शंभुनाथ

 

भारत जैसे एक बड़े बहुभाषिक देश के लिए देशप्रेम की जितनी अधिक जरूरत है, उतना ही आज यह एक कठिन मामला है। कम आबादी वाले छोटे देशों में देशप्रेम का रूप सहज है, क्योंकि एक भाषा- एक जाति वाले देश में साझी भावना आसानी से पैदा होती है। जिस देश की आबादी बड़ी है, कई जातीयताएं हैं और कई जातियां (कास्ट) हैं, वहां देशप्रेम मुश्किल से पैदा होता है। भारत में देशप्रेम को चुटकी में अवतरित हो जाने वाली भावना नहीं मान लेना चाहिए, यह एक गहन आत्मसंघर्ष से गुजरने पर ही संभव है।

सच्चे देशप्रेम के मार्ग में एक समस्या शिक्षा का अभाव है, अधपढ़ता है। 21वीं सदी में भी हमारे देश के भीतरी गांवों में ऐसे सैकड़ों निरक्षर पुरुष-स्त्रियां मिल जाएंगे जो भारत नाम से अपरिचित होंगे और मुश्किल से अपने जिला का नाम जानते होंगे। ऐसे करोड़ों शिक्षित लोग हैं, जिनमें देशप्रेम केवल तब जगता है, जब इस देश का इंग्लैंड या पाकिस्तान से क्रिकेट मैच होता है या सरहद पर अचानक युद्ध छिड़ता है।

वैश्वीकरण के बाद पश्चिमी देशों में प्रतिभा-पलायन बढ़ा है। ऐसी प्रतिभाओं के देशप्रेम का स्तर स्वत: उद्घाटित हो जाता है। लोगों को अधिक आमदनी और विलासितापूर्ण जीवन के लिए इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया जाकर बस जाने या वहां की ‘सिटिजनशिप’ लेने में कोई दुविधा नहीं होती। वे कभी-कभी तिरंगा हिला भी दें, यदि उनका देश में लौटने का मन न करे, देश के लोगों के दुख-विपदा पर उनके मन में कोई हलचल न हो, उनके अपने बुजुर्ग माता-पिता देश में एकाकीपन झेल रहे हों तो सोचना चाहिए कि ऐसे स्मार्ट व्यक्तियों में कैसा देशप्रेम होगा!

नव-उदारीकरण के जमाने में देखा जा सकता है कि लोग ‘लोकल’ हैं या सीधे ‘ग्लोबल’ हैं। उनमें जब भारतबोध ही नहीं है, देशप्रेम कहां से पैदा होगा!

क्या वैश्वीकरण और देशप्रेम एक-दूसरे के विपरीत हैं? क्या देशप्रेम बाजार अर्थव्यवस्था में जन-असंतोष को नियंत्रित करने का औजार भर है?
भारत के लोगों के सपने
उनकी स्मृतियों से महान थे

देशप्रेम का गहरा संबंध देश को जानने से है। देश को जानने के मार्ग में मुख्य बाधाएं हैं- इतिहास की औपनिवेशिक समझ, बहिष्कारपरक राष्ट्रवाद और एकायामी आधुनिकता। आज हमारे सामने इतिहास नहीं इतिहास के टुकड़े हैं- ‘फ्रैग्मेंटेड पास्ट’ और सबके अपने-अपने अतीत हैं। कोई साझी भावना नहीं बची है, कोई साझा जीवन-लक्ष्य नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में अतीत लड़ रहा था, आज वह लड़ा रहा है।

आनंद कुमारस्वामी एक श्रीलंकाई कला-दार्शनिक थे। उन्होंने देश के स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया था। वे रवींद्रनाथ के भी नजदीक थे। उन्होंने इतिहास से ज्यादा महत्व कला-साहित्य की परंपराओं को दिया और कहा कि इनकी रोशनी में अपने को देखो। इतिहास खंड-खंड करता है, खासकर अंग्रेजों की औपनिवेशिक धारणाओं से प्रेरित खंड-खंडवादी इतिहास, जबकि कला और साहित्य जोड़ते हैं!

ऊपर से पश्चिमी आधुनिकता ने लोगों को कबंध बना दिया जिसके पास सिर नहीं है, केवल धड़ है। कुमारस्वामी किसी बिंदु पर रहस्यमय हो जाते हों, पर उन्होंने ‘राष्ट्र’ की यूरोपीय धारणा का विरोध किया। दरअसल भारत में राष्ट्रीयता का विकास न पश्चिमी पद्धति से हुआ न स्त्री-दलित-आदिवासियों को अलग रखकर। इसलिए भारत को भारत की दृष्टि से ही जाना जा सकता है।

देशप्रेम के लिए देश को जानना पहली जरूरत है। इसके लिए ‘अ-पर’ की खोज करने वाले वैदिक ॠषियों, बौद्धों, जैन साधकों, प्राचीन कवियों, भक्तों-सूफियों-संतों को जानना जरूरी है। उन सभी ने ‘अदर्स’ को लेकर बुद्धिपरक चिंतन किया, ‘अ-पर’ का महत्व बताया और पर-पीड़ा को ‘अधमाई’ माना। उन्होंने हमेशा प्रेम को महत्व दिया जो मनुष्य संसार से आगे बढ़कर पेड़-पौधों, पर्वत-नदियों, पशु-पक्षियों बल्कि संपूर्ण पर्यावरण तक विस्तृत था- ‘पाती तोरै मालिनी, पाती पाती जीव’ (कबीर)।

रामायण में जब लक्ष्मण सीता को वन में छोड़कर जाते हैं, सीता के क्रंदन के साथ संपूर्ण वन रो पड़ता है, ‘रूदितं वनेपि’ और रोने की आवाज कवि वाल्मीकि तक पहुंचती है। कवि हमेशा बहिष्कृत की आवाज सुनता है!

प्राचीन ॠषियों-कवियों की दृष्टि में जो भारत है उसका संबंध कभी किसी छोटे राज्य या साम्राज्य से नहीं रहा है। वे ‘परस्पर मिलो-परस्पर संवाद करो- साथ सोचो’ (वेद) गणतंत्र (बौद्ध-दर्शन), वृंदावन के कल्पलोक (सूरदास), ‘ठाढ़े सिंह चरावै गाई’ की अहिंसा (कबीर), राम राज्य (तुलसी), बेगमपुरा (रैदास), भूमा लोक (शैव दर्शन) आदि का स्वप्न देखते रहे हैं। भक्त कवियों में तुलसी ने अवधी से प्रेम के बावजूद ‘भारत’ का नाम लिया था- ‘भलि भारत भूमि’ और एक जगह गंगा के साथ दक्षिण भारत की नदियों का भी उल्लेख किया था। उन्होंने संसार को हमेशा नया पल्लवित-पुष्पित होते एक बड़े वृक्ष के रूप में देखा, ‘पल्लवत फूलत नवल नित संसार विटप नमामहे’! वे सभी महान कवि भारत के साथ पूरे संसार के बारे में सोचते थे।

हजारों साल से ॠषियों-साधकों-कवियों ने उस भारत को जानने की कोशिश की जो अनोखा है, विविधता से भरा है। उन्होंने बताया कि भारत का पहला और अंतिम सत्य प्रेम है। उन सभी ने अपने-अपने ‘लोकेल’ से अपनी सीमा में भारत को लेकर बड़े सपने रचे। कहना न होगा कि भारत के लोगों के सपने उनकी स्मृतियों से महान है।

राष्ट्रीय काव्यधारा एक बंद कोठरी नहीं है

राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि स्वाधीनता आंदोलनों की देन थे। वे सभी गांव की मिट्टी से उभरे थे और एलीट मानसिकता से मुक्त थे। इन दिनों उन्हें संकुचित दृष्टि से देखा जा रहा है, जबकि एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस धारा के प्रमुख कवि माने गए हैं- माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’। इनमें दिनकर को छोड़कर बाकी तीनों को अंग्रेजी राज में जेल जाना पड़ा था।  वे कवि त्याग और सादगी से रहते थे, विलासी देशभक्त न थे। उन्होंने राष्ट्रीयता का जो अर्थ दिया, वह आज भी एक आलोक स्तंभ बन सकता है।

राष्ट्रीय काव्यधारा के संबंध में पहला सवाल उठता है कि छायावादी कवि के रूप में जो जाने जाते हैं प्रसाद-निराला आदि, क्या वे गैर-राष्ट्रीयतावादी हैं और राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि क्या गैर-छायावादी हैं?

छायावाद और राष्ट्रीय काव्यधारा के कवियों का उदय एक ही काल में हुआ था, जब देश अंग्रेजी शासन के अधीन था और राष्ट्रीय जागरण का दृश्य था। छायावाद (रोमांटिसिज्म) का आगमन औपनिवेशिक स्थितियों में हुआ था। इसलिए छायावाद में विश्वमानवता के साथ राष्ट्रीय जागरण एक स्वाभाविक मामला है। प्रसाद की कविता ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’, उनके ‘चंद्रगुप्त’ जैसे नाटक और निराला की ‘जागो फिर एक बार’ उदाहरण हैं। इसी तरह माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य में यदि छायावाद के प्रेम, प्रकृति और सौंदर्य के भरपूर चिह्न मिलें तो यह विस्मय की बात नहीं है। दरअसल भारत में रोमांटिसिज्म के बिना देशप्रेम संभव नहीं है।

यह भी देखने की जरूरत है कि 19वीं सदी का समाज सुधार आंदोलन स्वाधीनता आंदोलन के दौर में थमा नहीं था। इसलिए छायावादी साहित्य और राष्ट्रीय काव्यधारा दोनों में स्त्रियों और पिछड़ों-दलितों को लेकर जागरूकता है। भारत जैसे देश में देशप्रेम कभी भी स्त्रियों तथा पिछड़ों-दलितों की दशा में क्रांतिकारी परिवर्तन से तटस्थ नहीं रह सकता।

राष्ट्रीय काव्यधारा ने स्वाधीनता के प्रश्न को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बनाकर अंग्रेजी राज्य के अलावा धार्मिक अंधविश्वासों पर भी पर्याप्त चोट की। इसने सबसे पहले परलोक की धारणा का खंडन किया। मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ में इहलौकिकता के पक्ष में लिख चुके थे, ‘भव में नव वैभव व्याप्त करने आया/ नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया/ संदेश यहां मैं नहीं स्वर्ग का लाया/ इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’ अब मोक्ष, कर्मकांड और स्वर्ग जीवन के लक्ष्य नहीं थे। देशप्रेम तब ‘मनुष्य में ईश्वरता के उदय’ पर जोर देता था।  प्रसाद की ‘कामायनी’ की श्रद्धा हो या दिनकर की ‘उर्वशी’ की उर्वशी, वे गंधर्व लोक-देवलोक की निरर्थकता बताकर पृथ्वी का जयगान करती हैं।

माखनलाल चतुर्वेदी ‘पुष्प की अभिलाषा’ में देश की स्वाधीनता के लिए तरुणों के त्याग और बलिदान को महिमामंडित करते हैं, ‘मुझे तोड़ लेना वनमाली!/ उस पथ में देना तुम फेंक/ मातृभूमि पर शीश चढ़ाने/ जिस पथ जावें वीर अनेक।’ इसके साथ वे रूढ़िवादी धार्मिक पोथियों की कैद से मुक्ति की बात भी करते हैं, ‘हम हैं नहीं रूढ़ि की पुस्तक के पथरीले भार/ नित नवीनता के हम हैं जग के मौलिक उपहार।’ (विद्रोही, 1932)।

राष्ट्रवादी कवि दिनकर ‘रश्मिरथी’ में जातिवाद और जाति के आधार पर श्रेष्ठता का विरोध करते हैं जो हिंदी समाज में शुरू हो चुके बौद्धिक अंतर्मंथन का चिह्न है। ‘रश्मिरथी’ में कर्ण कहता है, ‘जाति जाति रटते जिनकी पूंजी केवल पाखंड’। दिनकर के राष्ट्रवाद में स्पेस है, उसके भीतर से पूरा देश और समाज बोलता है। वे गांधी को संबोधित करते हुए कहते हैं, ‘अरे गरीब-निवाज, दलित जी उठे सहारा पाया।’ हम देख सकते हैं, राष्ट्रीय काव्यधारा एकांगी राष्ट्रवाद की बंद कोठरी नहीं है।

छायावाद और राष्ट्रीय काव्यधारा का संबंध

उस जमाने की यह समझ थी कि ज्यादा ज्ञान कई बार सत्य के आगे कोहरा होता है। पश्चिम का औपनिवेशिक ज्ञान और अतीत की जर्जर पुरातन सोच दोनों भारत को जानने में बाधक थे। माखनलाल चतुर्वेदी कहते हैं, ‘ढूंढ़ने चलें चलो मधुवन, मुझे लौटा दो मेरापन’। यह उनके निजी मेरापन की खोज नहीं है, भारत के मेरापन की, भारत के स्वभाव की तलाश है। भारत आत्माविष्कार के पथ पर था! माखनलाल चतुर्वेदी कहते हैं, ‘सखे, यह जर्जरता की जननि, ज्ञान की गठरी फेंक चलूं/ आदरों की चादर दूं फाड़, फेंक यह वृद्ध विवेक चलूं।’  अब बूढ़ी सोच से काम नहीं चलेगा। पुरस्कार-सम्मान कई बार आत्मा को ढकते हैं, निर्बल करते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी ज्ञान के अहंकार और सम्मान की भूख दोनों को धता बताते हैं। उनका स्वच्छंदताबोध भारत के ‘स्व’ की तलाश है। भारत के ‘स्व’ को जाने बिना इस देश में स्वतंत्रता का अर्थ समझ में नहीं आ सकता!

उस युग में छायावाद सामंती रूढ़ियों और बंधनों के विरुद्ध व्यक्ति के ‘स्व’ का उद्घोष था। माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रीयतावादी कविताओं में स्वातंत्र्यचेता व्यक्ति का ‘स्व’ मुखर है। यदि व्यक्ति का ‘स्व’ नहीं बचेगा, भारत का ‘स्व’ भी नहीं बचेगा। क्या आज उन्मत्त भीड़ की संस्कृति में व्यक्ति का ‘स्व’ बच पा रहा है?

भारत जैसे देश में अपनी मनुष्यता को व्यापक बनाए बिना देशप्रेम की कल्पना नहीं की जा सकती। राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि माखनलाल चतुर्वेदी के ‘स्व’ की ऊंचाई देखिए-
जब चांद मुझे नहलाता है
सूरज रोशनी पिन्हाता है
क्यों दीपक लेकर कहते हो
यह तेरा है यह मेरा है
हो मुकुट हिमालय पहनाता
सागर जिसके पग धुलवाता
वह बंधा बेड़ियों से मंदिर
मस्जिद गुरुद्वारा मेरा है।

माखनलाल चतुर्वेदी को दिख रहा था (अमीर इरादे गरीब इरादे) कि केवल भारत नहीं संपूर्ण एशिया मुक्ति पथ पर है, ‘समस्त एशिया जाग उठा है।’ वे पश्चिम के श्रेष्ठता-दंभ को चुनौती देते हुए एशियावासियों को नगण्यताबोध से उबारना चाहते हैं। वे भारत के उत्थान की कल्पना अलगाव में नहीं करते, सरहदें नहीं बनाते। यहां भी उनके राष्ट्रवाद में स्पेस है, तभी एशियाबोध है। यह दुर्भाग्यजनक है कि एशिया के देश सभ्यता के शिखर पर भी रक्त से लथपथ हैं, यूरोपीय यूनियन की तरह एशियाई यूनियन नहीं बन पाया!

माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘प्रभा’, ‘कर्मवीर’ का संपादन करते हुए राष्ट्रीय आंदोलनों में पनपते सुविधावाद और अंग्रेजों द्वारा बनी कौंसिल में शामिल होने के लोभ का विरोध किया था, जैसा प्रेमचंद ने भी किया था। उनके राष्ट्रवाद में उन तरुण क्रांतिकारियों के लिए जगह अधिक है जो ‘बलि पथ के अंगारे’ थे। उनके राष्ट्रवाद में सत्ता का लोभ नहीं है, क्रांतिकारी रोमांटिसिज्म है-
सूली का पथ ही सीखा है
सुविधा सदा बचाता आया
मैं बलि पथ का अंगारा हूँ
जीवन ज्वाल जलाता आया।

20वीं सदी के पूर्वार्ध के राष्ट्रवाद के कई रंग हैं, कई लहरें हैं। उस दौर में इसके कट्टरवादी रूपों के समानांतर उदार राष्ट्रवाद की आवाज प्रबल थी। उदार राष्ट्रवाद धार्मिक, जातिवादी और प्रांतीय संकीर्णताओं से ऊपर उठाता था। वह उच्च आदर्शों से प्रेरित था। उसमें औद्योगिक समाज के सुखवाद, धन-संपदा के लिए पागल स्पर्धा का विरोध था। आज के जमाने में भौतिक सुखवाद मनुष्य की विचारशक्ति को मिटा रहा है। माखनलाल चतुर्वेदी ‘अमर राष्ट्र’ कविता में कहते हैं-
हाय राष्ट्र मंदिर में जाकर
तुमने पत्थर का प्रभु खोजा
लगे मांगने जाकर रक्षा
और स्वर्ण-रूपे का बोझा
मैं यह चला पत्थरों पर चढ़
मेरा दिलवर वहीं मिलेगा
फूंक जला दे सोना चांदी
तभी क्रांति का सुमन खिलेगा!

माखनलाल चतुर्वेदी स्वच्छंद मन के कवि थे-  विचारों में दृढ़, सुविधावाद पर प्रहार करने वाले और खुद निरंतर असुरक्षित! राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर और बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ संसद सदस्य बन गए। लेकिन माखनलाल चतुर्वेदी  विद्रोही तेवर के कारण अपने को कहीं वफादार साबित न कर सके। वे कुछ मुद्दों पर चुप रहना नहीं सीख पाए, एक अलग मिजाज के कवि थे। उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ नहीं ‘एक भारतीय आत्मा’ कहा गया। वे ही ग्रीष्म का सूखा झरना बनकर बोल सकते थे-
भावों के उन्मत्त
साध के हिरणों से पूछो
जल प्रपात से नहीं
ग्रीष्म के सूखे झरनों से पूछो
क्यों गाता हूँ।

देशप्रेम में अतीत के प्रति रोमांटिक आकर्षण

अमेरिका के पास कोई प्राचीन अतीत नहीं है। वहां के देशप्रेम में अतीत शामिल नहीं है। इंग्लैंड, फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में देशप्रेम को उत्प्रेरित करने के लिए अतीत के प्रसंग सामने आए हैं। इंग्लैंड में शेली, कॉलरिज, यहां तक कि टी.एस. इलियट की दृष्टि इतिहास की तरफ गई है। फ्रांस में देशप्रेम के लिए रोमन गणतंत्र के अलावा स्त्री संत जान ऑफ आर्क प्रेरणा बनी। ये सभी स्वतंत्र देश रहे हैं।

भारत 19वीं सदी और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में एक गुलाम देश था, एक अपेक्षाकृत जटिल इतिहास वाला देश भी। इसलिए यहां पराधीनता के दर्द का एक संदर्भ यदि प्राचीन गौरव की स्मृति है तो इसे हमेशा पुनरुत्थानवाद नहीं समझ लेना चाहिए।

भारतेंदु ‘भारत दुर्दशा’ में लिखते हैं, ‘जहां भीम, कर्ण अर्जुन की छटा दिखती। वहां (अब) रही मूढ़ता कलह अविद्या राती’! हिंदी क्षेत्र के लोगों की मूढ़ता, कलह, अविद्या भारतेंदु को कष्ट देती है। वे अर्जुन के साथ कर्ण को भी याद करते हैं। वे ‘हाय! पंचनद हा पानीपत… हाय चित्तौड़’ का शोक मनाते हैं, पर वे आज की तरह अपने देशप्रेम में अतीत के प्रति ‘नास्टेल्जिया’ के शिकार नहीं होते। उनके ‘भारत दुर्दशा’, ‘भारत जननी’ जैसे शीर्षकों और ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है’ जैसे प्रश्नों से स्पष्ट हो जाता है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक भारत-हृदय रखते थे।

आज के संदर्भ में भी कहा जाना चाहिए कि इतिहास का पहिया हमेशा भविष्य की यात्रा के लिए बना है। उसे अतीत के कीचड़ में थोड़ी देर के लिए ही फँसाकर रखा जा सकता है। अतीत में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की चीजें हैं। सवाल है, हम उनमें से क्या चुनते और क्या छोड़ते हैं। दिनकर का अतीतबोध वर्तमान को दबोचता नहीं है-
जब भी अतीत में जाता हूँ
मुरदों को नहीं जिलाता हूँ
पीछे हटकर फेंकता बाण
जिससे कंपित को वर्तमान।

महर्षि अरविंद (1872-1950) शुरू में उग्र राष्ट्रवादी थे। वे धार्मिक-आध्यात्मिक अतीत से प्रेरणा लेते थे। दूसरे विश्व युद्ध के समय हिटलर के विरुद्ध मित्र शक्तियों के युद्ध को उन्होंने ‘मानवता के भविष्य की रक्षा’ और ‘सभ्यता के बचाव की कोशिश’ कहा था। उनका राष्ट्रवाद हिटलर के पक्ष में नहीं जाता। वे कहते हैं, ‘मैं जानता हूँ कि मित्र राष्ट्र- अमेरिका, ब्रिटेन, रूस भी अपनी जीत का दुरुपयोग कर सकते हैं या शांति भंग कर सकते हैं या अपनी जीत द्वारा मानव प्रगति की खोली गई संभावनाओं के द्वार बंद कर सकते हैं। फिर भी मैं उन मित्र राष्ट्रों को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करूंगा। किसी भी कीमत में परिस्थितियां उससे सौ गुना भी बुरी नहीं हो सकतीं, जितनी हिटलर के जीतने पर हो जाएंगी।’ हमारे देश में ऐसे राष्ट्रवादियों की कमी नहीं है, जो गांधी का विरोध करेंगे, पर हिटलर का विरोध नहीं करेंगे क्योंकि उनका देशप्रेम अति-संकुचित है।

समावेशी भारतीय राष्ट्रीयता हमारे देशप्रेम की आत्मा है

राष्ट्रवाद का चरित्र कैसा है, यह बहुत कुछ इसपर निर्भर करता है कि देशप्रेम का चरित्र क्या है। कुछ बुद्धिजीवी राष्ट्रवाद नाम से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। उनकी दृष्टि राष्ट्रवाद के दो रूपों बहिष्कारपरक राष्ट्रवाद और समावेशी राष्ट्रवाद की तरफ जानी चाहिए। यह भी समझना होगा कि बहुभाषी देश भारत का राष्ट्रवाद कभी जर्मनी के राष्ट्रवाद जैसा नहीं हो सकता।

हम माखनलाल चतुर्वेदी के काव्य में राष्ट्रवाद का समावेशी रूप देखते हैं। राष्ट्रीय काव्यधारा के एक अन्य महत्वपूर्ण कवि बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ क्रांति की बात करते हैं और कड़कते-गरजते भी हैं, ‘हम गरज उठे कर घोर नाद/ हम कड़क उठे हम कड़क उठे’। उनमें आवेश अत्यधिक है। लेकिन वे यह चिंता भी व्यक्त करते हैं, ‘आ पहुंचा है जिस ठौर मनुष्य, उस ठौर आज है सर्वनाश’! उस दौर के राष्ट्रवाद में आलोचनात्मक आत्मनिरीक्षण की प्रवृत्ति थी। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के देशप्रेम में सामाजिक रूढ़ियों और बंधनों की आलोचना का स्वर स्पष्ट है-
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ
जिससे उथल पुथल मच जाए
एक हिलोर इधर से आए
एक हिलोर उधर से आए
एक ओर कायरता कांपे
गतानुगति विगलित हो जाए
अंधे मूढ़ विचारों की वह
अचल शिला विचलित हो जाए।

राष्ट्रीय काव्यधारा के कवियों के देशप्रेम में उत्ताल समुद्री लहरों-सा क्रांति-गर्जन है जिसे समझने की जरूरत है। उनके ‘नेशनलिज्म’ और नवजागरण काल के ‘रैशनलिज्म’ के बीच संबंध है, इसलिए राष्ट्रवाद उन्माद नहीं बनता। वे सभी कवि सामाजिक बुराइयों के प्रति आलोचनात्मक थे और वर्चस्व-विरोधी थे। उनके देशप्रेम में सामाजिक क्रांति का संदेश है, अतीत का अंधा पुनरुत्थान नहीं। उनके राष्ट्रवाद की बुनियाद में उच्च मानवीय आदर्श हैं। वे राष्ट्रवाद का उपयोग मिथ्या अंतर्विरोधों को मिटाने के लिए कर रहे थे, मिथ्या अंतर्विरोध पैदा करने के लिए नहीं। कहने की जरूरत है कि स्वाधीनता आंदोलन के दिनों की राष्ट्रीय काव्यधारा की रचनाओं में इतना ताप है कि उसे छूने पर आज कइयों का हाथ जल जा सकता है।

देशप्रेम में विषमता को लेकर चिंताएं

दिनकर ने जब लिखना शुरू किया, राष्ट्रीय आंदोलन कभी ठंडे कभी गरम रूप में चल रहा था। उनकी एक आरंभिक कृति ‘हुंकार’ (1939) में उनकी कलम देशप्रेम को समर्पित है, ‘कलम आज उनकी जय बोल/जला अस्थियां बारी-बारी/ छिटकाई जिनने चिनगारी/ जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर/ लिए बिना गर्दन की मोल।’ आज बिना व्यक्तिगत स्वार्थ के कोई आदमी राजनीतिक जुलूस में नहीं जाता। वह बिना मतलब के घर से बाहर नहीं निकलता। उस जमाने में लोग बिना स्वार्थ फांसी के तख्ते पर चढ़ जाते थे। दोनों जगहों में से कहां है देशप्रेम?

दिनकर साहस से कहते हैं, ‘डरपोक हुकूमत जुल्मों से लोहा जब नहीं बजाती है/ हिम्मतवाले कुछ कहते हैं, तब जीभ तराशी जाती है।’ (विपथगा)। वे इन ध्वनियों में क्रांति भाव भी व्यक्त करते हैं, ‘झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन’! इस कविता में उनकी दृष्टि विषमता की ओर भी जाती है, ‘श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं/ मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं।’ उस युग के देशप्रेम में इस प्रवृत्ति को समझने की जरूरत है।

दिनकर ‘दिल्ली’ (1933) और ‘भारत का एक रेशमी नगर’ (1954) में दिल्ली महानगर की विडंबना के जरिए सभ्यता की दिशा का बोध कराते हैं। एक बार देश के पराधीन नागरिक के रूप में और दूसरी बार राज्य सभा का सदस्य बनने के बाद। वे वस्तुत: दिल्ली में भारत की खोज करते हैं। महानगर बाग-बगीचों से सजा है, पर यहां कुम्हार का चाक नहीं है, किसान नहीं हैं। कैसी दिल्ली है, जहां सब कुछ रेशमी है! नेता हैं, मदिरा है, इंद्र की परियां हैं, वेतनभोगी हैं, विलासी हैं, अमीर लोग हैं। महानगर में केवल देश नहीं है, जिसकी उन्हें तलाश है। वे दिल्ली पर पहली कविता में लिख चुके थे-
वैभव की दिवानी दिल्ली
कृषक मेध की रानी दिल्ली
अनाचार अपमान व्यंग्य की
चुभती हुई कहानी दिल्ली!

उस युग में राष्ट्रवादी कवियों की दृष्टि आर्थिक अत्याचारों की तरफ जा रही थी, आंखें मूंदे रखने की चालाकी न थी। वे कवि देश के साथ-साथ पूरे समाज के बारे में सोचते थे, केवल एक समुदाय के बारे में नहीं। देशप्रेम वंचितों से प्रेम की ओर ले जाता था, लोभी नहीं बनाता था। उस युग का देशप्रेम अंधा देशप्रेम न था, वह मानवता-उन्मुख देशप्रेम था, आंखों वाला। उसमें सच्चे लोकतंत्र की मांग थी। दिनकर ने स्वप्न देखा था-
फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं
धूसरता सोने से शृंगार सजाती हैं
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

यह अलग बात है कि उस युग के छायावाद और राष्ट्रीय काव्यधारा के देशप्रेमी कवियों के स्वप्न बिखर गए।

क्यों आज भी देशप्रेम की जरूरत है

पिछले 100 सालों में किसिम-किसिम के अंतरराष्ट्रीयतावादी हुए। वे हाई-फाई सोच वाले थे। कुछ अपने को ‘विश्वमानव’, ‘विश्व क्रांतिकारी’ समझने लगे थे। उन सभी ने अपने-अपने नशे में देशप्रेम को फिजूल की चीज मान लिया। यह भी देखा जा सकता है कि बड़े व्यापारियों का कोई देश नहीं होता। अरबों में खेलने वाले ऐसे कई व्यापारी ‘डबल सिटिजनशिप’ रखते हैं। वे अपनी कल्पना ‘विश्व नागरिक’ के रूप में करते हैं। उनके लिए मुनाफा ही उनका देश है!

दूसरी तरफ, बहुत से लोग पेड़ की एक डाल लेकर, उसे ही नचा-नचा कर पूरा पेड़ बताते हैं। वे पूरे भारत की चिंता नहीं करते। देश में जब से लोकप्रियतावादी लोकल प्रचारों का बोलबाला बढ़ा है इतिहास, संस्कृति के साथ देश को भी खंड-खंड देखा जा रहा है। इसे विभिन्न संकुचित स्वार्थों की जमीन से देखा जा रहा है, जहां प्रेम नहीं घृणा है। घृणा के रंग कई हैं, पर नतीजा एक है विनाश।

स्वाधीनता आंदोलन के दौर के छायावादी और राष्ट्रीय काव्यधारा के कवियों की दृष्टि में एक अलग चरित्र का देशप्रेम था। ‘राष्ट्र’ की उनकी धारणा में स्पेस था। उनके देशप्रेम में प्रकृति थी, उदार चिंतन था और तर्क की गुंजाइश थी। स्पष्ट है, कोई भी छायावादी या राष्ट्रवादी कवि सिर्फ अपने समुदाय के लिए देश की स्वतंत्रता और प्रगति नहीं चाहता था। उस दौर में लोकप्रिय वे थे, जिनका चित्त बड़ा था। वे अपने को भारतीय कहते थे।

भारतीयता क्या है

भारतीयता सामान्यत: स्थानीयता, भारतीय राष्ट्रीयता और विश्वबोध का त्रिभुज है। कहीं इसका कोई कोण बड़ा और कोई कोण छोटा हो सकता है, पर इस त्रिभुज के बिना भारत का हर व्यक्ति अधूरा है। चिंताजनक है कि वैश्वीकरण की शक्तियों ने इस त्रिभुज को तोड़ दिया है। लोकप्रियतावादी वाग्जाल इतना शक्तिशाली है कि अब धार्मिक या लोकल राष्ट्रवाद सबकुछ है या ग्लोबल होना पसंद किया जाता है। कहा जा सकता है कि किसी भी क्षेत्र में लोकप्रियतावाद को चुनना बौद्धिक आत्मविसर्जन है। यह भारत के लिए दुर्भाग्यजनक है कि भारतीय राष्ट्रीयता के विचार लोकप्रिय नहीं हो पाए हैं।

इस घटना का असर देशप्रेम के चरित्र पर ही नहीं भारत भाव पर भी पड़ा है। इसके कारण अपनी संकुचित मानसिकता से निकलकर ‘सबके’ बारे में दिखावे की जगह सचमुच सोचना कठिन हो गया है।

देशप्रेम में संवेदना एक प्रमुख तत्व है। कहना न होगा कि संवेदना में ह्रास देशप्रेम में ह्रास ला देता है। आज जिधर दृष्टि ले जाइए- अस्पताल, अदालत, शिक्षण संस्थान या कोई प्रशासनिक दफ्तर, कहीं संवेदना नहीं बची है। संवेदना नहीं होगी और चालाकी होगी तो आखिरकार किसी में कितना देशप्रेम होगा, कितनी भारतीयता होगी! थोड़ा सरल हो जाइए, जिंदगी खूबसूरत हो जाएगी।

अपने को ‘भारतीय’ बताना या ‘मनुष्य’ समझना अब नुकसान का मामला बनता जा रहा है, क्योंकि फायदा चाहिए, तो आइडेंटिटी की राजनीति करो। जिसमें फायदा है, वही अब पहचान है! धर्म, जाति, प्रांत, भाषा आदि के आधार पर खंड के विमर्शपरक नैरेटिव ज्यादा बन रहे हैं। इन्हें नव-एलीट वर्गों द्वारा ‘बार्गेनिंग प्लेटफॉर्म’ बना दिया गया है। यह सफलता की ओर खुलने वाला द्वार है जो तात्कालिक फायदे और दीर्घकालिक विनाश की ओर ले जाता है।

आज भी देशप्रेम जरूरी है। इसके लिए देश को, देश की साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपराओं में से भले-बुरे को जानना जरूरी है। देश की अखंडता और जटिलता को समझना जरूरी है। इसलिए पहला सवाल है, हम देश को कहां से देखें? इसका उत्तर इसपर निर्भर है कि भारत देश को हम कितने अज्ञानी या कितने शिक्षित चित्त से देखते हैं। आज दुनिया भर में देश को समझना कठिन हो चुका है, क्योंकि देश भूगोल-इतिहास से बड़ी चीज है।

इधर चारों तरफ ‘बाहरी’ की धारणा लोकप्रिय बनाई जा रही है, मिथ्या सामाजिक खाइयों में बारूदी सुरंगें बिछाई जा रही हैं और अनस्तित्वमान ‘मूल’ की तलाश है। यह तलाश अंधेरे में काली बिल्ली को खोजने जैसी है, जो वहां नहीं है!

वैश्वीकरण फेल हो चुका है। सभी नागरिकों को आर्थिक मंदी सहित अनगिनत विपत्तियों में डालने वाला व्यापार युद्ध तेज हो रहा है। आदमी के जीवन में अनिश्चितता और हिंसा बढ़ती जा रही है। ऐसे में ही हमें वैश्वीकरण के असफल सफर से देश में लौटना है। सवाल है, हमारा देश कहां है जहां हमें लौटना है! क्या हम देश में नहीं, बल्कि एक संकरी गली में खड़े हैं? दरअसल हमारा देशप्रेम उतना ही विस्तृत होगा, हमारे भावना पथ में जितना बड़ा यह देश दिखेगा, जितनी बड़ी हमारी संवेदना होगी और पुरानी दीवारों को तोड़कर ‘अ-पर’ की ओर बढ़ने की हममें जितनी अधिक इच्छाशक्ति होगी!