वरिष्ठ लेखिका। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। संप्रति उत्तराखंड में प्राध्यापिका।

बेटियों को लगता था कि उनके मायके का मकान अभी लंबे समय तक ऐसा ही रहेगा। उनके छुटपन के संदूक-आलमारियां, बुक शेल्फ, मेज-कुर्सियां, पलंग-तख्त – सब यथावत रहेगा। जब भी वे यहां आएंगी, उन्हीं को छू-छूकर मां-पिता जी को अनुभव कर लेंगी। नरी भाई साहब को तो हमेशा जरूरत रहेगी इनकी, इनसे लगाव भी होगा। जहां तक छोटे सुरू भाई की बात है, उसको शायद ही कोई दिलचस्पी हो इन सब में। इंटर के बाद वह रहा ही कब यहां! पढ़ने में तेज था। इंटर करते ही इंजीनियरिंग में निकल गया। मद्रास आई.आई.टी. से पढ़ाई की। वहां से निकलने से पहले ही एक जानी-मानी कंपनी ने उसे लपक लिया। फिर तो एक लंबी विरुदावली है उसके माथे पर सजती नई उपाधियों और उपलब्धियों की। देहरादून उसके लिए बहुत छोटा हो गया था। उसकी धर्मपत्नी यानी छोटी भाभी और बच्चों को तो यहां से क्या ही मोह होगा! फिलहाल कुछ हिलनेवाला नहीं है।

लेकिन, बहुत जल्दी सब कुछ हिल गया। बहनों को सचमुच उस समय धक्का लगा, जब छोटे ने प्रस्ताव रखकर सबको चौंका दिया। वह भी पिता जी की तेरहवीं के दिन। पिता जी ढंग से विदा भी नहीं हुए थे। उनका पलंग, आराम कुरसी,  आलमारी, संदूक, चाबियों का गुच्छा, कपड़े, जूते, डायरी, पेन- सब नजरों के सामने यथावत था।

सुबह से ही बड़ी भाभी पूजा-हवन की तैयारी की दौड़-धूप में थी। एक बजे तक तर्पण, हवन, गोदान, पूर्णाहुति, ब्राह्मण भोज, दक्षिणा -सब  निबट गया था। चार-साढ़े चार बजे तक आखिरी बंदे ने भी पितृ प्रसाद ग्रहण कर लिया था। तेरहवीं का सारा जिम्मा सुरू भाई ने उठाया हुआ था। जीते जी पिता भले सीईओ के पिता जी न लगे हों, मगर मरने पर वे पक्के सीईओ के पिता लग रहे थे। वे शहर के पुराने वासिंदे थे। जान-पहचान का दायरा बड़ा है, लोग उमड़े चले आए। बड़ी भाभी केंद्र बनी हुई थी। पिता जी हम सबके थे, लेकिन कार्यक्रम केवल बड़ी भाभी का लग रहा था। पंडित उन्हीं से मुखातिब, लोग उन्हीं से परिचित, रिश्तेदारों की गुफ्तगू भी उन्हीं से। दोनों भाइयों की व्यस्तता अपने किस्म की थी। जीते जी पिता की गति-अगति जैसी रही हो, लेकिन दिवंगत होने पर उनकी सद्गति सुनिश्चित करने के विधान में दोनों बेटे पंडित जी के संकेतों का विधिवत पालन कर रहे थे। और छोटी भाभी को परिचय की जरूरत पड़ रही थी। लोग अनुमान लगा ले रहे थे, लेकिन पुष्टि, कभी ‘सुरू की बहू’ कभी ‘ममता की चाची’ के रूप में करनी पड़ रही थी।

बड़ी भाभी आज कुछ चहकती-सी लग रही थी। कोई नकारात्मक भाव नहीं। वेश-विन्यास शादी-ब्याह जैसा ही। गृहसज्जा भी मनलुभावन। पिता जी का बड़ा-सा फ्रेम लगा फोटो बाहर मेज पर पूरी सज्जा के साथ। फोटो में पिता जी मुस्करा रहे हैं।

सहसा रंजना को बिस्तर पर पड़े रुग्ण पिता की याद हो आई। जीर्ण काया और खाली-खाली आंखें। कमरे में पसरे सन्नाटे और सकुचाते प्रकाश में अवसाद निंद्रा में झूलते वे कई बार आने वाले को आशंकित कर देते थे। आते ही रंजना सबसे पहले आधे-अधूरे खुले खिड़की-दरवाजों को पूरा खोल देती। कमरे की मनहूस हवा बाहर चली जाती। रोशनी झांकने लगती। बिस्तर में स्पंदन होने लगता, ‘कौन?’

‘पिता जी, मैं रंजू। प्रणाम।’ रंजना कुछ ज्यादा जोर से बोलती।

कुछ वक्त लगता था पिता जी को पहचानने में। लेकिन आज पिता जी सबको पहचान रहे हैं। सब प्रसन्न हैं। खूब बतिया रहे हैं। चुहल-मजाक भी चल रहा है। हवा में पकवानों की सुगंध तिर रही है। खाने की तारीफ हो रही है। भाभियों के मायके से भी लोग आए हैं। उन्होंने लिफाफा भी पकड़ाया। पूरा उत्सव का माहौल है। पिता जी नब्बे पार कर चुके थे। पिता जी के सामने अभय भी नौकरी में लग गया था। अफसोस भी कैसा! ऐसे में उत्सव  ही होना है – मृत्यु  का उत्सव! रंजना ने दिमाग को झटका दिया। अब बस, सब कुछ भूलना चाहती है वह। 

दो बजे तक पंडित और विप्रगण विदा हो चुके थे। चार बजे तक लोगों की आवाजाही बनी रही। निबटते-निबटते शाम के सात बज गए। मेहमान लगभग जा चुके थे। बस बुआ जी रह गईं। उनका बेटा साथ ले जा रहा था। भाभी ने रोक लिया। रंजना को अच्छा लगा कि बुआ जी रुक गईं। पिता जी के जाने पर दोनों बहनों के अलावा बस बुआ की आंखों में आए थे आंसू। वे सारे दिन नाते-रिश्तेदारों से मिलने-जुलने में रहीं। थक भी गईं। भाभी ने अपने कमरे में सुला दिया।

जो फैला-बिखरा था, उसे संभलवा कर, हाथ-मुंह धोकर चारों भाई-बहन बैठक में बैठ गए। वही परदे, वही सोफा, पिता जी की वही कुरसी, कोने में छड़ी। बस पिता जी नहीं हैं। यह पहली बार था कि चारों भाई-बहन एक साथ घर पर हैं और न मां है, न पिता। एक खालीपन का अहसास हवा में तिर गया। स्मृतियां संस्मरण बन उमड़ने लगीं। होते-होते बात पिता जी की कार्यशैली पर आ गई। पिता जी को किसी काम में देरी सहन नहीं होती थी। अभय से तो उनकी तकरार हो जाती थी।

‘…दादा जी अभी बहुत समय है, अप्लाई करने में।’

‘समय बहुत है तो क्या आखिरी दिन, आखिरी घंटे की इंतजारी में बैठे हो… फुरसत है तो अभी क्यों नहीं कर लेते!’ अभय और पिता जी के बीच के वाकये को भाभी ने दोहराया तो सबके अधरों पर एक उदास मुस्कान उभर आई।

भाई साहब, मकान का भी देख लेते हैं’, एकाएक छोटा बोल पड़ा।

क्या!’, निकला था बड़े के कंठ से। उन्होंने यह कभी स्वीकारा ही नहीं था कि पिता जी पर उनके किसी और बच्चे का भी कुछ हक बनता है। दोष अकेला उनका नहीं है। पिता जी ने हवा ही ऐसी बना रखी थी।

हमारी भी उम्र हो रही है। पेरेंटल प्रोपर्टी का समय रहते निस्तारण जरूरी है। बाद में दावेदारों की संख्या बढ़ने से बहुत दिक्कत हो जाती है।छोटे ने मजबूती से अपनी बात रख दी।

नरी भाई साहब से ज्यादा भाभी को बुरा लगा। फैल कर रहने की आदत पड़ चुकी थी। मां जी के बाद वे पूरी हवेली की एकछत्र मालकिन बन गई थी। पिता खुद में सिमट गए थे।

‘पिता की जिम्मेदारी भी आधी-आधी समझते।’ भाभी तुनक कर बोल पड़ी।

‘कौन किसकी जिम्मेदारी बना रहा, भाभी जी, मैं इसपर नहीं जाना चाहता। मैं आपका बहुत आदर करता हूँ।’ ज्यादा कुछ न कहते हुए भी छोटे ने सब कुछ कह दिया। वह अपनी शक्ति और समय का निवेश सोच-समझ कर करता है। भाभी भी समझ गई। गनीमत है केवल मकान की ही बात उठाई।

‘भाईसाहब बंटवारा होने पर फस्ट चॉइस आपकी होगी। मकान का जो हिस्सा आप रखना चाहोगे, आप रख लेना। आपको तो यहां रहना है।’ कहते-कहते सुरू ने मकान में बहनों के भी शेयर की बात कह दी- ‘कायदे से मकान के चार हिस्से होने चाहिए।’

यह कुछ ज्यादा हो गया था। सुनीता दीदी ने यह कहते हुए माहौल को थाम लिया- ‘पिता जी हम दोनों बहनों को एक-एक लाख रुपये दे चुके हैं। देते समय यह भी साफ कर दिया था कि मकान दोनों भाइयों का होगा…।’

‘सास जी ने अपने सारे जेवर भी बेटियों को दे दिए, हैं न दीदी!’ कह कर भाभी ने बात और खोल दी। सुनीता है तो नरेंद्र भाई से छोटी, लेकिन उम्र में भाभी से बड़ी हैं। शादी भी पहले हो गई थी।

‘जी भाभी, मां जी ने अपने बचे हुए गहने हमको दे दिए।’

‘उनके हाथों में जो चार चूड़ियां थीं’, रंजना ने दीदी की अधूरी बात को पूरा करने का बीड़ा उठाते हुए खुलासा किया, ‘दो-दो दोनों भाभियों को देने लिए कह गई थीं। उन्होंने तो देह छूटने पर देने को कहा था। लेकिन दीदी ने उनको अपने हाथों से देने के लिए मनाया। दो चूड़ियां मां जी अपने होशोहवास में अपनी बड़ी बहू के हाथों में डाल गईं थीं। छोटी भाभी की रखी हुई थी जो उनके आने पर उनको दे दी गईं। कान के कुंडल मां जी ने ममता को दे दिए थे।’

‘हां मुझे मिल गई थीं चूड़ियां, मैंने वे ही तो पहन रखी हैं।’ छोटी भाभी ने धीमे से कहा। कमरे में एक चुप्पी छा गई। सुनीता दीदी के आंसू छलक आए। अब वे पिता जी के बच्चे नहीं, हिस्सेदार हैं। रंजना वॉशरूम जाने लगी।

‘थकान हो रही है, थोड़ी देर बुआ जी के साथ लेट जाती हूँ’, कहती हुई छोटी भाभी भी उठ गई। ‘चाय बनाती हूँ’ कह कर बड़ी भाभी रसोई की ओर चल दी। रंजना तीन बीघे जमीन को बेचने से आए पैसों का जिक्र नहीं कर सकी। पिता जी ममता के विवाह का इंतजाम कर गए हैं उससे। सुरेंद्र ने भी पिताजी के पेंशन वगैरह की बात नहीं छेड़ी।

फीते से नाप-नाप कर बेटों ने पिता जगदंबा बाबू के मकान के दो हिस्से कर दिए।

मकान बंट गया, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे मकान खुश नहीं है। आधा अधूरा कहां जमता है! अब यहीं पर देख लो, आगे के गेट से आना और पीछे के गेट से निकलना या पीछे के गेट से घुसो और आगे के गेट से निकल जाओ, यह तो अब मुमकिन न रहा। आम और लीची सामने वाले हिस्से में थे। वह बड़के के हो गए। आड़ू पीछे वाले आंगन में था, वह अकेला हो गया। क्षैतिज बंटवारा हुआ था। आगे यानी नरेंद्र भाई ने अपनी तरफ खुलने वाले खिड़की-दरवाजे, यहां तक कि रोशनदान बिना चूके तुरंत चिन दिए। पिछले हिस्से में दिन में भी लाइट जलाने की नौबत आ गई।

अगल-बगल से दीवार खींच दी गई। ऐसी कसावट के साथ कि इंसान तो क्या, हवा-पानी भी आर-पार न जा सके। ऐसी लाइन खिंचने से ड्राइंगरूम, रसोईघर और ऊपर छत पर जाने वाली सीढ़ी जैसे मकान के अहम हिस्से-कोने पीछे यानी छोटे के पास चले गए। खैर बड़के ने तुरत-फुरत सामने का बरामदा बंद कर बैठक, मकान को थोड़ा आगे बढ़ाते हुए रसोई, पूजाघर- सबकी तजबीज कर दी। मकान के बाईं तरफ से ऊपर जाने के लिए लोहे की सीढ़ी भी लगा दी। अभय की नौकरी लग गई थी। बड़के का हौसला बढ़ा हुआ था। काम इतनी तत्परता से हो रहा था कि रंजना और सुनीता दीदी जब भी उधर आतीं उनको अपना मायका बदला हुआ लगता।

माता-पिता के जाने से वैसे ही मायके का स्पंदन कम हो गया था, लेकिन अब घर-आंगन के बदले स्वरूप में मायके को खोज पाना कठिन हो रहा था। दो आंगनों में खेलते-कूदते बड़ी हुई थीं वे। अब एक आंगन बंद हो गया। सुरू का ताला लटका है उधर।

सुरेंद्र सालों से बंगलौर में है। नौकरी में कई मुकाम हासिल कर चुका है। वह बात अलग है माता-पिता के चेहरों पर निश्चिंतता की वह आभा कभी थिर नहीं हो सकी, जो बेटे की कामयाबी से होनी चाहिए थी। वे तो बड़के के फैले रायते को ही समेटने में खप गए थे। चाय बागान, टैंट-केटरिंग, फैन्सी मोमबत्ती निर्माण और फिर प्रोपर्टी डीलिंग जैसे फितूरों में पड़ कर बड़के ने जवानी के जोश को ठंडा कर दिया। पिता से सिवाय पैसे के उन्हें कुछ नहीं चाहिए था, सलाह बिलकुल नहीं। पिता उनके साहसिक (दुस्साहसिक) उद्यमों के फाइनेंसर बने रहे।

पिता कुछ पूछते तो पान-तंबाकू से तरबतर जिह्वा से गड्ड-मड्ड जो एकपदीय वाक्य फूटता, वह पिता के कानों तक पहुंच ही नहीं पाता। बहू से टोह लेते तो ‘साफ कभी कुछ बताते नहीं… कुरदो तो चिढ़ जाते हैं’ – इससे अधिक वह कुछ कह नहीं पाती। मां-पिता के माथे की लकीरें गहरी होती गईं। चिंता कई स्तरीय होती। पान-गुटके की तीक्ष्ण सुगंध में दबी मदिरा की गंध उनके नथुने पकड़ चुके थे। घर में असंतोष पहले ही पैर पसारे बैठा था। बाद में कलह की भी दस्तक हो गई थी। बेटियां इधर आने से कतराने लगीं।

जैसे-जैसे बुढ़ापा नजदीक आता जा रहा था, पिता का विश्वास डगमगाने लगा। लेकिन वे ताउम्र अपने इसी अयोग्य और बददिमाग बेटे के पिता बने रहे। बहुत कुछ कुर्बान किया उन्होंने अपने इस बेटे पर। रुपये-पैसों का हिसाब बताया जा सकता है, लेकिन उन्होंने रातों की जो नींद और दिन का जो चैन खोया, उसका आकलन कैसे होगा!

दो साल पहले सुरु माँ के मरने पर आया था और अब पिता के जाने पर। इस अवधि में पिता जी ने उपेक्षा का जो दंश झेला, उससे उनको मां की कही बातों का मर्म समझ में आ गया था। सब कुछ होते हुए भी जगदंबा बाबू का बुढ़ापा वैसा नहीं गुजरा, जिसके वे हकदार थे। व्यथा की जिस छाया से मां ग्रसित रहीं, वही छाया पिता के चेहरे पर भी दिखने लगी थी। धीरेधीरे इस छाया का विस्तार बेटियों के अंतर्मन तक हो गया।

इधर बेटियों का आना बढ़ा और उधर रिश्तों के समीकरण बदलने लगे। अपनी बढ़ती उपेक्षा का बेटियों को मलाल नहीं था। उनका दिल रोता था पिता के प्रति भाभी और बच्चों के व्यवहार को देख कर। कभी-कभी उनके बर्दाश्त के बाहर हो जाता। अभी पिता जी को बिस्तर पकड़े कोई ज्यादा समय नहीं हुआ था और भाभी के पास परेशानियों के वृत्तांत इकट्ठा हो गए! बात-बात पर पिता जी की दवाइयों पर होने वाले खर्चों का बखान बेटियों का कलेजा चीर देता। एक दिन रंजना से रहा नहीं गया। कह दिया- ठीक है, किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं। हमारे पिता जी समर्थ हैं। उनकी पेंशन है, किराया आता है। पिता जी के लिए सहायक रख लेते हैं।’

‘सब उन्हीं पर खर्च कर देंगे तो हम क्या करेंगे…? बेटे को भी समर्थ बनाना था न… हम भी सिर उठाकर चलते। जिसे देखो, हमें समझाने चला आता है!’

भाभी के पास जवाब हरदम तैयार रहता। बेटियां मर्माहत हो जातीं। जोखिम भी नहीं ले सकतीं। पिता जी उन्हीं की अभिरक्षा में हैं। अभिरक्षक को अप्रसन्न करने से बात और बिगड़ जाएगी।

रंजना खामोश हो गई। इसलिए भी कि अगले दिन पिता जी ने भी चुप रहने को कह दिया था। वह समझ गई उस तूफान को, जो उसके जाने के बाद बीमार पिता ने झेला होगा। इतने दबंग पिता दबाव में आ गए। इसके बाद उसने फिर कभी न पेंशन का जिक्र किया और न किराए का। कहने का कोई मतलब भी नहीं रह गया था। पिता की चैकबुक और पासबुक तभी से भाईसाहब के पास थीं, जब पिता जी प्रोस्ट्रेट ग्लैंड के ऑपरेशन के लिए अस्पताल भर्ती हुए थे। बेटियां पिता की लाचारी देख बेचैन होने लगीं। वे अपना काम जैसे-तैसे निपटा कर पिता के पास चली आतीं। पिता के लिए बहुत कुछ करना चाहतीं, लेकिन कर नहीं पातीं। आते हुए जितनी व्यग्र होतीं, लौटते वक्त उतनी उदास।

ममता बीसवें साल में है। अपने दोनों भाइयों से बड़ी। बी.एस-सी. के अंतिम वर्ष में। बुआ को देख कर जो निश्छल प्रेम और हर्ष उसके चेहरे पर पहले टपकता था, वह अब जाने कहां गायब हो गया! बुआओं का अपार स्नेह मिला है बच्चों को। रंजना उनके साथ खेली भी है। आज यह कैसी खेमेबाजी? वे जब भी पिता जी को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करती, ममता मोर्चे पर आ जाती अपनी मां की वकील बन कर। वे हैरान भी होती कि जिन बच्चों के लिए पिता जी इतनी जोड़-तोड़ करते रहे, उनके लिए वे इतने गैरजरूरी कैसे हो सकते हैं!

भाभी कोई भी बात कर लेती हैं बच्चों के सामने। ‘भाभी, धीरे बोलिए, बच्चे नजदीक ही बैठे हैं’, पिछली दफे रंजना ने आगाह किया तो भाभी तपाक से बोली थी- ‘अच्छा है, सुन लें, दुनियादारी सीख लेंगे, मेरी तरह बेवकूफ तो नहीं बनेंगे।’ ऐसे वातावरण में बालमन की निर्मलता आखिर कब तक बरकरार रहती।

‘बुआ, कल दादा जी ने बेहिसाब खा लिया और फिर उल्टी कर दी…। मम्मी उस समय खाना खा रही थी…। अब दादा जी को पेशाब का पता ही नहीं चलता, पाजामे में ही कर देते हैं। मम्मी थक गई हैं। पहले दादी को देखा… अब… चाचा को तो कभी कोई मतलब रहा नहीं।’ ऐसे तमाम वाक्य बेटियों को गहरे विषाद से भर देते। मन करता, पिता जी को अपने घर ले आएं।

मां जी तो कभी-कभी आ भी जाती थीं, लेकिन पिता जी टस से मस नहीं होते अपनी जगह से। अपनी कुरसी, अपनी थाली, अपना पलंग, अपना घर – सब उनके लिए आत्मवत हो गए थे। जिद करें तो वे ‘मैं अपने घर में ही मरना चाहता हूँ ’ का ब्रह्मास्त्र छोड़ देते।   

भाभी की जैसे-जैसे उम्र बढ़ रही थी, वैसे-वैसे उनके स्वभाव में तल्खी आ रही थी। उस दिन जब साबुत चने की दाल पिता जी ने छोड़ दी थी तो रंजना ने सिर्फ इतना बोला था- ‘भाभी, शायद पिताजी खा नहीं पाए होंगे, दांत भी तो न के बराबर हैं …पिता जी के लिए तो धुली मूंग, अरहर-मलका ठीक रहेगी।’

भाभी पलट कर बोलीं- ‘दांत नहीं हैं तो क्या हुआ, मसूढ़े अब पत्थर के हो गए हैं… वे लोहे के चने चबा लें। मन नहीं होगा खाने का, इसलिए छोड़ दिया… एक तो ये नहीं हैं घर में। जब ये सामने रहते हैं, तब बिलकुल नहीं छोड़ते…।’

क्या मतलब, जबरदस्ती निगलते हैं! रंजना को उल्टी वाली बात याद आ गई…। हे भगवान, पिता जी, आपने मां की बात क्यों नहीं मानी। आप बड़े हिसाब-किताब वाले थे, क्यों नहीं बैठाया अपना सही हिसाब? अब अपने ही घर में डर के मारे खाएंगे…! रंजना से रहा नहीं गया। लगा दिया सुरेंद्र को फोन। आखिर उस बेटे का भी तो कुछ फर्ज है।

‘पिता जी जब आ सकते थे, तब आए नहीं। अब क्या आएंगे! मैं ले भी आया तो वे यहां रह नहीं पाएंगे। …ऐसा है, वे लोग जैसा देख रहे हैं, उनको देखने दो। तुम लोग ज्यादा इंटरफेयर न करो’, बंगलौर के इस जवाब से रंजना को गुस्सा आ गया। सुरेंद्र पर नहीं, पिता जी पर। क्यों करी अपनी यह गत? क्यों नहीं मानी मां की बात? कितना किलसती थी मां।

बड़के की शादी यहीं हुई। गृहस्थी यहीं बसी। उनको पिता बनने की बधाई देने लोग यहीं आए। एक बार नहीं, तीन बार। तीन बच्चों की मां बनने के उपरांत शोभा भी सास के इशारे पर उठने-बैठने वाली बहू नहीं रह गई। उसकी अपनी सत्ता है। रसोई अब उसकी है। पड़ोस में उसकी अपनी सखी-सहेलियां हैं, अपना समाज है, अपने आयोजन हैं। अपनी खरीददारियां हैं। जिंदगी से संवाद कैसे करना चाहिए, यह उनसे सीखा जा सकता है। सभी ने जान लिया कि सीधी कमर वाली शोभा ही अब असली मालकिन है।

बहू का संवाद ससुर जी से सीधे होता था। सास को तवज्जो देने की उसको जरूरत महसूस नहीं हुई। उनका कहा कुछ सुनना ही नहीं है तो जवाब क्या देना! मां भीतर ही भीतर छीजने लगीं। बेटियां सब महसूस करने लगी थीं। एक तो भाभी की स्वायत्तता कई मौकों पर उनको हैरान कर देती थी। उस दिन जब नजरें भाभी के पैरों में छनकती उस भारीभरकम पाजेब पर पड़ी तो वे हतप्रभ हो गईं। वह मां की पाजेब थी।

क्या मां जी ने निस्तारण कार्य शुरू कर दिया है! यह तो बड़ी जल्दी है। मौका मिलने पर पूछा तो और धक्का लगा। बात ही ऐसी थी। दरअसल कॉलेज के किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए ममता ने दादी से मांगी थी। दादी ने खुश होकर दे दी। कार्यक्रम हो गया। ममता ने दादी को वीडियो दिखाया। दोनों पाजेबों को जोड़ कर माला बना ममता ने गले में डाली हुई थी। बिलकुल रानी लग रही थी। दादी और खुश हो गई। लेकिन जब चार-पांच दिनों बाद पाजेब भाभी के पैरों में दिखी तो मां सकते में आ गईं। बोलीं कुछ नहीं। मां ने फिर देर नहीं की। अपनी गठरी की चीजें दोनों बेटियों में बांट दी।

‘इतनी आफत क्या है, फिर देख लेंगे’, सुनीता दीदी ने रोकना चाहा लेकिन मां नहीं मानीं। ‘पिता जी से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। पेंशन के पैसे जोड़-जोड़ कर इन बच्चों के नाम एफ. डी. बनाते रहते हैं… दो-एक शोभा के नाम से भी बना रखी हैं। जो मैं दे रही हूँ, वही मायके की आखिरी सौगात समझ कर पकड़ लो। बाकी जब देह छूटेगी तब हाथों की ये चार सोने की चूड़ियाँ दोनों बहुओं की हो जाएंगी।’

सरकारी नौकरी से रिटायर जगदंबा बाबू की पेंशन है, किराया है। जमा पूंजी से आने वाला ब्याज भी है। उनको दुनियादारी की अच्छी समझ है। अभी परिवार के मुखिया, हर्ता-कर्ता, पहचान -सब वही हैं। शादी-ब्याह के निमंत्रण पत्रों से लेकर  बिजली-पानी के बिलों और नगर पालिका के नोटिसों तक में उन्हीं का नाम चल रहा है। लेकिन वे जानते हैं कि बच्चों को दादा के नाम से अधिक पिता की पारिवारिक और सामाजिक हैसियत की जरूरत होती है। उन्होंने बड़के के लिए प्रेमनगर की तरफ चाय का बाग लिया। बड़के में न पिता जैसी कर्मठता है, न चतुराई। बाग को ताश-पत्ती का अड्डा बना दिया। कुछ सालों तक सब्र किया। नुकसान झेला। पर ऐसा आखिर कितने दिन चल सकता था!

फिर जमीन तो जोर की, नहीं तो किसी और की। जब बगल के बाग वाले से जमीन को लेकर रोज की तनातनी होने लगी, तब जगदंबा बाबू ने वहां से निकलने में ही अपनी खैरियत समझी। उसकी तरफ की बाईस बीघा उसी के जैसे एक दबंग को बेच दी और तीन बीघा रोक कर, पुख्ता चौहद्दी करके मामले का पटाक्षेप कर दिया।

अब बड़के का अपना ऐसा कोई उद्यम था नहीं कि उन्हें दौड़-धूप करनी पड़े, लेकिन पिता की सल्तनत को बचाने-थामने की जिम्मेदारी से वे बच नहीं पाए। शहर का विस्तार हो रहा है। गांव नगरपालिका की जद में आ गए। दूर गांव की जमीन सीलिंग में आने लगी। सभी अदालत गए। जगदंबा बाबू भी गए। वकील-फीस तय करने के बाद मुकदमे का दारोमदार बड़के को सौंप दिया। मुकदमा जिला न्यायालय के बाद हाईकोर्ट गया। बड़के की भाग-दौड़ और परेशानी जगदंबा बाबू को दबा देती। वे खर्च का हिसाब नहीं मांग पाते। जो पकड़ाया, समझो गया।

खैर, लक्ष्मी जगदंबा बाबू पर प्रसन्न थी। कोर्ट में वह जमीन कृषि भूमि साबित हुई। वे न केवल मुकदमा जीते, बल्कि अच्छा-खासा मुआवजा भी पा गए। बाद में तो जमीन ही बेच दी। मां जी ने पीछे पड़-पड़ कर मिली रकम में से एक-एक लाख बेटियों को दिलवा दिए। अभी भी बेटियों को या तो चोरी से मिलता है या छीना-झपटी करके। 

बाकी बड़का कमजोर ही रहा। लेकिन भाभी ने पति को अपनी कमजोरी मानने से इनकार कर दिया। ‘क्यों, सारा दिन लगे तो रहते हैं। बैंक ये जाएंगे, डाकखाने ये जाएंगे, कोर्ट-कचहरी ये झेलेंगे। अब क्या जान लेनी है!’ भाभी के मुख से निकलते ऐसे वचनों से एक लकीर खिंच जाती। साफ दिखाई देता कि लकीर के एक तरफ भाई-भाभी और उनके तीनों बच्चे ममता, अभय व अमन हैं और दूसरी तरफ मां-पिता जी।   

रंजना के पास एक ही चारा होता कि वह यथासंभव अपना व्यवहार सामान्य रखे। वह भाभी का अनादर नहीं चाहती। वह छोटी थी, जब भाभी आई थी। उसके कहने पर भाभी उसके लिए तिकोने परांठे बनाती थी। उसके सूट सिले हैं भाभी ने। उसकी सहेलियों का सत्कार किया है। दरअसल सारी जवानी पिता की आराधना सुन-सुन कर अब भाभी खिन्न हो गई हैं। ‘चरण धोकर पियो ऐसे सास-ससुर के’ मौसी ने न जाने कितनी बार दोहराया होगा उनके सामने। एक बार निकला था उनके मुख से- ‘उधार की जिंदगी है हमारी।’ क्यों कहा भाभी ने ऐसा? क्या यही है अस्तित्वमूलक पहचान का संकट!

इसीलिए कहा जाता है कि हरेक को अपना स्पेस चाहिए, निजता… एक ऐसा घेरा जहां कोई और न हो। किसी की छाया तक न हो। केवल वह हो, और वह भी वह, जैसा वह है।

मां को भी अपने लिए इसकी जरूरत थी, बेटियों को भी। संवेदना पर किसी प्रकार की कुंठा संबंधों का रस पी लेती है। मां, पिता जी की तरह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन स्त्री थीं। वे स्त्री-संवेदना को महसूस करती थीं। ससुराल में पति और पति का स्थान विवाहिता का अस्तित्व होता है। ‘आपको नरी की जो मदद करनी है, करते रहिए। लेकिन उसको अलग अपने हिसाब से रहने को कह दीजिए’ -ऐसा मां जाने कितनी बार कह चुकी थीं। पिता जी यहां पर चूक गए। बाद में खुद शून्य बन गए।

रंजना ‘मौसी’ नहीं बनना चाहती थी। उसको तो वैसे भी भाभी में मां की छवि दिखती है। वह आती और जितनी देर रहती, पिता जी के कपड़े-बिस्तर ठीक कर देती। गंदे कपड़ों का समाधान करती। कभी-कभी तो बटोर कर थैले में अपने घर ले आती। वह सहायता करना चाहती थी, प्रदर्शन नहीं। वह भाभी का हाथ बटाना चाहती थी, उनका दिल दुखाना नहीं। उसका हृदय भाभी की टिप्पणियों में छलकती उनकी भग्नाशा से भी आर्द्र होता था। क्या करे, मायका है और मायके की पीर है…!