
वरिष्ठ लेखिका और समीक्षक। अद्यतन पुस्तक ‘स्त्रीवादी चिंतन की विविध दिशाएं’। संप्रति इलाहाबाद में शिक्षिका।
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यदि स्त्री को सही मायने में सशक्त करना है, तो उसे शैक्षिक और आर्थिक रूप से समृद्ध करना जरूरी है। विवाह संस्था का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके निर्णय लेने की भूमिका पर पड़ा है। आज भी अपने पारिवारिक फैसलों में हम इन्हें शामिल नहीं करते। |
उपन्यास यथार्थ और संभाव्यता के बीच की एक रचनात्मक परिघटना है। यह ऐसी विधा है जिसमें समाज के प्रत्येक रंग और रेशे को देखा जा सकता है। यथार्थ और संभाव्यता के बीच एक द्वंद्वात्मक संबंध है। यहां समीक्षित तीनों उपन्यास में स्त्री जीवन के अलग-अलग शेड्स हैं, किंतु समस्याएं लगभग एक-सी हैं।
भगवान दास मोरवाल का ‘काँस’ एक स्त्री विषयक उपन्यास है, जो स्त्री की सामाजिक, राजनीतिक और न्यायिक स्थिति का अंकन करता है। यह हमारे समाज की विसंगतियों और अंतर्विरोधों को रेखांकित करता है जो कस्टमरी लॉ जैसे अमानुषिक कानूनों के चलते अत्याधुनिक और सभ्य कहे जाने वाले समाज में गहराई से मौजूद हैं। विवाह संस्था की विद्रूपताओं को इसमें लेखक ने बखूबी उभारा है।
भारतीय उपमहाद्वीप में महिलाओं की नियति एक जैसी है। सभी धर्मों ने स्त्रियों को अवरुद्ध कर रखा है। भारत के एक समुदाय में प्रचलित कानून को न केवल वैधानिकता प्राप्त है, बल्कि आजाद भारत में उसका इस्तेमाल संविधान के विरुद्ध खुलेआम हो रहा है। रिवाजे-आम एक ऐसा ही कानून है। यहां चलती है तो सिर्फ उस विधान की जो स्त्री को केवल दोयम दर्जे का नागरिक मानने में यकीन करता है। जिस देश का संविधान स्त्री के अधिकारों की रक्षा का वचन देता है, उसी देश की असंख्य बेटियों और स्त्रियों को इस कानून की आड़ में पैतृक संपत्ति से वंचित कर, दर-दर भटकने और ठोकर खाने पर विवश किया जाता है।
‘काँस’ उपन्यास केवल चांदनी, जैतूनी, जैनब, शाइस्ता, समीना, अरस्तून की कहानी नहीं है। भारतीय समाज में आम स्त्री काँस की तरह अनचाही घास की तरह है जो चौमासे के बाद पृथ्वी की सख्त देह को फोड़कर अपने आप उग जाती है।
भगवानदास मोरवाल के इस उपन्यास में लोक संस्कृति की छटा है, मेवात की जनपदीय गंध है। यह उपन्यास सभ्य कहे जाने वाले अत्याधुनिक समाज में स्त्री की स्थिति और दिशा को विस्तृत रूप में व्यक्त करता है। यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि दिल्ली से सटे होने के बावजूद हरियाणा के पिछड़े जिले मेवात का मेव समुदाय आज भी आधुनिक चेतना और प्रगतिशील विचारों से दूर क्यों है। ‘काँस’ उपन्यास मेवात में मर्दवादी कानून अर्थात ‘कस्टमरी लॉ’ जैसे अमानुषिक और बर्बर कानूनों की तेज धार से लहूलुहान होती सामान्य स्त्रियों की दास्तान को बयान करता है। लेखक ने बड़े संवेदनशील ढंग से इस समाज के गहरे अध्ययन से मेवात की बेटियों की बेबसी का वर्णन किया है।

जिज्ञासा : ‘काँस’ उपन्यास मुख्य रूप से कानून की बलिवेदी पर जिबह होती बेटियों की व्यथा-कथा है। इसको लिखने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
भगवानदास मोरवाल : आपने पहला ही प्रश्न बड़ा रोचक पूछ लिया। जहां तक इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा का प्रश्न है, उसके लिए लगभग दो दशक पीछे जाना पड़ेगा। वह इसलिए कि अपने पहले दो उपन्यासों ‘काला पहाड़’ और ‘बाबुल तेरा देस’ में जिनकी पृष्ठभूमि मेवात है, के बाद मुझे कोई विषय नहीं सूझ रहा था। उन्हीं दिनों मैंने हरियाणा के मेवात, विशेषकर पुराने गुड़गांव जिले के मेव समुदाय में प्रचलित इस रिवाज के बारे में सुना और रिवाजे-आम अर्थात कस्टमरी लॉ के नाम पर बने इस जमींदारी कानून को जानने की और जिज्ञासा पैदा हुई। इसे जानने के लिए मैंने इस कानून के जानकार वकीलों के बारे में पता किया, तो गुड़गांव शहर, जो उस समय इसी जिले का हिस्सा था, उसके एक वकील का पता चला। वह इस कानून का विशेषज्ञ था, क्योंकि निचली अदालतों के बाद इससे जुड़े मामले डिस्ट्रिक्ट जज और सेशन जज के पास आते थे। मैं एक बार इस वकील से मिला भी था। मैंने मिलकर इनसे अपनी इच्छा जाहिर की कि मैं इस कानून पर एक उपन्यास लिखना चाहता हूँ, मुझे आपसे कुछ जानकारी चाहिए। इसी बीच मुझे अपने तीसरे उपन्यास ‘रेत’ (2008), जो एक समय की अपराधी जनजातियों में से एक कंजर समुदाय को केंद्र में रखकर लिखा गया है, उससे जुड़ी कुछ सामग्री और जानकारी मिल गई। इसके बाद मैंने रिवाजे-आम पर लिखे जाने वाले उपन्यास को वहीं छोड़ दिया और ‘रेत’ पर जुट गया।
आप कह सकते हैं कि ‘काँस’ के असल बीज मेरे तीसरे उपन्यास के रूप में अंकुरित हुए थे।
जिज्ञासा : विवाह संस्था की कौन-सी ऐसी धारणाएं हैं, जिनका सीधा और सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर पड़ता है?
भगवानदास मोरवाल : यह एक बहुत जटिल प्रश्न है। यदि आप विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास’ पढ़ेंगे, तो शायद इसका कोई उत्तर मिल जाए। हालांकि भारत में विवाह संस्था के अस्तित्व में आने के दूसरे कारण थे। मुख्य कारण था स्त्री को केवल एक भोग्या के रूप में देखने की मर्दवादी कामुकता। उस समय के परिवारों में रिश्तों की कोई स्पष्ट परिभाषा तय नहीं हुई थी। इतना ही नहीं, अतिथि के आगमन पर उसके पास घर की स्त्री को उसके विलास के लिए भेजना अनिवार्य था। इसके चलते समाज में व्यभिचार बढ़ गया। रिश्तों की शुचिता तार-तार होने लगी। इसी व्यभिचार को समाप्त करने के लिए विवाह संस्था अस्तित्व में आई। बाद में इस संस्था का दुरुपयोग संपत्ति के बंटवारे में किया जाने लगा। दरअसल, रिवाजे-आम अर्थात कस्टमरी लॉ आदिवासियों, जनजातियों और कुछ समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को नष्ट होने से बचाने की गरज से किया गया था। लेकिन आगे जाकर कानूनी वैधता प्रदान कर दी गई। इसके चलते बेटियों को अपने पिता की संपत्ति से हाथ धोना पड़ रहा है। मेरा मानना है कि यदि स्त्री को सही मायने में सशक्त करना है, तो उसे शैक्षिक और आर्थिक रूप से समृद्ध करना जरूरी है। विवाह संस्था का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके निर्णय लेने की भूमिका पर पड़ा है। आज भी अपने पारिवारिक फैसलों में हम इन्हें शामिल नहीं करते।
जिज्ञासा : इस कुप्रथा का अंत कैसे होगा?
भगवानदास मोरवाल : यह शायद देश में एकमात्र ऐसा कानून है जिसके आगे न संविधान की चलती है, न शरीयत की। यह जिम्मेदारी मेवात के नागरिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और जागरूक महिलाओं की है कि वे इस बर्बर कानून के विरुद्ध आवाज उठाएं। मैं कई बार सोशल मीडिया पर इसके दुष्परिणामों के बारे में बता चुका हूँ, यहां तक एक उपन्यास भी लिख दिया है। इस देश का दुर्भाग्य यह है कि अपने समाज की कुरीतियों और कुप्रथाओं को हम धर्म और मजहब के चश्मे से देखने लगे हैं॥ इसलिए यदि आज भी यह कानून प्रचलित है, तो इसका सबसे बड़ा जिम्मेदार मेवात का मेव समुदाय है।
जिज्ञासा : अकबरी, फरजाना, काकी मलूकी, कुलसुम, मरियम और जाहिदा जैसी स्त्रियों की नियति क्या है?
भगवानदास मोरवाल : हमारे लोक साहित्य से लेकर धर्मग्रंथों चाहे वे हिंदू धर्मग्रंथ रहे हों अथवा मुस्लिम धर्मग्रंथ सभी स्त्री-विरोधी निर्देशों से भरे हुए हैं। इसकी अनुगूंज हमें अक्सर स्त्री-विमर्श संबंधी साहित्य में सुनाई देती है। इस मामले में एक समय पश्चिमी देशों के हालात भी अच्छे नहीं थे। यदि अच्छे होते तो केट मिलेट, जर्मन ग्रेअर, सुसान एंथोनी, सिमोन द बोउआ जैसी स्त्रीवादी चिंतक और लेखिकाओं को स्त्रियों के अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठानी पड़ती। सिमोन द बोउआ का यह कथन आज एक सूक्ति बन गया है- ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।’ इसलिए जो नियति ‘काँस’ उपन्यास के स्त्री पात्रों की है, कमोबेश वही नियति पूरे समाज की स्त्रियों की है।
जिज्ञासा : स्त्रियों के लिए आज आजादी के क्या मायने हैं?
भगवानदास मोरवाल : स्त्री-मुक्ति से जुड़े प्रश्न आज राजनीतिक पद या कहिए नारों में तब्दील हो चुके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है महिला आरक्षण विधेयक, जिसके अनुसार महिलाओं के लिए लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रस्ताव है। यह बिल आज भी कूड़ेदान में पड़ा हुआ है। स्त्री भले आज कितनी भी आर्थिक और शैक्षणिक रूप से समर्थ हो जाए, साहित्य में हम लाख स्त्री विमर्श की बात कर लें, लेकिन पुरुष कभी मन से नहीं चाहेगा कि वह उसके बराबर आ जाए। दरअसल स्त्री-मुक्ति और स्त्री-स्वतंत्रता के मायने आज बहुत व्यापक और जटिल हो गए हैं।
मेरी नजर में स्त्री की आजादी उसकी सामाजिक संरचना, परिवेश और मर्दवादी नजरिए पर अधिक निर्भर करती है।
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अकबर द्वारा पुनर्जागरण का सूत्रपात हुआ था- सती प्रथा को खत्म करने की कोशिशों में, धार्मिक कट्टरता को समाप्त करने के प्रयासों में; प्रजा के अज्ञान का लाभ लेकर कलह के बीज बोने के जवाब में ज्ञान को आम जनता तक पहुंचाने के प्रयत्नों में, और जीवन से अंधविश्वासों को उखाड़ फेंकने की उसकी कोशिशों में। |
प्रदीप गर्ग का उपन्यास शहंशाह अकबर : एक अनमोल विरासत अपने आप में विशिष्ट है। इसमें अकबर के कालखंड को इतिहास के अनुत्तरित प्रश्नों को उठाने का प्रयास है। अकबर के जीवन पर लिखे गए कई उपन्यासों में उसके साथ न्याय नहीं हुआ। लेखक का मानना है कि अकबर न सिर्फ एक महान साम्राज्य का संस्थापक था बल्कि वह ऐसी शख्सियत था जिसकी द़ृष्टि प्रगतिशील थी। अंधविश्वासों और विचित्र धारणाओं के समय में उस बुद्धिवादी बादशाह ने न केवल इस देश में पुनर्जागरण का सूत्रपात किया, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले राजा राममोहन राय से तीन शताब्दी पहले सामाजिक सुधारों के कार्यक्रमों की शुरुआत करने की यथासंभव कोशिश की।
लेखक ने अकबर के व्यक्तित्व के उन पक्षों का उजागर किया है, जिसे इतिहासकारों ने तोड़-मरोड़कर व्यक्त किया है। अकबर ने हिंदू और बाकी धर्मों तथा संप्रदायों के प्रति बहुत ही सकारात्मक रवैया रखा था और सभी को बराबरी का दर्जा दिया था। भारत में गंगा-जमुनी तहजीब को पल्लवित एवं पुष्पित करने का श्रेय अकबर को जाता है।
प्रदीप गर्ग ने अकबर के ऐसे रूप को भी उभारा है जहां उनके आध्यात्मिक विकास में सूफीवाद और वैदिक अद्वैतवाद का सामंजस्य झलकता है। लेखक ने लिखा है- ‘इस पुस्तक का फलक अकबर की पूरी जिंदगानी है, पैदा होने से लेकर उसके इंतकाल तक। उसका उदास और तनहा बचपन। पिता को खोकर एक अनजान देश में भय और असुरक्षा से जूझता कैशोर्य यौवन की दहलीज पर प्रेम की उमंग, निराशा व हताशा। फिर साजिशों के जंगल से और कई लड़ाइयों के इम्तिहान से गुजरकर हिंदुस्तान का साम्राज्य खड़ा करना और अपनों का विरोध सहकर भी उसे एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप देना। इसके साथ ही तत्कालीन हिंदुस्तान का सजीव चित्रण भी इस पुस्तक में है।’
कथाकार ने अकबर जैसे इतिहास पुरुष के जीवन की दास्तान को बहुत ही गंभीरता के साथ औपन्यासिक कलेवर में पिरोया है। वर्तमान समय में इस तरह के ऐतिहासिक उपन्यासों की बहुत आवश्यकता है जो तथ्यों की रक्षा करते हुए महान चरित्रों को बहुत रोचक ढंग से व्यक्त करते हैं। यह एक जीवनीपरक ऐतिहासिक उपन्यास है।
इस उपन्यास में लेखक ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदू राजाओं द्वारा बगैर हिचक के अपनी बेटियों का चाहे-अनचाहे अकबर से विवाह है। उपन्यास स्त्री प्रश्न को भी छूता है। स्त्रियों के साथ जिस तरह का व्यवहार हिंदू समाज में होता आ रहा है, वह पशु के साथ किए गए व्यवहार से भी गया गुजरा रहा है।
हमें कई आपत्तियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि अकबर अपने समय के सबसे बड़े संवाद पुरुष थे। प्रदीप गर्ग ने अकबर पर उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, हिंदी में प्राप्त सामग्री का बहुत सटीक प्रयोग किया है। उन्होंने अकबर के चरित्र को सहृदयता से व्यक्त किया है।

जिज्ञासा : भारतीय इतिहास में बहुत सारे ऐतिहासिक चरित्रों ने धर्म और राजनीति को प्रभावित किया है, आपने अकबर को ही क्यों चुना?
प्रदीप गर्ग : अकबर के जीवन पर केवल दो औपन्यासिक कृतियां मुझे उपलब्ध हो सकी थीं। अकबर को कामलोलुप, युद्धपिपासु एवं क्रूर व्यक्ति के रूप में, और सिर्फ इसी रूप में चित्रित करती हैं। दोनों पुस्तकें पश्चिमी लेखकों की थीं और उनके उपन्यासों में तथ्यात्मक त्रुटियों की भरमार थी। वे भारत के इतिहास के सांस्कृतिक पक्ष की समझ के अभाव को भी रेखांकित करती थीं। पश्चिमी लेखक उस ‘इबादतखाना’ को समझ ही नहीं पाए जो शिकागो में हुए सर्वधर्म-सम्मेलन के लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व घटित हुआ विश्व इतिहास में सर्वप्रथम सर्वधर्म-सम्मेलन था! जब पूरी दुनिया में और हर धर्म में कट्टरता और संकीर्णता का बोलबाला था, अकबर के द्वारा उठाए गए इस क्रांतिकारी कदम के इतिहास को मैं लोगों के सामने लाना चाहता था।
जिज्ञासा : अकबर और राजपुताने के बीच के संबंध को आप किस रूप में देखते हैं।
प्रदीप गर्ग : आज जिस तरह मणिपुर में कुकी और मैतेई एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं, ऐसा ही देश के विभिन्न हिस्सों में हो जाए; विभिन्न समुदाय एक-दूसरे की जमीन पर कब्जा करने के प्रयासों और षड्यंत्रों में लिप्त हो जाएं, और किसी केंद्रीय शक्ति द्वारा मध्यस्थता को स्वीकारने से सब इनकार कर दें तो क्या भारतवर्ष एक राष्ट्र कहला सकेगा? जब अकबर दिल्ली की गद्दी पर बैठा, ‘राष्ट्र’ शब्द तब अप्रचलित था। छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए परस्पर लड़ते रहने वाले राज्यों के भूभाग को जिसे हिंदुस्तान कहा जाता था, अकबर ‘एक’ करना चाहता था। इस सपने को साकार करने के लिए उसे राजपूतों की जरूरत थी, जिनकी बहादुरी और नमकहलाली एक किंवदंती थी। राजपूतों में आरंभिक प्रतिरोध था। मगर अकबर ने अपने व्यवहार और नीतियों से उनके प्रतिरोध को समर्थन में बदल दिया और उनकी मदद से अपने सपने को मूर्त रूप दिया।
जिज्ञासा : आपको किस घटना ने अधिक उत्प्रेरित किया?
प्रदीप गर्ग : अकबर के जीवन में ज्ञान-पिपासा का उदय; उसका विभिन्न धर्मों के धर्माचार्यों के साथ चर्चारत रहना और फिर इबादतखाना में सभी धर्मों एवं संप्रदाय के साथ, हिंदुओं, जैन और बौद्ध, मुसलमानों में शिया, सुन्नी और सूफ़ी के अलावा जो भी संप्रदाय थे उनके उलेमा तथा मौलवियों को लेकर पारसियों एवं ईसाइयों के नुमाइंदों को और इसके अलावा उस समय जो कई संप्रदाय थे जिनका आज अस्तित्व शेष नहीं है उनके मुखियाओं को बाइज्जत बुलाकर धर्मों के मूल में निहित समानता को बाहर लाने का उसका प्रयास मेरी नजर में सबसे बड़ी घटना है।
जिज्ञासा : क्या अकबर ने किसी पुनर्जागरण का सूत्रपात किया?
प्रदीप गर्ग : पुनर्जागरण का अर्थ है सोई हुई चेतना को जगाना। जो अच्छा खो दिया है, उसे पुन: प्राप्त करना। हम इस शब्द का प्रयोग यूरोप पुनर्जागरण के संदर्भ में करते हैं जब यूरोप ने अपनी रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं अतार्किक मान्यताओं को त्यागकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हर विश्वास को परखना आरंभ किया था। इस अर्थ में अकबर द्वारा पुनर्जागरण का सूत्रपात हुआ था- सती प्रथा को खत्म करने की कोशिशों में, धार्मिक कट्टरता को समाप्त करने के प्रयासों में; निहित स्वार्थों द्वारा प्रजा के अज्ञान का लाभ लेकर कलह के बीज बोने के जवाब में ज्ञान को आम जनता तक पहुंचाने के प्रयत्नों में, और जीवन से अंधविश्वासों को उखाड़ फेंकने की उसकी कोशिशों में। इसके कारण उसे इस्लाम के कट्टर लोगों का जबरदस्त विरोध सहना पड़ा था।
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ऐसा हमेशा होता आया है। प्राचीन युद्धों में स्त्री को ही बंधक बनाया जाता था, प्रताड़ित किया जाता था। स्त्री बनाम पुरुष के इस ‘वर्ग-संघर्ष’ का स्वरूप बहुत नहीं बदला। आज भी सामाजिक उथल-पुथल का फायदा उठाते हुए स्त्री को अपना शिकार बनाने से उसके ‘सगे’ भी नहीं चूकते। |
‘रोमियो, जूलियट और अँधेरा’ उपन्यास चर्चित और सजग कथाकार कुणाल सिंह का है। यह आज के जीवन की ट्रैजडी पर आधारित है। इसकी कहानी असम और गौहाटी के आसपास से शुरू होती है। हिंदी अध्यापक मनोज और स्थानीय लड़की अनुभा की प्रेम कहानी को बहुत ही सहज ढंग से व्यक्त किया गया है। यह असम में आंदोलन के दौर की प्रेम कहानी है जिसके किरदार मजबूत है और भाषा का बहुत सशक्त प्रयोग है। यह वस्तुतः अनिष्ट की छाया से आक्रांत और भयाक्रांत लोगों की कहानी है। किसी से प्यार करना या नहीं तो नफरत ही करने लग जाना- किसी को खोजना, खो देना और फिर पाने के लिए अनवरत चेष्टा करते रहना हमारी जिंदगी को सहसा एक नया अर्थ दे देता है।
यह उपन्यास असम में उत्तर प्रदेश, बिहार के लोगों के उत्पीड़न और दमन की पृष्ठभूमि में रचा गया है। लेकिन इसमें मुख्यत: लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की हत्या करने वाली बर्बर ताकतों का प्रतिरोध है। इस उपन्यास की कहानी वास्तविक दुनिया का साक्षात्कार कराती हुई पाठकों को प्रभावित करती है। प्रेम के भावों की प्रस्तुति दुनिया को रौशन करती है। इसमें रोशनी और अंधेरे के बीच का वह आदिम खेल है जो सभ्यता के कथित विकास की विडंबनाओं को उजागर करता है। उपन्यास को पढ़ते हुए महसूस होता है कि आज चारों ओर बर्बरता का भाव फैलता जा रहा है। हर जगह बेबसी, आतंक और शतरंजी विसात है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए आभास होता है कि हर भाषा के अपने दुख, मातम और अंधेरे हुआ करते हैं। उपन्यास की पंक्तियां हैं ‘कहानी में मुख्यमंत्री का कयास था कि उनके शासनकाल में असम की जनता में इन उग्रवादी संगठनों के प्रति हमदर्दी के ग्राफ में तेजी से गिरावट आई है, जिससे ये बुरी तरह बौखला गए हैं।’ हिंसा की जो भी वारदातें होती हैं, उसके पक्ष में सभी अपना अपना बचाव करते हैं।
कुणाल सिंह का उपन्यास ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’, प्रेम, अंधकार और प्रतिरोध का एक शोकगीत है।

जिज्ञासा : आमतौर पर बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में दुर्व्यवहार होता है। असम की स्थिति का रेखांकन करते समय आप किस घटना से विशेष रूप से प्रभावित हुए?
कुणाल सिंह : असम में परप्रांतियों के प्रति रोष का माहौल कोई नया नहीं है, समय-समय पर इसे हवा दी जाती रही है। लेकिन वर्ष 2003 के आसपास रेलवे की चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिया जाए एवं दूसरे प्रांत के लोगों की बहाली पर रोक हो, इस मांग के साथ आंदोलन में तेजी आई थी। विद्यार्थी संघों के नेतृत्व में व्यापक जनाक्रोश देखा गया था। मेरी कहानी इसी काल को चुनती है। आप देखें कि इसके पीछे की जो राजनीति है, वह इस उपन्यास की नायिका अनुभा की जुबानी एक स्थान पर उद्घाटित किया गया है। साथ ही परप्रांतियों पर इसका कितना भीषण प्रभाव पड़ता है, उपन्यास का एक चरित्र रामदहिन कामती खुद इसकी नजीर है। असम में परप्रांतियों से दुर्व्यवहार को वह महाराष्ट्र तथा अन्य कई स्थलों से जोड़ता है। आज विदेशों में भी भारतीय तथा तीसरी दुनिया के अन्य देशों की जनता के साथ दुर्व्यवहार एवं भेदभाव आम बात है।
जिज्ञासा : प्रेमकथा के लिए आपने रोमियो जूलियट और अँधेरा शीर्षक का ही चयन क्यों किया?
कुणाल सिंह : ‘रोमियो जूलियट और अँधेरा’ ओत्सेनासेक के एक उपन्यास का भी शीर्षक है, जिसका हिंदी अनुवाद निर्मल वर्मा ने किया है। प्रभाकर श्रोत्रिय तब ज्ञानपीठ के निदेशक हुआ करते थे। उन्होंने इसे मेरी पहली किताब के शीर्षक के रूप में सिर्फ इसी बिना पर अस्वीकृत कर दिया था कि इस शीर्षक से पहले से ही एक किताब है। बाद में यह हार्पर कॉलिंस, हिंदी से आई। आजकल लोकभारती इसे प्रकाशित एवं वितरित कर रहा है। बहरहाल, ऐसी कोई बाध्यता न थी कि इसका शीर्षक यही रखा जाए।
किसी किताब का शीर्षक क्या और क्यों है, इसका कोई खास कारण नहीं होता। उस वक्त यही सटीक लगा, रख दिया। रोमियो और जूलियट वे पात्र हैं जो प्रेमी-प्रेमिका के रूप में लैला-मजनूं, शीरीं-फरहाद जैसी अमरता को प्राप्त कर चुके हैं। इनके बरक्स अंधेरे को रखा गया है। इसमें जो पद है- अंधेरा, वह कथा के उस हिस्से को आलोकित करता है जो प्रेमकथा के लिए अवांछित है, जिसमें हम रहने, रचने और प्रेम करने को अभिशप्त हैं।
जिज्ञासा : पूरी कहानी परप्रांतियों के प्रति स्थानीय रोष को उजागर करती है, लेकिन कथा के अंत में क्रूरता का ग्रास बनती है कथानायिका, जो स्वयं असमिया मूल की है। इस विरोधाभास को स्पष्ट करें।
कुणाल सिंह : किसी भी व्यापक सामाजिक त्रासदी का उत्स नितांत तुच्छ और वैयक्तिक किस्म का होता है। आप देखें कि परप्रांतियों के प्रति रोष और आक्रोश ही था तो कहानी में उसका स्वाभाविक शिकार कथानायक मनोज को होना चाहिए था जो बिहारी था। लेकिन होता उल्टा है। असामाजिक तत्व उसे मारते-पीटते जरूर हैं, लेकिन नायिका बलात्कृत होती है और अपने ‘सगों’ के हाथों मारी जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि स्थानीय बनाम परप्रांती से भी बड़ा भेद है स्त्री और पुरुष का। स्त्री, चाहे स्थानीय अथवा अपनी मजहब, अपने वर्ग की ही क्यों न हो, अंतत: वह जैविक रूप से अपनी कमजोरी का दंड भुगतती है। अनुभा को मार डालने वाले लोग उसके अपने प्रांत के थे। अगर वे अपने एजेंडे पर ही होते, तो ऐसा कतई न होता। उनका कोई और भी ‘हिडन एजेंडा’ था, जिसका शिकार वह बनी। ऐसा हमेशा होता आया है। प्राचीन युद्धों में इन्हें ही बंधक बनाया जाता था, प्रताड़ित किया जाता था। स्त्री बनाम पुरुष के इस ‘वर्ग-संघर्ष’ का स्वरूप बहुत नहीं बदला। आज भी सामाजिक उथल-पुथल का फायदा उठाते हुए स्त्री को अपना शिकार बनाने से उसके ‘सगे’ भी नहीं चूकते।
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समीक्षित पुस्तकें–
(1) काँस, भगवान दास मोरवाल, राजकमल प्रकाशन, 2024
(2) शहंशाह अकबर : एक अनमोल विरासत, प्रदीप गर्ग, लोकभारती प्रकाशन, 2024
(3) रोमियो, जूलियट और अँधेरा, कुणाल सिंह, लोकभारती पेपरबैक्स, 2025
12/24/47/1-सी, मुइर रोड, ट्रैफिक पुलिस लाइन के पास, प्रयाग राज-211001 मो.9415616083



