कविता संग्रह ‘मां और अन्य कविताएं, ‘मौन को मुखर होने दो’ एक लघुकथा संग्रह -‘एक स्पेस’। भोजपुरी में भी लेखन।

नई खबर

उन्हें नहीं पसंद है सपाट रास्ते
और सरल समाज
वे चाहते हैं कुछ हलचल
कुछ उठापटक
ताकि उनका अस्तित्व बना रहे
वे उकसाते रहें
आग सुलगाते रहें
तिल को ताड़ बनाते रहें
ताकि हर दिन मिलती रहे
और हर दिन बनती रहे
एक नई खबर।

स्पर्श

मेवाड़ के किलों की तरह
सख्त बन चुकी थी मेरी आत्मा
पर एक प्यार भरा स्पर्श क्या मिला
रेत की तरह ढह गई मैं।

प्रलय

नदियां रोना चाहती हैं
पर सुनने वाला कोई नहीं
नदियां कुछ दिखाना चाहती हैं
पर देखने वाला कोई नहीं
इसीलिए वे अब मौन हो गई हैं
बिलकुल एक स्त्री की तरह
और अब उन नदियों की खामोशियां
समय-समय पर
अपना प्रकोप दिखाती रहती हैं।

संपर्क : द्वारा जस्टिस दीपक रौशन, बंगला नंबर – 4, न्यू जज कॉलोनी, डोरंडा , रांची – 834002