शंभुनाथ

जर्मन महाकवि गेटे (1749-1832) की प्रसिद्ध कृति है ‘फाउस्ट’। इसका मुख्य चरित्र फाउस्ट ज्ञान से लबालब भरा एक ऐसा व्यक्ति है जो दर्शन, कानून, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, धर्मशास्त्र सब पढ़ चुका है और अपने को सर्वज्ञ समझता है। वह अनुभव को भी अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। गेटे ने इस कृति में ज्ञान-दंभ की आलोचना करते हुए दिखाया है कि अपनी असीमित महत्वाकांक्षाओं के कारण फाउस्ट ज्ञानी होने के बावजूद किस तरह शैतान तक से समझौता कर लेता है।

फाउस्ट पृथ्वी की आत्मा को बुलाता है। पृथ्वी उसके अहंकार से भरे ज्ञान और प्रकृति की सारी चीजों पर नियंत्रण की उसकी अनैतिक इच्छा देखकर उसे दुत्कारती है, क्योंकि वह प्रगति का दूत दिखते हुए भी वस्तुत: विनाश का मार्ग है। उसका ज्ञान शीर्ष पर है, पर आत्मा मर चुकी है। वह विकास करना चाहता है, पर संसार के उच्च आदर्शों को मलबे में बदलकर। गेटे की महान रचना ‘फाउस्ट’ को उत्तर-ज्ञानोदय काल की पश्चिमी आत्मा का दर्पण कहा जा सकता है।

21वीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा पर हो रही नई चर्चा गेटे के चरित्र फाउस्ट की याद दिलाती है, हालांकि ‘उत्तर-सत्य’ की एक भिन्न पृष्ठभूमि में। फाउस्ट एक ऐसा ज्ञानी था, जो ईश्वर, नैतिकता और प्रेम सबसे विच्छिन्न हो चुका था। वह ज्ञान का उपयोग सत्ता के लिए करता है।

आखिर ज्ञान किसलिए? जीवन में प्रेम, स्वतंत्रता और न्याय के लिए या प्रभुत्व के लिए? फाउस्ट दुनिया को जीत लेता है लेकिन प्रेम खोकर। वर्तमान युग का इंसान भी सुख-सुविधाओं के लोभ में अपनी संवेदना, स्वतंत्रता और न्याय की बलि देने के लिए हमेशा तैयार है, कुछ ऐसी ही हवा बह रही है।

गेटे के संदर्भ में यह भी जानना चाहिए कि 20वीं सदी में हिटलर को उसके मानवतावाद, सार्वभौमिकता और बहुलता के विचारों से बड़ी समस्या हो रही थी। उल्लेखनीय है कि जर्मनी का होकर भी गेटे ने ज्ञान को अपने देश की सरहदों तक सीमित नहीं माना था। उसने कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की जमकर प्रशंसा की, इसका अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा था। हिटलर जब सत्ता में आया उसने गेटे को ‘जर्मनी का सांस्कृतिक गौरव’ कहा, लेकिन उसने ‘फाउस्ट’ को उसकी बुनियादी विश्व भावना से विच्छिन्न करके उसे शक्ति के रूपक के तौर पर प्रचारित करवाया। उसने गेटे के विचारों को विस्थापित करके उसे एक पूजित मूर्ति में सीमित कर दिया।

इस घटना की तरफ दृष्टि जानी चाहिए कि हिटलर के सत्ता में आते ही 1933 में जर्मनी के कई विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों में हजारों पुस्तकें जलाई गईं। ज्ञान के केंद्रों में ज्ञान का दहन हुआ। पुस्तकों के अग्निदहन का नाजी सिलसिला फ्रैंकफुर्त्त सहित 30 से अधिक शहरों में चला। होलोकास्ट के पहले किताबें जल रही थीं, जो गेटे की आत्मा का अपमान था। इन दिनों भी देखा जा सकता है कि विश्वविद्यालय और पुस्तकालय संकट से गुजर रहे हैं। अमेरिका के विश्वविद्यालयों सहित विश्व भर के ज्ञान केंद्रों में ज्ञान को अवहेलित किया जा रहा है या उसे महज ‘पूजित वस्तु’ में बदल दिया जा रहा है। ज्ञान चप्पे-चप्पे पर सत्ताओं की कैद में है।

डिजिटल विस्मृतिकरण क्या है

गेटे के चरित्र फाउस्ट ने शैतान से समझौता किया था, जबकि आज के हुनरमंद ज्ञानी एआई के अलगोरिद्म को गले लगा रहे हैं। इसका अर्थ है, ज्ञान को दृश्यता में रिड्यूस किया जा रहा है। इन दिनों ज्ञान उतना ही अस्तित्वमान है जितना दृश्य है। इसलिए डिजिटल संसार में ज्ञान की दृश्यता को अधिकाधिक मिटाकर उसे ‘अज्ञानता उद्योग’ की वस्तुओं से ढका जा रहा है। ज्ञान मौजूद है पर दिखता नहीं है या दिखने नहीं दिया जा रहा है। यह मनुष्य के डिजिटल विस्मृतिकरण की परियोजना है जो पुस्तकें जलाने का नया रूप है। इसे ज्ञान की हत्या भी कहा जा सकता है।

डिजिटल दुनिया की कई गतिविधियां उग्र हैं। इस दुनिया में रोज लाखों नकली तस्वीरें और छवियां निर्मित की जाने लगी हैं जो असली से ज्यादा जीवंत हैं। यह दुनिया बहुत से विचारों और पाठों को इस तरह अदृश्य कर देती है कि पता नहीं चलता कि ज्ञान के अनगिनत संसार, जिनमें हमारे देश के लोक ज्ञान और भारतीय भाषाओं के साहित्य की सैकड़ों साल की परंपराएं हैं, किस तरह गायब होते जा रहे हैं।

हर क्षण लाखों आकर्षक रील और मीम बन रहे हैं। दर्शक-पाठक जब ऐसी चीजों से जकड़ लिए जाते हैं, तथ्य छिप जाते हैं। ज्ञान की जरूरी चीजें  दब जाती हैं। गहरे विचारों से कम एंगेजमेंट के कारण ज्ञान धीरे-धीरे पाताल में चला जाता है। कई बार चुप्पी नहीं शोर से ज्ञान की हत्या होती है।

देखा जा सकता है कि ज्ञान के असंख्य प्राचीन और आधुनिक विचार अज्ञानता निर्माण के डिजिटल कारखानों में निर्मित प्रचारों से किस तरह दबते जा रहे हैं। तकनीकी उग्रता धार्मिक उग्रता की तरह विनाशकारी साबित हो रही है। इससे  हजारों साल की बहुत-सी कृतियां, उच्च परंपराएं और आवाजें विलुप्ति के कगार पर हैं। बसव, कबीर, सूर, तुकाराम, तुलसी, मीरा आदि भक्त कवियों के सुंदर और परिवर्तनकामी भाव दबा दिए गए हैं। देश के विभिन्न प्रदेशों में घटित नवजागरण के अग्रदूत भी हाशिए पर फेंके जा रहे हैं। ज्ञान अब अपनी दाल गलाने वाली पतीली है।

शैक्षिक संसार से एक उदाहरण हाल में आई बलराम शुक्ल की पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ है। कहना न होगा कि इसमें संस्कृत साहित्य को भारतीय ज्ञान का एकमात्र स्रोत बना दिया गया है, मानो बाकी भारतीय भाषाओं का ज्ञान संस्कृत साहित्य का आत्मविस्तार भर है! ऐसे सभी अध्ययनों में भारतीय ज्ञान परंपरा का ‘डिस्टॉर्शन’ ही नहीं हो रहा है, क्रूर ढंग से बताया जाता है कि इस परंपरा में असहमति, विविधता और नवोन्मेष के लिए जगह नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास का एक कथन है, ‘मुदहूं आंख कितहुं कछु नाहीं’!

आज सत्य बोलना कितना कठिन होता जा रहा है

आजकल ज्ञान में हर जगह अंतिम निष्कर्ष है, वह खुला संवाद नहीं है। उसमें प्रश्नों के लिए जगह नहीं है। भारतीय ज्ञान परंपराओं की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि उनमें प्रश्नों को कभी अपराध के रूप में नहीं देखा गया। बल्कि हमारा प्राचीन ज्ञान भंडार प्रश्न-उत्तर और वाद-विवाद-संवाद पर टिका रहा है। क्या वेद-उपनिषद और क्या बौद्ध-जैन दर्शन, हर जगह ऐसा है!

वैदिक ॠषि प्रार्थना करते हैं कि विश्व की हर दिशा से ज्ञान हम तक पहुंचे, ‘आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:’। वे ज्ञान में दीवारें नहीं खड़ी करते, सरहदें नहीं बनाते। वे ‘बहुलता में अद्वैत’ देखना चाहते हैं। वे जिज्ञासा से भरे होते हैं। ज्ञान दरअसल वहीं है जहां जिज्ञासा है और प्रश्न हैं और सतत संवाद है। जहां अंतिम निष्कर्ष है वहां ज्ञान नहीं है।

कठोपनिषद का नचिकेता जब प्रश्न करने पर अपने ही पिता से मृत्युदंड पाता है और यम के दरवाजे पहुंचता है, वह ज्ञान पाने के लिए यम से भी प्रश्न करता है। यम कहते हैं, वरदान में सुख-सुविधाएं लो, राजपाट लो, भौतिक सुख भोगो, प्रश्न मत करो! नचिकेता भौतिक सुख की जगह ज्ञान को चुनता है।

एक ही ज्ञान परंपरा में सद्बुद्धि-संपन्न अष्टावक्र है और शास्त्रार्थ में पराजित करने के बाद ज्ञानियों को जल में डुबो कर मार डालने वाला दुर्बुद्धि-संपन्न बंदी भी है। अष्टावक्र बंदी को शास्त्रार्थ में पराजित कर देता है। लेकिन वह शर्त्त के अनुसार बंदी को जल में डुबोकर मार डालने की जगह उसे क्षमा कर देता है। देखिए, दो तरह के ज्ञानी एक ही परंपरा में हैं!

बुद्ध विभिन्न मत के ज्ञानियों से बहस करके ही दुख की धारणा, अहिंसा, मैत्री और करुणा तक पहुंचते हैं। वे ‘सनातन’ की जगह ‘अनित्य’ अर्थात परिवर्तन के पक्षधर हो जाते हैं।

छांदोग्य उपनिषद की एक व्यंग्यात्मक कथा में बताया गया है कि पुरोहित केवल दक्षिणा और भोजन के लिए यज्ञ करते हैं। इसी उपनिषद में ‘तत्वमसि’ कहकर बताया जाता है कि तुम्हारी आत्मा में ही ईश्वर है, तुम आत्मबोध की ओर बढ़ो! अर्थात ज्ञान में मकड़ी का जाला और मधुमक्खी का मधु दोनों हैं। इनके बीच फर्क करना सीखना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा में असहमति, आत्मसंघर्ष और प्रतिवाद के प्रसंगों को विस्मृत करने की नहीं बल्कि समझने की जरूरत है, अन्यथा भौतिक विकास और बौद्धिक कूपमंडूकता की दोस्ती मानवता को एक भीषण संकट की ओर ले जाएगी।

सत्यकाम एक दासी का पुत्र था जिसे अपने पिता के बारे में कुछ पता न था। जब वह गौतम ॠषि के पास पहुंचा, उसने पूछने पर अपनी सचाई साफ-साफ बता दी। ॠषि गौतम ने कहा, ‘इतना स्पष्ट सत्य केवल ब्राह्मण ही बोल सकता है।’ यह जन्म-आधारित श्रेष्ठता पर एक जबर्दस्त वैदिक प्रहार है। कहने का आशय है, जो सत्य बोले वही सच्चा ज्ञानी है। राजनीति में सच-झूठ दोनों चलता है, पर कम से कम ज्ञान की दुनिया में सच को बचा रहना चाहिए।

ज्ञान जब निष्प्राण पूजित वस्तु बन जाए

आज लगता है कि ज्ञान का भारी बवंडर आया है, जबकि दुनिया में कहीं न सिद्धांत बचा है और न आदर्श बचे हैं। विश्व में एक ही दृश्य है ‘जिसकी लाठी उसका देश’! भौतिक ताकत विचारधारा पर भारी है, ताकत ही विचारधारा है। इसका एक रूप डिजिटल विस्मृतिकरण है। एक नया ज्ञानी एल्गोरिद्माचार्य उभरता है जो सोचता नहीं है, केवल अपडेट होता है। इस दुनिया में सत्य वही है जो डिजिटल है और अधिक लाइक पाता है!

दूसरा रूप ज्ञान को निष्प्राण पूजित वस्तु बना देना है, जो ज्ञान के अति-राजनीतिकरण की देन है। कुछ खास विचार ही अंतिम सत्य घोषित किए जाकर पूजित मूर्ति में बदल दिए जाते हैं। विद्वान ‘रेकार्डेट टेप’ में बदल जाते हैं, जिज्ञासा का स्थान निष्ठा ले लेती है। स्वतंत्र ढंग से सोचने की जगह विद्वान तयशुदा वैचारिक स्क्रिप्ट के अनुसार चलते हैं। सत्य की खोज से अधिक महत्वपूर्ण अपने ‘पक्ष का बचाव’ होता है। ऐसे ज्ञानी पंडित तोताराम हैं। हमारा युग एल्गोरिद्ममाचार्य और पंडित तोताराम की जुगलबंदी देख रहा है।

ज्ञान जब निष्प्राण पूजित वस्तु बन जाता है, खुद पढ़कर ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा मिटने लगती है। समाज में संवाद के लिए ‘स्पेस’ सिकुड़ जाता है। ज्ञान प्रश्नों के बिना कटे पेड़ों का नगर है, बौद्धिक पर्यावरणविहीन। ज्ञान तब पर्यवेक्षण, अनुभव और चिंतन-मनन की देन न होकर एक प्रमाणपत्र या उत्पादित वस्तु भर होता है। वह एक खोज नहीं मंत्रोच्चार होता है, दुहराते रहो!

अब पत्थर की प्रतिमाओं की तुलना में डिजिटल प्रतिमाएं अधिक शक्तिशाली हैं। इससे ज्ञान के ऐतिहासिक संदर्भ खो जाते हैं, उसका विकास नहीं दिखता। सबसे चिंताजनक घटना यह है कि उपयोगिता द्वारा ज्ञान निर्धारित होता है। राजसत्ता और बाजारसत्ता तय करती है कि क्या ज्ञान है और क्या मूर्खता। ऐसे ज्ञान से पता चलता है कि ज्ञान की सतत खोज और इसके लिए जीवन के अनुभवों में झांकना या किताबें पढ़ना सबसे बड़ी मूर्खता है। आज बहस नहीं नारा ही ज्ञान है। वह एक गहरी खोज नहीं बल्कि तुरंत डिलिवरी है!

बल्कि नए युग के ज्ञान में तय कर दिया जाता है कि आपको क्या-क्या भूल जाना है। हम जान नहीं पाते कि हम एक ऐसे ध्वस्त ज्ञान संसार के नागरिक हो चुके हैं जहां झूठ ही राजा है।

दुनिया के किसी देश में ज्ञान निष्प्राण मूर्ति नहीं है, वह एक जीवंत यात्रा है। हमारे यहां ‘नेति-नेति’ कहा गया, अर्थात कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है। ज्ञान तब सत्ता का प्रतीक है जब वह अंतिम सत्य हो और प्रश्नों से दूर हो।

बौद्धिक उपनिवेशन और अतीतांधता ज्ञान के दो बड़े अवरोध हैं

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि डेढ़-दो सौ साल पहले यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय भाषाओं को बहुत कुछ दिया। यह एक तथ्य है कि भले अपनी ही औपनिवेशिक व्याख्याओं के अधीन, पर उन्होंने प्राचीन संस्कृत ग्रंथों को खोजा, उनका अनुवाद किया और मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने 50 खंडों में ‘सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ (1879-1910) में उन प्राचीन ग्रंथों से लोगों का परिचय कराया।

पश्चिमी उपनिवेशक भारतीय समाज को ‘स्थिर’ और प्राचीन काल से ही ‘असभ्य’ बताते थे। पर कुछ पश्चिमी लेखकों ने इस धारणा के समानांतर भारत को ‘विश्वगुरु’ कहा है। डॉ. ओ. ब्राउन ने 19वीं सदी में ‘डेली ट्रिब्यून’ में लिखा, ‘यदि हम पक्षपातरहित होकर विचार करें तो हमको स्वीकार करना पड़ेगा कि हिंदू ही सारे संसार के साहित्य, धर्मों और सभ्यता के जन्मदाता हैं।’ (मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ में उद्धृत)।

यह भी प्रचारित किया जा रहा था, ‘जॉन फ्रायर अमेरिका के ‘हारपर्स’ नामक मासिक पत्र में एक लेख लिखकर साबित कर चुके हैं कि कोलंबस के सैकड़ों वर्ष पहले बौद्ध धर्म के प्रचारकगण वहां गए थे और उन्होंने अमेरिका में बौद्ध धर्म और एशियाई सभ्यता का प्रचार किया था।’(वही)। मैथिलीशरण गुप्त ऐसे ही तथ्यहीन विचारों की रोशनी में कहते हैं, ‘प्राय: सब नए और पुराने इतिहासवेत्ता इस बात को स्वीकार करते हैं कि दर्शन, विज्ञान और सभ्यता संबंधिनी सारी बातें यूनान ने भारतवर्ष से सीखी हैं और वहां से अथवा इसी प्रकार परस्पर सारे संसार ने प्राप्त कीं। यूरोप और अरब में यहां से जाकर प्रकाश फैला।’

1844 में छपी काउंट जार्न्सजेर्ना की पुस्तक ‘थियोगोनी ऑफ द हिंदूज’ में लिखा है, ‘आर्यावर्त्त केवल हिंदू धर्म का घर नहीं है, वरन वह संसार की सभ्यता का आदि भंडार है।’(वही)। यूरोपीय लेखकों की इन बातों से खुश होकर कोई गर्व कर सकता है, पर आज दुनिया के किसी कोने में यह सब कहने पर लोग हँसेंगे।

कुछ पश्चिमी लेखक-पत्रकारों का यह सब कहने का उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा होना न होकर यूरोपीय आधुनिकता की सीमा को उजागर करना था। पश्चिमी देश औद्योगिक प्रगति कर चुके थे, पर एक गहरे नैतिक-दार्शनिक संकट में फंसे हुए थे। 19वीं सदी में ऐसे पश्चिमी लेखक भारत को अपने आध्यात्मिक-नैतिक प्रेरणास्रोत के रूप में देख रहे थे। रवींद्रनाथ को नोबेल पुरस्कार इसी परिघटना का एक अंग है। वे पश्चिमी लेखक हमारे देश के प्राचीन अतीत को श्रेष्ठ बताते थे, पर भविष्य के बारे में मौन थे। भारत यदि विश्वगुरु था तो शॉपेनहावर सहित भारतीय अध्यात्म के वे सभी प्रेमी हमारे देश के क्रूर अंग्रेजी शासन का विरोध क्यों नहीं कर रहे थे? क्योंकि घूम-फिरकर वे सभी विद्वान भारत में अंग्रेजी राज को ‘सभ्यता का मिशन’ समझते थे।

उपर्युक्त किस्म के लेखक-पत्रकार प्रचलित प्राच्यविद्या (ओरियंटलिज्म) से केवल इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अन्य यूरोपीय विद्वानों की तरह भारत के प्राचीन अतीत को ‘असभ्य’ नहीं मानते थे। हम भारत को अतिवादी ढंग से विश्वगुरु बताने वाले पश्चिमी लेखकों के मत को ‘ओरियंटलिज्म’ का ही एक रूपभेद कहेंगे जो भारत को बर्बर कहने वाले अंग्रेजों के विचारों की तरह ही तथ्यों पर आधारित न था और भ्रांति फैलाता था।

‘ओरियंटलिज्म’ से लेकर भौतिकवादी दृष्टि से लिखे गए इतिहासों और सबाल्टर्न हिस्ट्री तक देखा जा सकता है कि उनमें कई महत्वपूर्ण खोजों के बावजूद भारतीय दर्शन, इतिहास और संस्कृति के खंडित आख्यान ही प्रबल हैं। वे हमारे देश की आदर्शवादी परंपराओं, यहां तक कि नवजागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की विचारधाराओं का भी अधूरा और पूर्वग्रहग्रस्त मूल्यांकन करते हैं। उनपर बौद्धिक उपनिवेशवाद के असर से इनकार नहीं किया जा सकता।

इसी तरह भारतीय ज्ञान परंपरा के नाम पर आजकल फास्ट फूड जैसे मूल्यांकन सामने आ रहे हैं। उनमें कहीं अति-मूल्यांकन है, कहीं अप-व्याख्या है। भारतीय ज्ञान परंपरा पर विभिन्न जगहों पर हो रही सतही प्रायोजित चर्चाओं में अतीत के प्रति वैसा खुलापन नहीं है, जैसा कभी दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, बाल गोविंद रानाडे, आनंद कुमार स्वामी, श्री अरविंद आदि के लेखन में था और गहराई तो जरा भी नहीं है।

यदि ‘ओरियंटलिज्म’ में औपनिवेशिक अंधता है, तो भारतीय ज्ञान परंपरा की नई चर्चाओं पर अतीतांधता हावी है। दोनों में कुछ सामान्य खूबियां हैं। दोनों में मुख्यत: भारत की सामाजिक खाइयां ढूंढ़ी गई हैं। दोनों में एक पक्ष भारतीय अतीत को असभ्य घोषित करता है और दूसरा पक्ष उसे स्वर्णयुग बताता है। दोनों में ही ज्ञान को नियंत्रण का औजार बनाने की प्रवृत्ति है। दोनों में तथ्यों को चुनने और छिपाने का खेल है। दोनों को भारत के स्वभाव, उसकी आत्मा की ऊंचाई और नवोन्मेषों से विमुख ज्ञान कहा जा सकता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा के ताजा अध्ययन की एक विडंबना इसे मुख्यत: प्राचीन क्लासिकल संस्कृत साहित्य तक सीमित कर देना है। यह न केवल 12-15 सौ सालों की हमारी महान राष्ट्रीय भाषाओं के साहित्य की उपेक्षा करता है और भक्ति आंदोलन को ढकता है बल्कि यह दक्षिण भारत की द्रविड़ परंपराओं के महान साहित्य की या तो उपेक्षा करता है या उसका संस्कृतकरण कर डालना चाहता है। संस्कृत एक महान भाषा है, पर संस्कृत में सारी दुनिया नहीं है।

भारतीय ज्ञान परंपरा के नए विद्वानों ने यदि आधुनिक हिंदी साहित्य को ही ध्यान में रखा होता तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा आदि के ग्रंथों को भी पढ़ा होता, तो वे बौद्धिक रूप से इतने दिवालिया नहीं होते। कहना न होगा कि उपर्युक्त सभी हिंदी लेखक-आलोचक ऐसे थे जिनका परंपराबोध सामान्यत: न पश्चिम के बौद्धिक उपनिवेशन से आक्रांत था और न अंतर्देशीय अतीतांधता से।

अद्यतन विडंबना है, चूहा हाथी को निगलना चाहता है!

हमें भविष्य कल्पना की स्वतंत्रता चाहिए

पश्चिम का बौद्धिक उपनिवेशन और अंतर्देशीय अतीतांधता भारतीय ज्ञान के दो प्रमुख शत्रु हैं। दोनों न केवल ज्ञान को रोकते हैं बल्कि दबाव बनाते हैं कि कुछ भी सोचने से पहले किसी और से अनुमति लो! ये व्यक्ति को जिज्ञासु नहीं अनुयायी बनाते हैं। हमारे प्राचीन ॠषि और कवि अपनी परंपरा से रिश्ता रखते हुए भी स्वतंत्र चिंतक थे। वे परंपरा के अंध-अनुगामी न थे, उससे ‘आत्मीय टकराव’ रखते थे। उनका सर्वत्र सम्मान था, उनके आने पर राजा उठ खड़े होते थे। उन ज्ञानियों ने अपनी ऐतिहासिक सीमा में हमेशा कुछ तोड़ा और कुछ जोड़ा।

एक उदाहरण है भवभूति का ‘उत्तररामचरित’। इसमें वाल्मीकि ‘रामायण’ से भिन्न दशा चुनकर सीता पृथ्वी से बाहर आती है और राम का विरह दूर करके अपने राज्य अयोध्या लौटती है। प्राचीन युग के कवियों का जीवनबोध निश्चय ही परंपरा और परिवर्तन के मेल से बना था, केवल परंपरा से नहीं।

पश्चिमी बौद्धिक उपनिवेशन ने भारतीय अतीत की हर चीज को नकार करके सांस्कृतिक उच्छेदवाद का रास्ता दिखाया तो अंतर्देशीय अतीतांधता ने ज्ञान को अतीत तक सीमित रखकर पुनरुत्थानवाद का।

कहना न होगा कि हमारे देश में विभिन्न रंग का अंध-राष्ट्रवाद ‘अ-पर’, ‘अद्वैत’ और प्रेम का संदेश देने वाली भारतीय ज्ञान परंपराओं की देन न होकर पश्चिम के उस बौद्धिक उपनिवेशन का नतीजा है जिसने हमारे देश में सामाजिक खाइयां चौड़ी कीं। भारत ने प्राचीन काल में केवल भेदभाव, युद्ध और निरंकुशता नहीं देखी है। हमारे देश ने अद्वैत, प्रेम तथा सहयात्रा भी देखी है। प्रेस के आविष्कार से लेकर टेलीफोन, रेडियो, हवाई जहाज, टीवी, कंप्यूटर आदि पश्चिमी चीजों को चुनना हमारे लिए जरूरी हो, क्योंकि हम बैलगाड़ी के युग में नहीं जा सकते, पर क्या पश्चिम के अंध-राष्ट्रवाद को चुनना हमारे लिए हितकर है?

वस्तुतः ज्ञान जीवन को समझने का औजार बनने की जगह पश्चिम द्वारा हमारी परीक्षा का प्रश्नपत्र बनता गया। यह भी धारणा बनी कि जो अंग्रेजी में है वही ज्ञान है। अंग्रेजी वर्चस्व की भाषा बन गई।

दरअसल वंचना, असमानता और कलह से भरे हमारे अतीत को ही हमारा भविष्य बनाने में पश्चिम के बौद्धिक उपनिवेशन और अंतर्देशीय अतीतांधता दोनों की बहुत बड़ी भूमिका है, बल्कि इसके लिए उनके बीच होड़ है। दोनों ने हमें अपने अतीत की महान चीजों से विमुख किया और पश्चिम की ‘बुराइयों’ की ओर उन्मुख किया। दोनों ने ज्ञान को महज सत्ता का औजार बना दिया। लक्षित किया जा सकता है कि आज हम पश्चिम और अतीत दोनों की अच्छाइयों से लगातार दूर होकर वस्तुत: दोनों की ‘बुराइयों’ में फंस चुके हैं और रोज अधिक असुरक्षित होते जा रहे हैं।

हम लक्षित कर सकते हैं कि एक ध्रुव पर हमारे अतीत को उत्पीड़न के इतिहास में सीमित कर दिया जाता है तो दूसरे ध्रुव पर अतीत को आलोचना से परे माना जाता है। एक तरह के बुद्धिजीवी प्राचीन ग्रंथों को बिना पढ़े खारिज कर देते हैं तो दूसरी तरह के बुद्धिजीवी बिना पढ़े उसकी पूजा करते हैं। दोनों पद्धतियां हमें अपने जीवन को स्वतंत्र ढंग से समझने की भाषा से वंचित करती हैं। हम मुक्त दृष्टि से भारत के भविष्य की कल्पना नहीं कर पाते। 

इसलिए हमारी चिंता यह है कि दोनों की जंजीरों से जकड़े इस देश के भविष्य को कैसे आजाद करें। हमें भविष्य कल्पना की स्वतंत्रता चाहिए। हम स्मार्ट सिटी में हैं और तेज गति पर सवार हैं, पर हमारी सामाजिक सोच स्थिरतावादी है। हम नकली बौद्धिकताओं से घिरे हैं जो वर्तमान ज्ञान संसार में सबसे अधिक चमक रही हैं। इस स्थिति में हमें ‘संवादधर्मी बुद्धिपरकता’ की बहुत अधिक जरूरत है।

हम ज्ञान को कहां से देख रहे हैं

ज्ञान का स्वरूप मुख्यत: इससे तय होता है कि इसे आप कहां से देख रहे हैं। अपनी जाति, अपने जेंडर, अपनी प्रांतीयता, अपनी नस्ल, अपने धर्म की जमीन पर खड़े होकर देख रहे हैं या जहां रहें उसका थोड़ा-बहुत अतिक्रमण करके मानवता की एक बड़ी भूमि पर खड़ा होकर भी। जो केवल ब्राह्मण, केवल दलित, केवल स्त्री, केवल आदिवासी या केवल मराठी, तमिल या बंगाली या केवल हिंदू या मुसलमान है वह खुद अपना सबसे बड़ा शत्रु है। मनुष्य बंट जाएगा और खो जाएगा, यदि वह इसपर फिर से विचार नहीं करता- ‘मैं कौन हूँ?’

इससे जुड़ा एक सवाल है, आखिर लोगों में विषमताबोध की तुलना में वंचना का बोध पैदा करना ज्यादा आसान क्यों है। दोनों दिखने में निकट लगते हैं पर बिलकुल अलग मामले हैं। विषमता का बोध किसी असमान व्यवस्था की गहरी समझ की देन है, जबकि वंचना का बोध भावनात्मक है और तत्काल अहसास कराता है- मुझसे कुछ छीना गया है! वंचना का बोध पैदा करने के लिए सामने एक स्थायी शत्रु निर्मित करके डर और अपमान के वृत्तांत रखते जाना काफी है।

एक अन्य बात है, विषमता का बोध सत्ता से सवाल करता है जबकि वंचना किसी एक खास समूह को दोषी ठहरा कर मौजूदा सत्ता में ही जगह मांगती है। वंचनाबोध की प्रबलता ने साहित्य को इकहरा विमर्श और करीब-करीब तात्कालिकतावादी बना दिया है। पॉप राजनीति ने भी ज्ञान परंपरा की विविधता और रचनात्मकता को अवरुद्ध कर रखा है।

वंचना की भावना सवाल रखती है, ‘मुझसे क्या छीना गया?’ वह इस प्रश्न को ओझल रखती है कि वंचना के पीछे पूंजी, राज्य और वर्ग की भूमिका है या नहीं। फिर वंचित के गुस्से और हिंसा का निशाना एक छोटा समूह या ‘अन्य’ समुदाय बनता है। संघर्ष किसी व्यवस्था की जगह बगल में खड़े आदमी से होने लगता है। यह मामला कई बार आपस में एक-दूसरे से बदला लेने जैसा होता है जो किसी भी स्वेच्छाचारी सत्ता के लिए बेहद सुविधाजनक है।

लक्षित किया जा सकता है कि दुनिया के लोकतंत्रों में बहुसंख्यक की निरंकुशता बढ़ती गई जब ध्यान विषमता से पूरी तरह हटकर वंचना की तरफ चला गया। सत्य अकेला होता गया- साझा सत्य नहीं बचा। इस वक्त विषमताबोध और साझा सत्य दोनों ही राजनीतिक-तकनीकी बल पर दृश्यता से बिलकुल बहिष्कृत हैं।

विषमता के बोध के लिए समाज और इतिहास का ज्ञान चाहिए, थोड़ा ठहरकर सोचने का समय चाहिए और आलोचनात्मक विवेक चाहिए जबकि वंचना के बोध के लिए आक्रोश और शोर काफी है। एक समय लोग विषमता को लेकर बेचैन थे, पर अब इसे स्वाभाविक मान लिया गया है।

कहना न होगा कि विषमता का बोध उत्पीड़ितों के बीच संवाद की मांग करता है, जबकि वंचना का बोध एकालाप, ध्रुवीकरण और भीड़ की दशा में ले जाता है! वंचना का बोध विशेष दशा में एक हद तक जरूरी है, पर सभी रंग के वंचितों के बीच संवाद और एकता भी जरूरी है।

जब दुनिया के समाजों में विषमता को दूर करने वाले सभी आंदोलन विफल हो गए और विषमता स्थायी भाव बन गई, तब वंचना ही मुद्दा रह गई। वह प्रतिस्पर्धी पहचानें निर्मित करने लगी। फलस्वरूप साझा भविष्य की ओर बढ़ने की जगह घायल अतीत वर्तमान और भविष्य दोनों पर भारी पड़ने लगा। लोग इस पद्धति से सोचने लगे, ‘बहुत हो गया, अब कोई सख्त हाथ चाहिए’!

फिर ‘मूर्तियां’ टूटने और बनने लगती हैं। इसी से लगता है कि कुछ हो रहा है। इस समय यही परिदृश्य है। समझ में आ सकता है कि इस हालत में ज्ञान चाबी वाले खिलौने से भिन्न क्या होगा। ज्ञान में आखिर तर्क की कितनी जगह होगी, संवेदना की कितनी जगह होगी और लोग उदारता से कितना सोचेंगे और तात्कालिक उपयोग की चीजों से बाहर कितना पढ़ेंगे!

यही नहीं, जिस देश में बड़े नगरों के बाहर चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार की दशा लगातार खराब होती जा रही हो वहां ज्ञान का क्या अर्थ है?

कहा जा सकता है, यह कुतर्क का युग है। इसका नतीजा है बड़ी उम्मीदों का मरते जाना तथा आम लोगों का अत्यंत मामूली खुशियों में जीना। तब हर थका आदमी कहता है- सब निरर्थक है, कोई एक भीड़ चुन लो!

डिजिटल बुद्धिजीवी के लक्षण

इन दिनों आमतौर पर ज्ञान के कुओं की भरमार है और विवेक का अकाल है। हर तरफ ज्ञानी हैं पर वे फाउस्ट की तरह सर्वज्ञ और शैतान से भी हाथ मिला लेने वाले हैं। इन दिनों ज्ञान सत्ता, मीडिया और बाजार की अपछाया में निर्मित हो रहा है। जो बिकता है वही दिखता है, जोर जैसे भी बिकने पर है। इसमें संदेह नहीं कि इन दिनों नैतिक साहस के क्षरण के साथ ज्ञान का क्षय हुआ है और इसकी जगह चालाकी बढ़ी है। इसका एक ही अर्थ है चुनी हुई चुप्पियों का अंधेरा!

कहना न होगा कि नए परिवेश में उदार सोच के लोग आतंकित और हास्यास्पद स्थिति में हैं। वे सभी तरफ से संदेह से देखे जाते हैं। ईमानदारी से सोचने-समझने वाला इंसान बिगड़ी घड़ी की मरम्मत में लगा ऐसा व्यक्ति है जो समय से बाहर फेंका जा चुका है। वह फेंका जा चुका हो, पर वह है।

अब बहुतों के लिए नि:संदेह आखिरी शरणस्थल सोशल मीडिया है जहां वे खुश होते हैं और आहत भी। आम लोग शोर के महापाठ में शामिल हो जाते हैं और बुद्धिजीवी इस महापाठ के फुटनोट बन जाते हैं!

इधर ज्ञानियों की जगह डिजिटल बुद्धिजीवी की एक नई श्रेणी है। ऐसे लोग हस्तक्षेप नहीं करते, पोस्ट करते हैं और तात्कालिक नैतिक संतोष पा जाते हैं, ‘मैंने अपना कर्त्तव्य निभा दिया!’ वे कई बार नदी में डूबते इंसान को बचाने की जगह इस दृश्य का लाइव प्रसारण करते दिखते हैं। वे बताते हैं कि कैसे यह सिर्फ पानी नहीं है, बल्कि एक नैरेटिव है। इसे अधिक से अधिक शेयर करो!

डिजिटल बुद्धिजीवी सामान्यत: नहीं देखता कि क्या झूठ और क्या सच है और हमारी ज्ञान परंपराओं के क्या उच्च मूल्य हैं। वह केवल यह देखता है कि यह चलेगा या नहीं! वह सोचता है कि किस पीड़ा पर बोलना लाभदायक है और किस पीड़ा पर चुप रहने में फायदा है। ऐसी घड़ियों में नैतिकता कैलकुलेटर बन जाती है, वह ब्रांडेड नैतिकता होती है। लोगों की पीड़ा कई रंगों में बंट जाती है। पीड़ा खासकर डिजिटल इंफ्लुएंसरों के लिए उनकी रीच का ईंधन है। कोई अन्याय उनके लिए एक अवसर से ज्यादा महत्व नहीं रखता।

आमतौर पर डिजिटल बुद्धिजीवी अपनी-अपनी गुफा में ही बिजली की रोशनी का इंतजाम कर लेते हैं, वे धूप देखना नहीं चाहते!

देखा जा सकता है कि इतिहास में पहली बार हजारों साल पहले से लेकर आज तक का एक बड़ा ज्ञान भंडार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, पर वह खामोश किया जा रहा है। यह जमाना डिग्रीधारी अशिक्षितों का है!