कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।

हिंदी पत्रकारिता के मीडिया बनने की यात्रा दो सौ वर्षों के बौद्धिक एवं सामाजिक चेतना के विकास का आख्यान है। ‘उदंत मार्त्तंड’ का प्रकाशन औपनिवेशिक परिवेश में 30 मई 1826 को नवजागरण के प्रमुख केंद्र कलकत्ता में हुआ था। एक समय पत्रकारिता कर्म एक मिशन था, आज वह पूरी तरह एक उद्योग है। पत्रकारिता के मिशन से मीडिया उद्योग बनने की पृष्ठभूमि में कई घटनाएं एवं बदलाव हैं, जिनपर द्वि-शताब्दी के अवसर पर चर्चा शुरू होनी चाहिए।

हिंदी पत्रकारिता का जन्म ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेतु’ हुआ था, जबकि आज मीडिया का हित बड़े राजनीतिज्ञों-व्यापारियों के हित से जुड़ गया है। पत्रकारिता की इस यात्रा को संपादक से प्रबंधक बनने की यात्रा के तौर पर भी देखा जा सकता है।

हिंदी पत्रकारिता का आरंभ भारतीय राष्ट्र की स्वत्व चेतना, सांस्कृतिक जागरण तथा राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की भावना के साथ हुआ था। ‘उदंत मार्त्तंड’ से लगभग पांच दशक पहले जेम्स आगस्ट हिकी के द्वारा पत्रकारिता की शुरुआत एक लोकतांत्रिक एवं न्यायपूर्ण दृष्टि के साथ हो चुका था। उसके बंगाल गजट (1780) अथवा ‘केलकटा जनरल एडवरटाइजर’ का प्रकाशन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि इस पत्रिका ने निडरता, निष्पक्षता और न्याय का दृष्टांत रखा। आज मीडिया ने ‘लोक की वाणी’ और ‘सत्य’ की प्रतिष्ठा की जगह सत्ता और पूंजी की गोद चुन ली है। बहुत कम ऐसे पत्रकार और पत्र-पत्रिकाएं बची हैं, जहां हिकी सा साहस और युगल किशोर सुकुल जैसी व्यापक दृष्टि है।

‘उदंत मार्त्तंड’ ने अंग्रेजी शासन और भारतीय समाज में व्याप्त अन्याय, अज्ञानता और अंधविश्वास के अंधेरे को भेदने का प्रयास किया था।

उस दौर में वारेन हेस्टिंग्स ने पत्रकारों का मनोबल तोड़ने के लिए कई पत्रों से डाक की सुविधा छीन ली थी। यह आज्ञा भी निकली कि छपने से पहले समाचार पत्र सरकार को दिखा दिया जाए। आजादी के बाद भी आपातकाल के समय सेंसरशिप ने पत्रकारिता का मनोबल तोड़ना चाहा था। आज फिर डाक खर्च में वृद्धि करके, सरकारी विज्ञापनों के जरिए दबाव बनाकर और कॉर्पोरेट घरानों द्वारा मीडिया पर आधिपत्य के बल पर सच का गला घोंटा जा रहा है। इन दिनों हाशिए की आवाज़ें सत्ता, वित्तीय पूंजी और बाजार के ठगबंधन से दबती जा रही हैं। दूसरी ओर, सोशल मीडिया अफवाह, सनसनी, उन्माद और उत्तेजना के बीच फंसा हुआ है।

हिकी से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर रघुवीर सहाय, राजेंद्र माथुर, प्रभास जोशी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, राजकिशोर जैसे पत्रकारों ने जिस तरह सत्ता तंत्र के यथार्थों को दिखाने का काम किया, आज वैसी आंख वाले पत्रकार कहां हैं? जो थोड़े हैं, अलग-थलग हैं। अधिकांश मीडिया वाले सामाजिक सच से आंख मूंद लेते हैं। वे ‘अर्धसत्य’ और ‘प्लांटेड खबर’ परोस रहे हैं।

1990 के उदारीकरण और आर्थिक सुधारों के साथ मीडिया के नए रूप ने बाजार की शक्ति अर्जित कर ली। यही वह समय है जब पत्रकारिता अपने लोक कल्याणकारी स्वरूप से कटने लगी। पहले अखबारों में साहित्यिक पृष्ठ होते थे। सुरुचिपूर्ण रचनाओं से पाठकों का सरोकार था। समाचार पत्र पाठकों की दृष्टि में ‘क्रिटिकल एंगल’ पैदा कर रहे थे। वह दौर रचनात्मक पत्रकारिता का था, जहां असहमति एवं संवाद की गुंजाइश थी। पत्रकार जन मुद्दों के साथ खड़े थे। वे निरंकुशता की आलोचना कर सकते थे। छोटी-छोटी जगहों की आवाजें भी मुखर थीं। यह एक विडंबना है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ पत्रकारिता संसार की उदारता समाप्त हो गई और व्यापारिक कट्टरता छा गई।

ज्ञान और सूचना के बड़े केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी हिंदी पत्रकारिता इस समय राजनीतिक उद्योग है। मीडिया का इस नए रूप में तेजी से विस्तार होने लगा है। 1990 के बाद जो एक बड़ा बदलाव आया- वह था मीडिया में बड़े कॉर्पोरेट घरानों का निवेश। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण मीडिया उद्योग का नया विस्तार हुआ।

1990 के पहले प्रिंट मीडिया उद्योग का अधिकांश हिस्सा निजी एवं पारिवारिक स्वामित्व वाले कारोबार की तरह था। 2013 में प्रकाशित फिक्की के पी.एम.जी. रिपोर्ट के अनुसार 2012 में मीडिया उद्योग में 821 अरब का व्यापार हुआ जो 2011 से 13% ज्यादा था। 2023 में 8.1% वृद्धि के साथ यह व्यापार कुल 2.32 लाख करोड़ रुपये का हो गया और 2026 तक अनुमानित व्यापार 3 लाख करोड़ रुपये का बताया जा रहा है। गौर करने वाली बात एक यह भी है कि 2020-2024 के बीच सूचना एवं प्रसारण क्षेत्र में एफ.डी.आई. के जरिए 74,309 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

भारत में मीडिया को प्रथमतः उद्योग का रूप प्रदान करने का श्रेय बेनेट कोलमैन को जाता है, जो टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स जैसे प्रमुख राष्ट्रीय अखबारों का प्रकाशक है और ‘टाइम्स नाउ’ टीवी चैनल चला रहा है। 2005 में बेनेट कोलमैन ने एक व्यापारिक पहल शुरू की जिसके अंतर्गत इच्छुक विज्ञापनदाता कंपनियों को अपने विज्ञापन छपवाने के लिए नगद राशि देने की जगह यह प्रस्ताव रखा गया कि आपको अपनी कंपनियों में हमें शेयर दें। 2005 में बेनेट कोलमैन ने वीडियोकॉन और काइनेटिक मोटर्स सहित 10 कंपनियों को शामिल किया। 2008 तक 175-200 कंपनियों के साथ समझौता हो गया। इस तरह 2005 में 15-20 करोड़ के निवेश के साथ आरंभ हुआ यह व्यापार 2008 में लगभग 4000 करोड़ रुपयों तक पहुंच गया।

इसका नतीजा यह हुआ कि मीडिया कंपनी दूसरी व्यापारिक कंपनियों में हिस्सेदार बन गई और हिस्सेदार बनने पर आमतौर पर कंपनियों के हित में काम करना उनकी प्राथमिकता बन गई। मीडिया ने पूंजी बढ़ाने के लिए पत्रकारिता के उद्देश्यों से हटकर मुना़फे को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया।

इन दिनों भारतीय मीडिया उद्योग में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि देश के दो बड़े औद्योगिक समूह- अंबानी का ‘रिलायंस’ और अडानी का ‘अडानी समूह’ मनोरंजन और समाचार मीडिया में सबसे बड़ी पूंजी लगाने वाले हो गए हैं। आज दर्जनों बड़ी और मझोली मीडिया कंपनियां शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। हिंदी क्षेत्र की तीन बड़ी समाचार मीडिया कंपनियों- दैनिक जागरण समूह और दैनिक भास्कर की मूल कंपनियों की शेयर बाजार पूंजी क्रमशः – 2151 करोड़ और 4773 करोड़ रुपये है। हिंदी टीवी न्यूज़ चैनलों की बाजार पूंजी इस प्रकार है- नेटवर्क 18 (रिलायंस समूह)- 8011 करोड़, एनडीटीवी (अडानी समूह)- 1286 करोड़, टीवी टुडे (आजतक और इंडिया टुडे)- 896 करोड़, जी मीडिया (जी न्यूज़)- 705 करोड़ रुपये।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया में पूंजी के बढ़ते निवेश ने समाचार केंद्रों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वामित्व और नियंत्रण में ला दिया। बड़ी कंपनियों ने छोटी कंपनियों को खरीद लिया। सूचना, समाचार एवं मनोरंजन उद्योग पर 10 से भी कम देशी-विदेशी कंपनियों का दबदबा है। मीडिया का नया स्वरूप परंपरागत मीडिया और बाजार की बहुलता को खत्म कर रहा है।

एक समय हिंदी पत्रकारिता में पूंजीवाद-आधारित पश्चिमी सभ्यता की आलोचना थी, जबकि आज उसका अभिनंदन है। ऐसे में मीडिया में हाशिए के लोगों की आवाज के लिए कितनी जगहें हैं? मीडिया के कॉर्पोरेटीकरण ने पत्रकारों की जनप्रतिबद्धता, ईमानदारी, निर्भयता आदि को कितना प्रभावित किया है, इसपर व्यापक विमर्श की जरूरत है।

एम महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी समाचार पत्रों को किस हद तक प्रभावित किया है। देखा जा रहा है कि हिंदी के कई समाचार पत्र इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रमुखता पाए समाचारों से प्रभावित रहते हैं। मीडिया पर दिनभर चलने वाली खबरों ने समाचार पत्रों को बासी खबरें परोसने के लिए बाध्य कर दिया है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि यह तत्काल अपडेट देता है और इसकी पहुंच व्यापक होती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरों पर सोशल मीडिया पर चर्चा के अवसर तत्काल बन जाते हैं। बहुत आसानी से लोग कनेक्ट होकर इसपर चर्चा करते हैं। जबकि  समाचार पत्रों की खबरों पर त्वरित  सोशल इंटरेक्शन संभव नहीं हो पाता।

आज शक्ति का अर्थ सूचना पर नियंत्रण से लिया जाता है, यानी आज वे लोग ज्यादा शक्तिशाली हैं, जिनके पास अधिक सूचनाएं हैं। आज जिन देशों के पास सटीक और ज्यादा सूचनाएं हैं वे शक्तिशाली हैं। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका ने अपने सूचना तंत्र को इतना विकसित कर लिया है कि उसे लड़ने के लिए युद्ध के मैदान में नहीं जाना पड़ रहा है। वह अपने स्पेस रूम में बैठकर लड़ रहा है।

हाल में उसने सूचना के आधार पर ईरान के बंकर (एटॉमिक ठिकाने) को चिह्नित कर ई-2 बमबारी द्वारा उसे नेस्तनाबूद कर दिया।

कृत्रिम बुद्धि (एआई) ने भी हमारी मौलिकता, कल्पनाशीलता और संवेदनशीलता को प्रभावित किया है। इन दिनों पत्रकारिता और मीडिया के क्षेत्र में उसके प्रवेश पर विभिन्न मत हैं। क्या वह पत्रकारों को एक हद तक रिप्लेस कर देगा? नौकरियों जाएंगी।

एक उदाहरण यह है कि जिन 25 लोगों ने मिलकर एआई के जरिए एक फर्म खोला था, कुछ दिनों बाद उसी एआई ने सबसे पहले यह फीडबैक दिया कि उनमें से 20 लोगों की अब जरूरत नहीं है। उसने बनाने वाले को ही सबसे पहले बेरोजगार कर दिया! एआई भस्मासुर की तरह है।

आज की युवा पीढ़ी का अधिकांश समय मनोरंजनपरक रील्स और वीडियो देखने में बीत रहा है। एक समय लोग सुबह अखबार खोजते थे। आज वे उठते ही मोबाइल उठाते हैं। आज के युवा के सामाजिक सरोकार कम हुए हैं। सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ने के कारण वे सामाजिक जीवन से कटने लगे हैं। चार लोग मिलने पर भी बात करने की जगह अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। वे वस्तुतः परंपरा, इतिहास और अध्ययनशीलता से कटते जा रहे हैं।

हम सभी के सामने प्रश्न है कि समाचारों की विश्वसनीयता कितनी है, राजनीतिक एवं सामाजिक मूल्यों में कैसी गिरावट आई है, जन सरोकार के प्रश्नों की अनुपस्थिति के क्या कारण हैं? क्या नई पीढ़ी में समाचारों को लेकर अरुचि पैदा हुई है?

मुख्यधारा के मीडिया के बरक्स वैकल्पिक मीडिया कितनी क्षतिपूर्ति कर सकता है, इसपर विचार किया जाना चाहिए। डिजिटल प्रगति मीडिया को अंततः कहां पहुंचाएगी? सोशल मीडिया के दौर में ‘सिटीजन जर्नलिज्म’ का उदय हुआ है, यह क्या भूमिका निभा सकता है? अब हर शहर, गली, मोहल्ले में न्यूज पोर्टल खुल गए हैं। मोबाइल और कैमरा लेकर दौड़ते-भागते हजारों जर्नलिस्ट अपने-अपने इलाके के अखबार हैं। यूट्यूब चैनल, ब्लॉग, पॉडकास्ट, फेसबुक पेज, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, लाइव स्ट्रीमिंग आदि के जरिए सैकड़ों खबरें प्रसारित एवं प्रचारित हो रही हैं। क्या इन्हें मुख्यधारा के मीडिया के विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है?

हाल में बांग्लादेश और नेपाल के आंदोलन के मूल में वैकल्पिक मीडिया के प्रभाव को आंका जाता है। क्या वैकल्पिक मीडिया अराजक एवं दिशाहीन हो जा सकता है?

हिंदी पत्रकारिता के मीडिया बनने की यह यात्रा जितनी लंबी है, आज उतने ही भयानक मोड़ पर है। इसपर व्यापक चर्चा की जरूरत है।

हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आसान नहीं रही है। इस यात्रा में हिंदी के लेखकों, संपादकों एवं पत्रकारों ने कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया। आज हिंदी पत्रकारिता कहां खड़ी है, यह देखने की जरूरत है। हमारा नैतिकता दायित्व बनता है कि हम हिंदी पत्रकारिता की विरासत को बचाएं। कहना न होगा कि हिंदी ही नहीं संपूर्ण भारतीय पत्रकारिता को नए युग की जरूरत के अनुसार मानवीय, लोकतांत्रिक एवं अंतरजातीय होने की जरूरत है।

सवाल :
(1) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले हिंदी पत्रकारिता की दीर्घ परंपरा में उसकी कौन-सी उपलब्धि आपको ज्यादा आकर्षित करती है?
(2) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी समाचार पत्रों पर कैसा असर डाला, इनके चरित्र में क्या फर्क आया है?
(3) क्या हम ‘सूचना ही शक्ति है’ से ‘शक्ति ही सूचना है’ के युग में आ चुके हैं? दुनिया में मीडिया की स्वायत्तता क्यों बच नहीं पा रही है और ‘चौथा खंभा’ क्यों जर्जर है?
(4) आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास मीडिया को किस तरह प्रभावित कर सकता है?
(5) क्या नई पीढ़ी में समाचारों की भूख खत्म हो रही है और वे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं से विमुख हो रहे हैं? समाचार पत्रों के सम्मुख आज प्रधान संकट क्या है?
(6) वैकल्पिक मीडिया के विभिन्न रूप कितने अर्थपूर्ण हैं और इनका क्या भविष्य है?

 

अशोक वाजपेयी

 वैकल्पिक मीडिया सच, ईमान और साहस के वाहक हैं

हम सिर्फ लोकतंत्र में लगातार हो रही कटौतियों और संकोच के अंधेरे समय भर में नहीं हैं, हम हिंदी पत्रकारिता के अधःपतन के कलियुग में भी, दुर्भाग्य से, हैं। यह अधःपतन इतना व्यापक है कि हिंदी पत्रकारिता की किसी उपलब्धि को याद करना व्यर्थ और कठिन लगता है। इस अधःपतन में हिंदी का ज्यादातर मीडिया अपना नैतिक विवेक और तेज, अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी और जवाबदेही, सचाई को सामने लाने के अपने स्वभाव से पूरी तरह विरत हो चुका है। इस समय वह मुदित मन झूठ-घृणा-हिंसा-अत्याचार-भेदभाव फैलाने में व्यस्त एक बेहद बाजारू माध्यम है जो प्रायः सत्ता की अंधभक्ति में पूंछ हिलाऊ वफादारी में लगा हुआ है। यह मीडिया अपनी अनैतिक लोकप्रियता, अपने लोकतंत्र से विश्वासघात और बाजारूपन से संपन्न उसे पोसनेवाली दौलत की ही तरह अश्लील हो चुका है। अगर हिंदी समाज में आज धर्मांधता, सांप्रदायिकता, हिंसा-हत्यारी मानसिकता, जातिवाद आदि का बोलवाला है तो उन्हें फैलाने और लोकप्रिय बनाने में हिंदी मीडिया की बड़ी सक्रिय और निर्णायक भूमिका है।

हिंदी मीडिया इस समय भारत का सबसे बड़ा, साधनसंपन्न और प्रभावशाली मीडिया है। उसने हिंदी भाषा को विकृत करके उसे झगड़े-झांसी, गाली-गलौज, झूठ और घृणा की लगभग राजभाषा ही बना दिया है। यह आकस्मिक नहीं है कि व्यापक रूप से उसकी हिंदी में लिखे जा रहे साहित्य और हिंदी अंचल में सक्रिय कलाओं में जरा भी दिलचस्पी नहीं रह गई है। करोड़ों और लाखों की संख्या में बिकनेवाले हिंदी अखबारों में एक भी नहीं है जिसे सचाई, वस्तुनिष्ठता, लोकतांत्रिकता, भद्र संवाद, निष्पक्ष विश्लेषण और प्रामाणिक खबरों के लिए पढ़ा जा सके। भारत की अन्य भाषाओं में यह स्थिति नहीं है।

सारी सूचना खतरे में और लगातार अप्रामाणिक होती जा रही है। सूचना का शक्ति होना अब बीत चुका है ः इस समय तो हिंदी मीडिया के लिए शक्ति ही सूचना है। यह हर रोज अनैतिक उत्साह से सूचनाएं दबाता और गलत सूचनाएं परोसता रहता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में मैं ज्यादा नहीं जानता। इतना जरूर लगता है कि जो मीडिया मनगढ़ंत सूचनाएं गढ़ने में व्यस्त और बड़ी मेहनत करता रहा है, उसे शायद ऐसी सूचनाएं गढ़ने में अब और तकनीकी आसानी हो जाएगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आर्टिफिशियल सूचना चोर-चोर मौसेरे भाई होंगे।

नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा, विभिन्न कारणों से, सचाई से, समाज से, लोकतंत्र से ऊब रहा लगता है। उसे समाचार और सूचना की कोई जरूरत नहीं लगती। हिंदी अंचल में जिस तरह लगभग रोज ज्ञान की अवमानना और अज्ञान का महिमामंडन हो रहा है, इसके चलते युवा वर्ग को अब ज्ञान की भी जरूरत नहीं रह जाएगी।

समाचारपत्र, अधिकांश इन दिनों, पाठकों से नहीं दौलत और विज्ञापन से चलते हैं। अपना पाठकवर्ग कम होने से वे संकट में नहीं पड़ेंगे। संकट तब आएगा जब राजनीति बदलेगी। तब वे सत्ता की चापलूसी का नया संस्करण आगे कर देंगे।

लोकतंत्र की बुनियादी परिकल्पना में विकल्प, उनकी उपस्थिति और उपलब्धता हैं। इसलिए भी इस समय वैकल्पिक मीडिया का महत्व और जरूरत दोनों हैं। वे हैं, यह हमारा, सजग नागरिकता का और स्वयं लोकतंत्र का सौभाग्य है। उनकी साहसिक मुखरता, ईमान और सच बोलने की हिम्मत इस मुकाम पर निर्णायक भूमिका निभा रही है। लगता यह है कि उनसे समान्य लोगों में लोकतांत्रिक चेतना और सजगता का विस्तार हो रहा है। वे खासा जोखिम उठा रहे हैं। अगर लोकतंत्र बना रहा तो वे बने रहेंगे। वे बने रहें और सच-ईमान-साहस के वाहक और प्रवक्ता रहें, यह हमें अपने भविष्य के लिए जरूरी लगता है।

सी-60,  अनुपम हाउसिंग सोसायटी, बी-13, वसुंधरा एन्क्लेव, नई दिल्ली-110096   मो. 9811515653

वैभव सिंह
सुपरिचित रचनाकार और आलोचक। पुस्तकें : ‘कहानी : विचारधारा और यथार्थ’, ‘रवींद्रनाथ टैगोर : उपन्यास, स्त्री और नवजागरण’,  ‘जवाकुसुम’ (कहानी संग्रह), ‘अनुमतिपत्र’ (उपन्यास)।

आज कई मीडिया विकल्प हैं
पर उनकी विश्वसनीयता कम हो गई है

(1) आज जिसे मीडिया कहा जाता है, उसे दो दशक पहले तक मुख्यतः पत्रकारिता कहा जाता था। तब रेडियो-टीवी की लोकप्रियता के बावजूद पत्रकारिता मुद्रित कागज और मुद्रित संप्रेषण पर आधारित थी।

मीडिया शब्द में ‘माध्यम’ का अर्थ निहित है जबकि पहले माध्यम के स्थान पर पत्र-पत्रिकाओं के छपने, उसके वितरित होने तथा उसमें निहित विचारों-समाचारों का महत्त्व था। इसीलिए अंग्रेजी में ‘जर्नलिस्ट’ शब्द, जो जर्नल (पत्र) से बना है, अधिक प्रचलित था और टीवी-रेडियो से जुड़े लोग भी जर्नलिस्ट कहलाते थे।

नई तकनीक ने समाचार, सूचना, संप्रेषण, अभिव्यक्ति आदि की कोडिंग व प्रस्तुति को व्यापक रूप प्रदान किया। इसने मास मीडिया जैसी शब्दावली को जन्म दिया। लेकिन ‘पत्रकार’ शब्द से वे लोग भी स्वयं को सम्मानित अनुभव करते हैं जिन्हें न पत्र से मतलब है, न पत्रकारिता से। यानी पत्रकारिता या पत्रकार शब्द ने जितना सम्मान अर्जित किया, उतना सम्मान मीडिया परसन, एंकर या न्यूज रीडर ने अर्जित नहीं किया है और न कर सकते हैं।

जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहा जाता है, वह नब्बे के दशक से अधिक लोकप्रिय हुआ। उसके पहले जो पत्रकारिता थी, उसमें भी सब अच्छा न था, न ही सबकुछ बुरा था। उसका सबसे आकर्षक पहलू यह था कि उसमें भाषा के प्रति विवेकवान बनाने की चिंता निहित थी। राजनीति, अर्थशास्त्र व संस्कृति की विशिष्ट शब्दावली को घर-घर तक पहुंचाने में उस दौर की पत्रकारिता की ही भूमिका थी। व्याकरण, वर्तनी, शब्द आदि को लेकर संपादकों के ज्ञान का सम्मान था।

अखबार के दफ्तरों में छोटे-बड़े पुस्तकालय होते थे जो भाषा व साहित्य के ज्ञान के लिए उपयोगी सामग्री जुटाने में सहायक थे। खेल, संस्कृति, साहित्य, अर्थशास्त्र, घरेलू चिकित्सा, राजनीति, कला, सिलाई-कढ़ाई सभी के बारे में सामग्री को एक जगह एक ही अखबार में प्राप्त किया जा सकता था। इस कारण भाषा में विविधता का भी ख्याल रखा जाता था, तथा पाठक के मन में भी बहुविध क्षेत्रों की बहुविध भाषा का ज्ञान बढ़ता था।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस भाषिक विविधता को लगभग नष्ट कर दिया है। विगत एक दशक में एक नए किस्म के शासन-तंत्र ने अपनी सत्ता की किलेबंदी के लिए उस पारंपरिक पत्रकारिता को निष्प्रभावी बनाने में काफी प्रयास किए हैं जो जनकल्याणकारी राज्य के मूल्यों तथा सत्ता से जवाबदेही की संस्कृति के बीच विकसित हुई थी। इस तरह एक अधिक उग्र, अधिक मिथ्यावादी, अधिक कर्कश मीडिया का उदय हो गया।

अब मीडिया व राजनीति एक-दूसरे के विकृत पर्याय भर हो गए हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश हिस्सों में सारे समय राजनीति का ही बेसुरा राग अलापा जाता है, जैसे कि राजनीति के अतिरिक्त जीवन में कुछ शेष रह ही नहीं गया है। पहले की पत्रकारिता पर अत्यधिक मनगढ़ंत बातों, मिथ्या-सूचना, पोस्ट-ट्रुथ या चौबीस घंटे वाले अतिउत्पादन का दबाव कम था। इसलिए कम विकल्प होते हुए भी अधिक विश्वसनीय सामग्री प्राप्त हो सकती थी।

आज विकल्प तो बहुत हैं, पर विश्वसनीय सूचना प्राप्त करने के स्रोतों में कृत्रिम ढंग से कटौती कर दी गई है। मुक्तिबोध ने अपने निबंध समाज और साहित्य में लिखा है- ‘अपने आदिकाल से लेकर तो आजतक मनुष्य अपनी भूख-प्यास, कामवृत्ति आदि की पूर्ति न केवल समाज के भीतर करता आया है, वरन समाज के द्वारा उन्हें परिपूर्ण व सुसंस्कृत भी करता रहा है।’ इस कथन के आलोक में हम ये पूछ सकते हैं कि क्या मीडिया भी केवल भ्रष्ट वर्गों की आकांक्षाओं को सुसंस्कृत व स्वीकार्य बनाने में योगदान तो नहीं दे रहा है?

(2) पत्रकारिता का फिल्मी ग्लैमर और तड़क-भड़क से सीधा संबंध पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और फिर इंटरनेट के आगमन के बाद स्थापित हुआ, क्योंकि दृश्यात्मकता अपने में विशेषता बन गई। छवियों, तस्वीरों, साजसज्जा, तेज गति आदि का आगमन हुआ। परंपरागत हिंदी पत्रकारिता नए जमाने की पत्रकारिता की शैली के आगे वैसे ही पिछड़ती दिखी जैसे विष्णु के छठे अवतार परशुराम आगे चलकर उनके सातवें अवतार राम के आगे निस्तेज हो गए। लेकिन मिथकीय तुलना को यदि गंभीरता से न लेकर वास्तविक विश्लेषण करें तो यह अवश्य लगता है कि हिंदी पत्रकारिता ने अपने कई श्रेष्ठ लक्षणों को गंवा दिया है।

सबसे पहले संपादक नामक प्राणी को विलुप्त किया गया और अब रिपोर्टर को लगभग समाप्त किया जा रहा है। एक समय पत्रकारिता की चर्चा होने पर पंडित जुगल किशोर सुकुल (उदंत मार्त्तंड), प्रेमचंद (हंस, जागरण) बाबूराव विष्णु पराड़कर (आज), रघुवीर सहाय (दिनमान), राजेंद्र माथुर (नवभारत टाइम्स), अच्युतानंद मिश्र (जनसत्ता, अमर उजाला) प्रभाष जोशी (जनसत्ता) आदि का नाम सहज ही याद आता था, पर अब किसी अखबार या चैनल में संपादक को केवल तकनीकी कारणों से रखा जाता है, बाकी उसे महान तो क्या साधारण पत्रकारिता के लिए भी छूट नहीं प्रदान की जाती। हिंदी पत्रकारिता ने साहित्य की कई विधाओं जैसे लघुकथा, रिपोर्ताज, कविता, सुंदर व संक्षिप्त जीवनी, साक्षात्कार, वैज्ञानिक कथा आदि को विकसित किया था। पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की असीमित, गैर-नियंत्रित और कुसंपादित दुनिया ने इन्हें हाशिए पर फेंक दिया।

यदि शिकायती पत्र लिखने को भी आम जनता की महत्वपूर्ण रचनात्मकता मानें, जो पहले बड़े पैमाने पर अखबारों में छपते थे, तो ऐसे शिकायती पत्र भी अब कम ही प्रकाशित होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सायंकालीन पत्रकारिता को लगभग समाप्त कर दिया है। पहले कई अखबारों के सायंकालीन संस्कारण छपते थे जो बड़े शहरों के प्रमुख चौराहों पर बिकते थे। उनमें अत्यधिक उत्तेजनापूर्ण शीर्षक बनाए जाते थे जो कई बार हास्यापद होते थे, पर वे पत्रकारिता के एक पूरे दौर का अहम अंग थे।

(3) ‘शक्ति ही सूचना है’ जैसा विचार सत्य के काफी निकट है। सत्ता में बैठे लोगों ने अब मीडिया से जुड़ने, उसे सरकारी नीतियों व मतंव्यों के बारे में सूचित करने, अपने साथ देश-विदेश के दौरों में ले जाने तथा प्रेस-कॉन्फ्रेंस के तौर-तरीके बदल डाले हैं। मीडिया विशेषज्ञ सेवंती निनान ने अपने एक लेख में लिखा है- ‘इस विचार को अब सिर के बल खड़ा कर दिया गया है कि सरकार को मुख्यधारा की पत्रकारिता की आवश्यकता है। अब यह माना जाता है कि कथित मुख्यधारा की पत्रकारिता को अपने बड़े-बड़े प्रायोजित कार्यक्रमों में सरकार यानी प्रधानमंत्री व मंत्रियों की आवश्यकता होती है और यदि सरकार को नाराज किया गया तो सरकार व उसका पूरा अमला ऐसा कमाई करने वाले प्रायोजित कार्यक्रमों का बहिष्कार कर सकते हैं।’ ‘मन की बात’ को अब सारे मीडिया संस्थानों को एक साथ दिखाना ही पड़ता है और इसे किसी राष्ट्रीय महत्व की घटना की तरह प्रस्तुत करना पड़ता है।

यानी जो शक्तिशाली सत्ता है, वह अपने विचारों, नीतियों व विचारधारा को अधिक गैर-जनतांत्रिक तरीकों से आम जनता पर थोप सकती है। अभिव्यक्ति की आजादी केवल सरकार के पास सिमटकर रह जाती है, बाकी जनता को कभी-कभी अनुच्छेद उन्नीस (ए) की याद आती है तो उसे अबोध शिशु समझकर उससे कहा जाता है कि उसे कम बोलने, कम सोचने तथा कम प्रश्न पूछने की आदत डालनी चाहिए।

‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की रपट दिखाती है कि दुनिया में प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत बहुत दयनीय स्थिति में है। 180 देशों में 151 नंबर पर। इसपर कोई व्यापक बहस या चिंता देखने को नहीं मिलती। यह अब यथार्थ है कि बड़े सेठों द्वारा शेयर खरीदने व पूंजी निवेश के कारण पत्रकारिता के अधिकांश ताकतवर संस्थान अपनी स्वतंत्रता की परवाह नहीं करते। एक अजीब स्थिति पैदा हो चुकी है कि जो सूचना-जगत में कारोबार कर रहे हैं, उन्हें पत्रकारिता तथा मीडिया की स्वतंत्रता की चिंता नहीं है और जिन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता की सर्वाधिक आवश्यकता है वे स्वयं सरकार व सूचना-उद्योग के गठबंधन के कारण हताशा में कुछ कह या बोल नहीं सकते हैं।

(4) जिसे हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहते हैं, उसका मानना है कि मशीन अब मानव मस्तिष्क से अधिक तीव्र गति से ही कार्य नहीं करती  बल्कि गुणात्मक रूप से भी अधिक सफल है, तथा वह अधिक रचनात्मक भी हो सकती है। पहले यह माना जाता था कि मशीन केवल आंकड़ों, सूचनाओं, व ज्ञान का मात्रात्मक रूप से अधिक तेजी से उत्पादन कर सकती है। अब एआई यानी मशीन कहानी, निबंध, कविता लिख सकती है तथा कई जटिल प्रश्नों का अधिक बुद्धिमानी से भरा उत्तर प्रदान कर सकती है।

इन दिनों मशीन लर्निंग को ही ज्ञान संग्रहण का माध्यम माना जा रहा है और इसका असर मीडिया पर यह पड़ा है कि वहां बहुत अधिक गतिशीलता तो दिखती है, पर अधकचरी रचनात्मक की बाढ़ आई हुई है, क्योंकि मशीन और उसके उत्पाद उदात्त, महान या गहनता नामक गुणों से वंचित है। टेलीविजन से लेकर मोबाइल तक की स्क्रीन बहुत कुरुचिपूर्ण रंगों से भरी दिखती है। मशीन के साथ समस्या यह है कि वह बहुत अधिक गंभीर भावों व संवेदना, विचारधारा, अनपेक्षित परिवर्तनों आदि को नहीं समझ सकती। एआई के बढ़ते उपयोग के कारण सूचना तो तुरंत जुटाई जाती है पर पत्रकारिता में गंभीर भावों-संवेदना, विचारधारा व परिवर्तनों के प्रति सजगता का ह्रास दिखाई पड़ता है।

(5) समाज में विचार की घटती भूमिका ने समाचार की भूमिका को भी घटाया है। समाचार जब बहुत अधिक विचारहीन, पक्षपातपूर्ण तथा राजनीति से बोझिल हो जाएं तो उनके बारे में लोगों की रुचि  समाप्त होने लगती है। इसी से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि जब समाज का वैचारिक विकास हो रहा होता है, तब समाचार की संस्कृति का भी विकास होता है। तब लोग वास्तव में सरकार की नीतियों, नौकरशाहों की गतिविधियों आदि के बारे में जानना चाहते हैं। समाज का वैचारिक पतन समाचारों के पतन में प्रकट हो सकता है।

लेखक होने के साथ संपादक भी रहे अज्ञेय जी ने लिखा है-‘जितना ही समाज स्वस्थ या बीमार, स्वतंत्र या परमुखापेक्षी होता है, उतने ही उसके समाचारपत्र भी स्वस्थ या बीमार, स्वतंत्र या परनिर्भर होते हैं।’ लोगों में समाचार की भूख अभी भी है, पर उन्हें समाचारों से विमुख किया जा रहा है ताकि आम जनों को यथार्थ-विमुख रखा जाए। उनकी चेतना को स्वस्थ ढंग से परिवर्तनकामी बनने तथा घटिया परिवर्तनों के प्रति सजग होने से रोका जाए। उनमें किसी प्रकार के आलोचनात्मक विवेक का विकास न हो सके।

पिछले दिनों कुंभ के मेले की खबरों से देश को डुबो दिया गया, पर वास्तव में कुंभ में जिस प्रकार की परेशानियां, दुर्घटनाएं व बदइंतजामी हुई, उसके बारे में समाचार सेंसरशिप का शिकार हो गए। यानी बढ़ती सेंसरशिप के कारण लोग समाचारों के प्रति भी विरक्त होने लग जाते हैं।

नई पीढ़ी के साथ छल यह किया जा रहा है कि उन्हें यह अहसास तो कराया जा रहा है कि उनके पास बहुत सारी सूचनाएं हैं। पर जो सूचनाएँ उनके जीवन पर दूरगामी प्रभाव डालने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, उन्हें रोका व नियंत्रित किया जा रहा है। जैसे कि उनके पास खानपान, फैशन, पर्यटन, सेक्स, डेटिंग, प्रोपर्टी, फिटनेस आदि की सूचनाएं व नवीनतम समाचार तो बहुत हैं, पर देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था व समाज को कैसे और कौन लोग संचालित कर रहे हैं, इस बारे में उनके पास सूचनाएं व समाचार कम होते जा रहे हैं। उनके पास धर्मस्थलों में जारी कर्मकांडों के समाचार बहुत आते हैं, पर धर्मस्थलों के भ्रष्टाचार व यौनाचार आदि के विषय में समाचार नहीं पहुंचते हैं।

पहले यह माना जाता था कि सत्य को खोजना मुश्किल है, पर वह खोजा अवश्य जा सकता है। इस कार्य में पत्र-पत्रिकाएं सहायता करती थीं। अब यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सत्य वही है जो निरंतर परोसा व दिखाया जा रहा है तथा मनुष्य उन्हें ही सत्य माने जो दिखाया जा रहा है।

नॉम चोमस्की ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘बुद्धिजीवियों का दायित्व’ में लिखा था- ‘यह बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वे सच बोलें तथा असत्य का पर्दाफाश करें।’ पर बुद्धिजीवी शब्द को मुख्यधारा के भारतीय मीडिया ने इतना बदनाम कर दिया है कि बुद्धिजीवी यदि सत्य बोले तो भी उसपर विश्वास करने के लिए लोग तैयार नहीं होते हैं।

(6) वैकल्पिक मीडिया की शब्दावली का जन्म लोकतंत्र के अलग-अलग किस्म के आंदोलनों के भीतर से हुआ है जिनमें ‘राष्ट्रीय’ को ‘सरकारी’ से अलग रखने की चेतना व्याप्त थी। वे सरकारी तंत्र के विरोध में उठ खड़े होने वाले सामाजिक आंदोलनों के प्रवक्ता होते थे। लेकिन मुक्त बाजार व्यवस्था को विश्वव्यापी स्वीकृति दिलाने के लिए ‘देयर इज नो आल्टरनेटिव’ (टीना) जैसे नारे का भी खूब इस्तेमाल किया गया। यानी वैकल्पिक और विकल्पहीनता के मध्य एक संघर्ष की स्थिति लगातार पैदा होती रही है।

आज के समय में प्रकटतः तो वैकल्पिक मीडिया के निर्माण का रास्ता अधिक सुगम प्रतीत होता है क्योंकि मोबाइल व सोशल मीडिया ने लगभग हर व्यक्ति को रिकार्डिंग करने, फोटो खींचने तथा अपने विचारों-समाचारों को किसी न किसी सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। कहा जाता है कि मोबाइल से लैस वर्तमान पीढ़ी अपना मीडिया खुद पैदा कर लेती है। पहले छोटी पत्र-पत्रिकाएं व कम संसाधनों वाले अखबार वैकल्पिक मीडिया की तरह दिखते थे। अब यूट्यूब, फेसबुक, रील्स आदि को कई लोग इस काम के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कई देशों में आंदोलन इन्हीं के प्रभाव से हुए। अरब स्प्रिंग के बाद नेपाल का पूरा सत्ता के खिलाफ आक्रोश इन्हीं के जरिए पैदा हुआ।

लेकिन इस क्षेत्र में कई लोगों के सद्प्रयासों के बावजूद संकट यह है कि इस प्रकार का वैकल्पिक मीडिया कई बार अचानक से जनतंत्र-विरोधियों के हाथ में पड़कर समाज में फासिस्ट विचारों के लिए जगह तैयार करता है। सत्ताविरोधी आंदोलन की आड़ में जनतंत्रविरोधी आंदोलन किए जाते हैं। यानी वैकल्पिक मीडिया का विकास करते हुए यह सावधानी रखनी चाहिए कि समाज में मौजूद अधिनायकवादी किस्म के दल व विचारधाराएं इसका अधिक चालाकी से उपयोग न करने लगें। यानी वास्तविक वैकल्पिक मीडिया का संघर्ष दोहरा है। एक ओर जनविरोधी सत्ताओं व पूंजीपतियों से है, दूसरी ओर उन अवसरवादी शक्तियों से है जो दुनिया के विभिन्न इलाकों में फैले-पनपे जनतंत्र को वैकल्पिक डिजिटल मीडिया के दुरुपयोग से निशाना बनाना चाहती हैं।

403, सुमित टॉवर, ओेमेक्स हाइट्स, सेक्टर-86, फरीदाबाद, हरियाणा-121002 मो.9711312374

रामशरण जोशी
वरिष्ठ पत्रकार और समाज विज्ञानी। विपुल लेखन। अद्यतन पुस्तक ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ (आत्मजीवनी)।

मीडिया जैसा भी हो
सवाल उसकी वस्तुनिष्ठता और जवाबदेही का है

सर्वप्रथम एक ताजा अनुभव साझा करूंगा। यह आलेख लिखने से पहले फेसबुक की पोस्टों पर सरसरी नजर डाल रहा था। एक पोस्ट पर नजर अटकी। पोस्ट में अगस्त के अंतिम सप्ताह में लखनऊ के एक पांच सितारा होटल में ‘क्षत्रिय पत्रकारों’ के समारोह की जानकारी थी। समारोह में सभी वर्ग तथा विधा के राजपूत मीडियाकर्मी आमंत्रित थे। आयोजन के समर्थन और विरोध में रोचक टिप्पणियां थीं। आशंकाएं व्यक्त की गई थीं कि इसके बाद प्रतिक्रिया स्वरूप अन्य जाति के पत्रकारों के भी आयोजनों का सिलसिला शुरू हो जाएगा। शुरू होगा या नहीं, यह दीगर मसला है। लेकिन, मैं अपनी 6 दशक से अधिक लंबी पत्रकारीय यात्रा में पहली दफा ऐसी खबर से टकराता और अचंभित होता हूँ।

हिंदी पत्रकारिता की दो सदी पुरानी यात्रा का सरसरी विवेचन समीचीन होगा। 30 मई 1826 से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आज 2025 में चैनल और वेब पत्रकारिता का रूप ले चुकी है। डिजिटल क्रांति प्रगति का मंत्र बन गया है। अतः दो सौ सालों की पत्रकारिता का सफर निश्चित तौर पर सपाट नहीं रहा है, विभिन्न उतार-चढ़ावों और मोड़ों से गुजरा है।

‘उदंत मार्त्तंड’ के समय फिरंगियों का शासन था। देश गुलाम था। सामंती परिवेश था और महाजनी-औपनिवेशिक मिश्रित अर्थव्यवस्था थी। जीवन की गति मंथर थी। पत्रकारिता किसी भी भाषा, काल और देश की हो, उसका आंतरिक व बाह्य चरित्र यथास्थिति में हस्तक्षेप का रहता है। ठहरे पोखर में कंकरी फेंकने से तरंगें कम-अधिक उठेंगी। यह पत्रकारिता का सार्विक चरित्र है। भारत की पत्रकारिता भी अपवाद नहीं है।

हिंदी की मुद्रित पत्रकारिता ने सांस्कृतिक ठहराव में हलचल मचाने, निजी वृत्त से मुक्त होकर राष्ट्रीय वृत्त से जुड़ने और भारत को संप्रभुता-संपन्न राष्ट्र-राज्य में रूपांतरित होने में अपना कम-अधिक योगदान दिया है। सारांश में,  मुद्रित पत्रकारिता ने मिशनवादी पथिक के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी। पथिक, लंबे समय तक एक स्वस्थ प्रोफेशनल भी बना रहा। लेकिन आज के दौर में यह विकृत चरित्र धारण चुका है, अर्थात पथिक का संपूर्ण व्यापारीकरण हो गया है, जिसे  कुख्याती मिली है।

मेरे आकलन में, हिंदी पत्रकारिता त्रिकाल खंडों से गुजरी है: मिशनवादी, मूल्य-आधारित व्यवसायवादी और विशुद्ध मुनाफा आधारित व्यापारीकृत। किसी भी काल की पत्रकारिता हो, वह राजसत्ता और उसकी राजनीतिक आर्थिकी (पोलिटिकल इकॉनमी) से समय-समय पर, विशेष रूप से निर्णायक दौर में, प्रभावित रहती रही है। यही  वजह है कि वर्तमान दौर में मुख्यधारा  का हिंदी मीडिया लगभग राजसत्ता-कॉर्पोरेट पूंजी सापेक्ष बन चुका है। 1925 में  हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा बाबूराव विष्णु पराड़कर ने भविष्यवाणी की थी कि आनेवाले कल में पत्र-पत्रिकाओं पर विज्ञापन स्वामियों का राज होगा। बीती सदी में टाइम्स समूह के मालिक समीर जैन ने बड़े गर्व के साथ घोषणा की थी कि वे विज्ञापन का व्यापार करते हैं, ख़बरों का नहीं। समीर जैन की दृष्टि में अख़बार या चैनल विशुद्ध ‘उत्पाद’ है। जाहिर है, इसके साथ पत्रकारिता की आत्मा, उसकी हस्तक्षेपधर्मिता की स्वतः मृत्यु हो जाती है।

यह व्यापारीकरण का दौर ‘पत्रकारिता का मर्सिया काल’ है, जबकि ‘प्रोफेशनलिज्म’ का काल संपादक संस्था के नेतृत्व में पत्रकारीय मूल्यों से संचालित हुआ करता था। आज यह संस्था अचेतन अवस्था में है।

मेरी पत्रकारीय यात्रा की शुरुआत संपादक संस्था के जीवंत परिवेश में हुई थी। उपसंपादक, रिपोर्टर, युद्ध संवाददाता, संसदीय संवाददाता और ब्यूरो प्रमुख- इनके अतिरिक्त फ्री लांसर।  पत्रकारिता की इतनी लंबी यात्रा में किसी संपादक ने मुझपर विशेष रुझान या पूर्वग्रह के साथ आलेख या रिपोर्ट लेखन के लिए दबाव डाला हो, मुझे याद नहीं आता। अलबत्ता, कॉपी एडिटिंग जरूर हुई। 1977 में दलितों और आदिवासियों पर ज़बर्दस्त हिंसा हुई थी। कलकत्ता से प्रकाशित प्रसिद्ध वामपंथी पत्रिका ‘फ्रंटियर’ में मेरा लेख था- जेनेसिस ऑफ रूरल टेंशन इन इंडिया।  यह कुछ अकादमिक शैली में था। नवभारत टाइम्स के एक सह-संपादक के सुझाव पर मैं अज्ञेय जी से उनके कक्ष में मिला और अपना लंबा प्रकाशित लेख उन्हें दिखलाया। उन्होंने दस मिनिट में पूरा लेख देखकर धीमे स्वर में कहा- जोशी जी, आप तो हिंदी के पत्रकार हैं। इसे  स्वतंत्र रूप से हिंदी में लिख कर लाइए। दो रोज बाद हिंदी में टंकित लेख की प्रति उनकी टेबल पर रखकर चला आया। चार-पांच दिन के अंतराल के बाद नवभारत टाइम्स के संपादकीय पृष्ठ पर तीन दिनों तक वह अनवरत छपा। आगे भी वे आदिवासियों और खेतिहर श्रमिकों से संबंधित लेख छापते रहे।

आपातकाल के दौरान हिंदी पत्रकारिता का चेहरा मलिन होने लगा था। बाद में हिंदी के कुछ साहित्यकार-संपादक बुद्धिजीवियों ने कोंस्टीटूशन क्लब के आंगन में पश्चाताप-प्रायश्चित गोष्ठी की थी। उनके विलाप में आत्मलज्जा का भाव था। हिंदी पत्रकारिता की रीढ़ निरंतर पीली होती  चली गई। लेकिन आज भी मेरा हिंदी पत्रकारिता के स्वर्णिम काल के साथ ‘रोमांस’ बरकरार है, क्योंकि तब मेरी वैचारिक और व्यावसायिक  अस्मिता सुरक्षित थी।

प्रिंट मीडिया ने एक समय तक अपना रोल शानदार तरीके से अदा किया। लेकिन प्रौद्योगिकी और सूचना क्रांति ने मंथर गति के प्रिंट माध्यम को निश्चित ही प्रभावित किया है। इस दृष्टि से हिंदी प्रिंट माध्यम भी अपवाद नहीं रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम बहुआयामी तीव्र गति का मीडिया है। इसकी गति और स्पेस का विस्तार असाधारण है, जबकि प्रिंट माध्यम की गति और स्पेस की व्यापकता समय-सीमा और पूंजी की शक्ति से संचालित रहती है। मैं विश्वासपूर्वक कह  सकता हूँ कि हिंदी प्रिंट माध्यम का अस्तित्व और चरित्र गहराई तक प्रभावित हुआ है। इसकी प्रसार संख्या सीमित हुई है, पाठक संख्या घटी है। उपभोक्ता वर्ग की मनोरचना ‘क्षण में विश्व दर्शन’ की बन गई है। यह वर्ग इलेक्ट्रॉनिक  माध्यम द्वारा ब्रह्मांड का चंद पलों में ‘श्रव्य-दृश्य माध्यम’ से दर्शन करने के लिए उत्सुक रहता है।

शायद इसीलिए बीती सदी के प्रसिद्ध मीडिया दार्शनिक मार्शल मैक्लुहान ने ‘विश्व ग्राम’ की अवधारणा सामने रखी थी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साम्राज्यवादी चरित्र को देखकर उन्होंने कहा था कि मानवता अब ‘विश्व ग्राम’ में परिवर्तित हो चुकी है। इस मीडिया के जरिए कॉर्पोरेट पूंजी ने मनुष्य की इंद्रियों का अनुकूलन-कारोबार शुरू कर दिया है। सभी देशों में प्रिंट माध्यम इन नई घटनाओं से कम-अधिक प्रभावित हैं। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन जैसे देशों में अखबारों की प्रसार संख्या घटी है। यही दशा हिंदी की है।

अब हिंदी दैनिक अपने ‘वेब संस्करणों’ पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। इसके साथ बड़े हिंदी घरानों ने अपने चैनल भी चला रखे हैं। अब हिंदी पत्रकारिता पर पूरी तरह से बाजारवाद का राज है। प्रतिबद्ध लघु पत्रिकाओं की बात अलग है। आज भी उनका कंपास वैचारिक तथा साहित्यिक है। सीमित ही सही, लेकिन सूक्ष्म स्तर पर उनकी हस्तक्षेपधर्मिता बनी हुई है। इस नाते ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘वागर्थ’, ‘समयांतर’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘अकार’, ‘नया पथ’, ‘पहल’, ‘वसुधा’, ‘उद्भावना’ जैसी पत्रिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है। हालांकि कुछ लघु पत्रिकाओं ने भी अपने वेब संस्करण शुरू कर दिए हैं।

आज सरकार की डाक-नीति के कारण बढ़ते डाक खर्च ने लघु पत्रिकाओं के समक्ष अस्तित्व संकट पैदा कर दिया है।

मैं जब पत्रकारिता-पथ का पथिक बना था, ज्ञान को शक्ति कहा जाता था। लेकिन राज्य,  पूंजी और  टेक्नोलॉजी के परिवर्तनशील चरित्र के कारण ज्ञान-शक्ति का प्रतिस्थापन ‘सूचना शक्ति’ से हुआ। सूचना युद्ध शुरू हो गया। पत्रकारिता भी इसकी गिरफ्त में आई। अनुशासन के सभी क्षेत्रों में सूचना शक्ति की धारणा व्याप्त रही है। लेकिन अब राजशक्ति-पूंजीशक्ति के गठजोड़ के द्वारा अधिकाधिक सूचना और सूचना स्रोत का संग्रह किया जा रहा है।

इसके साथ ही ‘सहमति निर्माण’ का  कारोबार भी समानांतर चल रहा है। परिणामस्वरूप, पत्रकारिता की कर्म-शक्ति निरंतर समर्पणशील बनने लगी है। दशकों पुरानी धारणा के अनुसार  चौथा स्तंभ मीडियापालिका है। अब यह कोरी अवधारणा है जिसे दस्तूर निभाते हुए गोष्ठियों और क्लास रूम में दोहराया भर जाता है। इसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है। यदि ऐसा नहीं होता तो गोदी मीडिया गुमनाम रहता। यह काल है ‘पोस्ट ट्रुथ मीडिया’ का है। यानी ‘सत्य का असत्य में, असत्य का सत्य में स्वेच्छानुसार परिवर्तन’ काल है। इसके लक्षण हैं- फेक न्यूज, फोटो शॉपिंग, न्यूज प्लांटिंग, प्रायोजित खबरें, पेड व एजेंडा खबरें-लेख आदि।

निस्संदेह कृत्रिम बुद्धिमता या ‘आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस’ मीडिया ही नहीं, जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। यह भविष्य में अधिक सघनता व गहनता के साथ प्रभावित करेगी।

ताजा अनुभव। कनाडा के एडमोंटन शहर में मिस्र की प्राचीन सभ्यता का एक ‘आभासी शो’ देख रहा था। करीब 45 मिनिट के शो में एआई  गाइड ‘मोना’ हमारे साथ रही और मार्ग दर्शन करती रही। दर्शक वास्तविक और कृत्रिम में फर्क नहीं कर सके। मीडिया में स्पॉट रिपोर्टिंग को छोड़ अधिकांश काम एआई ने संभालना शुरू कर दिया है। संपादन, भाषागत अशुद्धियां, संदर्भगत डाटा का एकत्रीकरण, डाटा-विश्लेषण, संपादकीय व फीचर लेखन, अनुवाद, न्यूज रीडिंग जैसे कामों में इसकी सहायता ली जा रही है। लेकिन, कालांतर में इसके दुष्प्रभाव भी सामने आ सकते हैं, इस पर चिंतन शुरू हो गया है।

मीडिया में एआई पर अधिकाधिक निर्भरता से खतरनाक नतीजे भी सामने आ सकते हैं। लोकतांत्रिक प्रणाली को खतरा पैदा हो सकता है। विनाशकारी सूचना जंग शुरू हो सकती है। मीडिया का अधिकाधिक अनुकूलन व केंद्रीकरण किया जा सकता है। तानाशाही के खतरे बढ़ सकते हैं। यद्यपि एआई से कार्यगति में तेजी आई है, परंतु मीडियाकर्मियों में क्रिटिकल दृष्टि की कमी दिखाई देने लगी है। हाई टेक ने जहां  जीवन को बेशुमार सुविधाओं से संपन्न किया है, वहीं अनेक जटिलताएं भी  पैदा कर दी हैं। मनुष्य झटपटिया प्रवृत्ति का बनता जा रहा है। वह कैप्सूल या टेबलेट फॉर्म या ब्रेकिंग न्यूज के रूप  में खबरें व लेख चाहता है। घटनाओं और घटना पात्रों के साथ उसके वैचारिक तथा भावनात्मक संबंध शिथिल होते जा रहे हैं। उसकी इंद्रियां  पलों-मिनटों पर केंद्रित होती जा रही हैं। मसलन, अब पाठक व दर्शक की दिलचस्पी गजा में मानवजाति के  महाविनाश में न होकर  गोलाबारी से मौत और हताहत के आंकड़ों में ज्यादा है। उसे हर वक्त ‘थ्रिल’ की भूख रहती है। एक प्रकार से इस सदी का आदमी ‘थ्रिल-बकासुर’ बनने लगा है। जाहिर है कि पिछड़े, विकासशील और विकसित देशों में पाठकों की अरुचि की मार छोटे-बड़े अखबारों पर पड़ी है। प्रसार संख्या तेजी से गिरी है और नए संस्करणों के शुरू करने में ठहराव आया है।

आखिर हम परिवर्तनशील टेक्नोलॉजी और अवसरवादी रुचि से पैदा उपभोक्ता-संकट का सामना कैसे करें, इसके उत्तर की खोज आसान नहीं है। यह तय है कि संचार टेक्नोलॉजी और  मीडिया विकास जिस मुकाम पर पहुंच चुके हैं। वे वापस मुद्रण और महाजनी पूंजीवादी युग में  लौट नहीं सकते। देखना यह है कि राज्य और  जनता के मध्य कौन-सा भरोसेमंद, टिकाऊ और सहज उपलब्ध मीडिया हो सकता है? अरसे से वैकल्पिक मीडिया के रूप में ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व में आया है। एक समय था जब वैकल्पिक प्रेस के रूप में लघु पत्र-पत्रिकाओं ने भूमिका निभाई थी। लेकिन, इस सदी का समूचा परिप्रेक्ष्य व संदर्भ बदल चुके हैं। अतः सोशल मीडिया, ‘कम्युनिटी रेडियो’, पॉडकास्ट जैसे माध्यम मुख्यधारा के मीडिया को खासी टक्कर दे पा रहे  हैं। सत्ता-सुहावन बहसों के कारण हिंदी चैनल पिटने लगे हैं। उनकी टीआरपी गिरने लगी है। सरकारी विज्ञापनों के सहारे वे अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। फलस्वरूप उन्हें अपनी व्यावसायिक नैतिक संहिता के साथ समझौता करना पड़ रहा है।

इतना तय है, आज  सोशल मीडिया  लोकतंत्र और खबर-सूचना उपभोक्ताओं के गणतंत्र की रक्षा में महती भूमिका निभा रहा है। इसकी उत्तरोत्तर बढ़ती भूमिका के प्रभाव से राजसत्ताएं भी भयभीत होती प्रतीत हो रही हैं। वह इसपर  अंकुश लगाने के उपक्रम तलाशती रहती हैं।  सितंबर के दूसरे सप्ताह में नेपाल के घटना-चक्र से सोशल मीडिया की अपरिहार्य भूमिका स्वयं रेखांकित हो जाती है। वहां की ओली सरकार ने सोशल मीडिया को कुचलने की कोशिश की थी। जन सैलाब उमड़ आया।  सरकार को झुकना पड़ा। अपने आदेश रद्द करने पड़े। तब तक सरकार का ही तख्ता पलट गया। इतना तय है कि भविष्य में सोशल मीडिया की भूमिका का विस्तार ही होगा, क्योंकि डिजिटल क्रांति अजेय बन चुकी है। वैकल्पिक मीडिया के रूप में कम लागत पर प्रखंड स्तरीय या पंचायत स्तरीय पत्र भी निकलेंगे। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में तो कॉलोनी-केंद्रित पत्र निकलने लगे हैं। फिर से ‘वाल पेपर’ निकालने  के प्रयास किए जा रहे हैं। कम्युनिटी रेडियो को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अंत में, मीडिया का आकार-प्रकार कैसा भी रहे, मूल मुद्दा है उसके कलेवर की वस्तुनिष्ठता और जवाबदेही का।

105, समाचार अपार्टमेंट्स, मयूर विहार -फेस 1,  दिल्ली – 110091 मो.9810525019

आलोक मेहता
‘दैनिक हिंदुस्तान’ और ‘आउटलुक’ पत्रिका के पूर्व-संपादक। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व-अध्यक्ष। पद्मश्री से सम्मानित। अद्यतन पुस्तक ‘पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स’।

जो मीडिया अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा
भविष्य उसी का सुरक्षित है

भारतीय पत्रकारिता के हर युग में चुनौतियां और उपलब्धियां रही हैं। यह धारणा गलत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने से हिंदी की पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौतियां और समस्याएं आई हैं। सच यह है कि मीडिया के विभिन्न माध्यम एक-दूसरे के पूरक भी हैं।

हिंदी और भारतीय भाषाओं के बाहुल्य वाले भारतीय शहरों से लेकर गांव तक सूचना, समाचार, विचार पढ़ने, सुनने और देखने की भूख कम होने के बजाय बढ़ती गई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों, अब सोशल मीडिया भी बड़े पैमाने पर लोगों के बीच लोकप्रिय हुआ है। यह अवश्य कहा जा सकता है कि समय के साथ हिंदी पत्रकारिता में भी कई तरह के बदलाव आए हैं।

बाल गंगाधर तिलक और गणेश शंकर विद्यार्थी के युग वाली पत्रकारिता की अपेक्षा वर्तमान युग में नहीं की जा सकती। लेकिन आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से 70 के दशक से संपादकों और पत्रकारों ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जागरूकता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, मनोहर श्याम जोशी, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी और हरिवंश जैसे संपादकों ने हिंदी अखबार के पाठकों के साथ संपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, नई दुनिया, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और प्रभात खबर जैसे दैनिक अखबार राजधानी दिल्ली से आगे बढ़कर विभिन्न हिंदीभाषी प्रदेशों में निरंतर अपनी छाप छोड़ते रहे हैं।

राजेंद्र माथुर जब 1982 में ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक बनकर दिल्ली आए तो उन्होंने कुछ ही सप्ताह बाद एक समारोह में कहा था कि हिंदी का कोई अखबार केवल दिल्ली या मुंबई से प्रकाशित होने से राष्ट्रीय नहीं कहा जा सकता। वह तभी राष्ट्रीय कहला सकता है जब देश के विभिन्न राज्यों में उसके संस्करण हों। अज्ञेय ने भी 1977 में नवभारत टाइम्स के संपादक बनने पर दिल्ली, मुंबई के अलावा बिहार की राजधानी पटना से अखबार का संस्करण निकालने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन दो वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल के कारण वह सपना पूरा नहीं हुआ। माथुर साहब के आने के बाद लखनऊ, जयपुर, पटना के संस्करण निकले।

इसी तरह जब मुझे ‘दैनिक हिंदुस्तान’ का संपादक बनने का अवसर मिला, पटना के अलावा लखनऊ यानी उत्तर प्रदेश के संस्करण निकालने के लिए प्रबंधन तैयार हुआ। हरिवंश जी ने ‘प्रभात खबर’ संभालने के बाद इसे झारखंड और बिहार में प्रतिष्ठित अखबार बना दिया। जनसत्ता दिल्ली के अलावा मुंबई और कोलकाता से प्रकाशित हुआ।

दिलचस्प बात यह भी रही कि राजस्थान पत्रिका जैसे जयपुर के अखबार ने कोलकाता के अलावा दक्षिण भारत में हैदराबाद और बंगलौर जैसे शहरों में हिंदी पाठकों के लिए संस्करण निकाले। इस दृष्टि से हिंदी पत्रकारिता ने अपनी गुणवत्ता से व्यापक स्तर पर पाठकों में अपनी पहचान बनाई। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी अखबारों की प्रगति को उपलब्धि की श्रेणी में रखा जा सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यानी टेलीविजन के समाचार चैनल आने से हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या कम नहीं हुई, बल्कि अधिकृत आंकड़ों के अनुसार भी इनके पाठक बढ़ते गए। मेरा यह मानना है कि रेडियो या टेलीविजन पर कोई खबर देखने के बाद सामान्य जनता इन्हें विस्तार से देखने, पढ़ने और उसपर होने वाली टिप्पणियों के लिए अखबार या पत्रिका पढ़ती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले भी दैनिक अखबारों में रंगीन फोटो तथा आधुनिक डिजाइन के आकर्षक प्रस्तुतीकरण के प्रयास होने लगे थे। अन्यथा 70 के दशक के पहले भारत ही नहीं, ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश में भी अखबारों में रंगीन फोटो नहीं छपते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आने पर हिंदी अखबारों की डिजाइन और परिशिष्ट में रंगीन फोटो छपने लगे। ररिवारीय संस्करण भी कुछ हद तक पत्रिका की कमी पूरी करने लगे।

असली समस्या यह है कि आधुनिक तकनीक, प्रिंटिंग का खर्च और न्यूजप्रिंट के मूल्य लगातार बढ़ने से बड़े प्रभावशाली कहे जाने वाले अखबार के प्रबंधन घाटे और मुनाफे पर अधिक ध्यान देने लगे। इन अखबारों पर कुछ हद तक राजनीतिक सत्ता का प्रभाव भी पड़ा। इस संदर्भ में देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ग्रुप ने मुनाफे को ही सर्वाधिक महत्व देने और अखबार को चटपटा, मसालेदार तथा अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री के अनुवाद को प्रोत्साहित करने की नीति अपनाई। इसका असर अन्य हिंदी अखबारों पर भी पड़ा।

लेकिन कम प्रसार संख्या वाले प्रादेशिक और स्थानीय अखबार बहुत हद तक व्यावसायिक नहीं हुए। वे पाठकों के बीच स्थानीय समाचारों और उपयोगी सामग्री के जरिए अपना स्थान बनाए हुए हैं। यह कहा जा सकता है कि महानगरों का एक बड़ा वर्ग और युवा पीढ़ी इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आने के बाद अखबारों में कम दिलचस्पी ले रही है।

लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अखबार पढ़ने की रुचि बनी हुई है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता बढ़ने से अखबारों के लिए अब भी संभावनाएं दिखाई देती हैं। सरकारों खासकर नौकरशाहों ने यह गलत धारणा बना रखी है कि अब लोग अखबार, पत्रिका या पुस्तकें नहीं पढ़ना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि अमेरिका या जापान जैसे आधुनिक संपन्न देशों में भी अखबारों की प्रसार संख्या अच्छी-खासी है। वास्तव में यह प्रकाशकों और संपादकों पर निर्भर है कि वह बाजार से प्रभावित न होकर ऐसी सामग्री पाठकों को उपलब्ध कराएं जो सामान्यतः टेलीविजन पर भी नहीं मिल सकती।

पश्चिमी देशों की तरह भारत में अलग से टैबलाइट अखबार भी निकले हैं, लेकिन दुर्भाग्य से कई अखबार सनसनीखेज सामग्री और फोटो आदि से टैबलाइट की तरह अखबार का स्तर गिराने लगे। इसके अलावा, मशीन, प्रिंटिंग और प्रसार व्यवस्था पर अधिकाधिक धन खर्च किया जा रहा है लेकिन समाचारों के संकलन और समर्पित पत्रकारों पर खर्च कम से कम करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई है। इसका असर गुणवत्ता पर पड़ रहा है।

इन दिनों मीडिया की शक्ति और स्वायत्तता को लेकर निरंतर सवाल उठ रहे हैं। जहां तक शक्ति का सवाल है, प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा सोशल मीडिया की बात है, उसके व्यापक असर के कारण ही हजारों करोड़ की पूंजी लग रही है। कोई भी सरकार हो उसका यथासंभव उपयोग करने का प्रयास भी करती है। यही नहीं, विदेशी शक्तियां भी भारतीय मीडिया को प्रभावित करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजी लगा रही हैं। बड़े कार्पोरेट घरानों के प्रभाव को लेकर बहुत शोर मचता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि 80 के दशक तक दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तक मीडिया संस्थानों पर बिड़ला, डालमिया, टाटा के प्रभाव की चर्चा शक्तिशाली प्रधानमंत्री करते थे। इसे जूट प्रेस कहा जाता था। सत्ता के दबाव तब भी थे।

मैंने पत्रकारिता पर अपनी पुस्तकों ‘पावर, प्रेस एंड पॉलिटिक्स’, ‘कलम के सेनापति’, ‘भारत में पत्रकारिता’, ‘इंडियन जर्नलिज्मःकीपिंग इट्स क्लीन’ में इस मुद्दे पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ विवरण दिया है। सत्ता की राजनीति ने पत्रकारिता को पहले भी प्रभावित किया था और आज भी कर रही है। इसलिए मुद्दा यह भी है कि सरकारों को बनाने या हटाने की भूमिका जो अखबार या मीडिया निभाता है उसका असर उसकी विश्वसनीयता पर पड़ता है या नहीं। यदि लक्ष्य केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या दल विशेष रहेगा तो स्वायत्तता कहां होगी, अन्यथा प्रामाणिक तथ्यों के साथ सरकार की गड़बड़ियों या जनता की समस्याओं को प्रकाशित करने पर दबाव नहीं पड़ सकता है।

खोजी रिपोर्ट के लिए संस्थानों को अधिक खर्च करना पड़ेगा। नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए मीडिया संस्थानों की वेबसाइट और प्रकाशित सामग्री को सोशल मीडिया पर उपलब्ध किए जाने के प्रयास किए जा सकते हैं और कुछ हद तक हो भी रहे हैं। इस दृष्टि से ग्रामीण क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं के अखबारों की संभावना बनी रहेगी। यही बात वैकल्पिक मीडिया यानी सोशल मीडिया पर लागू होती है। जो अच्छी सामग्री उपलब्ध कराएगा उसका भविष्य भी सुरक्षित रहेगा।

सी- 701, आनंदलोक सोसाइटी, मयूर विहार फेज-1, दिल्ली 110091 मो. 98103 23298

प्रियदर्शन
वरिष्ठ लेखक और पत्रकार। प्रमुख कृतियां : ‘जिंदगी लाइव’, ‘बारिश, ‘धुआं और दोस्त’, ‘समाज, संस्कृति और संकट’।

नई पीढ़ी अपने ढंग से
ज्ञान और सूचना के स्रोतों का इस्तेमाल कर रही है

(1) उपलब्धियों से ज़्यादा मेरा ध्यान प्रक्रियाओं पर रहता है। निस्संदेह उपलब्धियां हैं। ‘जनसत्ता’ जैसा सजग अखबार और प्रभाष जोशी जैसे संपादक उस दौर की उपलब्धि हैं। राजेंद्र माथुर के समय के ‘नई दुनिया’ और ‘नवभारत टाइम्स’ उपलब्धि हैं, धर्मवीर भारती और उनका ‘धर्मयुग’ भी उपलब्धि हैं। ‘दिनमान’ जैसी बौद्धिक और ‘रविवार’ जैसी राजनीतिक पत्रिका भी उपलब्धि है। रघुवीर सहाय, राजकिशोर जैसे पत्रकार उपलब्धि हैं। इनको पढ़ते हुए हमने अपने समय, समाज और लोकतंत्र के बारे में काफी कुछ सीखा और जाना है।

लेकिन मुझे प्रक्रिया की बात करना जरूरी लग रहा है। मैं यह बार-बार कहता रहा हूँ कि आजादी के पहले हिंदी पत्रकारिता जेलखानों में पली-बढ़ी। उसने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया। तमाम बड़े नेता संपादक भी रहे। आजादी के बाद भी पत्रकारिता देश के निर्माण में राजनीति का साथ देती रही। नेहरू को तब अपनी आलोचना में खुद लेख लिखने पड़ते थे और कार्टूनिस्टों को कहना पड़ता था- डोंट स्पेयर मी शंकर! वह रचनात्मक पत्रकारिता का दौर था। उसमें जरूरत पड़ने पर आलोचना का विवेक भी था।

साठ के दशक में खास कर लोहिया के प्रभाव में हिंदी पत्रकारिता पर एक समाजवादी रंग भी दिखता है। लेकिन 1975 में लगी इमरजेंसी ने सारे समीकरण उलट-पलट दिए। पहली बार पत्रकारिता को अपनी असली चुनौती समझ में आई। आडवाणी का यह तंज भूला नहीं जा सकता कि तब पत्रकारों को घुटने टेकने को कहा गया था, उन्होंने रेंगना शुरू कर दिया।

इसके बाद हिंदी पत्रकारिता अपने अलग तेवर में सामने आती है। ‘रविवार’ जैसी पत्रिका और ‘जनसत्ता’ जैसा अखबार अपने राजनीतिक रुझानों के साथ जैसे सत्ता से मुठभेड़ करते हैं। इसी दौर में पत्रकारिता का छोटे-छोटे केंद्रों में विस्तार होता है। छोटे-छोटे शहरों से नए अखबार निकलने शुरू होते हैं। राष्ट्रीय अखबारों के स्थानीय संस्करण शुरू होते हैं। यह सिलसिला 1991 तक बहुत करीने से चलता है।

1991 के बाद निजीकरण और उदारीकरण का जो दौर शुरू होता है, विश्व बाजार जब भारत में पहली घुसपैठ करता है, तब से अखबारों का नया चरित्र सामने आता है। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह धीरे-धीरे अपनी बेहद प्रतिष्ठित पत्रिकाएं- ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘माधुरी’ आदि बंद करता है। इसी तर्ज पर दूसरे समूह भी पत्रिकाओं को समेटते हैं। फिर टाइम्स ऑफ इंडिया घोषित करता है कि वह एक ‘ब्रांड’ है। इसके बाद अखबारों के सरोकार सिमटते जाते हैं, उनमें रंग-रोगन बढ़ता जाता है और उनकी भाषा में एक सपाटपन-सतहीपन चला आता है।

(2) यह सच है कि हिंदी समाचार पत्रों का बदलाव इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उभार के पहले से दिखने लगा था। 2003 के आसपास जब कई समाचार चैनल एक साथ शुरू हुए तो उनका असर धीरे-धीरे अखबारों पर दिखने लगा। अखबारों में सतहीपन बढ़ा, पृष्ठों को और रंगीन किया जाने लगा। फीचर के पन्नों पर ग्लैमर की गुंजाइश बढ़ाई गई। खबरों के ‘ट्रीटमेंट’ में भी बदलाव आया। पहले जो भाषण अखबारों के लिए बहुत नई चीज होते थे, वे टीवी चैनलों पर चल चुके होते थे तो अखबारों को उनसे आगे की खबर देनी होती थी।

अखबारों में जो बदलाव आया, वह सिर्फ टीवी चैनलों की वजह से नहीं आया। वह समाज में घटित हो रहा था, इसलिए अखबारों में दिख रहा था। एक दिलचस्प बात आने वाले दिनों में यह हुई कि टीवी और अखबार एक-दूसरे की सामग्री का इस्तेमाल करने लगे। यानी अखबारों में सुबह छपी खबर शाम को टीवी पर दिखती और कई बार ऐसा होता कि शाम को टीवी पर जो खबर चली, उसको विस्तार से अखबार दिखाते। यह सच है कि इस पूरे दौर में गंभीरता घटी, सरोकार घटे, सनसनी बढ़ी, भाषा सपाट हुई।

(3) बरसों पहले मीडिया पर केंद्रित मेरी एक किताब आई थी- ‘खबर बेखबर’। उसके एक लेख में मैंने लिखा था- पहले पत्रकारिता कमजोर आदमी की आवाज होती थी, अब मजबूत आदमी का बयान बन गई है। पहले यह खबर छपती थी कि अमुक शहर या मोहल्ले के घर अंधेरे में डूबे हैं- वहां बिजली नहीं है। अब खबर छपती है कि बिजली मंत्री ने इतने किलोवाट के ट्रांसफॉर्मर का उद्घाटन किया। यह सच है कि पहले सूचना शक्ति होती थी। लेकिन यह शक्ति कहां से आती थी? सूचना में निहित सरोकार से।

पहले लोग पत्रकार का सम्मान करते थे, उससे उम्मीद करते थे- किसी सिफारिश की नहीं, बस इस बात की कि वह खबर दे देगा तो उनका काम हो जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे शक्ति में सरोकार घटने लगा, बल बढ़ने लगा। अब पत्रकार सत्ता से अपने संपर्कों की वजह से बड़ा होता है- पुलिस-प्रशासन के लोगों से अपनी करीबी से उसकी हैसियत तय होती है। तो हुआ यही है कि सूचना पीछे चली गई है, शक्ति आगे आ गई है। इसलिए नया सच यह है कि शक्ति ही सूचना है। जो ताकतवर है, जो सत्ता में है, जिसके पास आर्थिक साधन हैं, वह अपनी बात तरह-तरह के प्लैटफॉर्म से रख सकता है। वह अखबारों और टीवी चैनलों को खरीद रहा है, वह शक्ति को सूचना में बदल रहा है। जाहिर है, यह नया पूंजीतंत्र है जिसे चीजों पर नियंत्रण रखने की नई कलाएं आ गई हैं और उसे एक तरह से नए समाज की स्वीकृति भी हासिल है।

मीडिया का चरित्र इस तरह बदला है कि उसे संपादक नहीं, ब्रांड मैनेजर और सीईओ चला रहे हैं। चौथा खंभा जर्जर है, लेकिन ज्यादा बड़ी सच्चाई यह है कि लोकतंत्र के सारे खंभे जर्जर हो रहे हैं। सरकारें निरंकुश हो चुकी हैं, विधायिका सरकार के पीछे है और न्यायपालिका दबाव में है। तो चौथे खंभे को कमजोर होना ही है।

(4) कृत्रिम मेधा सबको डरा रही है। यूअल नोआ हरारी ने अपनी किताब ‘नेक्सस’ में बहुत साफ लिखा है कि यह सूचना का ऐटम बम है जो हमारे नियंत्रण के बाहर जाकर सबकुछ तबाह कर सकता है। उनका यह भी कहना है कि बहुत सारी सूचनाएं सही होने की गारंटी नहीं हैं। एआई का आगमन हमारे जीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि प्रभावित कर रहा है। मीडिया में भी उसका इस्तेमाल शुरू हो गया है। उससे कॉपी लिखी जा रही है, उससे ग्राफ़िक्स बनाए जा रहे हैं, उससे टीवी चैनलों के पैकेज तक तैयार किए जा रहे हैं। कहीं-कहीं एआई का इस्तेमाल वॉयस ओवर के लिए भी हो रहा है। एक तरह से इसमें हर्ज भी नहीं। हम जब सूचना के बाकी माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं, जब इंटरनेट और सोशल मीडिया से खबरें लेते हैं तो एआई टूल्स की मदद भी क्यों नहीं ले सकते?

मुश्किल तब आती है जब हम फैसला करने का, रचने का अधिकार कृत्रिम मेधा पर छोड़ दें। वह हमारी सहायक भूमिका में हो तो चलेगा, लेकिन वह हमें निर्देशित करने लगे तो खतरा है। दुर्भाग्य से अंदेशा इसी बात का है। कृत्रिम मेधा हमारा काम आसान नहीं बना रही, हमें अप्रासंगिक बना रही है। एक पत्रकार के रूप में अभी ही खबरों के चुनाव में हमारा दखल कम हुआ है। अब हम देखते हैं कि सोशल मीडिया पर क्या ट्रेंड कर रहा है, उसे ही अपनी खबर बनाते हैं। जिसे मानवीय हस्तक्षेप कहते हैं, जिसमें बहुत सारी संभावनाएं होती हैं, वह धीरे-धीरे घटता जा रहा है। एआई इस प्रक्रिया को बढ़ाएगा तो मीडिया का भविष्य बहुत अनिश्चित रह जाएगा।

(5) दरअसल भूख तब पैदा होती है जब किसी चीज की कमी होती है। इस सूचना युग में हर तरफ समाचार ही समाचार है। सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया एक-एक पल की खबर दे रहा है। सूचना की इस बाढ़ ने सूचनाओं को बेमानी बना डाला है। इसलिए नई पीढ़ी समाचारों की परवाह करती नहीं दीखती। पत्र-पत्रिकाओं से विमुख होने की वजह भी यही है। बल्कि इनके ऑनलाइन एडिशन वह ज्यादा देख लेती है। लेकिन वह अखबार या पत्रिकाएं देखे या नहीं, गंभीर सामग्री या अध्ययन से वह पूरी तरह विमुख नहीं। वह अपने ढंग से ज्ञान और सूचना के बहुत सारे स्रोतों का इस्तेमाल कर ले रही है। जहां उसे कुछ विशिष्ट दिखता है, वहां वह ठहर भी जाती है।

(6) वैकल्पिक मीडिया ही धीरे-धीरे असली मीडिया होता जा रहा है। बल्कि पुराने और पारंपरिक मीडिया घरानों के दिग्गज इस वैकल्पिक मीडिया के खेल में उतर आए हैं। तमाम अखबारों के ऑनलाइन संस्करण हैं जिनकी अलग से फीस भी लगती है। तमाम अखबारों, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों की अपनी वेबसाइट हैं, उनके अपने यू ट्यूब चैनल हैं। समाचार उद्योग के बहुत सारे संसाधन अब वैकल्पिक मीडिया में जा चुके हैं। पारंपरिक मीडिया उसके लिए सामग्री उत्पादन का केंद्र बन गया है। टीवी पर अगर किसी बड़े आदमी का इंटरव्यू रिकॉर्ड किया जाता है तो पहली कोशिश उसे टुकड़ा-टुकड़ा कई हिस्सों में बांट कर नेट पर डालने की होती है। 40 सेकंड से लेकर 40 मिनट तक के अलग-अलग क्लिप प्रमोशन के साथ डाले जाते हैं।

तो वैकल्पिक मीडिया की वेबसाइट्स, उसके यू ट्यूब और उसके सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म- वे सब ही आने वाले दिनों का वास्तविक मीडिया बनाएंगे- वे अच्छे हों या बुरे हों- उन्हीं का दौर आने वाला है। बेशक, अख़बार भी चलेंगे और टीवी भी- लेकिन उनकी भूमिकाएं सीमित और सहायक होंगी।

ई-4, जनसत्ता सोसाइटी, सेक्टर 9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012 मो.9811901398

किशन कालजयी
सुपरिचित लेखक और पत्रकार। ‘संवेद’ और ‘सबलोग’ पत्रिका के संपादक।

चौथा खंभा स्वतंत्रता और
नैतिक साहस के अभाव के कारण जर्जर है

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास दो सौ वर्षों से अधिक लंबा है। इसने 1826 में ‘उदंत मार्त्तंड’ के प्रकाशन से लेकर आज के डिजिटल दौर तक समाज को दिशा देने और जनमत निर्मित करने में असाधारण भूमिका निभाई है। पत्रकारिता को प्रायः ‘चौथा खंभा’ कहा जाता है। यह विशेषण यूं ही नहीं मिला। हिंदी पत्रकारिता ने सत्ता से प्रश्न किए, जनता की पीड़ा को स्वर दिया और समाज में नैतिक ऊर्जा का संचार किया।

आज जब हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में हैं, यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि पत्रकारिता की पुरानी उपलब्धियां हमें क्या सिखाती हैं, समकालीन चुनौतियां हमें किस दिशा में धकेल रही हैं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले हिंदी पत्रकारिता पूरी तरह मुद्रित अखबारों और पत्रिकाओं पर आधारित थी। इस दौर में पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को जन-जन तक पहुंचाया। ‘भारतमित्र’, ‘सरस्वती’ और ‘प्रताप’ जैसे विभिन्न युगों के पत्र न केवल समाचार देते थे, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सुधारों के वाहक भी थे। गणेश शंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’ असहयोग आंदोलन और किसानों-मजदूरों की पीड़ा का दस्तावेज था। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती के माध्यम से हिंदी गद्य को नई ऊंचाई दी, साहित्य को समाज-चेतना से जोड़ा। इसी तरह ‘अभ्युदय’ और ‘आज’ जैसे अखबार जनांदोलनों की आवाज बने। उस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि पत्रकारिता केवल समाचार तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समाज परिवर्तन का औजार थी।

हिंदी पत्रकारिता ने जातिगत असमानताओं, स्त्री-शिक्षा, किसान समस्याओं और औपनिवेशिक शोषण जैसे मुद्दों पर खुलकर लिखा। उस समय का पाठक अखबार को आंदोलन की मशाल मानता था। यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने बार-बार प्रेस पर अंकुश लगाने की कोशिश की। फिर भी हिंदी पत्रकारिता की निर्भीक परंपरा समाज की स्मृति में गहराई से दर्ज हुई।

टेलीविजन के आगमन ने समाचार-पत्रों की दुनिया को हिला दिया। 1980 और 90 के दशक में जब दूरदर्शन और फिर निजी समाचार चैनल आए तो खबरों का स्वरूप बदलने लगा। अब पाठक से पहले दर्शक बनने की दौड़ शुरू हो गई।

समाचार पत्रों ने देखा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तेजी से घटनाओं को ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनाकर प्रस्तुत करता है। इसने प्रिंट मीडिया पर भी दबाव डाला कि वे ताजगी और तात्कालिकता की होड़ में उतरें। पहले अखबार गहन विश्लेषण और विवेचन के लिए पढ़े जाते थे, अब वे भी सनसनी और तात्कालिकता की दौड़ में फंस गए। समाचार पत्रों का चरित्र ‘गंभीर विमर्श’ से खिसककर ‘पढ़ने लायक हल्की खबरों’ की ओर बढ़ा। विज्ञापन की निर्भरता बढ़ी और अखबार भी ‘प्रोडक्ट’ बन गए। पहले जहां संपादकीय को विचार निर्माण का माध्यम माना जाता था, अब वह सिमट गया। संपादक की जगह मार्केटिंग हेड ने ले ली। इस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हिंदी पत्रकारिता को तेज, आकर्षक और दृश्यात्मक तो बनाया; साथ ही उसके चरित्र में गहराई, धैर्य और वैचारिकता का क्षरण भी किया।

सूचना को शक्ति कहा जाता था, क्योंकि जो जानकार होता है वही समाज को दिशा दे सकता है। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। अब शक्ति ही सूचना का नियंत्रण करती है। जिनके पास राजनीतिक या आर्थिक ताकत है, वे ही सूचना प्रवाह को मोड़ते हैं। मीडिया की स्वायत्तता आज  बड़े संकट में है। कॉरपोरेट घरानों के स्वामित्व ने समाचार संस्थानों को पूर्णतः व्यावसायिक बना दिया है। सत्ता से टकराने की जगह मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता का सहयोगी बन गया है।

‘चौथा खंभा’ जर्जर इसलिए है कि इसमें नैतिक साहस और स्वतंत्रता की जगह अब विज्ञापन, टीआरपी और राजनीतिक दबाव ने ले ली है। पत्रकार की कलम जो कभी जनसत्ता की आवाज थी, आज अधिकांश मामलों में सत्ता के प्रवक्ता की तरह दिखने लगी है। फिर भी देश में स्वतंत्र मीडिया का एक छोटा कोना बचा हुआ है- कुछ वैकल्पिक पोर्टल्स, छोटे अखबार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेकिन मुख्यधारा का परिदृश्य गहरे संकट में है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पत्रकारिता के लिए वरदान है और चुनौती भी। एआई अब न्यूज लेखन, अनुवाद, तथ्य-जांच और आंकड़ों के विश्लेषण तक में काम कर रहा है। बड़ी मीडिया कंपनियां एआई की मदद से कंटेंट तैयार कर रही हैं, जिससे गति और दक्षता बढ़ रही है। खतरा यह है कि एआई की निष्पक्षता संदिग्ध है क्योंकि उसका प्रशिक्षण, डाटा और प्रोग्रामिंग भी मानव-निर्मित पूर्वग्रहों से प्रभावित होते हैं। एआई के जरिए बनाई गई फेक न्यूज, डीप फेक वीडियो और बॉट-जनित प्रोपेगेंडा पत्रकारिता की विश्वसनीयता को अधिक कठिनाई में डाल सकते हैं।

साथ ही, एआई पत्रकारों की नौकरियों को प्रभावित करेगा। रूटीन खबरें, खेल-सांख्यिकी या शेयर बाजार रिपोर्ट अब एआई से ली जा सकती हैं। पत्रकारिता की असली चुनौती यह होगी कि वह मानव संवेदना, आलोचनात्मक विवेक और नैतिक जिम्मेदारी को बचाए रखे- जो मशीन कभी नहीं दे सकती।

आज की युवा पीढ़ी तेजी से डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रही है। अखबार पढ़ने की आदत कम हो रही है। सुबह अखबार खोलने की जगह मोबाइल नोटिफिकेशन देखना आम हो गया है। इससे समाचार पत्रों की पाठकीयता घटी है। नई पीढ़ी की सूचना की भूख खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसका रूप बदल गया है। वह संक्षेप दृश्य और तात्कालिक सूचना चाहती है। लंबे विश्लेषण और गहन विमर्श को पढ़ने का धैर्य कम होता जा रहा है। इसके चलते पत्र-पत्रिकाओं के वैचारिक लेखन में गिरावट आई है।

बड़े समाचार पत्रों के लिए दोहरा संकट है- आर्थिक और नैतिक। आर्थिक इसलिए कि विज्ञापन राजस्व अब डिजिटल कंपनियों (गूगल, फेसबुक) की ओर चला जा रहा है। नैतिक इसलिए कि जनता अखबारों को स्वतंत्र प्रहरी के बजाय सत्ता-समर्थक मंच मानने लगी है। यही कारण है कि अखबारों की साख गिर रही है। यदि वे गहराई, तथ्यपरकता और विश्लेषण की ओर लौटें और डिजिटल माध्यमों पर सशक्त उपस्थिति दर्ज करें, तभी उनका पुनर्जीवन संभव है।

इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में वैकल्पिक मीडिया का उदय बहुत अर्थपूर्ण है। यूट्यूब चैनल, स्वतंत्र वेब पोर्टल, ब्लॉग, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया पेज आज मुख्यधारा मीडिया के विकल्प के रूप में उभरे हैं। ये सत्ता और कॉरपोरेट दबाव से अपेक्षाकृत मुक्त हैं। इसलिए जनता की असली आवाज इनसे निकल रही है।

न्यूजलॉन्ड्री, द वायर, स्क्रॉल, जनचौक, न्यूजक्लिक जैसे वैकल्पिक पोर्टलों ने दिखाया है कि पत्रकारिता केवल बड़े घरानों की बपौती नहीं है। युवा पत्रकार और नागरिक भी अपनी आवाज से परिदृश्य बदल सकते हैं। हालांकि वैकल्पिक मीडिया के सामने भी चुनौतियां हैं- आर्थिक संसाधनों की कमी, तकनीकी अवरोध, और सत्ता का दमन। लेकिन इसका भविष्य उज्ज्वल है,  क्योंकि नई पीढ़ी इन्हें भरोसेमंद मान रही है। लोकतंत्र में जब मुख्यधारा का मीडिया कमजोर पड़ता है, तब वैकल्पिक मीडिया ही नई ऊर्जा देता है।

हिंदी पत्रकारिता की यात्रा गौरवपूर्ण है और संकटग्रस्त भी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से पहले जिस निर्भीकता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ पत्रकारिता ने समाज को दिशा दी, वही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही है। आज हम उस दौर में हैं जब सूचना का प्रवाह सत्ता और पूंजी के नियंत्रण में है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल प्लेटफॉर्म पत्रकारिता को नए अवसर दे रहे हैं, लेकिन उसके नैतिक संकट को और गहरा भी कर रहे हैं। नई पीढ़ी की सूचना-आदतें बदल गई हैं जिससे अखबारों का अस्तित्व संकट में है। इस बीच वैकल्पिक मीडिया लोकतंत्र की नई आशा बनकर सामने आ रहा है।

पत्रकारिता को बचाना केवल पत्रकारों का काम नहीं है। यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जनता जब तक सच और विमर्श की मांग नहीं करेगी, तब तक पत्रकारिता सत्ता और बाजार की सेवा में उलझी रहेगी। जरूरत है कि हम पत्रकारिता की उस परंपरा को पुनर्जीवित करें, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को बल दिया था और समाज को न्याय, समता और लोकतंत्र की ओर अग्रसर किया था। यही हिंदी पत्रकारिता का भविष्य है और यही उसकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी।

402, कैमेलिया, आस्था लाइफ स्टाइल सिटी, बंशीटीकर (ग्लोकल अस्पताल के पास), भागलपुर-812001(बिहार) मो. 8340436365

संपर्क प्रस्तुतिकर्ता :​1, राम कमल रोड, पोस्ट-गरीफा, पिन-743166, उत्तर 24 परगना (प.बं.) मो.9331075884