शंभुनाथ

यदि आज की उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिपक्ष में किसी एक कृति को रखना हो, कहा जा सकता है कि वह प्रसाद की ‘कामायनी’ है। यह कृति सुख की दासता और स्वेच्छाचारिता से एक महाकाव्यात्मक विद्रोह है। आज का मनुष्य कृत्रिम इच्छाओं की वजह से भोगवादी और कट्टर एकसाथ दोनों होता जा रहा है। वह सुखों के पीछे दौड़ते हुए क्रूरता की किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे समय में ‘कामायनी’ महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह मनुष्य को कृत्रिम इच्छाओं के संसार से निकालकर उदात्त इच्छाओं के संसार में ले जाती है। इसमें ऐसी ज्ञान परंपरा की खोज है जो ‘अंश’ की जगह ‘समग्र’ (भूमा) पर आधारित है। साथ ही ऐसे श्रेष्ठ कर्मों की ओर बढ़ने के लिए कहा गया है जिनका लक्ष्य मानवता को विजयोन्मुख करना हो- ‘विजयिनी मानवता हो जाए’!

‘कामायनी’ पर काफी लिखा गया है, पर इसे एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इसको रहस्यवादी काव्य, शैव दर्शन पर आधारित आदर्शवादी काव्य और कई बार स्त्री-विरोधी काव्य के रूप में देखा गया है। जबकि यह सुखवादी और स्वेच्छाचारी प्रवृत्तियों की आलोचना है। इसकी शुरुआत में ही सार्वभौम पतन का प्रलय-दृश्य है :
प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में,
भोले थे, हां तिरते थे केवल सब विलासिता के नद में।
वे सब डूबे, डूबा उनका विभव, बन गया पारावार-
उमड़ रहा था देव-सुखों पर दुख-जलधि का नाद अपार।

प्रसाद काफी सोच समझ कर ‘कामायनी’ की शुरुआत प्रलय के दृश्य से करते हैं। भौतिक सुखों का दास बन जाने के कारण देव सभ्यता का ध्वंस हो जाता है। आंधी-पानी के बीच सिर्फ बिजलियां नृत्य करती हैं। अमरता के देव-दंभ का अंततः नाश हुआ, क्योंकि सभी देवता केवल बल, वैभव और सुख इकट्ठे करने में लग गए थे। ‘सुख, केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीभूत हुआ इतना’ कि अंततः प्रलय आया। एक न एक तरह का प्रलय हर युग में आएगा, जब सुख केंद्रीभूत होंगे और विषमता बढ़ेगी। कहना न होगा कि प्रसाद ने प्रलय की जो मिथकीय कल्पना की है, उसका एक लौकिक-ऐतिहासिक अभिप्राय है।

एक समय उपनिषदों ने अहंकार से भरी भौतिकवादी सभ्यता का प्रतिपक्ष रचा था। कहा जा सकता है, आधुनिक युग में यह काम ‘कामायनी’ ने किया।

प्रसाद देख रहे थे कि मनुष्य का जीवन पुरानी सामंती बुराइयों के साथ आधुनिक सभ्यता की बुराइयों से भी घिरता जा रहा है। भारतीय सचाई है कि यह देश लंबे समय से इच्छाहीनता (संन्यास) और असीमित इच्छाओं (भोगवाद) के बीच फँसा रहा है। प्रसाद के युग में सुख-सुविधा की आकांक्षा बढ़ती जा रही थी जो लोगों को राष्ट्रीय-मानवतावादी उद्देश्यों से विमुख करती थी। हालांकि उनके युग में सादगी और त्याग की भावना के साथ ऊँचे लक्ष्यों के लिए जीने वाले लोग भी थे। इनका प्रतिनिधि चरित्र श्रद्धा है, जिसे शिक्षा संसार में ‘हृदय’ कहकर उसी तरह उत्साहपूर्वक प्रचारित किया गया, जिस तरह इड़ा को ‘बुद्धि’ कहकर बहुत कुछ निंदापरक अर्थ में लिया गया। आगे चलकर देखेंगे कि श्रद्धा बुद्धिवाद की सीमाओं को तोड़ती है, उसका त्याग नहीं करती।

हिंदी क्षेत्र में नवजागरण की तरह रोमांटिसिज्म ऊपर से गुजर गया

छायावाद या रोमांटिसिज्म पुरातन के जीर्ण-शीर्ण अवशेषों से मुक्ति का सांस्कृतिक आंदोलन है। वह नवजागरण का अगला चरण है। श्रद्धा चाहती है कि प्रलय से आक्रांत मनु अपने अवसाद से बाहर निकलें। वे नए सिरे से विश्व का मंगलमय विकास करें। वे देव सभ्यता के हिंसक भौतिकवाद को न दुहराएं। वह तर्क देती है, प्रकृति की शिक्षा नवोन्मेष है। उसके यौवन का अभिनंदन बासी फूलों से नहीं किया जा सकता :
पुरातन का यह निर्मोक
सहन करती न प्रकृति पल एक
नित्य नूतनता का आनंद
किए है परिवर्तन में टेक।

छायावाद का मुख्य स्वर है- नूतनता का आनंद। वह एक नए युग का आह्वान बनकर आया। इसके लिए ‘भिन्नता’ पर आधारित सामाजिक बंधनों और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्ति जरूरी थी। दरअसल मानव चित्त की उदारता से ही संभव है अ-पर का बोध। हिंसक भौतिकवाद अ-पर के बोध, प्रकृति से रागमय संबंध और प्रेम तथा सौंदर्य के अवसर नहीं देता। इसलिए प्रसाद की पहली लड़ाई औपनिवेशिक संरक्षण-प्राप्त हिंसक भौतिकवाद से है।

रोमांटिसिज्म, अर्थात छायावाद ने व्यक्ति की अनुभूति को प्रधान बना दिया था। इसने ‘मैं’ को केंद्र में रखा था, पर यह ‘मैं’ बड़े चित्त वाला है। वैयक्तिकता का अर्थ व्यक्तिवाद नहीं है, दोनों में फर्क है। छायावादी वैयक्तिकता एक तरफ विश्व मानवता से जुड़ी थी, दूसरी तरफ भारत की औपनिवेशिक स्थितियों के कारण उदार राष्ट्रीय भावना से। प्रसाद ने विश्वबोध के साथ राष्ट्रीय जागरण को भी स्वर दिया ‘हिमाद्रि तुंग शृंग से’ जैसी कविताएं या ‘स्कंदगुप्त’ जैसे नाटक लिखकर। उनके राष्ट्रीय जागरण में स्त्री का क्या स्थान है, यह उनका ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक पढ़कर और बुद्धिवाद का क्या स्थान है, यह उनका ‘कंकाल’ उपन्यास पढ़कर जाना जा सकता है।

इसमें कुछ भी विस्मयजनक नहीं है, यदि हिंदी क्षेत्र में नवजागरण की तरह रोमांटिसिज्म भी साहित्यिक संसार तक सीमित रह गया। वह हिंदी सामाजिक चेतना का अंग नहीं बन सका, क्योंकि शिक्षा और आधुनिकीकरण से वंचित किए जाने के कारण हिंदी क्षेत्र में सामंती कठोरता ज्यादा थी। इस स्थिति में भी छायावादी कवियों ने जो किया, उसके महत्व को समझा जाना चाहिए।

सामंती बर्बरता का आधुनिक पुनरोदय

‘कामायनी’ का मनु प्रसाद के सारे छायावादी स्वप्नों  को तोड़ देता है। उसे श्रद्धा का साथ मिला। लेकिन ‘अखिल मानव भावों का सत्य’ अपनाते हुए विश्व के हृदय पटल पर एक सुंदर इतिहास की रचना करने की जगह वह पुरानी देव सभ्यता के हिंसक सुखवाद के रास्ते पर चलने लगा। श्रद्धा ने उसे अपना सर्वस्व सौंप दिया था, ‘दया, माया, ममता लो आज, मधुरिमा लो, अगाध विश्वास/हमारा हृदय-रत्न-निधि स्वच्छ तुम्हारे लिए खुला है पास।’ इसके बावजूद मनु ने विश्वासघात किया। उसके भीतर सामंती बर्बरता का पुनरोदय हुआ। उसकी ‘अतृप्ति’ बढ़ गई। सुखवाद हो या उसका नया रूप उपभोक्तावाद, यह व्यक्ति का रोमांटिसिज्म मिटा देता है। इसके साथ ध्वस्त हो जाता है मानवीय संवेदना, प्रेम और साहस का बनता संसार। ‘कामायनी’ बताती है कि भारत अपने को पुनर्उपलब्ध करते-करते कैसे फिर अपने को खोने लगता है।

मनु के पुरोहित बनते हैं दुष्प्रवृत्तियों के जनक आकुलि-किलात। मनु जब कर्म क्षेत्र में उतरते हैं, उनमें सामंती युग की हिंस्र पशुता फिर जाग जाती है। श्रद्धा के विचारों को, जो गांधी युग के विचार थे, भूलकर मनु अपने यज्ञ में मेष शावक की बलि देते हैं। धरती रुधिर के छींटों से भर जाती है। प्रसाद सुखवाद के लिए मनु के पागलपन का चित्र खींचते हैं, ‘आकर्षण से भरा विश्व यह केवल भोग्य हमारा/ जीवन के दोनों कूलों पर बहे वासना धारा।’ मनु अब श्रद्धा को स्त्री-देह समझने लगते हैं। उन्होंने मधुरता की जगह मादकता को चुना। श्रद्धा मनु की हिंसा और सुख के लिए उनका पागलपन देखकर सवाल करती है, ‘मनु! क्या यही तुम्हारी होगी उज्ज्वल नव मानवता?’ मनु जवाब देते हैं, ‘तुच्छ नहीं है अपना सुख भी, श्रद्धे! वह भी कुछ है’। दुखी प्रसाद अपने टूटे स्वप्नों के बीच अपनी चिंता व्यक्त करते हैं, ‘अपने में सबकुछ भर कैसे व्यक्ति विकास करेगा/ यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा।’ अपने में सबकुछ भरने की इच्छा ही व्यक्तिवाद, प्रभुत्व की असीमित आकांक्षा और अंततः तानाशाहियत की तरफ ले जाती है।

मनु को हिंसा और क्रूरता अधिक पसंद आती है। श्रद्धा विलगाव का अनुभव करती है। मनु में आए विकास को लक्षित करके वह कहती है, ‘यह हिंसा इतनी है प्यारी जो भुलवाती है देह-गेह!’ प्रसाद सुखवादी पश्चिमी सभ्यता तथा भेदभावपूर्ण हिंस्र सामंती अतीत दोनों तरफ एकसाथ बढ़ते झुकाव को नव-मानवता के उत्थान में बाधक मानते हैं। हमें आश्चर्य हो सकता है कि उनमें कितनी दूरदर्शिता थी। उन्हें नहीं पता था कि वे सुदूर 21वीं सदी के यथार्थ को भी देख रहे हैं। प्रसाद के युग में वे सभी व्यक्ति श्रद्धा की तरह विलगाव और अकेलेपन का अनुभव करने लगे थे जो जीवन के कोमल तंतुओं को टूटते हुए तथा सौंदर्य के नए मानदंड को ढहते हुए देख रहे थे।

मनु के विपरीत, श्रद्धा अपने लघु विश्व में ही सौंदर्य देखती है। वह कुटीर बनाती है, गर्भ के बच्चे के कपड़ों के लिए तकली पर सूत काटती है। जबकि मनु विराट का स्वप्न देखते हैं, भले वह तुच्छ हो। आज भी लोगों को बड़े मकान, बड़ी गाड़ी, बड़े संगठन, बड़े मॉल या बड़ी वित्तीय क्षमता ज्यादा आकर्षित करती है। उनका विश्वास ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ में नहीं है। मनु जब श्रद्धा को अपनी संपत्ति नहीं बना पाते, उसे त्याग कर वे सारस्वत प्रदेश की तरफ चल देते हैं जहां अब उन्हें एक महानगर का निर्माण करना था। 19वीं-20वीं सदियों का विकसित हो रहा मनुष्य एक ऐतिहासिक युग से एक दूसरे ऐतिहासिक युग में छलांग लगा रहा था, पर सुख के लिए प्राचीन पागल हिंसा लेकर।

दुःस्वप्नों के बावजूद

आज हमारी पृथ्वी भेदभाव, कृत्रिम इच्छाओं और हिंसा से भरी है। मनुष्य और मनुष्य के बीच हृदय का वह संबंध नहीं बचा है, जो एक समय पनप रहा था। विश्व का पर्यावरण बिगड़ रहा है। यदि इन चिंताओं को अपने समय में प्रसाद ‘कामायनी’ के जरिए व्यक्त कर रहे थे, तो यह एक ‘वार्निंग’ था और आज भी साइरन की तरह बज रहा है। फिर भी प्रसाद भय में जीने की जगह इस ‘दुखदग्ध जगत’ को ‘आनंदपूर्ण स्वर्ग’ में बदलने का स्वप्न देखते हैं। वे कहते हैं, ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन’! वे कहना चाहते हैं कि हमारे लिए अहिंसा, सादगी, न्याय और सार्वभौम सौहार्द बड़े मूल्य हैं। वे सोचते थे, विश्व और भारत का भविष्य लोभ और भेदभाव-आधारित व्यवस्था से भिन्न हो।

प्रसाद भारत के स्वप्न के रूप में श्रद्धा को खड़ा करते हैं तो ज्ञान-विज्ञान (इड़ा) के बल पर मनु द्वारा निर्मित महानगर की ऐसी घटनाएं भी सामने लाते हैं जो स्वप्न-भग्न का बिंब रचती हैं। वे ‘उदात्त’  ही नहीं, ‘ह्रासात्मक’ को भी पहचानते हैं। प्रसाद की लोकतंत्र को लेकर आशंकाएं कितनी सही थीं, इन पंक्तियों से स्पष्ट है :
यह अभिनव मानव प्रजा सृष्टि
द्वयता में लगी निरंतर ही
वर्णों की करती रहे वृष्टि
अनजान समस्याएं गढ़ती
रचती हो अपनी ही विनष्टि
कोलाहल कलह अनंत चले,
एकता नष्ट हो बढ़े भेद
अभिलषित वस्तु तो दूर रहे,
हां मिले अनिच्छित दुखद खेद …
दुख देगी यह संकुचित दृष्टि।

‘कामायनी’ में काम कई अभिशाप देता है, जिनसे आधुनिक भौतिक विकास का सांस्कृतिक खोखलापन जाहिर होता है। ऐसे दिन आएंगे कि महानगरीय मनुष्य अपने सुख में भी हताश रहेगा। वह आत्मनिर्वासित होकर हमेशा अशांत होगा। उसकी अपूर्ण इच्छाएं ‘नव ज्वलन धूम’ सी होंगी। लोग नए-नए नियमों से बंधेंगे। वे सिर्फ अपनी देह-पूजा करेंगे। वे अपनी ‘अपूर्ण अहंता’ में खुद को बड़ा ‘प्रवीण’ समझेंगे। सुख में डूबे क्षण ही यथार्थ माने जाएंगे। सौंदर्य जलधि से पुरुष अपना पात्र केवल गरल से भरेगा, क्योंकि वह स्त्री को सुंदर देह से ज्यादा नहीं समझेगा। वह हमेशा सोचेगा, ‘कुछ मेरा हो’। वह ‘प्रणय-प्रकाश’ ग्रहण नहीं कर पाएगा, संसार में पहले-सा प्रेम नहीं रह जाएगा। मनुष्य राग-विराग में फँसा रहेगा, ‘अपने को कर शतशः विभक्त’। वह एक विभाजित व्यक्तित्व होगा, मस्तिष्क और हृदय के बीच सद्भाव नहीं होगा। जिंदगी हार-जीत की तरह जुआ में बदल जाएगी। बुराई और अच्छाई में क्या फर्क है, यह विचारशक्ति जाती रहेगी। सर्वज्ञता का अहंकार होगा, भले ‘क्षुद्र-अंश विद्या’ ही पास हो!

प्रसाद ‘काम’ के अभिशाप के जरिए कहते हैं, ‘जीवन सारा बन जाए युद्ध’। नए युग में लोग हठी होते जाएंगे। तर्क मारक हथियारों से सिद्ध होंगे। संसार युद्ध में फँसा रहेगा। लोग आदर्शों से रहित होते जाएंगे और स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता होगी। इड़ा सर्ग में ‘काम’ महानगरीय मनुष्य को अभिशाप देता है, ‘लिख दिया आज उसने भविष्य! यातना चलेगी अंतहीन’। एक अवरुद्ध भविष्य होगा! काम का अभिशाप लोगों की अनंत कृत्रिम इच्छाओं का नतीजा है।

प्रसाद तानाशाहियत की कल्पना करते हुए कहते हैं, ‘सबका नियमन शासन करते बस बढ़ा चले अपनी क्षमता।’ तानाशाह पूरी शक्ति से जनता को विभाजित करता है, पर वह डरता भी है :
भयभीत सभी को भय देता
भय की उपासना में विलीन
प्राणी कटुता को बांट रहा
जगती को करता अधिक दीन

‘कामायनी’ में महानगर के दुःस्वप्न के चित्र हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रसाद भारत को पुरातन ग्राम समुदाय में, बैलगाड़ी और फेरीवालों के युग में रखना चाहते थे। निश्चय ही वे ज्ञान-विज्ञान के विरोधी नहीं हैं। रोमांटिसिज्म दुनिया में कहीं भी नगरीय विकास, ज्ञान-विज्ञान या आधुनिक वस्तुओं के उपभोग का विरोधी नहीं रहा है। प्रसाद कामायनी में स्पष्ट कहते हैं, ‘मेरे विकल्प संकल्प बनें, जीवन हो कर्मों की पुकार/सुख साधन का हो खुला द्वार।’ वे उपभोग के नहीं, उपभोक्तावाद या उस जमाने के अनुसार सुखवाद के विरोधी हैं। वे चाहते हैं कि ‘विकास’ और बराबरी पर आधारित आपसी मानवीय प्रेम के बीच संबंध हो। वे शैव दर्शन से शब्दावली लेकर इसे ‘समरसता’ कहते हैं। प्रसाद शैव दर्शन सहित प्राचीन क्लासिकल ग्रंथों से जो विचार चुनते हैं, उनका लक्ष्य ‘पुनरुत्थान’ न होकर अपने देश काल के संदर्भ में ‘पुनर्निर्माण’ है। वे अतीतविलासी नहीं थे।

इसलिए प्रसाद इड़ा सर्ग में मनु की एक बड़ी कमी की ओर संकेत करके वस्तुतः स्त्री-पुरुष गैरबराबरी सहित विषमता के सभी रूपों पर प्रहार करते हैं और समान मानवाधिकार की बात करते हैं :
तुम भूल गए पुरुषत्व-मोह में
कुछ सत्ता है नारी की
समरसता है संबंध बनी
अधिकार और अधिकारी की
जब गूंजी यह वाणी तीखी
कंपित करती अंबर अकूल
मनु को जैसे चुभ गया शूल।
मानववाद बनाम मानवतावाद

मनु अपने को संपूर्ण प्रकृति और सृष्टि के केंद्र में रखकर देखता था। यह मानववाद है, मानववादी केंद्रिकता है। मानववाद और मानवतावाद में फर्क है। 18वीं-19वीं सदी में विज्ञान की विजय यात्रा के समय मानववाद बुद्धिवाद पर आधारित एक ऐसी पश्चिमी विश्वदृष्टि के रूप में सामने आया, जिसके केंद्र में मनुष्य था। मानववाद मानता है कि प्रकृति, पेड़-पौधे, पहाड़-नदियां, पशु-पक्षी और संपूर्ण सृष्टि ही मनुष्य के उपयोग के लिए है। मनुष्य का अपना जीवन ही सबकुछ है। उसके नैतिक मूल्य धर्म से स्वतंत्र हैं। मानववाद की बुद्धिपरकता अंध-बुद्धिवाद तक चली जाती है।

मनु की महत्वाकांक्षा है, ‘विश्व में जो सरल सुंदर हो विभूति महान/सभी मेरी हैं, सभी करती रहें प्रतिदान।’ सब मानव का है और मानव केवल अपना है, यह मानववाद है। आज उसकी शिक्षा है, अपना होना सीखो! श्रद्धा पुरुषसत्तात्मक मानववाद को मान्यता नहीं देती तो मनु उसका तिरस्कार करते हैं, ‘तुम अपने सुख से सुखी रहो, मुझको दुख पाने दो स्वतंत्र।’ वे मानवतावादी श्रद्धा का साथ छोड़ देते हैं।

हम देख सकते हैं कि मानववाद की प्राचीन परंपरा ग्रीक दार्शनिकों के अलावा भारत के बुद्धिवादी-सुखवादी चार्वाक पंथियों के बीच भी रही है, हालांकि यह मुख्य रूप से 18वीं सदी के यूरोपीय ज्ञानोदय की देन है। मानववाद दार्शनिक स्तर पर मार खाकर भी दुनिया में अपने विध्वंसकारी रूप में आज इतना अधिक छाया हुआ है कि उसकी वजह से जलवायु परिवर्तन का संकट उपस्थित है। प्रकृति में मनुष्य का हस्तक्षेप सारी सीमाएं तोड़ चुका है। पहाड़ों पर प्रलयंकारी बाढ़ें आ रही हैं। तापमान में वृद्धि हो रही है। प्रदूषण बढ़ रहा है। मानववाद मनुष्य को खुदगर्जी में सीमित कर देता है। प्रसाद ने ‘कामायनी’ में मनु को खुदगर्जी से भरे मानववाद की प्रतिच्छाया बनाकर उपस्थित किया है।

श्रद्धा कभी नहीं सोचती कि मनुष्य को कभी प्रकृति और सृष्टि केंद्र में होना चाहिए।  प्रकृति लूटने का माल नहीं है, उसपर मनुष्य का अस्तित्व निर्भर है। इसलिए सभी छायावादी कवियों ने प्रकृति में सौंदर्य देखा, उससे रागमय संबंध स्थापित किया। छायावाद ने बताया, सभ्यता के विकास के लिए प्रकृति से द्वंद्व जरूरी है, पर रागमय संबंध उससे कम महत्वपूर्ण नहीं है। छायावाद महज प्रकृति के मानवीकरण का मामला नहीं है!

श्रद्धा मानती है कि मनुष्य में बुद्धि के साथ सहृदयता भी होनी चाहिए, ताकि मनुष्य अपने चित्त का विस्तार करते हुए अ-पर का बोध कर सके और प्रकृति, ‘जड़-चेतन’ सबका महत्व समझ सके। श्रद्धा मेष शावक पालती है, पर्यावरण से रागमय संबंध स्थापित करती है। उसे कला से प्रेम है। प्रसाद इच्छा, ज्ञान और कर्म में समन्वय चाहते हैं, अर्थात मनुष्य इच्छाओं का गुलाम होने की जगह ज्ञान की रोशनी में उन इच्छाओं का संस्कार करते हुए कर्म करे! वे कहते हैं, ‘देखो कि यहां पर कोई भी नहीं पराया’। वे आकांक्षा व्यक्त करते हैं, ‘‘सब भेदभाव भुलवा कर दुख-सुख को सत्य बनाता/मानव कह रे! ‘यह मैं हूँ, यह विश्व नीड़ बन जाता।’’ यह कवि की मानवतावादी कामना है, जो मानववादी खुदगर्जी से भिन्न है।

कामायनी में स्त्री जागरण

द्विवेदी युग और छायावाद को एक दूसरे के विरोधी के रूप में देखा जाता है, जबकि खासकर स्त्री प्रश्न पर दोनों के बीच गहरा संबंध है। नवजागरण ने स्त्री को केंद्र में रखकर सुधार आंदोलन शुरू किया था, छायावाद और स्वाधीनता आंदोलन के युग ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।

प्रसाद की ‘कामायनी’ के लज्जा सर्ग से ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो…’ को उठाकर प्रसाद की स्त्री-दृष्टि पर आक्रमण किए गए हैं। भारतीय परंपरा में लज्जा को स्त्री का आभूषण माना गया है। श्रद्धा इस धारणा के विरुद्ध लज्जा से सवाल करती है, ‘तुम कौन? हृदय की परवशता?’ प्रसाद ने सामान्यतः रूप में सौंदर्य न देखकर भाव सौंदर्य देखा है, जो बाजार सभ्यता को स्पष्ट चुनौती है। वे स्त्री देह के शृंगार और रूप-गर्व को कितनी आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं, यह उनके स्त्री चरित्र मधूलिका (पुरस्कार) सालवती (सालवती) देवसेना (स्कंदगुप्त), कमला (प्रलय की छाया) आदि रचनाओं को देखने से पता चल सकता है।

‘कामायनी’ का लज्जा सर्ग वस्तुतः भारतीय स्त्री की परंपरागत छवि और पर-अधीन दशा की आलोचना है। इसमें श्रद्धा का आत्ममंथन है। लज्जा स्त्री की आम दशा उपस्थित करती है कि किस तरह स्त्री कोमल, निरीह और घरेलू श्रमिक है। उसका एक काम ‘मधु-लीला’ करना है। वह ‘निस्संबल’ है और सपने में भी स्त्री-जागरण के बारे में नहीं सोच सकती। हिंदी प्रदेश में स्त्रियों की दशा ज्यादा चिंताजनक थी। प्रसाद ने उनका करुण यथार्थ रखा है, ‘भुज लता फँसाकर नर-तरु से झूले सी झोंके  खाती हॅूं’। स्त्री का कर्तव्य बताया जाता है, अपना सर्वस्व दे देना और बदले में कुछ न मांगना। इसी परिप्रेक्ष्य में लज्जा स्त्री की नियति घोषित करती है, ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में/पीयूष-स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।’ ‘कामायनी’ की इन पंक्तियों पर पुरुष दशकों से मुग्ध होते रहे हैं। स्त्रियां भी इनपर लट्टू रही हैं, जो एक विडंबना है।

स्त्री का भारतीय यथार्थ लज्जा खुद उपस्थित करती है, ‘आंसू के भीगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा/तुमको अपनी स्मिति रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा।’ गुलामी के बांड पर स्त्री को हस्ताक्षर करना होगा, वह भी मुस्कराते हुए! श्रद्धा ने इस स्थिति से विद्रोह किया।

श्रद्धा मनु के साथ छोड़कर चले जाने के बाद जरा भी महसूस नहीं करती कि वह अबला हो गई है। वह थोड़ी देर के लिए व्यथित जरूर होती है, ‘एक विरक्ति बोझ-सी ढोती मन ही मन बिलखाई’। उसके आंसू निकलते हैं, लेकिन निराशा में भी संभावना के चिह्न मिटे नहीं थे, ‘सूखी काष्ठ संधि में पतली अनल शिखा जलती थी’। इसका अर्थ है, गहन दुख और निराशा की घड़ियों में भी मनुष्य की अपराजेयता में आशा की अग्निरेखा होती है। श्रद्धा दृढ़ता से अपने गर्भ की रक्षा करती है, जिसमें भविष्य का मानव पल रहा था। वह अपनी संतान को प्रशासक-डाक्टर-इंजीनियर जैसा कुछ बनाने के पहले मनुष्य बनाना चाहती है!

भारतीय राष्ट्रनीति का घोषणा पत्र

मनु ने सारस्वत प्रदेश में जब जनता के विद्रोह का दमन करना चाहा, जनता ने डटकर संघर्ष किया और अहंकार से भरे सर्वशक्तिमान मनु को घायल कर दिया। मनु हताश होकर आत्मघात की ओर बढ़ रहे थे कि श्रद्धा उनके पास पहुंच जाती है। श्रद्धा के साथ उसकी संतान मानव था। मनु को लेकर आनंदवाद, अर्थात कैलास लोक की यूटोपियाई दार्शनिक यात्रा पर निकलने से पहले श्रद्धा ने मानव को इड़ा को सौंप दिया, ताकि देश के आधुनिक विकास का सीधा संबंध मानवता से हो। यहां एक स्पष्ट लौकिक संकेत है, इड़ा के पास ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी की शक्ति है तो श्रद्धा की संतान मानव के पास सहृदयता है। उसे श्रद्धा से मानवता के गुण मिले थे। विज्ञान, टेक्नोलॉजी और नगरीकरण उच्चवर्गीय अत्याचार के औजार बनेंगे, यदि वे बौद्धिक सहृदयता, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों से विच्छिन्न होंगे। श्रद्धा इड़ा के साथ खड़े मानव से कहती है :
तुम दोनों देखो राष्ट्र-नीति
शासक बन फैलाओ न भीति…
हे सौम्य! इड़ा का शुचि दुलार
हर लेगा तेरा व्यथा भार
यह तर्कमयी तू श्रद्धामय
तू मननशील, कर कर्म अभय…
सब की समरसता का प्रचार
मेरे सुत! सुन मां की पुकार।…
इस देव-द्वंद्व का वह प्रतीक
मानव! कर ले सब भूल ठीक!…
यह विष जो फैला महाविषम
निज कर्मोन्नति से करते सम
सब मुक्त बनें काटेंगे भ्रम
उनका रहस्य हो शुभ-संयम
गिर जाएगा जो है अलीक
चलकर मिटती है पड़ी लीक।

प्रसाद अपनी भावनाएं हमेशा रूपकों, प्रतीकों और संकेतों में व्यक्त करते हैं। इसे छायावाद की लाक्षणिक प्रवृत्ति कहा गया है। इसलिए ‘कामायनी’ के सपाटपठन से सपाट निष्कर्ष निकल सकते हैं। वस्तुतः प्रसाद अपनी कल्पनाशीलता से दूर तक देखते हैं। उनकी दृष्टि में देश की समस्याएं महज मुद्दे नहीं हैं, वे चुनौतियाँ हैं। वे समस्याओं से भागते नहीं टकराते हैं।

‘कामायनी’ महाकाव्य 1936 में छपा था, जब प्रेमचंद का ‘गोदान’ आया था। दोनों कृतियां महान हैं। प्रसाद ने मनु में और प्रेमचंद ने ‘गोदान’ के रायसाहब में ढहती सामंती व्यवस्था के बिंब खोजे थे, हालांकि यह व्यवस्था अंततः ढह नहीं पाई, बल्कि नए रंग-रोब से चमक उठी।

‘कामायनी’ आधुनिक प्रौद्योगिक विकास और मानवता को ही राह नहीं दिखाती। वह गुलाम भारत में रचे जाने के बावजूद स्वतंत्र भारत की राष्ट्रनीति का एक गैर-राजनीतिक घोषणापत्र है। ‘कामायनी’ भ्रमों को दूर करने तथा समाज को जहर से मुक्त करने के लिए है। छायावाद का युग सामंजस्य का युग था। प्रसाद इड़ा और श्रद्धा को, बुद्धि और हृदय को, टेक्नोलॉजी और मानवता को लड़ाते नहीं हैं, इन्हें जोड़ते हैं। वे बौद्धिक सहृदयता, सामाजिक समरसता और अहिंसा की बात करते हैं। वे मनुष्य होने का अर्थ बताते हैं, जो बाजार की वस्तु होने से भिन्न है। वे स्पष्ट कहते हैं कि शासक का काम भेदभाव पैदा करना नहीं है, भय फैलाना नहीं है। प्रसाद भविष्य कल्पना करते हैं, ‘यह विश्व अरे कितना उदार/मेरा गृह रे उन्मुक्त द्वार।’  प्रसाद के युग की विश्व मानवता वैश्वीकरण के युग में विश्व बाजार में सीमित हो गई है।

मानवता विजयिनी कैसे होगी

20वीं सदी की शुरुआत यह सोचते हुए नहीं हुई थी कि आगे चलकर दुनिया में यह होड़ प्रधान हो जाएगी कि कौन एक लाख करोड़ ट्रिलियन डालर का मालिक बनेगा-बिल गेट्स, एलेन मस्क या कोई ऐसा व्यक्ति जिसका कृत्रिम मेधा के व्यापार पर एकाधिकार होगा। यह सोचते हुए भी नहीं हुई थी कि समाज में प्रचारित अज्ञान ही ज्ञान बन जाएगा और पड़ोसी ही शत्रु के रूप में देखना शुरू कर देंगे। मनु द्वारा इड़ा के बलात्कार की कोशिश जैसा यौन उत्पीड़न बढ़ जाएगा, यह किसने सोचा था! किसी ने कल्पना नहीं की थी कि गरीब को गरीब की ही, मध्यवर्ग को मध्यवर्ग की ही लूट-मार के लिए इतना तैयार कर दिया जाएगा कि अरबपतियों तक उनका असंतोष कभी पहुंच नहीं पाएगा। आज के ‘मनु’ सुरक्षित होंगे! आखिर किसने सोचा था कि पिछली सदियों के आंदोलनों, क्रांतियों और सुधारों के उच्च आदर्श इस तरह उजड़ जाएंगे कि किसी के पास सैद्धांतिक रीढ़ नहीं होगी। हर आदमी आत्ममुग्ध उपभोक्ता में बदल जाएगा और हमारा समाज व्यक्तिवादियों का समाज होगा!

हम अपने समाज को जब सांस्कृतिक आत्मघात के रास्ते पर बढ़ते देख रहे हैं, एकबार सोच सकते हैं कि प्रसाद ने अतीत से मनु, श्रद्धा, इड़ा जैसे कथात्मक चरित्रों को उठाकर किस तरह सामाजिक भेदभाव, हिंसा, प्राकृतिक विनाश और खुदगर्जी के प्रतिपक्ष में एक मानवतावादी भविष्य की कल्पना की थी। यह एक निर्लज्ज समय है, अब कुछ भी ‘बुरा’ करने में लज्जा नहीं होती। फिर भी इस संकट को तो पार करना ही होगा। सभ्यता जितनी जर्जर होती जाए, उसमें अग्निरेखा बची होती है।

मनु ने अपने पुरोहितों आकुलि-किलात की बुरी प्रेरणाओं से हिंसा और क्रूरता के दृष्टांत दिए, जो एक राष्ट्रीय वादा-खिलाफी है। मनु श्रद्धा की तरफ आकर्षित होते समय शुरू में कह रहे थे, ‘मैं पुरुष, शिशु-सा भटकता आज तक था भ्रांत’। श्रद्धा को लगा था कि मनु ‘अमृत संतान’ है। वह विश्व के हृदय पटल पर अखिल मानव भावों का सुंदर इतिहास लिखेगा। ऐसा नहीं हुआ, इतिहास अधूरा रह गया। मनु सुखवाद, स्वेच्छाचारिता और हिंसा की तरफ मुड़ गए।  कई बार इतिहास के अधूरे पन्ने रचनाकार के कल्पलोक में होते हैं, जैसे कि ‘कामायनी’ के अंतिम सर्गों में हैं।

दुनिया में अब नई चीजें आ गई हैं, पुरानी चीजें विदा हो रही हैं। ट्राली बैग आ गया तो स्टेशनों पर लाल कपड़ों में कुली कम हो गए। वाशिंग मशीनों ने धोबियों को असहाय कर दिया। पान मसाला आ गया, पान की दुकानें फीकी हो गईं। ऑनलाइन सामान आने लगे तो सब्जी वालों और दुकानदारों से प्यारा संबंध खोने लगा। इसी तरह कई कृतियां पुरानी लगने लगीं, जिनमें एक ‘कामायनी’ है। क्या ‘कामायनी’ महज एक प्राचीन सच है?

‘डीप हिस्ट्री’ (श्रयोक और स्मेल) ने इतिहास में क्या कमाल दिखाया, यह नहीं पता लेकिन ‘डीप फेक’ छाया हुआ है। ‘कामायनी’ दिखाती है, ‘विकास’ भी किस तरह आतंक पैदा करता है। श्रद्धा का ‘चेतना का सुंदर इतिहास’ मनु में ‘डीप फेक’ का ट्रैजिक इतिहास बन जाता है। मनु की सोच में ‘फेक’ ही ‘रीयल’ है। मनु पराजित होते हैं, दंड पाते हैं और हास्यास्पद हो उठते हैं, ‘सोच रहे थे जीवन सुख है, ना यह विकट पहेली है/भाग अरे मनु! इंद्रजाल से कितनी व्यथा न झेली है।’ पराजित तानाशाह की यह आत्मव्यथा हास्यास्पद  लगती है। यहां आशा की एक किरण है, हर तानाशाह एक दिन हास्यास्पद हो जाता है!

‘कामायनी’ में प्रसाद एक स्वप्न देख रहे थे, ‘जीवन वसुधा समतल है समरस है जो कि जहां है।’ भारत का व्यक्ति, जो जहां हो अपनी विशिष्टता के साथ समरसता से भरा हो। वह समता की रसात्मक अनुभूति और एक आनंदमय समग्रताबोध से भरा हो, मानवता तभी विजयिनी होगी, अन्यथा धर्म जीतेंगे, जातियां जीतेंगी, प्रांतीयताएं जीतेंगी और मनुष्य हारेगा!

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