहास का ग्रंथ है। इसमें दो बातें खास हैं। एक, ब्राह्मण होते हुए भी कल्हण बुद्ध को आदर भाव से देखते हैं। दूसरी बात, खुद इतिहासकार होने के बावजूद वे कवि को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनकी ‘राजतरंगिणी’ के एक आरंभिक काव्यात्मक अंश का यह अनुवाद है-
सर्ववंद्य है कवि
जो करता तिरस्कृत अमृत को
और अमर कर देता
काव्य रस से अपने चरित्रों को
अमृत से भी श्रेष्ठ है काव्य
अन्यथा कौन कर सकता अतीत को प्रत्यक्ष
कौन नित्य देख सकता हर वस्तु को
अपनी नवोंन्मेषशालिनी बुद्धि से
सहृदयता से, दूरदर्शिता से
कवि ही है श्रेष्ठ
जिसकी वाणी में गूंजता है इतिहास
न मोह में पड़ता
न द्वेष से कलुषित होता
बार-बार लिखते हुए इतिहास
कभी विमुख नहीं होता महत उद्देश्य से
शास्त्र ज्ञान जानने नहीं देता यथार्थ
क्षमा करें क्षेमेंद्र
दोषों से बचना होगा
आनंद ही रचना है
पांडित्य नहीं
शांति का रस ही सर्वश्रेष्ठ है सहृदयो!
अशांति के वर्तमान युग में कल्हण की पंक्तियों से सुखद विस्मय होता है कि इनमें भारत की एक कितनी बड़ी आवाज है। बताया जा रहा है कि हम अपने अतीत को कैसे देखें और इतिहासकार तथा कवि के देखने में क्या फर्क है! कवि अतीत को सहृदयता, दूरदर्शिता और नित नवोन्मेषशालिनी बुद्धि से देखता है। वह अतीत को मोह और द्वेष से मुक्त होकर देखता है और बुरे उद्देश्य की जगह सकारात्मक द़ृष्टि से देखता है। शास्त्रों का ज्ञान अंधा बनाता है, जबकि काव्य आंखें खोलता है।
यूरोप अपने औपनिवेशिक हित को प्रधानता देने के कारण देश-दुनिया के अतीत को इतिहास की भाषा में देखता था, जबकि हमारा देश कथाओं की भाषा में अपने अतीत को देखता रहा है और बताता रहा है कि क्या सत्य, सुंदर और नैतिक है। इतिहास का तथ्य सत्ता विमर्श की चीज है। देखा जा सकता है कि आजकल इतिहास फास्ट फूड बन गया है। वह इतना अधिक तात्कालिक होता जा रहा है कि हर बार सत्ता बदलते ही नया इतिहास लिखा जाने लगता है।
हमारे देश के लोग इतिहास को लेकर कभी परेशान न थे- राम का जन्म कब हुआ, आर्य कौन थे, द्रविड़ कौन थे, महावीर कब हुए, तिरुवल्लुवर या तुलसी कहां जन्मे, अगस्त्य मुनि उत्तर के थे या दक्षिण के? ऐसी खोजों में केवल उन्होंने ही दिलचस्पी ली है जो इन्हें अपने एक न एक स्वार्थ में कैद करना चाहते थे। दरअसल मूर्तियां तब बनती हैं, जब विचार दफना दिए जाते हैं। इतिहास लिखना केवल मूर्तियां बदलना है। इधर हम देख रहे हैं कि इतिहास कितना असहाय है, वह ‘आत्म-जयजयकार’ में सीमित है।
इसलिए कल्हण की बात सही लगती है कि पांडित्य से बचो, यह विद्वेष पैदा करता है। सहृदयता से देखो!
भक्ति भारतीय उदारता का एक आध्यात्मिक इंद्रधनुष है
युधिष्ठिर एक बार भीष्म से पूछते हैं, ‘आप कहते हैं कि अनृशंसता ही धर्म है, तब खोलकर बताएं कि नृशंस कौन है।’ (शांति पर्व, अध्याय 164)। भीष्म उत्तर देते हैं, ‘जिनमें गर्हित काम करने की अदम्य इच्छा हो, जो शठ है, जो प्रतिष्ठा और संपत्ति को बांटता नहीं बल्कि खुद भोग करता है, जो अपने वर्ग, श्रेणी, जाति, संप्रदाय की ही प्रशंसा करता है और दुर्बल, अनाहार-पीड़ित, दीन-हीन की आंखों के सामने खूब मजा लेकर खाता-पीता है, उसी को नृशंस कहते हैं।’ ढाई हजार साल पहले यदि इस तरह एक महाकाव्य में कहा जा रहा है, तो यह एक बड़ी सोच है। महाभारत बताता है कि धर्म क्या है और धर्म तथा संसार के यथार्थ में कितना फर्क आ गया है। आज भी धर्म के शोर में धर्म गायब है। 21वीं सदी में जब लोभ और क्रोध हर नियंत्रण के बाहर हो चुके हों, धर्म कितना बचा रहेगा!
भक्ति आंदोलन का लक्ष्य रहा है समस्त भेदभाव, धार्मिक दिखावे और अहंकार को मिटाकर धर्म के उच्च मूल्यों का पुनर्वास। भक्त कवियों की प्रेरणाओं और उपलब्धियों को, उनके काव्यात्मक हस्तक्षेपों को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। भक्ति भारतीय उदारता का एक आध्यात्मिक इंद्रधनुष है। उसने देश के लोगों को एक समय आत्मविस्मृति से बाहर निकाला था और एक ऐसी ईश्वरानुभूति का द्वार खोला था जिससे मानवता का सौंदर्य प्रवेश कर सके। उसने ज्ञान को बीहड़ों से निकालकर प्रेम की भूमि पर प्रतिष्ठित किया था।
निश्चय ही भक्त और पुरोहित में अंतर है। भक्त के लिए देवता उसके हृदय में है- उसके प्रेम, अभेद की अनुभूति और करुणा में है जबकि पुरोहित के लिए देवता बाहर है। वह केवल शृंगार और आरती के लिए है!
मीरा कहती हैं कि मेरे प्रभु धरती पर सभी जगहों पर हैं, आकाश तक हैं और जहां तक दिखेंगे मैं उठकर चली जाऊंगी। मेरे लिए तीर्थ-व्रत का कोई अर्थ नहीं, ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों से मुझे क्या लेना-देना और करवत-कासी जाने का क्या मतलब- ‘तीरथ बरतां ग्याण कथंता कहा लयां करवत कासी’! वे पूछती हैं कि जो आदमी काम, क्रोध, अहंकार और लोभ से भरा है वह भक्ति कैसे कर सकता है, ‘यहि विधि भगति कैसे होय’! भक्त होने और केवल पूजा-पाठ करने, घंटा बजाने में अंतर है।
क्या भक्ति एक सामाजिक क्रांति है
भक्त चाहे 7वीं-10वीं सदी के तमिलनाडु के हों, 12वीं सदी के कर्नाटक के हों, 13वीं-14वीं सदी के महाराष्ट्र के हों, 15वीं-18वीं सदी के हिंदी-बांग्ला प्रदेशों के हों, वे धर्मों की दशा से संतुष्ट न थे। इसलिए भारत में सामाजिक भेदभाव, बाह्याडंबर और पाखंडों से टकराते हुए भक्ति की जो लहरें उठीं, वे आत्मा का प्रतिवाद थीं। वे दिखावटी धार्मिक चिह्नों और पहचानों को गौण बना रही थीं। भक्ति ने एक बड़ा परिवर्तन यह किया कि धन और जाति के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता की जगह ज्ञान के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता की घोषणा की।
भक्तों ने एक नया लोकवृत्त निर्मित किया, एक नई श्रेणी जन्मी- ‘हरि जन सईं न जाति’। अर्थात हम ईश्वर के लोग हैं, इससे भिन्न हमारी कोई जाति नहीं है। यहां शैव-वैष्णव, ब्राह्मण-शूद्र-दलित अमीर-गरीब के बीच भेद नहीं रह जाता। उल्लेखनीय है कि भक्ति किसी भी ऐतिहासिक दौर में शक्ति संग्रह की जगह नहीं रही है, यह हमेशा सामाजिक परिवर्तन की ‘न्यूक्लियस’ है। बीता युग ऐसा था जब हर तरफ एक ‘कॉमन प्लेस’ बन रहा था। गौर करने की चीज है कि तमिल, बांग्ला, मराठी, हिंदी आदि जातीयताओं के प्रारंभिक निर्माण में भक्ति आंदोलन की एक बड़ी भूमिका है।
आज की दुनिया में हंगामे और तमाशाई बढ़ गए हैं। कबीर, सूर, मीरा, जायसी, तुलसी जैसे भक्त कवि कम महत्वपूर्ण हो गए हैं। लोग उनका महान संदेश भूल गए हैं। भव्यताओं के बीच सांस्कृतिक उन्मूलन के दृश्य हैं। इन दिनों धार्मिक जनमानस में भक्त कवियों द्वार प्रसारित ईश्वर से एकात्मता, सामाजिक भेदभाव से मुक्ति और करुणा की भावधारा सूखती जा रही है। आदर्शों का अकाल है।
भक्ति आंदोलन ने लोकभाषा में एक महान काव्य दिया था। उसेे एक सामाजिक क्रांति कहा जाना चाहिए। भक्त कवि स्वर्ग और परलोक की धारणा का खंडन करते हैं। वे बताते हैं कि किसी को स्वर्ग नहीं जाना है, लौकिक जीवन में स्वर्ग से बड़ा आनंद है। वह आनंद है ईश्वर से प्रेम का, इसे पा लेने के बाद मनुष्य स्वर्ग की इच्छा क्यों रखे! वेद, वेदांत, गीता के ज्ञान से बढ़कर है ईश्वर से प्रेम। कबीर, सूर, मीरा, जायसी, तुलसी सभी प्रेम दीवाने हैं। इनके लिए प्रेम से ऊपर कुछ नहीं है। फिर ईश्वर से प्रेम का अर्थ है सबसे प्रेम- ‘तुलसी ममता राम सो समता सब संसार’!
एक भी भक्त कवि समाज में घृणा नहीं फैलाता, जाति भेदभाव और बाह्याडंबर के पक्ष में खड़ा नहीं होता। एक भी भक्त कवि ईश्वर को धर्मस्थलों में नहीं खोजता, वह ‘हृदय की छवि’ को प्रधानता देता है।
भक्ति आंदोलन बहुस्रोतपरक है
आखिर भक्ति काव्य में लौकिकता की महत्ता और जाति-भेदभाव तथा बाह्याडंबर का विरोध किस दार्शनिक स्रोत से आकर मिश्रित हुआ? वेद-वेदांत-पुराण में परलोक, स्वर्ग-नरक, वर्ण-व्यवस्था और कर्मकांड की महत्ता है। इसलिए बौद्ध परंपराओं, योगियों और सिद्धों-नाथों के संप्रदाय को ही ऐसे विद्रोहों का दार्शनिक स्रोत मानना चाहिए। भक्ति आंदोलन ने यदि आत्मज्ञान, अद्वैत जैसे तत्व उपनिषदों से लिए तो लौकिकता की महत्ता तथा जाति-भेदभाव और बाह्याडंबर के विरोध के तत्व बौद्धों, लोकायितकों और योगियों से लिए।
इसका अर्थ है, भक्ति आंदोलन बहुस्रोतपरक है। वह यदि लोकजागरण बन सका तो इसकी बुनियाद में भारतीय सांस्कृतिक अंतर्मिश्रण है। भक्ति आंदोलन का वेदांत, पौराणिक कथाओं, बौद्ध दर्शन, योग साधना आदि सभी से ‘इंटरैक्शन’ था। भक्ति प्रत्येक से कुछ ले रही थी और कुछ छोड़ रही थी। वह किसी एक पर आश्रित नहीं थी। संभव है, किसी भक्त कवि ने एक खास परंपरा से कुछ ज्यादा लिया हो और किसी परंपरा से कम। लेकिन कोई भक्त कवि शुद्धतावादी नहीं है, हर भक्त कवि मिश्रणशील है। भारत का समाज भी अवरोधों के बावजूद सदा से मिश्रणशील है।
तमिल सिद्धों की खूबियां
भक्ति आंदोलन पर योगियों के प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए, क्योंकि भक्ति काव्य के मूल्यांकन में एक प्रबल विचारधारा योगियों-सिद्धों और नाथों के योगदान को नकारने या कम आंकने की है। गौर करने की चीज है कि प्राचीन काल से ही योग एक सेकुलर भारतीय परंपरा है। यह वैदिकों तथा बौद्धों दोनों के बीच स्वीकृत रही है और हाल में पूरी दुनिया द्वारा अपनाई गई है।
हम देखते हैं कि सिद्धों की प्रधानता का काल उत्तर और दक्षिण भारत दोनों जगहों पर 700-1200 ईसवी के बीच है। हमें उत्तर भारतीय सिद्धों के साथ दक्षिण के सिद्धों को भी जानना चाहिए। आज भी तमिलनाडु, केरल आदि दक्षिण राज्यों में ‘सिद्धा मेडिसिन’ लोकप्रिय है। इस तरह की कोई चीज उत्तर भारत के सिद्धों के साथ नहीं है।
पतंजलि के बारे में एक धारणा है कि वे दक्षिण भारतीय थे। उन्होंने योग के लिए हिंसा, वैर, अभिमान, झूठ और इंद्रियपरायणता इन पांच चीजों को त्यागने की जो शर्त्तें (यम) बनाईं, इन्हें ध्यान में रखा जाए तो आज का ‘योगा’ मानव चित्त के उत्थान के प्रकल्प की जगह महज एक मार्केट प्रोडक्ट नजर आएगा। लोग बिना चित्त शुद्धि के भी ‘योगा’ कर रहे हैं, अपराधी भी ‘योगा’ कर रहे हैं!
भक्तों की तरह सिद्ध, लगता है,पहले दक्षिण भारत में हुए। उत्तर भारत में सिद्ध सरहपा यदि बौद्ध परंपरा से जुड़े थे तो दक्षिण भारत के सिद्ध शैव परंपरा से। दोनों में तांत्रिक साधना की प्रधानता है। योग की तरह तांत्रिक परंपरा को भी लौकिक माना गया है। प्राचीन सिद्धों की गतिविधियों का संबंध दार्शनिक, कलात्मक और वैज्ञानिक खासकर औषधीय मामलों में मानव चित्त के उत्थान से है। उनका संबंध मनुष्य की समझ बढ़ाने से है। इस तरह योग कोई भौतिक व्यायाम नहीं बल्कि मानव चित्त की समस्त क्षमताओं को जगा कर उसका उत्थान है। नाथपंथी गोरखनाथ कहते हैं, ‘अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा’। मानव मन की सबसे बड़ी क्षमता ‘बुद्धि’ है। सिद्धों ने अपनी ऐतिहासिक सीमा में बुद्धि को महत्व दिया था।
दक्षिण भारतीय सिद्धों ने बताया कि मनुष्य वैराग्य की ओर न मुड़े, वह जीवन से प्रेम करे। वह भेद-भावों और पाखंडों को त्याग कर योग के जरिए इसी जीवन में सच्चे सुख का अनुभव कर सकता है।
तमिल सिद्ध अठारह हैं, जिनमें अगस्त्य, तिरुमुलर, पतंजलि, पंबत्ति, शिववक्कियार आदि के नाम हैं। सिद्ध साधक वैदिक और बौद्ध दोनों परंपराओं में मौजूद संन्यास की धारणा का खंडन करते हैं। हम जानते हैं कि भारत के लोग हजारों साल से संन्यास और अति-भोगवाद के दो ध्रुवों के बीच भटकते रहे हैं। उनमें इच्छाहीनता है या असीमित कृत्रिम इच्छाएं रही हैं। तमिल सिद्ध पंबत्ति सपेरे थे। वे मंत्र नहीं, औषधि बताते थे। वे कहते हैं, आध्यात्मिक उपलब्धि चित्त-सुधार में है, न निवृत्ति में और न भोगवाद में!
राह पर ऐसे चलो
जैसे तुम धरती का चुंबन कर रहे हो
तुच्छताओं से असंपृक्त रहो
उस परम तत्व को जानो
तुम्हारे अंदर प्रेम और भक्ति पैदा हो जाएगी…
ओ सर्प
सभी सच्चाइयों का सार पाने के लिए
यह जान लो और नाचो!
तमिल सिद्ध कवि शिववक्कियार (10वीं सदी) के जीवन से कई चमत्कार जुड़े हैं, जैसे- हांडी में बालू डालकर चावल निकालना, नदी में सिक्का डालकर पा जाना। योगियों का चमत्कारवाद से संबंध है, पर महत्वपूर्ण है उनकी लोक-प्रधान दृष्टि। तमिल सिद्ध शिववक्कियार तर्क करते हैं। वे मानते हैं कि शरीर में ही देवताओं का मंदिर है-
क्यों झुके हुए हो
पेड़ों की डालियों
झाड़ियों और तालाबों से तोड़े
फूलों से सुसज्जित पत्थरों के आगे
क्यों बुदबुदा रहे हो प्रार्थना
क्या ये मूर्तियां बोल सकती हैं
भले कोई कहे
उनमें है सर्वव्यापक भगवान का वास
पर क्या कढ़ी का स्वाद
पात्र में रखी कलछुल बता सकती है
तुम जाते हो दौड़े काशी
नहाते हो गंगा में
क्या तुम बदल जाते हो काले से गोरे में…
मेरा हृदय ही है उसका मंदिर
मेरी सांसों में बसा है शिवलिंग
मेरी इंद्रियां हैं जलती अगरबत्तियां
यही वह स्थल है
जहां मेरी आत्मा करती है नृत्य
नटराज जैसी!
सूफी कवि और टिल्ला जोगिया
हमारे देश में कई प्राचीन सांस्कृतिक घटनाएं हैं जिनपर चर्चा कम होती है। उनमें एक है योग की परंपरा से सूफियों का संबंध। इस्लाम से जुड़े सूफी मत में योग का शामिल होना एक अनोखी घटना है। जायसी के सूफी महाकाव्य ‘पद्मावत’ में निराश योगी रतनसेन को हिम्मत देने के लिए योगीराज शिव के साथ अन्य हिंदू देवता हनुमान आदि भी आ जाते हैं। सांस्कृतिक समावेशिकता की इस प्रवृत्ति को समझने की जरूरत है। हमारे देश में भले कट्टरवादी रुकावटें हों, पर ‘समावेशिकता’ ही सबसे बड़ी भारतीय सच्चाई है।
पंजाब में योगियों की व्यापक उपस्थिति थी। उनके स्थान को ‘टिल्ला जोगिया’ कहते हैं। सूफी कवि बुल्ले शाह का एक चरित्र रांझा हीर को पाने के लिए इस जगह आकर योगी बनता है। उसकी हीर प्रेम के शिखर पर अपने को रांझा समझने लगी है। वह राधा की तरह है, ‘राधा हरि बन गई यदि हरि राधा बन पाते’ (सूर)! राधा कृष्णमय होकर अपने को कृष्ण समझने लगती है! भक्त आत्मोत्थान कर ईश्वर के जैसा हो जाए, तभी सच्ची भक्ति है। 21वीं सदी का धर्मांध आदमी ईश्वर को ही अपने जैसा बनाने पर तुला है। वस्तुत: ईश्वर की भक्ति और धर्मांधता दो विपरीत दिशाएं हैं।
‘गुरुग्रंथ साहिब’ का एक हिस्सा ‘सिद्धगोष्ठी’ है जो गुरुनानक और सिद्धों के बीच एक संवाद से संबंधित है। इसमें वज्रयानी शाखा से संपर्क वाले 84 सिद्धों का वृत्तांत है। गुरुनानक ने जाति व्यवस्था और अन्य समस्त भेदभावों के विरोध को अपने धर्म में एक प्रमुख तत्व के रूप में रखा था। उन्होंने सिद्धों से उनके कठिन तप की जगह सहज आत्मज्ञान लिया। देखा जा सकता है कि व्यापारियों द्वारा चलाए गए धर्मों में त्याग, उदारता, सेवा भावना, कर्मठता और समावेशिकता अन्य धर्मों-पंथों से ज्यादा रही है।
द्वंद्वात्मक अंतर्मिश्रण क्या है
भक्त कवियों ने पुरोहित-प्रपंच से मुक्त होने और जीवन के सहज मार्ग के लिए बौद्ध और सिद्ध-नाथ परंपराओं से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रेरणा ली है। सिक्खों और वैष्णव भक्तों ने भी ‘आतम ज्ञान’ और ‘जप’ को महत्व दिया। ‘जप’ और ‘नारा’ में फर्क है। ‘जप’ कई धर्मों में मनःकेंद्रण के लिए प्रस्तावित है। क्या इसकी शुरुआत शैव परंपरा में हुई? इसका एक छोर सिद्धों का ‘अजपा जाप’ है!
उल्लेखनीय है कि कबीर योग की परंपरा से अपना संबंध जोड़ते हुए भी पथभ्रष्ट योगियों की आलोचना करते हैं, ‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा’! कबीर योगियों से एक ‘आत्मीय दूरी’ रखते हैं। तुलसी ‘साखी-सबदी-दोहरा’ कहने वालों की उपेक्षा करते हुए भी ज्ञान मार्ग को महत्व देते हैं- ‘भगतहि ज्ञानहि नहिं कछु भेदा’! लड़ते-लड़ते भी दूसरे के गुणों से मिश्रण, ‘द्वंद्वात्मक अंतर्मिश्रण’ भी एक अद्भुत भारतीय परंपरा है। किसी भी आंदोलन को समझने के लिए ‘द्वंद्वात्मक अंतर्मिश्रण’ और ‘आत्मीय दूरी’ को समझना चाहिए।
कबीर चिंता व्यक्त करते हैं कि हमने आत्मज्ञान गंवा दिया है, ‘अपनपौ आप ही बिसरो/ जैसे स्वान कांच मंदिर में, भ्रमि-भ्रमि भूक परो।’ कुत्ता शीशे में अपनी ही छवि देखकर भूंकता रहता है, अपने को नहीं पहचान पाता। कबीर और सूर दोनों को यह रूपक प्रिय है- हिरण की नाभि में ही कस्तूरी है पर वह इसकी गंध खोजता हुआ वन-वन भटकता है। कबीर कहते हैं, ‘कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढ़त बन माहिं’। सूर कहते हैं, ‘जो लौं संत सरूप नहिं सूझत/ तौ लौं मृग नाभि बिसारे फिरत सकल बन बूझत’। कबीर और सूर दो भिन्न भक्ति धाराओं के कवि माने जाते हैं, पर एक जैसा रूपक चुनते हैं। ऐसे लोगों में बुनियादी भेद नहीं है। यह भी देखने की जरूरत है कि भक्ति जयकारा लगाना नहीं है, मंदिर-मंदिर घूमकर रुपया चढ़ाना नहीं है, वह आत्मज्ञान है!
भक्ति आंदोलन का जो कवि योग की परंपरा से जितनी अधिक दूरी पर है, वह जाति व्यवस्था और बाह्य आडंबर का उतना कम विरोधी है। कबीर के जातिप्रथा तथा बाह्याडंबर-विरोध की प्रखरता का संबंध योग से है।
भक्ति आंदोलन ने कल्पना की स्वतंत्रता दी
मानवतावाद का जो बुनियादी संदेश अद्वैतवादी वैदिक परंपराएं, जैन-बौद्ध परंपराएं और शैव दर्शन देता रहा है भक्ति आंदोलन में उसी संदेश का नवोत्थान है। भक्ति का संदेश प्रेम और सौंदर्य की नई-नई छवियां लेकर आया था और अभूतपूर्व था। हम देखते हैं कि भक्ति किस तरह कल्पना का एक विविधतापूर्ण संसार लेकर आती है। दरअसल धर्मांधता का जन्म तब होता है जब धर्म में सृजनात्मक कल्पनाशीलता का अंत हो जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो भक्ति आंदोलन ने वस्तुत: भारतीय कल्पनाशीलता को जड़ धार्मिक बंधनों से स्वतंत्र किया।
भक्ति धर्म को झूठ के छिलके से अलग करती है, झूठे बंधनों से बाहर निकालती है। वह महंतों-पुरोहितों को बिचौलियों के रूप में स्वीकार नहीं करती बल्कि उनके लोभ, वैभव और प्रभुत्व को चुनौती देती है। भक्ति उस धार्मिक भावना के करीब ले जाती है जिसका संबंध ईमानदारी, बंधुत्व और परहित से है।
योगी गोरखनाथ का विद्रोह
दक्षिण भारत में कई शैव भक्त कवि हैं, पर हिंदी में वैसा शैव भक्त कवि एक नहीं है। नाथ संप्रदाय के गोरखनाथ के संबंध में कई अंधविश्वास हैं। उनमें एक यह है कि वे शिव के अवतार थे। उनके जीवन के तथ्य अज्ञात हैं, इसलिए उनको घेरकर रहस्य ज्यादा खड़ा हुआ। मुख्य बात है कि उनकी सबदी को ‘बाणी’ के रूप में देखा जाता है, कविता के रूप में नहीं। उनकी बाणी उस तरह काव्य न हो, पर उसमें एक गहरी सीख है जिसे आज लोग भूल गए हैं। भारतीय योगियों की प्राचीन परंपरा की आज जो दशा है, उससे भिन्न गोरखनाथ की बाणी में वस्तुतः क्रांति का आनंद रहा है। वे कबीर से पहले पंडित-मुल्ला दोनों को फटकार चुके थे। गोरखनाथ परमात्मा को देवालय और मस्जिद की जगह अन्यत्र खोजते हैं और नाथपंथ की विशिष्टता बताते हैं-
हिंदू ध्यावै देहुरा मुसलमान मसीत
जोगी ध्यावै परमपद जहां देहुरा न मसीत।
योगी गोरखनाथ सामाजिक विद्रोह की परंपरा को एक नई ऊंचाई देते हैं। उन्होंने कबीर से पहले उग्र ढंग से कहा था कि धर्मग्रंथ धर्म को ढकते हैं। आज धर्मग्रंथों पर कोई ऐसी टिप्पणी करे तो यह चीज हिंदू और मुसलमान समुदायों में हिंसक उन्माद ला देगी। गोरखनाथ के लिए यह उनकी सहज साधना के लिए एक महत्वपूर्ण प्रस्थान है, ‘काजी मुलां कुरान लगाया, ब्रह्म (ब्राह्मण) लगाया बेदं’! कबीर इस बिंदु पर नरम होकर कहते हैं, ‘वेद कतेब कहहु मत झूठे, झूठा जो न विचारे’, अर्थात इन्हें झूठा मत कहो, झूठे वे हैं जो धर्मग्रंथों को विवेक से नहीं देखते!
योगी गोरखनाथ मूर्ति के बारे में कहते हैं, ‘घड़ी मूरति कूं सब कोई सेवै, ताहि न जाने भेवा’, अर्थात लोग मूर्ति की पूजा जरूर करते हैं, पर वे उसके रहस्य, आंतरिक अर्थ से बेखबर हैं। उनका आत्मकथन है, ‘जन्म से हिंदू हूँ, जरणां के कारण योगी हूँ और अक्ल से मुसलमान पीर हूँ!’ गौर करने की चीज है कि गोरखनाथ अपने को महंत की जगह पीर बताते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं, ‘गरब न करिबा सहजे रहिबा’! सहज और शीलवान होकर जीवन यापन करने वाला गृहस्थ गंगा जल की तरह पवित्र है। शिव भी उसका आदर करते हैं! सिद्ध और नाथपंथी योगी जीवन का ‘सहज मार्ग’ चुनने के लिए कहते हैं, जो बौद्धों के यहां ‘अष्टांग सम्यक मार्ग’ है- संतुलित दृष्टि, संतुलित इरादा, संतुलित वाणी, संतुलित आचरण, सही आजीविका, सकारात्मक स्मृति, सच्चा प्रयास और सच्चे ढंग से ध्यान। किस व्यक्ति को ये अमान्य हो सकते हैं?
रस गगन घटा में अजर झरै
हमारे देश में योगियों का, वे सिद्ध हों या नाथ, बड़ा आदर रहा है। उनमें साधारणत: पिछड़ी जातियों के लोग थे। भक्त कवि योगियों की लोकप्रियता से परिचित थे, उनके विचारों से प्रभावित थे और उनके हिंसक संप्रदायवादी रूप से चिंतित भी थे। कबीर सहित प्राय: सभी भक्तों ने संपत्तिवान महंतों में परिणत योगियों की आलोचना की। पलटूदास (18वीं सदी) ने कहा-
सिध चौरासी नाथ नौ, बीचै सबै भुलान
बीचै सबै भुलान भक्ति की मारग छूटी
हीरा दिहिन है डारि, लिहिन है कौड़ी फूटी।
हमारे देश में वेदांत से लेकर जैन-बौद्ध दर्शनों तक, योगियों से लेकर भक्तों तक सांस्कृतिक परिवर्तन की सभी आवाजें दुर्घटनाग्रस्त हुईं। सिद्धों-नाथों की परंपराएं भी भटक गईं। उनके बढ़ गए चमत्कार-प्रदर्शनों और आडंबरों ने वैज्ञानिक खोज की प्रवृत्तियों को चोट पहुंचाई। आज भारतीय संस्कृति के प्रवाह में फिर ‘ब्लॉकेज’ बढ़ गए हैं, खतरे बढ़ गए हैं। हजारों साल से धर्म हैं, पर ये मनुष्यजाति का दुख दूर नहीं कर सके हैं, आपसी विद्वेष और हिंसा नहीं मिटा सके हैं, संसार में युद्ध की जगह शांति नहीं ला सके हैं।
भक्ति आंदोलन के दौर की खूबी है कि शासक नहीं, आम लोग अपनी संस्कृति का निर्माण कर रहे थे। वे ईश्वर को एक नूतन आंख से देख रहे थे। हमारे लिए कबीर, सूर, मीरा, जायसी और तुलसी- हिंदी क्षेत्र के ये पांचों कवि महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अपनी ऐतिहासिक सीमा में वे एक नया संसार रच रहे थे। उनकी कृतियां उस लंबे दौर की मानवता की उच्चतर उपलब्धियां हैं, भले आज कोई किसी कवि की सारी बातों से सहमत न हो। कुछ व्यक्ति पुरानी घिसी-पिटी बातें उठाकर बिना पढ़े ही भक्त कवियों में से किसी को ऊंचा और किसी को नीचा घोषित करते रहते हैं। इस मामले में लंबे समय से नायक पूजा रही है। भक्त कवियों को आपस में लड़ाने का खेल अब बंद हो जाना चाहिए।
हमें भक्त कवियों की विविधता आकर्षित करती है, उनका सौंदर्यबोध आनंद देता है। उनकी कल्पनाशील ईश्वरानुभूति में सांस लेने की जगह दिखाई देती है। सामाजिक क्रांति के उनके आध्यात्मिक प्रयासों ने एक समय सारे भेदभावों को मिटाकर एक ऐसे ‘साझा जीवन-साझी संस्कृति’ की आधारशिला रखी थी, जिसकी एक बड़ी प्रेरणा निश्चय ही योगियों की प्राचीन परंपरा थी।
बारह सौ सालों के भक्ति आंदोलन को धार्मिक जड़ांधकार से विविध सांस्कृतिक विद्रोहों की एक दीर्घ परंपरा कहा जाना चाहिए। उसके प्रभाव को लोकमानस संभालकर नहीं रख पाया। विविधतापरक आस्था की वे परंपराएं सत्ता विमर्श और मीडिया-प्रचारित लोकप्रियतावाद में बह गईं। सामाजिक भेदभाव और बाह्याडंबर ने उलटकर प्रचंड रूप धारण कर लिया। फिर भी भक्ति आंदोलन, नवजागरण के विचारों और जन आंदलनों का इतना दबाव बना हुआ है कि कोई भी विश्वविद्यालय, ‘मनुस्मृति’ पढ़ाने का साहस नहीं कर सकता।
हम कह सकते हैं कि भक्त कवियों की ईमानदार वाणी कभी मिट नहीं पाएगी, क्योंकि उसमें नए मानव भविष्य की आवाजें हैं। कोई इतिहास अधिक समय तक भविष्य की आवाजों को अनसुना करके वर्तमान के कीचड़ में धंसा नहीं रह सकता!
योग का कल्पलोक है- ‘रस गगन गुफा में अजर झरै’ (कबीर)। संसार का आनंद इसी देह में है। इस देह की छोटी गुफा में ही संपूर्ण गगन है, जहां निरंतर नूतन रस की बरसात होती है। इस भौतिक देह को ही बौद्धिक साधना करके ‘बुराइयों’ (मलों) से ऊपर उठाओ और नूतन जीवन रस में भीगते रहो! वे योगी, वे भक्त-संत यही बात कहना चाहते थे जो बहुतों को गुह्य साधना लगी, जबकि योगी और भक्त-संत वस्तुत: प्राचीन सुधारवादी थे।
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आदरणीय, महापुरुषों के चित्र से चरित्र की स्मृति मानस में कौंधती है तो कुपंथ से सुपंथ पर आने की संभावना बढ़ जाती है। इसी संदर्भ में मूर्ति या चित्र का सनातन धर्म में महत्व है। निश्चित रूप से मात्र चरित्र श्रवण से परिवर्तन नहीं आता वरन चरित्र श्रवण कर उस पर अमल करने से जीवन पवित्र होता है।
अल्प असहमति के साथ संपादकीय रुचिकर लगा।
सादर प्रणाम 🙏🙏