युवा कवयित्री। ‘चुप्पियों में आलाप’ और ‘भाषा में नहीं’ काव्य संग्रह प्रकाशित। संगीत और सिनेमा में गहरी रुचि। वर्तमान में उत्तराखंड शिक्षा विभाग में अध्यापन कार्य।

स्वीकारोक्ति

एक दिन
रक्त मांस और अस्थि से नहीं
बल्कि मर्यादा से बंधी
मेरी इस देह को छोड़ देंगे प्राण

एक दिन छूट जाएंगे
श्वास के सब बंधन, लाज की सब डोरियां

रीतियों, उपदेशों और लोकाचारों से दबी
मेरी इस छाती से हट जाएगा
यह क्रूर कठिन पत्थर एक दिन

मेरी आत्मा देह-अदेह के चक्रव्यूह से छूटकर
कई-कई प्रकाश वर्षों की अलंघ्य दूरी पर
करती रहेगी अपनी ही अस्मिता की परिक्रमा

एक दिन मेरे नहीं होने से
मिट जाएंगी मेरी मर्मांतक पीड़ाएं
और निश्छल चाहनाएं भी

एक दिन मेरी आंखें प्रतीक्षा से
और हृदय अकुंठ आदिम प्यास से
मुक्त हो जाएगा
मेरी अकथ पीर बह जाएगी

प्रेम का यह अंतिम दुख
मेरी मृत आसक्तियों की तरह यहीं छूट जाएगा

स्त्री होना और प्रेम व सम्मान की इच्छा रखना
यहां अपराध की तरह देखा जाता है
मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूँ

और यह भी कि
जब मैं नहीं रहूंगी
तब भी मेरे अतृप्त और खाली अन्तस की
उदास प्रार्थनाओं में
एक स्त्री होकर
सुखी रह सकने की कामनाएं रहेंगी!

निश्चिंतता

मेरी देह इन दिनों
अक्सर अपने पते पर नहीं मिलती

क्षितिज पर
अहर्निश टंगे सुरंगे दृश्यों
और मतवाले चैत का अखूट सौंदर्य
मुझे पुकारता है

मैं घाटी के
निचाट रस्तों पर भटकती रहती हूँ

मेरी तरसी हुई दीठ
केवल पहाड़ बादल नदी और
बांज, देवदार के लकदक पेड़ ही नहीं देखती
मौल्यार के धानी वैभव का
आह्लाद भी देखती है

चाय की छोटी धूसर दुकानों पर
सस्ते बिस्कुट और मैगी के पैकेट ही नहीं देखती
थके हारे लोगों की तृप्ति भी देखती है

इधर मैं एक दृश्य में
ठिठक कर प्रवेश करती हूँ
चौरंगीनाथ के मुख्य द्वार पर
चार हमउम्र बूढ़ों की
चमत्कृत करती फसक सुनती हूँ
देर तक मुस्कुराती हूँ

किसी कुल देवी की
फिरकियों चर्खियों और
फ्योंली बुरांश से सजी वह डोली देखती हूँ
जिसके शीर्ष पर
मनौती वाली चिट्ठियां बंधी हैं

क्षमता से अधिक
घास लकड़ियां ढोती स्त्रियों का
मुझ देसवाली को देख
खिस्स करके हँस देने का
कौतुकपूर्ण उल्लास देखती हूँ
उन मृदुल मीठे ठहाकों पर न्योछावर होती हूँ

चैत में मायके आई
बेटियों के अछोर सुख की तरह
एक निश्चिंतता
मेरी पूरी आत्मा में पसर जाती है
फेफड़ों में खूब गहरी सांस भरकर
मैं इस कविता के सहारे
धीरे-धीरे अपने एकांत में लौट आती हूँ।

प्रेम की हताशा

ध्यान में बाधा हूँ
चित्त में अन्यमनस्कता हूँ

दुर्दिन बहुरने का
मीठा, सुनहरा भुलावा हूँ
स्वयं को छलता और छेदता हुआ

नकली झूठे रत्नों की अंगूठी से
खोए प्रेम को दोबारा पा लेने का
ऊटपटांग टोटका हूँ
बहलावों, थकन और ऊब से भरा

मैं देह से चूकी शक्ति हूँ
मन से छीजता हुआ सामर्थ्य हूँ
लगाव और अपनेपन को तरसता कान हूँ
संज्ञाओं के मौलिक अर्थों से भटके
बिगड़े नामों में गूंजता उपहास हूँ

सहज बालपन की खीज हूँ, रुलाई हूँ

घर में अतिथियों की
औचक उपस्थिति से उपजी अव्यवस्था हूँ
दाल में पानी हूँ
गांठ का आखिरी नोट हूँ

लड़खड़ाए भाग्य के
पैरों की फटी बिवाई हूँ
ईश्वर की दुखती, पिराती
अंधी आंख का मोतियाबिंद हूँ

दुपट्टे को भेदती, देह तौलती
दृष्टि की क्रूर यातना का आक्रोश हूँ
स्त्री की आदिम लाज का दुख हूँ

मैं प्रेम का शोक हूँ
कविता की हताशा हूँ।

विस्मृति

विस्मृति से बड़ी कोई औषधि नहीं!
मन से निरंतर रिसते याद के घाव पर
उसी का लेप हो तो प्राण बचते हैं
मेरे जन्मचक्र में किंतु तुम्हारा स्मृति दोष है

दिन की कोई घड़ी हो, रात का कोई पहर
मन के कोमल तंतुओं को काटती
तुम्हारी याद की छुरी रुकती नहीं
उधर प्रेम के क्रूर ग्रहों को
अश्रुओं का अर्घ्य चढ़ता है
इधर मैं सूखती चली जाती हूँ

हे देवो, गंधर्वो, किन्नरो, नव ग्रहो
दसो दिशाओ!
तुमने कहीं देखी है क्या?
दुष्यंत की दी अंगूठी मुझसे कहीं खो गई है
मैं अपने ही बियाबान में भटक रही हूँ
अभिशप्त और अकेली

पीठ पर कामनाओं की शिला बांध
मुक्ति के ऊंचे, बहुत ऊंचे
पहाड़ पर चढ़ना आसान नहीं

मैं तुम्हारी याद का भारी पत्थर पीठ पर नहीं
सीने पर बांधे जाने कितने जन्मों की
असंभव यात्रा पर हूँ
कहते हैं, कुछ यात्राएं कभी पूरी नहीं होतीं
कहते हैं कुछ यात्री कभी कहीं नहीं पहुंचते!

संपर्क :द्वारा – आनंद विहार कॉलोनी, ए-12 चरण 2, एमआईटी कॉलेज के पास, ढालवाला, ऋषिकेश,  उत्तराखंड-249137