गजल संग्रह ‘ये और बात है’। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित। संप्रति भारतीय वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त।

गज़ल

1
है कोई साजिश कि है बकवास या कुछ और है
जो बताया जा रहा, इतिहास या कुछ और है?

जिस तरह हम दे रहे हैं पूर्वजों को गालियां
संस्कारों में निरंतर ह्रास या कुछ और है?

हम किसी का दर्द अब महसूस कर पाते नहीं,
क्या हमारा मर गया अहसास या कुछ और है?

हर कोई संदेह की जद में दिखाई दे रहा
खत्म होता जा रहा विश्वास या कुछ और है?

जिस तरह का कारनामा हो रहा है आजकल
यह सियासत की गई सायास या कुछ और है?

2
देखते ही देखते कितना सयाना हो गया!
आ गले लग जा, मिले तुझसे जमाना हो गया।

व्यस्तताएं बढ़ गई हैं इन दिनों मेरी बहुत
तुम सुनाओ, क्या तुम्हारा गांव जाना हो गया?

कोई आता था कहीं से, पूछते थे गांव में
आज भी क्या पूछते हैं, …और खाना हो गया?

जिन जमीनों में हुआ करती थीं फस्लें उन दिनों
उन जमीनों पर सुना है कारखाना हो गया

एक अरसा हो गया इस शहर में आए हुए
सोचता हूँ आज, मैं कितना पुराना हो गया!

3
किस नजरिए से कहें, कमजोर होतीं औरतें
वेदना सहतीं प्रसव की, वंश बोतीं औरतें

भस्म हो जातीं हैं कर लेतीं हैं जौहर, हां! मगर
मान-मर्यादा किसी दम पर संजोतीं औरतें

इस तरह संबंध वे रखतीं संभाले जिस तरह
मोतियों को एक धागे में पिरोतीं औरतें

छोड़ जातीं हैं सभी पहचान तक बाबुल के घर
संस्कारों को मगर सायास ढोतीं औरतें

उन घरों में आ नहीं सकतीं कभी खुशहालियां
जिन घरों में हैं सिसकतीं और रोतीं औरतें।

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