कांचरापाड़ा (पश्चिम बंगाल) की संस्था ‘पगडंडी : नई राह की तलाश’ द्वारा डॉ. भोला प्रसाद सिंह स्मृति व्याख्यानमाला के पहले व्याख्यान का आयोजन नैहाटी के समरेश बसु मंच में 1 मार्च 2026 को  किया गया। कांचरापाड़ा और नैहाटी के शिक्षकों, बौद्धिकों और छात्रों से खचाखच भरे हॉल में कार्यक्रम संपन्न हुआ। ‘पगडंडी’ एक शुरुआत है उस साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की, जिसकी प्रेरणा भोला प्रसाद सिंह रहे हैं। कोलकाता महानगर से कोसों दूर साहित्य के विद्यार्थी और अध्यापक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. भोला प्रसाद सिंह ने अपना जीवन एक निष्ठावान संस्कृतिकर्मी के रूप में जिया था। सांस्कृतिक रूप से शुष्क होते जा रहे समाज में सांस्कृतिक रुचि पैदा करने में उन्होंने ऐसी कई पीढ़ियाँ तैयार कीं जो किसी न किसी तरह आज भी साहित्य और सांस्कृतिक कर्म से जुड़ी हुई हैं।

व्याख्यानमाला के तहत पहले व्याख्यानदाता के रूप में ‘वागर्थ’ के संपादक और वरिष्ठ आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने ‘आधुनिकता की परंपरा : समस्याएं और उपलब्धियाँ’ विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।

डॉ. शंभुनाथ अपने व्याख्यान में कहते हैं कि आधुनिकता सबसे पहले एक बौद्धिक मूल्य है।  इसके मुख्य औजार हैं ‘प्रयोग’, ‘तर्क’ और ‘प्रमाण’। वे दार्शनिक देकार्त के इस कथन का उल्लेख करते हैं, ‘मैं सोचता हूँ, इसलिए हूँ।’

उनका कहना है कि औद्योगीकरण, नगरीकरण और आधुनिकीकरण की ही देन है आधुनिक जीवन दृष्टि और नई कल्पनाशीलता। वे सतर्क करते हैं कि यह दौर आधुनिकता और कूपमंडूकता की जुगलबंदी का है। जो आधुनिकता एक समय मुक्ति का द्वार बनकर आई थी, आज वह हमें डिजिटल पिंजड़े में कैद कर रही है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय राय ने कहा कि सत्ता और बाजार के लिए कट्टरपंथी व्यक्ति बहुत फायदेमंद होता है। समाज में जिस तरह वैज्ञानिक समझ के बजाय मध्यकालीन मूल्यों का प्रसार बढ़ता जा रहा है, आधुनिकता पर नए सिरे से बहस की जरूरत बढ़ी है। शिक्षक राजेश कुमार पांडे और प्रोफेसर एन चंद्र राव ने प्रश्न पूछकर इस विचार गोष्ठी को बहसतलब बना दिया। भोला प्रसाद जी के करीबी मित्र माणिकचंद प्रसाद, इंदु सिंह और गंगा प्रसाद ने मंच की शोभा बढ़ाई। वरिष्ठ पत्रकार गंगा प्रसाद ने विचार और व्यवहार के बीच की खाई को पाटने की बात कही और अगले वर्ष के दूसरे आयोजन में श्रोताओं को अग्रिम आमंत्रण दिया।

प्रस्तुति : अनूप कुमार गुप्ता