
आज सुबह पैदल घूमते हुए उन्हें रोना आ रहा था। अभी कुछ देर पहले सुनी बेटे की कर्कश आवाज उन्हें बेचैन किए हुए था। कुछ दिन पहले मित्र दिलीप के आगे अपने अकेलेपन की बात की तो चार लोगों के बीच बोले उसके शब्द उनके कानों में पड़ ही गए थे- ‘ये राजेंद्र तो कायर ही है यार! जब देखो तब रोता ही रहता है।’
छह बरस पहले बीमारी के कारण पत्नी का निधन हुआ था तब व्याथित होकर वे बड़े भाई के गले लगकर वे रोने ही लगे थे कि उसने भी फटकार दिया था- अबे क्या औरतों जैसा रोता है? वो तो वैसे ही जाने वाली थी। उसे तो मुक्ति मिल गई। रोना बंद कर और मजबूत बन।’
फिर वे मजबूत बन गए थे। माँ और इकलौती बेटी के जाने पर भी रोए नहीं।
लेकिन बरसों से अकेले रहते हुए आज जब विदेश में सेटल बेटे को फोन लगाया तो बोलते बोलते रुलाई फूट ही पड़ी थी उनकी जिसे सुनकर भी बेटा पसीजा नहीं, उल्टे बरस ही पड़ा था- ‘पापा, अभी तो ऑफिस में आया हूँ। क्या रो- धोकर जब-तब इमोशनली ब्लेकमेल करते रहते हो?’
तभी एक मकान के अंदर से कुछ लोगों के जोर-जोर से हँसने और हँसने की कोशिश करने की आवाजें आईं तो वे वर्तमान में लौटे। उमड़- घुमड़ आए आंसुओं को रोका और चौंक कर उधर देखा, बाहर लिखा था- लॉफिंग क्लब।
‘लॉफिंग क्लब वा!’ वे बुदबुदाए, ‘जैसे लॉफिंग क्लब होते हैं वैसे वीपिंग क्लब, क्राइंग क्लब क्यों नहीं बनते हमारे यहां? जहां रोने पर इंसान को कोई रोके-टोके नहीं, कोई कायर न कहे, कोई मजाक न बनाए। वीपिंग क्लब, जहां वह खुलकर रो सके, अपने मन का सारा गुबार निकाल सके।’
सोचते-सोचते वे घर आ गए और दरवाजा बंद कर फूट-फूट कर रोने लगे।
उन्हें पता था दरवाजा, दीवारें और छत उनका, उनके रोने का कभी मजाक नहीं उड़ाएंगे।
- सुदामा नगर, आगर रोड, उज्जैन-452009 9424816096

बहुत बढ़िया