
वरिष्ठ लेखिका। ‘अब न नसैहों’, ‘धीरे-धीरे मना’ (कहानी संग्रह), दृष्टि (निबंध संग्रह)।

‘मम्मी, आपको कितना टाइम लगेगा? मुझे भूख लग रही है।’
‘बेटा, मैं मीटिंग में हूँ…थोड़ी देर रुक जाओ, मैं खुद बात करूंगी’, कहते हुए मेज की साइड में झुकी पल्लवी ने फोन बंद कर दिया। बेटी का रिस्पांस भी नहीं पहुंचने दिया। मोबाइल पर्स में खिसकाया। खुद को दबाकर फिर मीटिंग में घुस गई। मातृत्व पर भारी पड़ जाती है नौकरी कई दफे।
‘मैडम निशा, आपकी ब्रांच टारगेट अचीव नहीं कर पाई?’ जोनल हेड ने सिकोई सब एरिया की ब्रांच मैनेजर पर सवाल दागा।
‘सर, पहले का डेफेसिट कवर करने में लगे हैं। मुझे बड़ी खराब हालत में मिली थी यह ब्रांच’, निशा मैम ने अपना बचाव किया।
‘पिछले क्वाटर में भी आपने यही कहा था। चीफ मैनेजर हैं आप। एक साल हो गया आपको यहां। बार-बार यह नहीं चलेगा। एडवांसेज पर कोई काम नहीं हुआ… कोर्ट के मामले भी बढ़े हैं’, बैंक के जोनल हेड ने फाइल पर नजर टिकाए कहा।
‘सर, हम तो पूरी कोशिश कर रहे हैं’, कहते-कहते निशा का स्वर धीमा हो गया था। थकान से चेहरा पहले ही कुम्हलाया हुआ था, अपमान ने और काला कर दिया।
‘काम बोलता है मैडम। तरीका बदलिए। अगली मीटिंग में रिजल्ट दिखना चाहिए’, कहकर जोनल हेड ने अपनी टिप्पणी लिखी और फाइल एक तरफ रख दी।
मीटिंग खतम हो गई थी। पल्लवी की ब्रांच की परफॉर्मेंस अच्छी थी। सारे टार्गेट अचीव कर लिए थे। ‘आपकी ब्रांच अच्छा कर रही हैं,’ कहकर जोनल हेड ने जिस प्रकार उसके काम का संज्ञान लिया, उससे पल्लवी का रात्रि का स्पर्श करती ढलती शामों तक ऑफिस में टारगेट को लेकर जूझना सार्थक हो गया।
पल्लवी की परफॉर्मेंस हमेशा अच्छी रहती है। खराब से खराब ब्रांच को उसने अधिक समय लिए बिना पटरी पर चढ़ा दिया। खराब कस्टमर सर्विस के लिए बदनाम ब्रांच को लोकप्रिय शाखा में रूपांतरित करने में सब उसकी प्रबंधकीय कुशलता और लोक लुभावन ग्राहक सेवा का लोहा मानते हैं। पिछले दस वर्षों की बैंकिंग सेवा में उसने अपनी धाक जमा दी। इसका सिला भी मिला उसे। समय-समय पर इन्सेंटिव तो मिलते रहे, ट्रांस्फर ड्यू होने पर इसबार उसने अपना गृह जनपद देहरादून मांगा तो विभाग ने संवेदना दिखाई। चौंका भी। इससे पहले वह दिल्ली में थी। अलकापुरी, डिफेंस कॉलोनी, मुखर्जी नगर जैसे व्यस्त शहरी क्षेत्रों में नौकरी करने के अलावा उसने कोयली जैसे ग्रामीण क्षेत्र का मेंडेटरी दौर भी दिल्ली में ही निकाल लिया। दिल्ली जैसे घमासान राज्य में बैंकिंग जैसी जटिल सेवा करने के उपरांत जब उसने देहरादून का विकल्प दिया तो जी. एम. भी चौंक गए।
‘अरे, देहरादून! देहरादून तो बहुत छोटा है तुम्हारे लिए। चीफ मैनेजर की बस एक पोस्ट है वहां। तुमको तो हम मुंबई भेजने की सोच रहे थे। मुंबई बहुत अच्छा रहेगा करियर के लिए। सोच लो पल्लवी शर्मा, लोग तो जैक लगाते हैं मुंबई के लिए।’
‘थैंक यू सर, लेकिन बेटी के कारण मैं देहरादून चाह रही हूँ, घर है मेरा। अभी तक हसबैंड की पोस्टिंग भी यहीं थी, सो चल गया। अब उनका ट्रांसफर असम में शिलांग हो गया है। अकेले मेरे लिए मुश्किल होगा।’
अभिषेक सेना में मेजर हैं। पूरे पांच वर्ष दिल्ली में रहने को मिल गया। पहले दो साल हैदराबाद से दिल्ली पोस्टिंग के और बाद के तीन साल स्टडी लीव। दिल्ली आईआईटी से एम.टेक. की उपाधि हासिल कर ली। अब फील्ड पोस्टिंग में शिलांग मिला है।
बेटे के बीवी-बच्चे देहरादून आ रहे हैं, सोनी के दादा-दादी में खलबली मच गई। बीवी-बच्चा कहना चाहिए। लेकिन बोला तो बीवी-बच्चे जाता है। नए शब्द युग्म गढ़ने पड़ेंगे अब। सोनी नौ साल की हो गई। अभी तक एक ही है। आसार भी नजर नहीं आ रहे। लेकिन बच्चा एक ही है तो क्या हुआ, अहसास तो ऐसा फैला रखा है जाने कितने बच्चे हैं। सोनी का प्ले रूम, सोनी का स्टडी रूम, बैड रूम… यानी जहां पहले एक कमरे में कई बच्चे रहते थे, वहां अब तमाम कमरे और बच्चा एक।
बेटा दूर शिलांग में और उसका परिवार अपने पुश्तैनी घर देहरादून में। अनायास दादा जी गहरे दायित्व बोध से घिर गए। वे तो एक आलस्य भरी जिंदगी जी रहे हैं लंबे समय से। जब तक टल सकता है, चीजों को टालते रहते हैं। अब कहां टाल पाएंगे। अभी चाहिए तो अभी लानी पड़ेगी। जो ठीक करना है, वह अभी करना होगा। क्या होगा आज के बच्चे तो बहुत आग्रही हैं। जो चाहिए, वही चाहिए। समझौता शब्द तो है नहीं उनके शब्दकोश में। बहू की बैंक की नौकरी। जाएगी तो सुबह साढ़े नौ बजे मगर वापस कब आएगी, कुछ नहीं पता। ‘अभी मम्मी नहीं आईं,’ अक्सर सोनी का यही जवाब होता जब भी वे शाम की तरफ सोनी को फोन लगाते। सारी बातों का जायजा लेते-लेते दादा जी को नर्वसनेस होने लगी। बार-बार दादी से कहते, बस, यह ध्यान रखना, बच्चों को कोई परेशानी न हो। हमारे भरोसे आ रहे हैं वे यहां। परीक्षा है हमारी…।
‘किस बात की परीक्षा! मैं नहीं रही क्या गांव में सास-ससुर के साथ बच्चों को लेकर। आप तो फौज की नौकरी में अधिकतर बॉर्डर पर रहे। जब कमीशन हुआ तभी तो लेकर गए थे अपने साथ। तब भी ससुर जी नहीं भेजना चाहते थे’, कहते हुए दादी ने दादा जी का इतिहास खोला।
‘पिताजी को विश्वास नहीं था मुझ पर। सच तो यह है कि मैं भी घबरा रहा था’, यादों के गह्वर में डूबते दादा जी के मुख से निकला।
‘फिर संभाल लिया था न आपने। बहुत अच्छे से संभाला। तीनों बच्चे होशियार निकले’, कह कर दादी ने जोश भरा।
‘वो अलग समय था। जैसा घर के बड़े रखते थे, सब उसी में ढल जाते। अब तो सबको अपना स्पेस चाहिए…।’
‘स्पेस चाहिए तो बनाएं अपने लिए। हमारे पास जो है, हम दे रहे हैं। बाकी तुम जैसा चाहते हो, कर लो’, कहते हुए दादी ने थोड़ा बल देते हुए आगे कहा, ‘पहली बात तो आप यह जान लो कि वे हमारे घर नहीं आ रहे हैं, अपने घर आ रहे हैं…। सारी परेशानी इस सोच की है।’
‘ठीक है, लेकिन एकदम से तो सब उनपर छोड़ देना सही नहीं है। शुरू में तो हमीं को देखना होगा।’
दादी ने कहने को तो कह दिया कि वे अपने घर आ रहे हैं, लेकिन सच्ची बात यह है कि वे भी दबाव महसूस करने लगी थीं। दोनों बहू और सोनी की नजर से अपने मकान का मूल्यांकन करने लगे। कई खामियां नजर आईं।
‘अब कहां-कहां ठीक कराएं! कितना तोड़ें-फोड़ें! ऐसा करते हैं, बहू को ऊपर का सेट दे देते हैं। ऊपर तो बहुत बाद में बना है। वह उतना पुराना नहीं लगता। बाकी जैसा मां-बेटी चाहेंगी, कर लेंगी। अब आपकी उम्र थोड़े न है, मजदूर-मिस्त्री करने की’, पत्नी ने कहा।
दादा जी को बात जंच गई। ऊपर के कमरे बने अभी सातेक साल ही हुए हैं। ‘ठीक कह रही हो। हालांकि आजकल तो समय भागता है। सात दिन में चीज पुरानी हो जाती है, सात साल तो बहुत होते हैं। चलो, फिर भी…।’
देहरादून में दादा-दादी कोई हाल-फिलहाल के कहीं से आए वाशिंदे नहीं हैं। उनका जीवन ढल गया इस पहाड़ी आबो-हवा और मैदानी चाल-चलन वाले शहर में। करीब पैंतीस-चालीस बरस तो हो ही गए हैं उनको देहरादून में मकान बनाए। ऊंची होती अट्टालिकाओं वाले आज के सघन, बदहवास शहर देहरादून में किसी जमाने के पॉश इलाके डालनवाला में तीन बीघे के क्षेत्र में फैला शर्मा दंपती का आशियाना देहरादून की पुरानी पहचान की बची-खुची निशानियों में आराम से शुमार हो सकता है।
‘बेटा, तुम अपने हिसाब से सेट कर लो। तुम्हें तो नौकरी पर जाना है। हमारा क्या, रिटायर लोग। न कहीं जाना, न कहीं आना’, पल्लवी के देहरादून पहुंचते ही दादा जी ने ऐलान कर दिया। सामान का ट्रक भी पहुंच गया था। सामान के अंबार पर नजर पड़ी तो सोच में पड़ गए थे। ऊपर दो ही कमरे हैं। उनमें तो इतना नहीं समा पाएगा।
‘जिसके बिना काम चल सकता है, उसको मत खोलो। नीचे गैराज में रखवा देंगे’, तत्काल सुझाव दे दिया।
‘पापा, सब हो जाएगा। आप बिलकुल चिंता न करिए। बस, आप लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।’
दादा जी को सचमुच बड़ी राहत मिली बहू के इस सुलझे रवैये से। वे यह भी देख रहे थे कि बहू ने ड्राइवर के सहायकों से हाथों-हाथ सामान ऊपर धरवा लिया। कामवाली से नजदीक की हलवाई की दुकान से गरमागरम समोसे मंगवा लिए। ट्रकवालों को बदा भुगतान के अलावा सामान रखने-धरने का मेहनताना पकड़ाया। चाय-नाश्ता कराया और सलाम ठोकते सहायकों को खुशी-खुशी अपने दरवाजे से विदा कर दिया।
बहुत दिनों बाद घर की फिजा बदली है। अमेरिका से अंजलि का फोन भी आया। चहक रही थी- ‘बहुत अच्छा हुआ। छोटी भाभी आप लोगों के पास आ गईं। अब अकेलापन नहीं लगेगा। हम भी चैन से रहेंगे।’
बंगलौर से बड़े की भी बधाई आ गई थी। दादा जी अब खुद को इतना बूढ़ा महसूस नहीं कर रहे थे जितना वे समझने लगे थे। एक प्रकार से बुढ़ापे की लत पड़ गई थी उनको। ‘हमारा क्या, कब्र में लेटे हैं, मिट्टी पड़नी बाकी है’ –तकियाकलाम हो गया था उनका। उनके घर में इतनी आवाजाही हुई, उनको कुछ नहीं करना पड़ा। सब खुद ब खुद होता चला गया। वह भी इतने खुशनुमा माहौल में – ऐसा आज पहली बार हुआ। उनकी तो अक्सर झड़प हो जाया करती है ऐसे मौकों पर। किसी न किसी बात पर उलझ ही जाते हैं वे कामवालों से। कभी काम पसंद नहीं आता, कभी पैसे ज्यादा लगते।
दादी भी कई बार बाहर-भीतर कर चुकी हैं। दो-एक बार ऊपर का भी निरीक्षण कर आई हैं। ‘मम्मी, बाथरूम आपको नया बनाना पड़ेगा। पुराने ढंग का है’, सोनी बाथरूम से निकलते हुए बोली। दादी ने झांका। सकुचा गई। आजकल के स्टेंडर्ड का नहीं लगा। ‘श्यामा से साफ करने को कहा था, अलग से पैसे दिए। मगर कहां करते हैं ये लोग कुछ भी ढंग से। हमारे बुढ़ापे का फायदा उठाते हैं’, कहते-कहते दादी खिसिया-सी गई।
‘मां जी, सब ठीक है।’ कहते हुए पल्लवी सोनी से मुखातिब हुई, ‘सोनी यह भी तो देखो कितना बड़ा है- कमरे जैसा। वाशिंग मशीन आराम से फिट हो जाएगी। साफ भी है। बहुत दिनों से अनयूज्ड रहा, इसलिए ऐसा लग रहा है। कल अर्बन क्लैप को कह देंगे। चमक जाएगा’, कहती पल्लवी फ्रेश होने बाथरूम में घुस गई।
दादी ने पहली दफे ‘अर्नब क्लैप’ शब्द सुना। यकायक वे एक नई सदी में आ गईं। सालों से बंद कमरे भी गुंजायमान हो गए थे। देखते-देखते पल्लवी ने ऊपर अपना सब व्यवस्थित कर लिया। नए परदे लग गए। कमरों का मिजाज ही बदल गया।
‘पापा, सोफे को अगर ऐसा कर दें तो और स्पेस निकल आएगा। चेंज आपको अच्छा लगेगा’, कह कर उसने नीचे भी थोड़ा-बहुत बदल दिया था। बाहर गमलों पर भी उसकी नजर पड़ चुकी थी।
एकाएक पल्लवी पर काम का दबाव बढ़ गया। मगर उसे यह दबाव उस दबाव के सम्मुख कुछ नहीं लगा जो दिल्ली में ‘सोनी को किसके पास छोड़े’ सोचते हुए महसूस होता था। नेट, ऐप्स और कार की तिगड़ी से उसने सब कुछ अपनी मुट्ठी में किया हुआ था। श्यामा को उसने और साथ ले लिया। मैडम के साथ श्यामा की भी चटक बढ़ गई थी। घर में श्यामा को दिशा निर्देश देकर वह बाहर के जरूरी कामों को करने में लग गई। सबसे पहले सोनी का स्कूल पक्का किया। बात तो पहले से ही चल रही थी। बेटी का एडमीशन शहर के अच्छे स्कूल में हो गया। सबको बड़ी राहत मिली। स्कूल घर से दूर भी नहीं है। स्कूल वैन से आना-जाना हो जाता है।
‘बेटा, तुम अपने रुटीन को फोलो करो। हम रिटायर लोग हैं। किसी काम को लेकर हमारे कारण रुकने की जरूरत नहीं है। हम लोग एकदम सुबह नाश्ता नहीं करते। तुम्हारी सास की पूजा जरा लंबी होती है…। यह समझ लो कि हमारी घड़ी में मिनट की सुई नहीं है’, कह कर दादा जी ने बहू को छूट दी या खुद को निरापद किया- यह तो भगवान जाने।
‘ठीक है पापा। मैं भी यही सोच रही थी कि हमारी प्रेजेंस से आप लोग कहीं डिस्टर्ब न हो जाएं। थोड़ा ऊपर ठीक करवा लूं। तब हम ऊपर ही खाना-पीना करने लगेंगे।’
कीचन मॉड्यूलर हो गया। गीजर लग गया। थोड़ा वुडवर्क भी हुआ। पीछे का बरामदा कवर करवा दिया। बारिश बहुत होती है देहरादून में। कवर होने से कपड़ों के भीग जाने की चिंता नहीं होगी। कीचन मॉड्यूलर बना तो पकवानों की रंगत बिखरने लगी। सारे घर में खुशबू फैल गई। ‘मां जी, आज शाम को आप खाना मत बनवाना। मैं इडली-सांभर बनाऊंगी… दादी मम्मी का फोन आया है, वे शाम को चटनी-डोसा बनाएंगी। नीचे मत बनवाना…। बीबी जी, मैडम दही-बड़े तैयार कर रही हैं। साहब को तो बहुत पसंद है…,’ आए दिन दादा-दादी की समझो दावत होने लगी। कहां तो लगातार मूंग की दाल, खिचड़ी और ब्रेड-बटर खाने से उनकी जिह्वा ने बगावत करनी शुरू कर दी थी, कहां अब ‘आज बहू नया क्या बना रही होगी,’ सोच कर ही उनकी स्वादेंद्रियां चंचल होने लगती हैं। ‘बिगाड़ तो नहीं होगा,’ दादी अक्सर कहतीं। थोड़ा झिझक जातीं। मन भर कर नहीं खा पातीं। पल्लवी भी डरती। जिद नहीं कर कर पाती।
असल में पल्लवी ने उनको जब-तब दवाइयों का जिक्र करते सुन लिया था। एक दिन पूछ ही लिया – ‘ये आप किसलिए ले रहे हो? किसने प्रिस्क्राइब्ड की है? कब से खा रहे हो?’ इसपर दादा-दादी ने एक-दूसरे की बात काटते हुए जो जवाब दिया उससे पल्लवी को एक ही बात समझ में आई कि दोनों को फिजीशियन के पास ले जाना जरूरी है। ‘डॉक्टर का परचा होगा?’ पल्लवी ने पूछा ही था कि घर में विकट खोज अभियान शुरू हो गया। दोनों आलमारी उलट-पुलट करने लगे। एक-दूसरे पर दोषारोपण का दौर चलने की संभावना उभरने लगी।
‘रहने दीजिए, उसकी जरूरत नहीं है’, कहकर पल्लवी ने बात वहीं पर बुझा दी।
महीने के चौथे शनिवार का अप्वॉन्टमेंट लेकर पल्लवी दादा-दादी को शहर के जाने-माने काय चिकित्सक डॉ. नागेंद्र की क्लीनिक ले गई। नया परचा लेकर जब तीनों क्लीनिक से बाहर निकले तब दादा जी के चेहरे पर खिसियाहट थी। जिन दवाइयों का वे सेवन कर रहे थे, उनमें से कुछ का औचित्य सिद्ध नहीं कर पाए। दादी खुश थी। अब दवा लेने में चूक होने से पड़ने वाली डांट से उनको मुक्ति मिल गई। अब तो केवल टॉनिक लेना है। बीपी भी नॉर्मल निकला। ऐसा कोई खास परहेज भी नहीं बताया। दादी चहक रही थीं। पल्लवी गंभीर दिखी। उसको यह समझ में आ गया कि सबकुछ इनपर नहीं छोड़ा जा सकता। कम से कम दवाई तो बिलकुल नहीं। अपने डॉक्टर खुद ही बने हुए हैं।
घर आकर उसने सारी फालतू दवाइयों को हटाकर डिब्बे को नए सिरे से व्यवस्थित कर दिया। दवाइयों के ऊपर लाल-काले मार्कर से सुबह-शाम लिख दिया। परचे और दवाई की रसीद की फाइल बना दी।
बहुत जल्दी ही पल्लवी अपनी नई पोस्टिंग में रम गई। अपनी कार्यनिष्ठा और पेशेवर कार्यशैली से उसने ब्रांच का रुतबा बढ़ा दिया। ग्राहकों की परेशानियों को चुटकियों में सुलझाने से स्थानीय लोगों में उसका सम्मान बढ़ने लगा। लक्ष्य सिद्धि को लेकर वह बहुत आग्रही है। स्वाभाविक था कि ब्रांच अपने टार्गेट एचीव करने लगी। अधिकारियों की बैठकों में उसकी प्रशंसा का दौर शुरू हो गया। विशेष अवसरों पर उसको सम्मानित किया जाने लगा। प्रमाण पत्रों और स्मृतिचिह्नों के, और, कभी-कभी परिचितों के जरिए उसके यश की सुगंध घर भी पहुंचने लगी। घर गौरवान्वित महसूस करने लगा। दादा-दादी में एक नई ऊर्जा का संचार होने लगा।
ऊर्जा, सकारात्मक ऊर्जा का संचार चारों ओर से हो रहा था। ‘पापा, शाम को तैयार रहना, आज शादी में जाना है न’, जब-तब पल्लवी की घोषणा हो जाती। वे सतर्क हो जाते। कहां वे जुगत में रहा करते थे कि कोई उनको अपने साथ ले जाए या फिर शगुन का लिफाफा ही ले जाए। कहां अब वे शादी-समारोह में खुद शामिल होने लगे।
एक तो शहर में भीड़ इतनी हो गई है कि दादा जी ही क्या, किसी भी ढलती उम्र के शख्स की गाड़ी में हाथ लगाने की हिम्मत नहीं होती। नजर अलग कमजोर हो जाती है बुढ़ापे में। कार गैराज में जाने कब से धूल खा रही थी। पल्लवी आई तो कार ने भी धूप देख ली। ‘कार चलनी चाहिए’ कहकर वह बीच-बीच में दादा जी की कार निकाल लेती। कार बंद पड़ी है- इस कुंठा से कार ही बाहर नहीं निकली, दादा जी भी बाहर आ गए। लेकिन उनका असली आत्मविश्वास तो तब पुनर्जीवित हुआ जब वे अपने बूते सोनी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग में शिरकत करने गए। दादी भी साथ में थीं।
एक प्रशिक्षण के सिलसिले में पल्लवी का तीन दिनों के लिए बरेली जाना हुआ। इसी बीच सोनी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग पड़ गई।
‘पापा, इस बार आपको जाना होगा’, कहकर पल्लवी ने अपनी विवशता बताई।
‘मुझे…मैं…कैसे…’, कहते-कहते वे सकपका से गए। पहली बार बहू ने कोई काम सौंपा, मना कैसे करें और कार चलाने का साहस नहीं है, हां कैसे करें।
‘आप चिंता न करें। सब हो जाएगा। मीटिंग परसों ग्यारह बजे है। मैं कैब कर दूंगी। ऐसे ही जब आप स्कूल से चलने को होंगे, बस मुझको फोन कर देना। कैब आ जाएगी लेने…।’
‘पर, मैं स्कूल में… कोई पहचानेगा भी?’
‘गार्जियन में आपका नाम भी लिखवा रखा है। फोटो भी लगी है, रजिस्टर में। ऐसा करिए दादी को भी ले जाना। वे भी सोनी का स्कूल देख लेंगी।’
जैसे ही सोनी को पता चला कि पेरेंट्स मीटिंग में दादा-दादी आएंगे इस बार, उसने दोनों की फैशन परेड निकाल दी। दादी की कई साड़ियां खुलीं और दादी की कई स्मृतियां छलकीं। खैर सोने से पहले यह तय हो गया था कि उनको क्या पहन कर मीटिंग में जाना है।
मीटिंग में दादा-दादी केवल वही थे, बाकी मौजूद सब मां-बाप थे। स्कूल ने उनका विशेष ध्यान रखा। बाकायदा सोफे पर बिठाया। सोनी की उपलब्धियों से वे पहले ही गौरवान्वित थे। मीटिंग खतम हुई, सोनी ने दादा-दादी को अपना क्लास रूम दिखाया। इसी बीच मम्मी का फोन आ गया। थोड़ी देर में कैब आ गई। लौटते हुए सोनी भी उनके साथ थी। रास्ता खतम हो गया मगर उसकी बातें पूरी नहीं हुईं।
‘देखो, अभि की माँ, जवान लोगों के आने से घर भी जवान हो जाता है’, बाथरूम से निकलते हुए दादा जी के मुख से निकला।
‘घर तो नया हो ही गया है, हमारा मन भी बूढ़ा नहीं रहा। जवान हो गया है। मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी पिज्जा खाऊंगी। सोनी की बदौलत यह भी चख कर देख लिया।’
‘बनाती भी तो बहुत अच्छा है बहू। कितने किस्म की चीजें डालती है…।’
‘पूरे ढंग से बनाती है। कोई टालमटोल नहीं। जबसे नीचे की रसोई मॉड्यूलर बनी तब से काम करना आसान तो हुआ ही है, नजरिया भी बदल गया है। अब तो मुझमें भी फुर्ती आ गई है। बताओ, क्या खाने का मन है’, कह कर दादी ने दादा को छेड़ा।
‘अब समझ में आया न तुम्हारे! कितना मनाया बहू ने तुमको, तब जाकर मानी। क्या आफत मचा रखी थी तुमने… कैसे होगा…क्या होगा…। बहू ने कहा- सब हो जाएगा… उसके इस ब्रह्मवाक्य के बाद ही तुम शांत हुई। अब देखो, इतराती फिरती हो, अपने मॉड्यूलर कीचन पर। सबको फोन कर-करके बताती हो।’
‘घबरा रही थी मैं। सच्ची बात यह है कि हम ठहर से गए थे। एक रस हो गई थी जिंदगी।’
‘इस बार की दीवाली भी देखना, अलग लगेगी…। अगले हफ्ते अभि पहुंच रहा है। उसके आने से और रौनक हो जाएगी।’
‘त्योहारों में काम भी बहुत हो जाता है।’
‘ज्यादा सोचा मत करो, सब हो जाएगा’, दादा जी कह उठे।
दादी के चेहरे पर मुस्कान तिर गई।
संपर्क :176, आराघर, देहरादून-248001, मो.9410983596
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बढ़िया कहानी।
बहुत सुंदर कहानी। दो जेनरेशन के बीच की कशमकश और सुंदर निदान। संयुक्त परिवार की ओर बढ़ते कदम की अच्छी मिसाल।