युवा कवयित्री, लेखिका, पत्रकार और अनुवादक।

आजाद भारत के जो सपने देखे गए, आजादी के बाद वे सभी लगभग ध्वस्त होते दिखाई दे रहे हैं। जनता की जो लूट अंग्रेज कर रहे थे देसी राज में वह लूट और गहरी, और निरंतर होती गई है। गुलामी के दौर में एक उम्मीद तो थी कि स्वतंत्र होंगे तो सब ठीक हो जाएगा, धीरे-धीरे वह उम्मीद भी निराशा में बदलती जा रही है।

 

 

 

 

कला का काम है कि वह कुछ कहे। कलाकारों ने अपने नाटक के लिए ऐसे ही राजा को गढ़ा है और अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है। लेखक या कलाकार का यही असली काम है कि वह सच को जनता के पक्ष से सामने लाए। समाज में सही के प्रति करुणा पैदा करे और बुरे के प्रति गुस्सा।

शंकर के उपन्यास ‘कुरबाडीह फाइल’ के कवर पर लिखा है कि यह कर्तव्य और न्याय के लिए किए गए संघर्ष की कथा है। करीब डेढ़ सौ पेज का यह उपन्यास लोकतंत्र के दो मजबूत खंभों- विधायिका और कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से न्याय के लिए कठिन संघर्ष का बयान है। उपन्यास में यह संघर्ष आम आदमी का न होकर खुद कार्यपालिका के भीतर बड़े नौकरशाह से कनिष्ठ अधिकारी का संघर्ष है। यूं कहें कि बेईमानी से ईमानदारी का संघर्ष है। ईमानदारी ज्यादातर छोटी जगहों पर रहती है, जबकि बेईमानी महलों और बंगलों में राजाओं की तरह राज करती है।

कथा के नायक छोटे अफसर राजेंद्र रमण का अपनी कर्तव्यनिष्ठा के चलते एक लगभग गैर-महत्वपूर्ण कार्यालय में तबादला कर दिया जाता है। उनके तबादले के पहले ऑफिस में ठेकेदार ने आठ कुओं की खुदाई का बिल जमा किया था। राजेंद्र रमण उत्साह में कुओं के भौतिक निरीक्षण को निकले तो उन्हें केवल दो कुएं मिले। एमएलए की सिफारिश के बावजूद उन्होंने ठेकेदार का आठ के बजाय दो कुओं की ही खुदाई का बिल पास किया। जनता से उन्हें वाहवाही मिली, लेकिन हफ्ते-दस दिन में एमएलए ने पनिशमेंट के तौर पर उनका तबादला फाइलों के श्मशान कहे जाने वाले एक उपेक्षित-से दफ्तर में करवा दिया। यहां उन्हें पुरानी फाइलों की सूची बनानी होती है और सौ फाइलें हो जाने पर आग के हवाले करना होता है।

लेकिन इसी काम में उन्हें एक ऐसी फाइल मिलती है जिसमें कुरबाडीह चेक पोस्ट पर तैनात ड्यूटी अफसर शशिभूषण दास को पेट्रोल डालकर जला डालने के विमल चंद्र के शिकायती पत्र मिलते हैं। शासन इसे केरोसिन लैंप से हुई दुर्घटना से मृत्यु में बदलकर फाइल बंद कर चुका है। वस्तुतः शशिभूषण दास को जलाने वाले लोग सिटिंग मंत्री रामनारायण सत्यव्रती के गुंडे थे। ड्यूटी अफसर की ईमानदारी के चलते चेक पोस्ट से अवैध कारोबार बंद हो रहे थे।

राजेंद्र रमण खुद शशिभूषण के चेकपोस्ट गए थे। वे फिर विमलचंद्र से भी मिलने उसके गांव गए थे। उन्होंने फाइल पुनः कार्रवाई की संस्तुति करते हुए ऊपर भेजी थी। इसके बाद उन्हें इस पूरे जाल में उलझा लिया जाता है।

आगे की कहानी इसी संघर्ष की है कि किस तरह राजेंद्र रमण नौकरशाही की क्रूरता से लड़ते हैं और जलाकर मार दिए गए ड्यूटी अफसर शशिभूषण दास को और खुद को इंसाफ दिलाते हैं।

उपन्यास प्रश्न छोड़ता है कि हम कैसी भ्रष्ट नौकरशाही की गुलामी से जकड़े हैं। यह व्यवस्था इतनी निर्मम है कि ईमानदारी के लिए अपने ही छोटे अफसर को बर्खास्त कर सकती है, जिंदा जला सकती है, आदिवासियों को लूट सकती है, छोटे बच्चों की राहत के लिए आया दूध डकार सकती है। यह तंत्र का खूंखार चेहरा है जिससे संघर्ष करना और जीतना दुरूह है।

शंकर मूलतः कथाकार हैं। उनके आधा दर्जन कहानी संग्रह आ चुके हैं। अपनी रचनाओं में वह अक्सर विशालकाय आदमखोर तंत्र से सामान्य आदमी की मुठभेड़ और उसके पक्ष में आवाज बुलंद करते देखे गए हैं।

उपन्यास के दो हिस्से हैं- अंतरकथा और उत्तर कथा। इन दोनों के बीच एकदम सिनेमा स्टाइल की तरह इंटरवल होता है। कथा में दृश्यात्मकता इतनी प्रभावशाली है कि पाठक दृश्य को निरंतर घटित होते देखता रहता है।

उपन्यास से गुजरते हुए ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ जैसी फिल्मों के कुछ दृश्य कौंध जाते हैं, तो कभी ‘राग दरबारी’ की याद आ जाती है। कभी स्वदेश दीपक का ‘कोर्ट मार्शल’ याद आता है। हालांकि उपन्यास में न्यायपालिका से इंसाफ मिलता है, लेकिन वास्तविकता हम सब जानते हैं कि कोर्ट का रास्ता सबके लिए आसान नहीं है।

जिन आदिवासियों को विकास के लाभ का एक फीसद भी नहीं मिलता, जिनकी आर्थिक कमजोरी को उनकी मूर्खता कहा जाता है, वे अपने हक को जानना सीख रहे हैं। उपन्यास में एक जगह कठपुतली नाच का दृश्य है। यहां उपन्यासकार ने सुंदर तरीके से कई जटिल सूत्र खोले हैं। कठपुतलियां लड़तीं, एक-दूसरे पर तलवार चलाती दिखती हैं, लेकिन उन्हें लड़वाने वाला परदे के पीछे कोई और होता है जो उन्हें नियंत्रित करता है।

यहीं एक सुंदर बात कही गई है- कला का काम है कि वह कुछ कहे। कलाकारों ने अपने नाटक के लिए ऐसे ही राजा को गढ़ा है और अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है। लेखक या कलाकार का यही असली काम है कि वह सच को जनता के पक्ष से सामने लाए। समाज में सही के प्रति करुणा पैदा करे और बुरे के प्रति गुस्सा। उपन्यास का अंत सकारात्मक और उम्मीद से भरा है, हालांकि वास्तविकता में ऐसा बहुत कम दिखता है।

जिज्ञासा : आप अपने लेखन में अक्सर नौकरशाही की क्रूरता को सामने लाते हैं और आम आदमी का संघर्ष दिखाया जाता है। क्या नौकरशाही कभी जनपक्षधर बन सकती है?

शंकर : समूची नौकरशाही नहीं, लेकिन इसका एक बड़ा तबका निःसंदेह संवेदनहीन, अमानवीय, स्वेच्छाचारी और न्याय-निरपेक्ष है। समाज धीरे-धीरे जागरूक हो चुका है। कई अवसरों पर संघर्ष की स्थितियां बनती हैं। संघर्ष के दृष्टांत अब आम हो रहे हैंं। नौकरशाही का मिजाज और चरित्र सरकार के मिजाज और चरित्र से तय होता है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल और केरल की नौकरशाही अन्य प्रांतों की नौकरशाली से थोड़ी भिन्न है। आज लोकतंत्र जहां पहुंच है उसका जनपक्षधर रूप सवालों के घेरे में है।

जिज्ञासा : इस उपन्यास को आपने सच्ची घटना से प्रेरित बताया है, क्या उस घटना में पीड़ित को इंसाफ मिला है?

शंकर : जिस घटना पर उपन्यास आधारित है उसमें न्याय नहीं हो पाया था। इस घटना को अधार बनाकर उपन्यास लिखने की मनोवैज्ञानिक बेचैनी की वजह यही थी। मैंने तदनुसार चरित्र, प्रसंग और संघर्ष की प्रक्रिया को बुना और उस घटना को न्याय की स्थिति तक पहुंचाने की एक कोशिश की है।

जिज्ञासा : आपकी कई कहानियों में नाट्य मंचन के तत्व नजर आते हैं। इधर रंगमंच में अच्छी स्क्रिप्ट की कमी देखी गई है, आप इस पर क्या कहेंगे?

शंकर : मैं शुरू से कहानियों के दृश्यात्मक ट्रीटमेंट में रुचि रखता रहा हूँ। इस उपन्यास में भी वही स्थिति है। मेरे एक छोटे भाई जो बिहार के एक कस्बे सासाराम में रंगमंच की गतिविधियां चलाते रहे हैं, कहते हैं कि इसपर फिल्म  बन सकती है। मेरी अपनी उलझने हैं, लेकिन कोई यह काम करे तो मेरी सहर्ष सहमति होगी।

 

 

 

 

जो हार गए, और कभी उठ न पाए, जिनके जीवन में याद रह जाने लायक कोई जुगनू तक नहीं रहा! जिन्होंने शाम के बाद अंधेरा देखा और सवेरा कभी हुआ ही नहीं! ऐसे भी अनगिनत मनुष्य हमारे इर्द गिर्द हैं, जो किसी को प्रेरणा नहीं दे पाते जिनका जन्म और मृत्यु कोई घटना नहीं होती। यह उपन्यास ऐसे ही चरित्रों के अंधेरे रंगों को चित्रित करता है।

‘कौन से देस उतरने का’ कवयित्री सविता पाठक का पहला उपन्यास है। इसके पहले उनका कहानी संग्रह ‘हिस्टीरिया’ आ चुका है।

उपन्यास का फलक बहुत बड़ा है। यह दिखाता है कि पूंजी-केंद्रित विकास के कारण गांव से पलायन हो रहा है, खेती घाटे का सौदा बन गई है। किसान और खेतिहर मजदूर जीवन यापन के लिए शहर जा रहे हैं। शहर उनको अपने नरकलोक में ठूंस देता है। यहां बेकारी और अपमान है। दूसरी तरफ पितृसत्ता की क्रूरता और सामंती उत्पीड़न से जूझते गांव हैं।

उपन्यास मुनीश के जीवन से शुरू होता है, जिसने अपने जीवन में पिता की अत्यधिक हिंसा देखी और झेली है। उसके पिता शिव प्रसाद दुबे यानी साहेब सामंती पितृसत्ता के सच्चे प्रतीक हैं।  उन्हें पत्नी का गाना-बजाना, स्त्री, मर्द, यहां तक कि बालक से बात करना भी उन्हें पत्नी को पीटने को उकसाता है। ऐसी भयावह प्रताड़ना से जूझती राधेश्वरी के देह संबंध किसी पल पराए पुरुष से बन जाते हैं और गर्भ ठहर जाता है। इस तरह उनकी पत्नी राधेश्वरी की आजन्म प्रताड़ना का नया अध्याय शुरू होता है। उन्हें सार्वजनिक रूप से थूक के चटवाया जाना, पीट पीट कर शरीर नीला कर देना – इसी हिंसा में मुनीश अपनी मां को बचाने में पिता पर हाथ उठा देता है। इसका नतीजा है उसे जिंदगी भर बेघर भटकना पड़ता है।

उपन्यास दिखाता है कि पितृसत्ता की भयावह हिंसा ने स्त्रियों का आत्मसम्मान इतना कुचल दिया है कि उनको सिर उठाकर चलने लायक नहीं छोड़ा।

मुनीश बुखार की हालत में दिल्ली की मेट्रो में सवार है और बड़बड़ाता हुआ-सा पूछता है-  कौन से देस उतरने का! लोग उसे मेंटली डिस्टर्ब समझते हैं।

उपन्यास का नायक कोई एक व्यक्ति नहीं है।  यह गांव के साथ दिल्ली जैसे महानगर से भी जुड़ी कहानी है। शायद इस कहानी का कोई एक नायक हो भी नहीं सकता था। जो अंत में जीत जाता है वही नायक होता है और प्रेरक भी। लेकिन जो हार गए, और कभी उठ न पाए, जिनके जीवन में याद रह जाने लायक कोई जुगनू तक नहीं रहा! जिन्होंने शाम के बाद अंधेरा देखा और सवेरा कभी हुआ ही नहीं! ऐसे भी अनगिनत मनुष्य हमारे इर्द गिर्द हैं, जो किसी को प्रेरणा नहीं दे पाते जिनका जन्म और मृत्यु कोई घटना नहीं होती। यह उपन्यास ऐसे ही चरित्रों के अंधेरे रंगों को चित्रित करता है। उपन्यास हिंसा की कई परतों को दिखाता है- पूंजी की हिंसा, पितृसत्ता की हिंसा और सामंती उत्पीड़न।

उपन्यास दुखों का कोलाज है। गहरे रंगों से बनी ऐसी पेंटिंग जिसमें सारे रंग राख के हैं। यह सोचना भी मुश्किल लगता है कि यह कोरा कैनवास कभी सफेद रंग का रहा होगा। ‘कौन से देस उतरने का’ के पात्रों के जीवन में कोई चमक, उम्मीद, भविष्य के सपने नहीं हैं।

उपन्यास की शुरुआत में एक कोल्हू है – जिस पर उड़ती चिड़िया और नाचते स्त्री-पुरुष हैं। लड़का यानी मुनीश इसी कोल्हू से अपने मन की सब बातें करता है। वह चिड़िया से, कोल्हू से, महुआ से बात करता है। गांव से निकल कर कुछ लोग तो हाईवे की ऊंचाई पर पहुंच गए हैं लेकिन ज्यादातर पाताल की खाई में धंस गए हैं। शहर में धक्के खा रहे इन लोगों का कौन सा देस है? ये कहां जाएं? विकास की मेट्रो इन्हें कौन-देस उतारे जहां ये सम्मान से जी सकें। किसका दुख कहा जाए- मुनीश, मां राधेश्वरी, नंदा, अमृता, उसके गुम पिता का या इस उपन्यास में बिखरे सिमटे दर्जनों पात्रों का!

उपन्यास में खलनायक कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि इस पूंजीकाल में राज्य व्यवस्था और समाज की रची वे परिस्थितियां हैं जो इस संभाव्य को निर्मित करती हैं। कोई एक खलनायक हो तो कोई नायक उससे संघर्ष करे, खलनायक को हराए और जीत हासिल करे और पाठक को उपन्यास के अंत में कुछ परंपरागत राहत दे कि बुराई पर अच्छाई की जीत होती है या जो होता है सो अच्छे के लिए होता है। उपन्यास ऐसा कोई आश्वासन नहीं देता बल्कि आंख में उंगली डालकर सत्य को देखने की जिद करता है।

उपन्यास में कई जगहों पर लोकगीतों और कहावतों की पंक्तियां घुली-मिली हैं। देसी बोली का ऐसा रवानी भरा प्रयोग है कि अंचल जीवित हो उठता है। कथा स्वप्न में जाती है, स्मृतियों में डूबती है और फिर वर्तमान में लौटती है। कहीं भी जाएं, खुशी की चमक का एक पल नहीं मिलता। दुखों के अंतहीन नगर में हम प्रवेश कर जाते हैं। जहां हर सड़क पर अंधेरा है, हर गली में कालापन पसरा है, हर रास्ता बंद है।

सविता पाठक का पहला उपन्यास इस अर्थ में स्वागत योग्य है कि यह बिना लाग लपेट पूंजी-केंद्रित विकास के आदमखोर दैत्य की पहचान कराता है। यह उपन्यास जिन लोगों पर लिखा गया है- ठेठ बोली और कथ्य की सहजता के कारण वे खुद इसे अच्छे से समझ सकते हैं। 

जिज्ञासा : इस उपन्यास को लिखने की पृष्ठभूमि क्या रही?

सविता पाठक : मेरा अपना जीवन शहर और गांव दोनों से जुड़ा रहा है। धीरे-धीरे मेरा खुद का गांव छुटे हुए लोगों का अड्डा हो गया है। गांवों में रोजगार नहीं है कि लोग यहां टिक सकें और शहरों में न जगह है और न ऐसी कोई व्यवस्था जिसमें सामान्य आदमी गरिमामय जीवन जी सके। सही शब्दों में कहना चाहिए कि गांव से उजड़कर स्लम में आना ही शहर में आना है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी तरह शरीर को जिंदा रखना ही रोजगार का पर्याय हो गया है। ऐसे में जो बीमार पड़ गया या किन्हीं वजहों से छूट गया वह छूटता ही जाता है। वह सरकार और समाज दोनों के लिए अतिरिक्त आबादी है, जिससे किसी को कोई मतलब नहीं है।

जिज्ञासा : उपन्यास में दुखों की करुण गाथा है। इसके पात्र त्रासदी भुगतते हैं, जबकि न यह बंटवारे का समय है, न कोई दंगा हुआ है फिर भी हर तरफ आंसू, कराह, बीमारी और बर्बादी है। फिर उम्मीद की किरण कहां है?

सविता पाठक : हम सभी लोग किसी बड़ी घटना को ही दुख का कारण समझते हैं। जैसे  महायुद्ध हो गया हो या कोई प्राकृतिक आपदा हो या फिर बंटवारे का दंश। सच यह है कि जो एक बड़ी परिघटना इन घटनाओं के पीछे का कारण है वह है- पूंजी का संक्रेंदण। उसके लिए मची लूट। अपार संपदा पर कुछ घरानों, कंपनियों का नियंत्रण और इसकी वजह से एक ऐसी व्यवस्था को प्रोत्साहन जहां बामुश्किल लोग जी रहे हैं। एक ऐसा विकास जो पूरी धरती पर कहर की तरह टूट पड़ा है। कुपोषण, भूख और गरीबी से हर दिन मरते लोग किसी लिस्ट में नहीं हैं। हम गरीबी और बेरोजगारी के कहर को समझ ही नहीं पा रहे हैं। हम नहीं समझ पा रहे हैं कि विज्ञान हर दिन बीमारियों के इलाज ढूंढ़ पाने में सक्षम हो रहा है और लोग मोतियाबिंद का आपरेशन कराते हुए अंधे हो जाते हैं। बच्चे बिना आक्सीजन के मर जाते हैं। आपने पूछा है कि उम्मीद की किरण कहां हैं। उम्मीद इस अंधेंरे और अंधेरगर्दी की शिनाख्त करने में है। झूठी उम्मीद नाउम्मीदी से ज्यादा बुरी चीज है।

जिज्ञासा : एक लेखक के तौर पर आप अपने लिए क्या चुनौती पाती हैं?

सविता पाठक : मुझे कुछ कहना है, जिसमें अंधेरा और उम्मीद दोनों हों। इस विशाल सच्चाई को पकड़ना आसान नहीं है। हम जिसे उम्मीद समझते हैं, कई बार वह एक ऐसी हैलोजिन लाइट की तरह होता है जो न दिखने वाला अंधेरा रच देता है। यह एक गफलत की स्थिति होती है। दूसरे, लिखना श्रमसाध्य काम है। निजी जीवन की आपाधापी और रोटी-रोजगार इतना समय ले लेते हैं कि जितना श्रम लिखने पर करना चाहिए कर नहीं पाती हूँ। पुरुष भी हूँ नहीं कि कहीं टिक जाऊं, कहीं रुककर लिख-पढ़ सकूं। खुद के लिखे से एक असंतोष होता है। लगता है कि कौन-सी भाषा लाऊं, क्या वाक्य विन्यास हो, किस तरह से बात उठाऊं कि वह दिल-दिमाग को छुए।

 

 

 

यह 1925 में स्थापित एक ऐसे सांस्कृतिक संगठन की नित्य कथा है जिसने पिछले सौ सालों में भारतीय लोकमन और उसके सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को गहरी चोट पहुंचाई है। साथ ही यह भारतीय उपमहाद्वीप में तेजी से बढ़ती उन सांस्कृतिक दुर्बलताओं को परिभाषित करता है, जिसके कारण आपसी संघर्ष, असहिष्णुता और वैमनस्य का दायरा बढ़ता जा रहा है।

दण्ड प्रहार भारतीय लोकमन के ताने-बाने पर निर्मम प्रहार की कथा है। हिंदी के सर्वाधिक सक्रिय और नए-नए विषयों पर लेखन के माहिर उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल का यह बारहवां उपन्यास है। इतना विपुल लेखन वह भी गंभीर विषयों पर, यह अपने आप में एक शानदार बात है। इनके उपन्यास जिन पाठकों ने पढ़े होंगे, वे इस बात से सहमत होंगे कि वे अपने उपन्यासों पर बहुत मेहनत करते हैं, विषय पर गहन शोध उनके लेखन में दिखाई देता है। यह लेखन को अधिक विश्वसनीय बनाता है। वे स्वयं कहते हैं कि उपन्यास लिखते वक्त वे इन चार बिंदुओं का खास ख्याल रखते हैं- पठनीयता, विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और शीर्षक। वह कहते हैं कि उपन्यास में तीस प्रतिशत यथार्थ और सत्तर प्रतिशत कल्पना होती है। वे दृश्य गढ़ते हैं।

‘दण्ड प्रहार’ उपन्यास देश की उन घटनाओं को बयान करता है जिन्होंने देश की दशा और दिशा को बदलकर रख दिया। साझी विरासत और सामूहिक विवेक पर जोरदार प्रहार हुआ और भारतीय उपमहाद्वीप की बहुलतावादी संस्कृति छिन्न-भिन्न हो गई। 

उपन्यास के परिचय में कहा गया है कि यह 1925 में स्थापित एक ऐसे सांस्कृतिक संगठन की नित्य कथा है जिसने पिछले सौ सालों में भारतीय लोकमन और उसके सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को गहरी चोट पहुंचाई है। साथ ही यह भारतीय उपमहाद्वीप में तेजी से बढ़ती उन सांस्कृतिक दुर्बलताओं को परिभाषित करता है, जिसके कारण आपसी संघर्ष, असहिष्णुता और वैमनस्य का दायरा बढ़ता जा रहा है।

उपन्यास का समय बीसवीं सदी के आठवें दशक से लेकर अब तक का कहा जा सकता है। इसमें देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण तात्कालिक घटनाओं पर बात है। उपन्यास की लोकेशन दिल्ली से पच्चीस-तीस मील दूर इस्माईलपुर है, जो दिल्ली के विकास के दायरे में आ चुका है। यहीं श्रीराम, श्रीराधा, अक्षरधाम, सुखसागर जैसे नामों के बीच आशियाना सोसायटी बनती है। इसका नाम सबसे अलग है क्योंकि उस वक्त को-ऑपरेटिव सोसाइटी विभाग की स्कीम के तहत इसे इसके संस्थापक सदस्यों मुंशीलाल रहबर, मशहूर शायर रामप्रसाद सुमन और उनके पक्के अदबी दोस्त मखदूम चिराग साहब ने अपने मन मुताबिक बनाया-सजाया था। मसलन उन्होंने सोसायटी के कम्युनिटी हॉल का नाम प्रेमचंद सदन रखा और इसकी दीवारों पर प्रेमचंद के कथन लिखवाए।

लेकिन इसके संस्थापकों के खूबसूरत सपने कब बुरे सपनों में तब्दील होते चले गए किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। सबके देखते-देखते समय बदला, पुरानी पीढ़ी स्वर्गवासी हुई और इन्हीं कवि सुमन जी के पुत्र जय प्रकाश सिन्हा कालोनी के रेजिडेंट वैलफेयर के महासचिव हुए और कब इन्हीं के समय प्रेमचंद सदन पहले तुलसी सदन और बाद में सावरकर सदन हो गया। मंसूर आलम को अपना फ्लैट छोड़ कर भागना पड़ा।

श्रीराम प्रॉपर्टी डीलर का मालिक विक्रम कहता है- ‘एक बात कहूं शकुनि जी, बंटवारे में सब कुछ लुटाकर शरणार्थी के रूप में आए इन गुलाटी, मेहता, गंभीर, मनचंदा, गिडवानी, आडवाणी, मल्होत्राओं ने इतने कम समय में कैसे अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया, इसका कारण जानते हो? कारण इसका यह है कि इन्होंने धर्म और धंधे को हमेशा एक-दूसरे से अलग रखा। कोरी भावुकता और नैतिकता के बल पर कारोबार नहीं चलता! यह गुंडागर्दी, हिंसक गतिविधियां आदि से बढ़ती हुई अंततः राजू बजरंगी और दलपत मीणा की जेल सजा तक पहुंचती है। इसमें अंबेडकर कांवर यात्रा का जिक्र है। नोटबंदी में पार्टी फंड में चंदा देकर पैसा सफेद करने की कहानी है।

इस उपन्यास को पढ़ना देश के उस महत्वपूर्ण समय को समझने के लिए जरूरी है जिसमें देश अचानक से बदलता चला गया और बहुत से लोग इसे ठीक से नोटिस भी नहीं कर पाए। आजादी के समय जो ताकतें कमजोर थीं उन्होंने ऐसा क्या किया कि वे आज विकराल बन कर सामने खड़ी हैं।

कथाकार की विषय पर पकड़ इतनी गहरी है जैसे लेखक ने स्वयं दण्ड प्रहार का जीवन बिताया हो।

उपन्यास की पठनीयता प्रभावशाली है। पांच सौ पृष्ठ के इस उपन्यास को आप दो-तीन दिन में आराम से पढ़ सकते हैं। कोई भी विवरण विषय से कटा हुआ नहीं है और विषय को खोलने में मददगार है। नैरेशन ऐसा है जो कथा को और विश्वसनीय बनाता है। कथानक की बुनावट ऐसी है जो इसके उद्देश्य को बोधगम्य बनाती है।

यह उपन्यास दूधनाथ सिंह के ‘आखिरी कलाम’ (2005) के सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है। हालांकि इसे स्वयं लेखक के ‘काला पहाड़’ से आगे की कहानी मान सकते हैं।  इसमें भी धार्मिक सद्भाव और ऐतिहासिक त्रासदी का जिक्र है। उपन्यास उम्मीद के मोड़ पर खत्म होता है। लेखक बहुत आशान्वित हैं, उनका कहना है कि हम इन सवालों का उत्तर राजनैतिक विमर्श के भोथरे औजारों में नहीं, सामूहिक विवेक में खोज सकते हैं।

जिज्ञासा : इस विषय पर लिखना शायद विवादास्पद और जोखिम भरा हो सकता है। अतीत पर लिखना सुरक्षित है, लेकिन जो वर्तमान हो उसपर लिखना साहसिक है। आपके मन में इस विषय पर कलम उठाने से पूर्व क्या ऐसा कोई विचार आया?

भगवानदास मोरवाल :  मेरा मानना है कि विषय कभी विवादास्पद और जोखिम भरा नहीं होता। विवादास्पद उसे उसकी प्रस्तुति और लेखक की लेखकीय नीयत और मंशा बनाता है। जब किसी लिखे हुए पर सवाल उठने लगते हैं, तब वह जोखिम भरा हो जाता है। यदि हम विवादास्पद और जोखिम की बात करें, तो सबसे अधिक जोखिम धार्मिक विषय और धर्म विशेष को आधार बनाकर लिखने पर होता है, वह भी तब जब एक लेखक दूसरे धर्म के बारे में लिखता है। यह जोखिम अतीत के धार्मिक विषयों पर भी हो सकता है और राजनीतिक विषय पर भी। क्योंकि लेखन अकेला ऐसा क्षेत्र है जिसमें न अतीत होता है, न वर्तमान। बिना अतीत और वर्तमान के मिश्रण के कोई रचना न संपूर्ण होती है, न समकालीन।

जहां तक ‘दण्ड प्रहार’ उपन्यास का प्रश्न है, उसमें पाठक को वर्तमान संदर्भ अधिक दिखाई देंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। जिस विषय को केंद्र में रखकर मैंने इस उपन्यास को लिखा है, उसका विस्तार पिछले सौ सालों के अतीत से हुआ है। वर्तमान में तो उससे जुड़े एक तथाकथित सांस्कृतिक संगठन, जिसका आज तक कोई रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, उसे अपने असली रूप में आने का अवसर मिला है। जहां तक साहस, विवाद और जोखिम का प्रश्न है, लिखते समय लेखक का ध्यान इनकी ओर बिलकुल नहीं जाता है। हालांकि अभिव्यक्ति की दृष्टि से देखें तो मौजूदा समय कहीं अधिक क्रूर और निर्मम है। ऐसा तो तब भी नहीं था जब यहां मुगलों का शासन था। लेकिन लेखक को ऐसे ही चुनौती भरे दौर का सामना कर, जो उसे अच्छा लगता हो, लिखना चाहिए। एक लेखक किसी को नाराज या खुश करने के लिए नहीं लिखता है। वह वही लिखता है जो उसके मन में आता है।

जिज्ञासा : आपका उपन्यास अच्छी डिटेलिंग देता है, कई बार अविश्वसनीय भी। क्या इन तथ्यों की पुष्टि कर सकते हैं।

भगवानदास मोरवाल : आपने आई डिटेलिंग्स और उनकी विश्वसनीयता की बात की है। डिटेलिंग्स को लेकर साहित्य में समय-समय पर बातें होती रही हैं। पश्चिम के देशों में औपन्यासिक विवरणों को एक अच्छी कृति की विशेषता माना जाता है, जबकि हिंदी साहित्य में इसे एक अवगुण की तरह देखा जाता है। मेरा अब तक का अनुभव यह कहता है कि बिना विवरणों के आप न उपन्यास को समझ सकते हैं, न उसके विषय को। जबकि विवरण किसी भी उपन्यास को कहीं अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाते हैं। जैसे मानव शरीर की पूरी संरचना को समझने और जानने के लिए उसकी छोटी-छोटी कोशिकाओं को जानना आवश्यक होता है, उसी तरह रचना के भीतरी रेशों को समझने में विवरण बहुत सहायक होते हैं।

मुझे याद है तब मेरे दो ही उपन्यास आए थे ‘काला पहाड़’ और ‘बाबल तेरा देस में’, तो एक बार राजेंद्र यादव जी ने मुझसे एक बात कही थी कि तुम्हारे उपन्यासों में इतने डिटेल्स हैं कि इनके चलते पाठक उनके झोल को नहीं पकड़ पाते हैं। एक पल के लिए मुझे उनका यह कहना अपने लेखन की एक कमजोरी लगी, किंतु थोड़ी देर बाद लगा कि यह तो मेरे लिए एक कॉम्प्लीमेंट है। यह तो मेरे उपन्यास लेखन की ताकत है।

यदि एक लेखक विवरणों से अपने पाठक को भ्रमित कर सकता है तो यह उसका रचनात्मक कौशल है। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप अपनी रचना में तभी प्रचुर विवरण दे पाने में समर्थ हो सकते हैं, जब आपने विषय-संबंधी जानकारियों का गहराई से विश्लेषण किया हो। हर छोटी-छोटी जानकारी का अपना महत्व होता है और इनकी समझ आपको तब तक नहीं हो सकती, जब तक आपने उन्हें बेहद नजदीक देखा-परखा ना हो।

जिज्ञासा : दण्ड प्रहार के लिए आपने क्या तैयारियां कीं? पढ़ते हुए लगा कि आपने इस सांस्कृतिक संगठन की कार्यशैली को बहुत करीब से देखा ही नहीं जैसे जिया भी हो! यह कैसे संभव हुआ और इस तैयारी में कितना समय लगा?

भगवानदास मोरवाल : जहां तक ‘दण्ड प्रहार’ लिखने की तैयारियों की बात है, वह आपने इसे पढ़ते हुए महसूस किया होगा। यह एक संयोग है कि अपने उपन्यासों के लिए मैं जो विषय चुनता हूँ, वे ऐसे होते हैं कि बिना शोधपरक तैयारियों के उन्हें लिखना मुश्किल होता है। यह बात अलग है कि हिंदी नगरीय बौद्धिक समाज इससे बेहद आतंकित रहता है, और इस लेखन-प्रक्रिया की आलोचना भी करता रहता है। जबकि इसके चलते पाठकों की एक लेखक के रूप में उससे अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं।

मजेदार यह है कि पाठकों में यह अपेक्षा मेरे शुरू के उपन्यासों से ही बढ़ गई। जैसे अपने दूसरे उपन्यास के लिए मुझे कुरआन और बहिश्ती जेवर सहित कई इस्लाम संबंधी ग्रंथों को पढ़ना पड़ा। ‘रेत’ के लिए मुझे अपराधी जनजाति अधिनियम से लेकर कंजर समुदाय के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को समझने के लिए उनकी बस्तियों में जाना पड़ा। ‘मोक्षवन’ के लिए पश्चिम बंगाल के नादिया, बोलपुर और वृंदावन सहित आसपास के क्षेत्रों की खाक छाननी पड़ी। ‘खानजादा’ के लिए पूरा मुगल इतिहास पढ़ना पड़ा। ‘वंचना’ के लिए स्त्री-संबंधी कानूनों का अध्ययन करना पड़ा।

इसी तरह मैंने भक्तिकाल के महत्वपूर्ण कवि रसखान के जीवन को केंद्र में रखकर हाल में अपना नया उपन्यास पूरा किया है। इसके लिए सोलहवीं सदी के पूरे भक्तिकालीन काव्य, विशेषकर वल्लभाचार्य और अकबर के समकालीन उनके पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा शुरू किए गए अष्ठछाप के कवियों का अध्ययन किया। यह जो गहन शोध आपको मेरे उपन्यासों में दिखाई देता है, यह एक दिन में पूरा नहीं होता बल्कि एक लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार होता है।

इसी तरह ‘दण्ड प्रहार’ के लिए मैं महीनों  2017-18 में एक शाखा में जाता था। जहां उसकी हरेक गतिविधि को बड़े ध्यान से देखता था और उनका विश्लेषण करता था। इसके अलावा मैंने संघ संबंधी साहित्य का भी अध्ययन किया।  इस विषय पर मैंने तुरंत नहीं लिखा। मैंने कुछ सालों का इंतजार करना उचित समझा, ताकि चीजें और स्पष्ट हो जाएं। बाद में 2024 में मैंने इसे लिखना शुरू किया, जो लगभग आठ महीने की निरंतर मेहनत और देह तोड़ने वाली बैठकों के बाद पूरा हुआ।

जिज्ञासा : आपने सभ्यताओं के संघर्ष की बात की है तब इजराइल-फिलिस्तीन, अमेरिका-खाड़ी के देशों, भारत-पाकिस्तान, लैटिन अमेरिकी देशों में आप इस थ्योरी से कैसे सहमत हैं?

भगवानदास मोरवाल : आपने वर्तमान में इजराइल-फिलिस्तीन, अमेरिका-खाड़ी के देशों, भारत-पाकिस्तान, लैटिन अमेरिकी देशों, बल्कि इसके साथ मैं रूस-यूक्रेन टकराव को भी जोड़ता हूँ, के संघर्षों की बात की है। इस पर सोचा है कि क्या ये सब सभ्यताओं के संघर्ष हैं? देखिए, इनमें बहुत कुछ तो सभ्यताओं के उसी संघर्ष के चलते हो रहा है जिसका सिद्धांत सैमुअल फिलिप हंटिंगटन ने 1993 में दिया था। कुछ टकराव साम्राज्यवादी वर्चस्व की मानसिकता के चलते हो रहा है। एक रोचक तथ्य यह है कि सैमुअल फिलिप हंटिंगटन ने जिन सभ्यताओं को चिह्नित किया था, वे सब वही हैं जिनमें आपस में सभ्यतागत टकराव चल रहा है। इनमें पश्चिमी, कन्फ्यूशियस, जापानी, इस्लामी, हिंदू, स्लाव-ऑर्थोडॉक्स, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी सभ्यताएं शामिल हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इन संघर्षों का मूल आधार धार्मिक अस्मिता और बहुसंख्यकवाद चरित्र कहीं अधिक है। इसका एक बड़ा उदाहरण हम भारतीय उपमहाद्वीप सहित मध्य एशियाई देशों में देख सकते हैं। मेरे इस उपन्यास में भारत और कुछ दक्षिणी-एशियाई देशों में आपसी सभ्यतागत टकरावों के ऐसे सूत्र आसानी से मिल जाएंगे।

 

समीक्षित पुस्तकें

(1) कुरवाडीह, शंकर, अंतिका प्रकाशक, मूल्य- 470 रुपए। (2) कौन से देस उतरने का (उपन्यास)- सविता पाठक, लोकभारती प्रकाशन, मूल्य- 299 रुपए। (3) दण्ड प्रहार (उपन्यास), भगवानदास मोरवाल, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य- 595 रुपए (पेपरबैक)।