कवि और समीक्षक. विद्यासागर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर एवं प्रबुद्ध रंगकर्मी.

संस्मरण साहित्य एक प्रामाणिक एवं रोचक विधा है। इन दिनों संस्मरण लेखन का चलन बढ़ा है। यह जितना आत्मीय और सृजनात्मक मामला है, उतना ही यह एक तरह का ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण भी है। कई बार संस्मरण को केवल निजी स्मृतियों का लेखन मान लिया जाता है, जबकि उसमें एक सामाजिक परिवेश की आत्मीय झलक भी होती है।

 

वरिष्ठ कवि-लेखक-संपादक विनोद दास की ‘छवि से अलग’ एक संस्मरणात्मक पुस्तक है। इसमें लेखक ने 15 हिंदी साहित्यकारों एवं राजनीतिज्ञों पर संस्मरण लिखे हैं, जिनमें उनके निजी प्रसंगों और घटनाओं के साथ कई अनजान और रोचक पहलू उजागर हुए हैं।

‘छवि से अलग’ में किसी व्यक्तित्व की अपनी स्थापित छवि से अलग घटनाओं के आख्यान हैं। विनोद दास अपने प्रिय लेखकों के बीच कभी एक सहज पाठक, कभी एक जिज्ञासु साहित्य प्रेमी और कभी अपनत्व से भरे मित्र की तरह दाखिल होते हैं। इस तरह के प्रवेश में कभी पूर्वग्रह माध्यम बनते हैं तो कई बार पूर्वग्रह टूटते भी हैं। आश्चर्यजनक रूप से एक साहित्यकार का पहला संस्मरण ‘एक बुजुर्ग की सीख’ शीर्षक से पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी पर केंद्रित है। इस संस्मरण में एक घटना का जिक्र है। उस घटना के कई कोण हैं। लेखक एक ओर कांग्रेस पार्टी में व्याप्त ‘ब्राह्मणवाद’ को देखता है। दूसरी ओर इंदिरा गांधी को लेकर उसके मन में एक वैचारिक अंतर्विरोध है। उस दिन दिल्ली सचिवालय के उनके तमाम साथी जहां इंदिरा गांधी से मिलने के लिए आतुर थे, लेखक के मन में उनसे मिलने का कोई उछाह नहीं था। इंदिरा गांधी ने उस दिन हिंदी भाषा की सरलता की चर्चा की थी।

‘रागदरबारी’ के लेखक श्रीलाल शुक्ल के साथ विनोद दास का पारिवारिक संबंध था। दोनों एक ही मुहल्ले में रहते थे। उन्होंने लिखा है कि श्रीलाल जी रोज सुबह सैर पर निकलते थे। सुबह की सैर में जितना अपरिचय का अवलोकन है, उतना ही परिचय का सान्निध्य भी। एकदम भिनसारे श्रीलाल शुक्ल के ‘पांव किसी तरफ मुड़ सकते थे- चाहे वह हिंदी कवि लीलाधर जगूड़ी का घर हो, उर्दू के अफसानानिगार रामलाल का आशियाना हो, रंगकर्मी राकेश का घर हो, आलोचक वीरेंद्र यादव या कथाकार अखिलेश या विनोद दास का गरीबखाना हो।’

आज जब बड़े लेखक एक दूरी बनाकर गंभीर एवं विशिष्ट द्वीप बनते जा रहे हैं, श्रीलाल शुक्ल बतकही के लिए आतुर दिखते हैं। ऐसी बतकही के लिए बंगाल में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों एवं कलाकारों के नियमित ‘अड्डे’ रहे हैं। श्रीलाल शुक्ल मानते हैं, पसीना बहाकर ही अच्छी चीजें आती हैं।

रघुवीर सहाय विनोद दास के प्रिय कवि थे। उनकी गहरी रुचि फिल्म में भी थी। उन्होंने विनोद दास के कहने पर ‘आक्रोश’ फिल्म देखी और अपनी क्रिटिकल प्रतिक्रिया ‘दिनमान’ में दी- ‘आक्रोश’ फिल्म आदिवासियों के शोषण की कहानी बताई जाती है, पर उसे आदिवासियों को कहने नहीं दिया जाता है।’ इसमें सिर्फ तब का सच नहीं है, बल्कि आज का भी सच है। विनोद दास रघुवीर सहाय से सीखते हैं कि दुनिया और समाज को ऐसे भी देखा जा सकता है। विनोद दास कहते हैं, ‘रघुवीर सहाय का जीवन और साहित्य को तोलने-परखने के बुनियादी बाट हमेशा बराबरी, अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता और प्रेम रहे हैं। ऐसा शायद समाजवादी विचारों के प्रति खासतौर से राममनोहर लोहिया के निकट होने के कारण रहा होगा।’

‘आलोचक के सिरहाने’ में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह, ‘गद्य में कविता’ में प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा, ‘सज्जनता में ज्ञान की चमक’ में वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण के कई पक्षों पर विनोद दास बड़ी सहजता से कुछ कहने का प्रयास करते हैं। ये संस्मरण हमारे लेखकों के साहित्यिक एवं सार्वजनिक जीवन की ओर और अतीत की ओर नए तेवर के साथ ले जाते हैं।

विनोद दास बड़े साहस के साथ कहते हैं- अज्ञेय का ‘मैं’ हमेशा सुसंस्कृत और शालीन है तथा ‘अन्य’ हमेशा उच्छाड़, गलत और हास्यास्पद। ऐसे कितने लेखक हैं जो अपने समकालीन के साथ बैठकर असहमत हो सकते हैं!

केदारनाथ सिंह पर लिखे ‘याद आते हैं छीमी में रस की तरह’ संस्मरण में विनोद दास केदारनाथ जी की सौम्यता ऐर सहजता के कायल हैं। उनका कोलकाता और भारतीय भाषा परिषद से भी विशेष लगाव था।

‘छवि से अलग’ पुस्तक में अलग-अलग पृष्ठभूमि और मिजाज के लोगों पर काफी कुछ लिखा गया है। लासानी शानी में कथाकार गुलशेर खान शानी का जिक्र मिलता है।

‘एक सतत विद्रोही’, ‘लोकप्रियता की कहानी’, ‘बिना ताले का घर’, ‘पटना में कवि’, ‘आडंबरहीन गंभीर चेहरा’, ‘किताब की संगत’ और ‘कथाकार-संपादक का अक्स’ संस्मरण में क्रमश: मुद्राराक्षस, गौरीपंत शिवानी, अशोक सेकसरिया, अरुण कमल, वीरेंद्र यादव, विजय कुमार और अखिलेश को याद किया गया है। इन दिनों इतिहास से असंतोष ने स्मृतियों का महत्व बढ़ा दिया है, क्योंकि स्मृतियों में ऐसा बहुत कुछ होता है जिससे इतिहास की खाली जगहें भरती हैं।

‘किताबों से मित्रता के फूल खिलते हैं’ ऐसी धारणा रखने वाले लेखक विजय कुमार लेखक के परिचय के दिनों में भारतीय औद्योगिक विकास बैंक में वरिष्ठ अधिकारी थे। उन्होंने 20वीं सदी के विचारों पर केंद्रित ‘अंधेरे समय में विचार’ जैसी किताब लिखकर 20वीं सदी के प्रमुख विचारकों से हिंदी जगत को परिचय कराया है।

जिज्ञासा : इस पुस्तक में शामिल व्यक्तियों की परिचित छवि के बरक्स आपका लेखन किन अर्थों में अलग है?

विनोद दास : हम चीजों को फ्रेमों में देखने के अभ्यस्त होते हैं। लेखक को भी। हम उन्हें कई बार किसी एक खास विशेषण के कंबल के नीचे ढँक देते हैं जैसे शमशेर बहादुर सिंह को ‘कवियों का कवि’ और नागार्जुन को ‘जनकवि’ कहकर अक्सर उसके पूरे रचना व्यक्तित्व को पहचानने के लिए रास्ता अवरुद्ध कर देते हैं। इस तरह फ्रेम में बंधा व्यक्ति एक तस्वीर बन जाता है। ‘छवि से अलग’ पुस्तक में संकलित लेखक उस तस्वीर से अलग हैं। ये उन अपारदर्शी तस्वीरों  से भी अलग हैं जो पाठक लेखक की रचनाओं को पढ़कर अपने मन में बनाते हैं। ऐसे में ये लेख केवल व्यक्ति चित्र ही नहीं, कुछ अमूल्य क्षणों को पुनर्जीवित करने के लिए स्मृति के स्पंदनशील अभिलेख भी हैं।

जिज्ञासा : संस्मरण लेखन में निजी स्मृतियों के साथ सामाजिक परिवेश, कल्पना और इतिहास कितने जरूरी हैं?

विनोद दास : किसी भी संस्मरण के कई अर्थ स्तर हो सकते हैं। सामाजिक परिवेश और इतिहास से मुक्त होकर भी अच्छे संस्मरण लिखे गए हैं और उनके साथ भी। महत्वपूर्ण यह है कि संस्मरण लेखक पाठकों को क्या दिखाना चाहता है। किसी भी व्यक्ति या लेखक का जन्म और विकास एक सामाजिक परिवेश में होता है और उस समय का एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी होता है। अगर इन दोनों के साथ संस्मरण में अभिव्यक्ति हो तो संस्मरण में उसका व्यक्तित्व और भी अधिक पारदर्शी होकर, निखरकर सामने आता है। संस्मरण में अधिकतर कल्पना के लिए जगह नहीं होती। हां, संस्मरण को लिखने की शैली कल्पनाशील जरूर हो सकती है। इन लेखों में परिवेश भी है और तत्कालीन इतिहास भी। एकरसता से बचने के लिए शिल्प को बदलने की कोशिश भी।

जिज्ञासा : किसी रचनाकार को उनकी रचनाओं के जरिए जानना और साहचर्य में जानने में क्या फर्क है?

विनोद दास : बहुत फ़र्क होता है। यह फ़र्क उसी तरह होता है जैसे एक स्त्री घर में जब बर्तन साफ़ कर रही होती है या पोंछा लगा रही होती है तो वह पसीने से भीगी काफी अस्तव्यस्त और घरेलू रूप में होती है, लेकिन जब वह किसी उत्सव में सज-संवर कर जाती है तो उसका रूप एकदम अलग होता है। लेखन में एक चतुर लेखक कई बार अपनी जातीय, धार्मिक और वर्गीय पूर्वग्रहों को भाषा और शैली की ओट में छिपा लेता है, जबकि वह अपने जीवन व्यवहार में कई बार अपने लेखन के विपरीत होता है। इस किताब में शामिल ऐसे कई लेखक भी हैं।

जिज्ञासा :  ऐसा माना जाता है कि इतिहास से असंतोष ने ही संस्मरण के महत्त्व को बढ़ाया है। क्या यह सच है?

विनोद दास :  संस्मरण और इतिहास दोनों अतीत के अभिलेख हैं। संस्मरण में व्यक्तिगत दृष्टि प्रभावी होती है। इसमें संवेदना की भूमिका प्रमुख होती है जबकि इतिहास विभिन्न स्रोतों से अपने समय और समाज का वस्तुनिष्ठ आकलन करता है। पहले इतिहास में केवल सत्ता और शक्ति केंद्रों की चर्चा होती थी। अब इतिहास में एक ऐसी धारा विकसित हो रही है जो जन-इतिहास का अभिलेखीकरण करने के लिए उन स्त्रोतों को भी शामिल कर रही है जो आम जीवन से जुड़े हैं। आम आदमी के जीवन के बारे में ऐतिहासिक अभिलेखीकरण स्वल्प है। ऐसे में जीवनियां, डायरियां, आत्मकथाएं और संस्मरणों को भी इतिहास की स्रोत सामग्री के रूप में शामिल किया जाने लगा है। इस कारण संस्मरणों का अकादमिक स्तर पर भी शोध की दृष्टि से महत्व बढ़ा है।

 

पूर्वा भारद्वाज की नवीनतम पुस्तक ‘लय’ में जीवन की अनगिनत घटनाएं दर्ज हुई हैं। वे अपनी स्मृतियों में से बहुत कुछ बचा लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं और जीवन की छोटी से छोटी घटनाओं के महत्व को बड़ी सहजता से रेखांकित करती हैं। उनके संस्मरण पढ़ते हुए लगता है कि वे हमसे बतिया रही हैं।

यह पुस्तक तीन अनुच्छेदों के कुल 48 अध्यायों में फैली है। यह फैलाव सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक जीवन तक है। पाठकों को कई अवसरों पर लगता है कि यह हमारा सच है। ‘लय’ के बहाने ‘भव, भाव और अनुभव’ के कई शेड्स हैं। एक स्त्री के मन की खिड़कियों से झांकते ये अनुभव कथात्मक शैली में हैं।

पूर्वा भारद्वाज ‘दोस्ती’, ‘उदासी’, ‘लगना’, ‘धुंधलापन’, ‘सन्नाटा’, ‘पहचानना’, ‘हलकापन’ आदि पर विचार करती हैं। दोस्ती को एक मूल्य मानने वाली पूर्वा का मानना है कि दोस्तियां बहुत होती हैं और अलग-अलग तरह की होती हैं। जेंडर के कारण भी दोस्ती का स्वरूप बदलता है।  वे कहती हैं, ‘मानसिक दूरी आती है क्योंकि हमको यही सिखाया जाता है कि हमारे लिए दोस्ती नहीं, परिवार अधिक महत्वपूर्ण है। हम इसे खुशी-खुशी अपना भी लेते हैं क्योंकि हमें अच्छी बहू, अच्छी पत्नी, अच्छी मां का दर्जा चाहिए होता है।’ दोस्ती के बारे में पूर्वा का यह विचार बहुत हद तक अपने जीवन की कई स्मृतियों से निर्मित है। एक-दूसरे को समझना ही दोस्ती की बुनियाद है।

वे मानती हैं कि उदासी स्मृति या याद से अनिवार्यत: जुड़ी होती है। हिरोशिमा और वियतनाम के अलावा उनकी उदासी का एक मामला बामियान में बुद्ध की मूर्ति का तोड़ा जाना है। शामली में लगा शिविर, केनिया में हिंसा की खबर भी उन्हें उदास करती है। अक्सर हम मान लेते हैं कि परिचय के दायरे में आने वाली बातें ही हमें उदास करती हैं, हालांकि यहां हम देख सकते हैं कि दूर-दराज की अपरिचित चीजें भी हमें उदास कर जाती हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि उदासी का संबंध हमारी संवेदना से है।

‘लगना’ संस्मरण में वे मानती हैं कि जो हमें लगता है, जरूरी नहीं कि वह वास्तविक हो। कई बार जो हमें नहीं लगता वह दूसरे को लगता है। कहा जा सकता है कि लगना अवास्तविकता और वास्तविकता के बीच पुल है। वे कहती हैं, ‘औरतों को घर हो या बाहर लगता है कि वे सुरक्षित नहीं हैं, वह क्या है? मिजो भाषा बोलने वालों को दिल्ली आने पर जो अजनबी-सा लगता है वह क्या है? क्या सब लगना झूठ है? या सब लगना अतिरेक है?’

‘धुंधलापन’ में लेखिका जीवन को धुंधलापन की तरह मानती हैं। हमें उसको साफ करते रहने की कोशिश करनी चाहिए। धुंधलापन में कई बार कई चीजें बची रहती हैं। स्मृतियों के धुंधलेपन में कई यादें बनी रहती हैं। इसलिए हमें धुंधलापने से घबराना नहीं चाहिए। ‘सन्नाटा’ में वे कहती हैं, ‘सच पूछिए तो सन्नाटा खतरनाक होता है। इससे डरना चाहिए। इसमें आवाजाही करने की मनाही रहती है। उसका पालन किया जाना चाहिए। यदि नहीं तो नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहिए। मुंबई के शक्ति मिल में जाने का दुस्साहस करने वाले पत्रकार की ‘दुर्दशा’ आखिर इसलिए हुई न कि उसने सन्नाटे में जाने का खतरा मोल लिया था।’ वे सन्नाटा को ‘चुप्पी’ और ‘खामोशी’ का पर्याय नहीं मानतीं। उन्हें लगता है कि सन्नाटा के बरक्स हमें आवाज उठाते रहनी चाहिए।

‘अनुभव’ खंड में वे बर्तन को महज गृहस्थी का एक उपकरण नहीं मानतीं। बल्कि वे ‘बर्तन’ जैसी निर्जीव वस्तु को स्त्री प्रश्नों से जोड़कर देखती हैं। वे मानती हैं कि बर्तनों का इस्तेमाल भले स्त्रियां करती हों परंतु उन बर्तनों पर कभी घर के पुरुषों के नाम खुदे रहते थे! आजकल बर्तनों पर नाम लिखने का चलन जरूर घटा है। बर्तन और स्त्री को पर्याय के तौर पर देखने की दृष्टि अभी भी नहीं बदली है। लेखिका ने प्रतिरोध और गुस्से के इजहार के तौर पर बर्तन की भूमिका को रेखांकित किया है।

इस खंड में शामिल ‘प्रमाणपत्र’, ‘घर जाना है’, ‘यात्रा’, ‘सैर और दस्तरख्वान’, ‘आपबीती: जे.एन.यू.’, ‘छवि और दिल्ली पुलिस’, ‘हिंदी में काम’, ‘सिटकनी’ आदि संस्मरणों में वे अपनी आपबीती के जरिए कई अनकही बातों को कहने का साहस दिखाती हैं।

‘भव’ खंड में वे ‘बाबा’, ‘नाना जी’, ‘लता जी’, ‘पंडिता रमाबाई’, ‘सरस्वती’, ‘मां के नाम’, ‘रोटी’, ‘छड़ी और पापा’, ‘मौसी’ आदि संस्मरणों में वे अपने पुरखों और परंपराओं को याद करती हैं। इन संस्मरणों से गुजरने का अर्थ है सहज मन से सबकुछ कहना और सामाजिक दस्तावेजीकरण।

जिज्ञासा:  आज भव्यता और भाषा सौष्ठव को अच्छा लेखन का पर्याय माना जा रहा है। ऐसे में  सीधा, सहज और आत्मीय लेखन के समक्ष किस तरह की चुनौतियां हैं?

पूर्वा भारद्वाज: एक बार जब मैं बी. ए. में आर. के. नारायण को पढ़ रही थी, तब मेरे पापा ने मुझे कहा था कि अच्छी भाषा वही है जो सादा और स्पष्ट हो। प्रेमचंद हमारे सामने हैं। इसलिए मेरे लिए भव्यता सादगी से उपजती है, लच्छेदार प्रयोगों से नहीं। इसका कतई यह मतलब नहीं कि लच्छेदार, मुहावरेदार प्रयोग और सजी-धजी भाषा को मैं कमतर मानती हूँ। हाँ, सादगी को लोग फीकापन मानने लगते हैं, यह उचित नहीं लगता मुझे। वैसे आज भव्यता को श्रेष्ठता का पैमाना नहीं माना जाता है।

जिज्ञासा: आपने लिखा है ’सन्नाटा खतरनाक होता है। इससे डरना चाहिए।’ आम जीवन में इस तरह के सन्नाटे को आप किस रूप में देखती हैं?

पूर्वा भारद्वाज: यदि गलत का, अन्याय का विरोध न किया जाए और सन्नाटा तोड़नेवाली आवाज़ को दंडित किया जाए, तब चुप रहना अपराध से कम नहीं है। हम सबका दुर्भाग्य है कि भारत ही नहीं, दुनिया के स्तर पर डर से उपजा सन्नाटा बढ़ता जा रहा है।

जिज्ञासा: आज के युवा में एक ओर तेजी से जिम, रेसिंग, गेमिंग, नेटफ्लिक्स -अमेजन प्राइम  जैसी चीजों में रुचि बढ़ी है। दूसरी ओर, वे सामाजिक आंदोलन से दूर हो रहे हैं। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?

पूर्वा भारद्वाज: मैं अलग-अलग पृष्ठभूमि के युवाओं के साथ काम करती हूँ। उनमें एक छोटा हिस्सा सामाजिक आंदोलनों में लगा हुआ है। आंदोलनों में उसकी भागीदारी अलग-अलग तरीके से हो रही है। दुनिया को बदलने की इच्छा सबमें खत्म नहीं हुई है।

 

समीक्षित पुस्तकें

(1) छवि से अलग: विनोद दास, 2025, सेतु प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य–295 (2)  लय भव–भाव–अनुभव की: पूर्वा भारद्वाज, 2024, सेतु प्रकाशन, मूल्य –375

1, राम कमल रोड, पोस्ट-गरिफा, पिन-743166, उत्तर 24 परगना (प.बं.) मो.9331075884

 

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